शनिवार, 25 जुलाई 2020

नाग पंचमी


"नाग पंचमी पर विशेष"





आज पुनः एक बार फिर नाग पंचमी है, हमारे पर्व और त्योहार प्रायः प्रकृति से जुड़े हुए है और हमको मानव और प्रकृति के बीच के संतुलन और सामंजस्य का  हर पल स्मरण कराते है जिसमे दोनों का सद्भाव पूर्वक सहअसतित्व बना रहे। त्योहार हमे समय समय पर आगाह भी करते है कि दोनों मे से कोई भी अपनी सीमा का उल्लंघन न करे फिर चाहे त्योहार होली, दीवाली, राखी गोवेर्धन पूजा, वट सावित्री अमावस्या या नाग पंचमी का क्यों न हो। नाग पंचमी वास्तव मे मानवता के मित्र, नागों, साँपों के प्रति हमारा आदर और सम्मान ही है जो प्रकृति और मानव के सहअसतित्व का अनूठा उदाहरण है और जिसका उल्लेख हमारे धार्मिक ग्रन्थों मे अनेकों जगह भी मिलता है। जिसका स्पष्ट संदेश है एक दूसरे की रक्षा करना। यदि हम साँपों की रक्षा करेंगे तो वे भी हमे फसलों को नुकसान पहुंचाने बाले जीव जंतुओं, कीट-पतंगो को आहार बना कर अन्न के रूप मे धन्य-धान प्रदान करेंगे। हम मानव समुदायों ने अपने पूर्वाग्रह से ग्रसित साँपों के बारे मे दिग्भ्रमित हो तमाम भ्रांतियाँ अपने मन मे पाल उन को मारकर उनके विनाश को अग्रसर हो परोक्ष रूप से अपना  ही विनाश किया है। टिड्डी रूपी समस्या इसका ज्वलंत उदाहरण है।  

हमे याद है बचपन मे झाँसी शहर मे नाग पंचमी का एक बहुत बड़ा मेला भूतनाथ दरवाजे बाहर बगिया (बगिया का नाम मै भूल रहा हूँ) मे लगता था। भूत नाथ गेट की किले की चारदीवारी के से लगी बगिया मे सुंदर सुंदर झकियां सजाई जाती थीं। एक दो दिन पूर्व से से ग्रामीणों के समुदाय सावन के गीत और आल्हा गाते हुए बगिया मे इक्कठे हो सारी रात लोक गीतों का गायन एवं श्रवण करते थे। प्रायः सावन की ऋतु होने के कारण वर्षात भी हो जाती थी।  नाग पंचमी बाले दिन सारा नगर मेला देखने उमड़ पड़ता था। हम लोगो के घर पानी की टंकी से एक-सवा किलोमीटर दूर बगिया तक क्या बूढ़े क्या बच्चे, महिला पुरुष  मेला देखने उमड़ पड़ते थे। तेलियों के मंदिर से तो भीड़ इतनी हो जाती कि सम्हालना मुश्किल। झूले खिलौने मिठाई की अंगिनित अस्थाई दुकाने सज जाती। पीने के पानी की व्यवस्था स्वस्फूर्त हो सभी बच्चे बाल्टी मे पानी ले अपने अपने घरों के चबूतरे पर बैठ लोगो को पानी पिलाने की सेवा करते। यद्यपि नलों से पानी की इतनी आपूर्ति न होती लेकिन हमारे घर के पिछवाड़े स्थित कुएं से कुछ लोग पानी खींचते और कुछ लोग बाल्टियों से दो ढाई सौ फुट दूर घर के चबूतरों तक पानी पहुँचते ताकि मेले देखने जाने बालों को पीने के पानी की कमी न हों।  इन सभी कार्यों की  देखरेख और अगुआई का कार्य मुहल्ले के संरक्षक के रूप जो व्यक्ति करते हम सभी उन्हे  "चुखू भाई साहब" कहते थे। उनकी  सक्रिय देखरेख मे पानी की व्यवस्था सुचारु रूप से दिन भर जारी रहती।

