गुरुवार, 30 जुलाई 2020

मित्र विजय गुप्ता की सेवानिव्रत्ति


"मित्र विजय गुप्ता की सेवानिव्रत्ति"




गुप्ता जी आज 38-39 साल की सफल और बेदाग सेवा के बाद आज 31 जुलाई 2020 को  आपकी बैंक से सेवानिव्रत्ति का दिन है एवं जीवन का एक महत्वपूर्ण पढ़ाव भी। गुप्ता जी तुम्हें याद तो होगा ही आज जब आपका  बैंक की सेवा से रिटायरमेंट है और इन्ही दिनों के अरीब-करीब 1985-86 मे अपनी पहली मुलाक़ात ग्वालियर शाखा मे हुई थी जब आप सीतापुर (उत्तर प्रदेश) से स्थानांतरित होकर ग्वालियर आये थे। उन दिनों ग्वालियर शाखा मे पहले से ही हम तीन स्टाफ सदस्य जो  झाँसी के मूल निवासी हो ग्वालियर शाखा मे पदस्थ थे। यध्यपि वे सब भी अपने स्वजन सहचर ही थे लेकिन उनकी निकटता मात्र बैंक और ग्वालियर-झाँसी के बीच दैनिक यात्रा तक ही सीमित थी। इन मित्रो के संबंध को हम कमतर नहीं आँकते लेकिन फिर भी उन रिश्तों  को प्रगाढ़ या मजबूत मित्रता के रिश्तों की कसौटी पर नहीं कसा जा सकता। वे मित्र तो थे पर मित्रता की वो भावना हम लोगो के बीच उतनी प्रगाढ़ नहीं थी।   कुछ ऐसी ही शंका उन दिनों  आपके बारे मे हमारे ज़ेहन चलती रहती थी कि कदाचित ऐसी ही मित्रता के भाव का आभाव आपके साथ भी न हो? लेकिन समय की लंबी कसौटी पर आज हमे कहते हुए फ़ख्र है कि तुम मित्रता की इस पैमाने मे अद्व्तिय रूप से अव्वल रहे। तुम्हारी मित्रता पर हमे अभिमान है गुप्ता जी।

जो अपने मित्र के दुःख मे दुःखी और सुख मे प्रसन्नता का अनुभव करे मानों कुछ मंगल उसके ही साथ हुआ है तथा जो अपने मित्र के साथ दुःख और संकट की घड़ी मे मजबूती से खड़ा रहे वास्तव मे बो ही सच्चा मित्र होता है। गोस्वामी तुलसी दास ने रामचरित मानस मे उल्लेख भी किया है:-
धीरज धर्म मित्र अरु नारी । आपद काल परखिये चारी॥

हमे कहते हुए कोई भी झिझक नहीं की तुम जैसे मित्रों ने संकट और विपत्ति मे हमारे साथ बखूबी दिया है जिसे जीवनपर्यंत हम नहीं भुला सकते। नब्बे के दशक मे हमारी व्यवसायिक  संपत्ति के विवाद मे एक तीसरे व्यक्ति द्वारा उसे अपने अधीन लेने के बल पूर्वक प्रयास के प्रतिवाद  से  उपजी हिसात्मक घटना  के पश्चात अपरोक्ष रूप से हमारे मित्र स्व॰ अनिल समधिया और तुमने जो साथ दिया था उसे एक पक्ष के नाते मै ही महसूस कर सकता हूँ। संकट की उस घड़ी मे हम तीन नहीं थे अपितु एक पे एक पे एक अर्थात 111 थे। विपत्ति की बो घड़ी आई और चली गई लेकिन इस दौरान हमारी मित्रता और मजबूत और निखरी लेकिंन  अनिल समधिया का इस असमय बिछुड़ जाना प्रायः दिल को बहुत कचोटता है।

गुप्ता जी दैनिक यात्रा मे बिताए वे अविस्मरणीय क्षण रह रह कर याद आते है। कैसे हर रोज बुंदेलखंड एक्सप्रेस मे हम 8-10 लोग सुबह का खाना एक साथ कभी ट्रेन की खाली पड़ी बोगी मे, कभी बीच रास्ते जंगल मे घंटों खड़ी ट्रेन मे छोले के पेड़ से तोड़े पत्तों पर हांस-परिहास  के बीच मुकेश रिहानी, राजकुमार खरे और दारोगा जी के साथ उड़ाई लंच पार्टियां किसी फाइव स्टार होटल की पार्टियों से कम    थी। आज आप के रिटायरमेंट के रहते आपकी माताजी का भी स्मरण हो आया। गुप्ता जी यूं तो मुनगा और सेम की सूखी सब्जी अनेकों बार हमने खाई होगी  पर आपकी माताजी द्वारा बनाई सेम और मुनगा की सब्जी की बात ही कुछ और थी। इन सब्जियों का वो स्वाद हम आज तक नहीं भूले। अदरणीय माता जी को भी हमारा स्नेह चरण वंदन कहना और आगे कोई ऐसा आयोजन अवश्य करने का प्रयास करना जिसमे उक्त दोनों सब्जियों का रसास्वादन पुनः ले सकूँ।  

तुम्हारी शादी मे वो भांग के नशे का स्वांग भरा वाक्या गाहे बगाहे याद कर हंसी छूट जाती है। कैसे पान के साथ तंबाकू के सेवन से उपजी असहज स्थिति से तुम्हें गुजरना पड़ा था। तुम्हारी ससुराल अर्थात आदरणीय भाभी जी का मायका स्थानीय होने के कारण आपके ससुर स्व. गेड़ा जी का स्मरण होना भी स्वाभाविक है। कैसे आपके सास ससुर हम पति पत्नी को भी आपके समकक्ष आदर सम्मान देकर साल मे एक दो बार परिवार सहित भोजन पर आमंत्रण देकर बुलाते रहे। आज के समय दामाद का रिश्ता निभाना ही कठिन होता है तो दामाद  के मित्र का रिश्ता निभाना तो कल्पना से परे है।

गुप्ता जी एमआईटीएस कॉलेज के बच्चों के बीच हुए झगड़ो मे एक पक्ष के रूप मे शामिल अपने बच्चों का पक्ष लिये मध्यस्था हेतु बच्चों के कॉलेज  हॉस्टल मे हम दोनों के जाने की वो भयावह रात तो याद होगी। कैसे 100-125 से ज्यादा बच्चों के बीच जब हम उस पीढ़ित छात्र से उसके तीन मंजिला हॉस्टल मे मिले थे। पीढ़ित बच्चों सहित सारे बच्चे हम सबको घेर आवेशित मुद्रा मे खड़े थे। कितने क्रोधित थे वो सारे छात्र, "बाप रे" सोच कर भी सिहरन होती है!! यदि कोई एक भी छात्र उस दिन हम लोगो की बुजुर्गीयत के लिहाज़ को अनदेखा कर अपनी सीमा लांघ न्यूनतम शिष्टाचार को तिलांजलि दे  हल्की सी भी हिंसा कर देता तो निश्चित ही हम दोनों बहुत ही गंभीर भीड़ का शिकार हो गये होते, जिसकी कल्पना से ही डर लगने लगा था। बात चीत के बाद कैसे हम दोनों दबे पाँव हॉस्टल से बगैर पीछे मुड़े तेजी से निकल गये थे। हमे लगता है वो हम लोगो का साहस नहीं दुस्साहस था। आज लगता है उस घटना मे इस तरह जाने का हमारा  निर्णय सही नहीं था।
गुप्ता जी ग्वालियर मेले मे 2 रुपए के गाने तो याद होंगे। हम चार पाँच लोग थे रिहानी, शायद खिच्ची साहब भी थे और कौन कौन था याद नहीं। बात रुपए की नहीं थी देखने बालों की भीड़ से दूर खड़े होकर एक पुलिस कांस्टेबल को पुलिस स्टाफ के रूप मे परिचय दे एक नहीं दो-दो बार वीआईपी दर्शकों की तरह एक्ज़िट गेट से कितने सम्मान के साथ शो मे ले जा कर आगे सोफ़े पर बैठाया  गया था। वे शरारते जब कभी याद आती है तो हंसी छूट ही जाती है। 

आपके हमारे और मिश्रा जी के परिवार सहित अंडमान निकोबार की यात्रा भी कम यादगार नहीं
थी। फिर चाहे कोलकाता मे ट्रैवल एजेंट द्वारा बुक  घटिया होटल को छोड़ अपनी पसंद के होटल मे ठहर ट्रैवल एजेंट से बाद मे पैसे की बसूली  जो लगभग असंभव लग रही थी फिर भी हम लोगो ने होटल के भुगतान को ट्रैवल एजेंट से बसूल किया था, लड़ाई भिड़ाई का कोई मौका नहीं छोड़ा था।  चाहे रॉस आइलेंड या हेवलॉक आइलेंड की यात्रा हो  चाहे समुद्र स्नान वो एक अविस्मरणीय यात्रा थी।   हेवलॉक से शिप से बापसी मे घनघोर वर्षा के बीच  हम सभी परिवारों का शाकाहारी होने के बीच मछलियों की तीक्ष्ण गंध के कारण भाभी जी से उल्टी की शुरुआत का जो सिलसिला चला उसके देखा देखी एक के बाद एक बाद 3-4  लोगो का उल्टी कर देना उस समय तो तनाव का कारण था लेकिन फिर उस घटना की चर्चा बच्चों सहित हम सब के बीच हास्य-परिहास का एक अनूठा किस्सा बना रहा था। आधुनिक तकनीकी से मेरे द्वारा बनाये विडियो और फोटो न जाने वीडियो कैमरा से कहाँ गायब हो गये इससे तो पुराने जमाने के निगेटिव ठीक लगते थे जब जी चाहा पीपी साइज़ फोटो एल्बम बना लेते थे और उनको देख सुनहरी यादों मे खो जाते थे। अब तो फोटो या अल्बम देखने की बाते गुजरे जमाने की बाते हो गई।

गुप्ता जी पिछले एक-सवा साल से नोएडा मे मुझे झोपड़ पट्टी के बच्चों के साथ जुडने का जो  मौका मिला उसने हमारी सोच को उद्वेलित कर एक नया आयाम दिखाया (https://www.facebook.com/pratibodhaksiksha.sansthan)। यध्यपि कोविड महामारी की बाध्यता के चलते हमे भी उक्त कार्य को अभी विराम देना पड़ा ।  जमीन से जुड़े एवं अभावों के बीच पल रहे उन बच्चों को देख लगा कि कि घर परिवार माता-पिता और बच्चों के प्रति अपने उत्तरदायित्वों के पूर्ण करने के बाद हमे आज उस वंचित समाज के लोगो और उनके बच्चों के लिये आगे आना चाहिए जो परिस्थिति वश शिक्षा से दूर अपना जीवन यूं ही व्यर्थ गंवा समाज और देश मे मिले शिक्षा के अधिकार से वंचित है। ये काम स्वार्थ परक राजनीति और भ्रष्ट व्यवस्था तंत्र के रहते सरकारों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता? समाज के लोगो को आगे आकर ही इस व्यवस्था मे बदलाव की शुरुआत करनी होगी। सेवानिव्रत्ति के बाद आज समाज के उन दबे-कुचले और वंचित वर्ग के लोगो  को कुछ बापस देने का समय है जिससे अब तक हम हर पल हर घड़ी कुछ न कुछ लेते आये है। जन्म से लेकर आज तक माता-पिता, भाई बहिनों चाचा ताऊ या अन्य अनेक नजदीकी रिश्तेदारों का उऋण तो लगातार हम अब तक  होते आये है पर उम्र के इस दो राहे पर आज  हमे समाज के इन वंचित लोगो के लिये कुछ करना चाहिये जो सब  वे न पा सके जो ईश्वर और अपने पूर्वजों के अनुग्रह से हमे प्राप्त हुआ है। ग्वालियर प्रवास पर अब समान विचारों के लोगो के साथ मिलकर हम सब इस राह मे कुछ करने का प्रयास करेंगे।

आज आपकी सेवानिव्रत्ति पर हम आपके सुखी और दीर्घ स्वस्थ जीवन की कामना करते है। आप जीवन की एक नई पारी की शुरुआत अपनी पूज्य माताजी, पितातुल्य बड़े भाई राधे श्याम भाई साहब-भाभी एवं परिवार के समस्त सदस्यों के साथ आनंद पूर्वक व्यतीत करें ऐसी कामनाओं के साथ।

तुम्हारा मित्र,

विजय सहगल
              
     


1 टिप्पणी:

विजय सहगल ने कहा…

हमारे एक मित्र और बड़े भाई समान श्री एसएल खत्री जी जो हमारे ग्वालियर प्रवास के दौरान ग्वालियर मुख्य शाखा मे मुख्य प्रबंधक थे एवं आजकल मंदसौर मे सेवानिवृत्त जीवन व्यतीत कर रहे है। उपरयुक्त पोस्ट पढ़ व्हाट्सप पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की जिसे कॉपी कर मै यहाँ उद्धरत कर रहा हूँ:-
सहगल जी मुझे सेवानिवृत्त हुए 11 साल हो गए हैं इस बीच मैं तीन बार अपने छोटे बेटे के पास अमेरिका रह कर आया हूं। अमेरिका में रहते हुए टाइम पास करने के लिए फेसबुक पर थोड़ा बहुत एक्टिव था। 2018 अक्टूबर में अमेरिका से आने के बाद से फेसबुक कभी खोलता ही नहीं हूं। परंतु आज मेरी मेल आईडी पर एक मेल आई जिसमें फेसबुक पर आपकी भेजी हुई पोस्ट के बारे में नोटिफिकेशन था Vijay Sehgal posted an update. आपका नाम देखकर मैंने वह मेल खोली और उस के थ्रू फेसबुक पर पहुंचकर आपकी पोस्ट, जो आपने श्री विजय गुप्ता के रिटायरमेंट पर, डाली थी उसे पूरा बढ़ा। बहुत आनंद आया। एक चीज मैंने नोट की है कि आपकी याददाश्त बहुत अच्छी है और यादों को भावनात्मक रूप देकर अभिव्यक्त करना आपकी विशेष कला है।
मैं सुपरएनुअटेड ओबीसियन ग्रुप का सदस्य हूं। पहले उस ग्रुप में एक दूसरे की टांग खिंचाई होती थी कोई भी पॉलिटिक्स पर किसी भी तरह की पोस्ट डाल देता था तो उसके दुनियाभर के ऑब्जेक्शन होते थे और इसी पर बहस होती रहती थी, यह सब मुझे पसंद नहीं आता था। परंतु इसी बीच अगर आपने कोई पोस्ट डाली तो उसे मैं जरूर पढ़कर आनंद लेता था। ग्वालियर में मेरी पोस्टिंग के समय आप भी थाटीपुर ब्रांच में पोस्टेड थे, अपनी आपस में बहुत ज्यादा अंतरंगता तो नहीं बन पाई पर अपने सौहार्दपूर्ण संबंध थे। मुझे याद आ रहा है, एक बार रिजनल हेड का ग्वालियर का दौरा था और कस्टमर मीट का आयोजन किया गया था। मैंने आपको उस सभा में एंकर की भूमिका निभाने के लिए कहा था जिसे आपने सहर्ष स्वीकार कर लिया था, परंतु किसी कारणवश आपको अचानक आउट ऑफ स्टेशन जाना पड़ा और एंकर की भूमिका मुझे निभानी पड़ी थी। स्वागत भाषण की शुरुआत करने के लिए मुझे आपने एक कागज पर कुछ मेटर लिख कर दिया था जिसे पढ़कर मैंने दिमाग में स्वागत भाषण की रूपरेखा बनाई थी। सभी स्टाफ व कस्टमर में उस स्वागत भाषण की बहुत तारीफ की थी।
हमारा जब भी मीटिंग आदि के लिए भोपाल जाना होता था तो हम सभी ग्वालियर एरिया के ब्रांच मैनेजर्स साथ में जाते थे और आप अपनी चुटकली बातों से यात्रा में कभी थकान महसूस नहीं होने देते थे।
हम दोनों रिटायरमेंट के बाद से मंदसौर रहते हैं। मैंने अपना घर जोधपुर में बनाया है और वहां मेरा बड़ा बेटा रहता है छोटा बेटा अमेरिका है। सबसे बड़ी बिटिया है उसकी शादी गुजरात में डीसा हुई है। मेरे दामाद जी सी ए है अहमदाबाद रहते हैं। तीनों बच्चों के 2-2 बच्चे हैं। सभी आनंद पूर्वक अपना जीवन यापन कर रहे हैं। अभी तक ईश्वर की दया, बड़ों के आशीर्वाद व दोस्तों की शुभकामनाओं से हम दोनो को किसी भी तरह का कोई रोग (बीपी शुगर आदि) नहीं है।
शंकर लाल खत्री, मंदसौर।