सड़क के दोनों ओर पूरे रास्ते मे जगह जगह कुछ बच्चे युवा बाल्टी मे पानी भर उसमे एक बहुत छोटी कटोरी या डिब्बी बाल्टी के पैन्दे मे रख लोगो को आमंत्रित करते कि जो एक, दो, पाँच दस पैसे के सिक्के बाल्टी मे भरे पानी के उपर से निशाना साध नीचे रखे कटोरी या डिब्बी मे डालेगा उसे उतनी ही मुद्रा पुरुस्कार स्वरूप मिलेगी। यानि, एक के दो, दो के चार, पाँच के दस और दस के बीस पैसे मिलेंगे। हर बाल्टी के चारों ओर बाल्टी मे पैसे डालने के खेल खेलने बालों की भीड़ लगी रहती। कोई ठीक बीच मे से सिक्का डालने का प्रयास करता कोई  विशेष कोण और स्थिति से पैसे डालने का प्रयास करता। अधिकतर लोग कभी सफल और कभी असफल होते। लेकिन कुछ लोग कैरम बोर्ड के महारथियों की तरह अचूक निशाना बना खिलाने बाले की जेब खाली कर जाते। ऐसे निशान बाज की खबर तुरंत ही लग जाने पर लोग उस निशाने बाज को खिलाने से बचते नज़र आते। पूरे शहर मे मेले का नशा दिन भर छाया रहता। शहर मे जहां तहां सपेरों को घेरे हुए बच्चे बूढ़े उत्सुकता पूर्ण नज़रों से काले नागों को देखते। बीन की आहट पर सपेरों का यहाँ वहाँ डोलना ऐसे लगता कि बीन की धुन पर मस्त हो कर नागिन डांस कर रही हो। भय मिश्रित डर से लोग साँपों के नजदीक भी आने से डरते। हर घर के लोग महिलाएं पुरुष साँपों को दूध पिलाना, तिलक, चावल पुष्प चढ़ाया जाता। मै भी अपनी माँ को साँपों की पूजा करते देख सँपेरों की बहादुरी पर अचंभित होता और उनकी ही तरह साँपों को अपने हाथ मे लेने के बारे मे  सोचता। सपेरों की भी ऐसे अवसरों पर अच्छी कमाई हो जाती। लोग पैसे के साथ पुराने वस्त्र और अन्न, मिष्ठान आदि मे उन्हे देता। एक ऐसी सामाजिक अर्थ व्यवस्था के दर्शन होते जिसमे समाज के हर वर्ग के लिये मुद्रा स्फीति अर्थात मुद्रा के विस्तार का स्थान होता। लेकिन दिसम्बर 2019 मे मेले के उन्ही मेले के  स्थलों और लक्ष्मी तालाब की दयनीय हालत देख बड़ी निरशा हुई।

छात्र जीवन मे आगे  जीव विज्ञान विषय होने के नाते इन जीव जंतुओं के बारे मे तमाम अज्ञानता और भ्रतियों का निवारण साँपों के बारे मे भी हुआ। तभी से साँपों के बारे मे पोषित डर, भय और कुधारणाओं को दूर करने के लिये बचपन मे साँप पकड़ने की चाह ने मुझे जब जब मौका मिला मैंने  हमेशा सँपेरों का उनके साँपों के बारे मे गूढ ज्ञान के कारण उनके गुरु रूपी सानिध्य मे रह साँपों को अपने हाथ मे लेना, गले मे डालना जैसे कार्य उनसे सीख अपने भय को दूर किया। लेकिन आज भी स्वतंत्र रूप से साँप पकड़ने का कार्य उस कहावत को चरतार्थ करने की मूर्खता नहीं करूंगा  कि "बिच्छू का मंत्र न जाने साँप के बिल मे हाथ डालें"। 
    
हर विषय मे सरकार से अपेक्षा करना, उनके सीमित संसाधन और स्वार्थपरक नीतियों के कारण  दीर्घ काल तक उनके भरोसे बैठे रहना न्यायोचित एवं विवेक सम्मत न होगा। आज के वैज्ञानिक युग मे जहां एक ओर  पशु क्रूरता, निवारण अधिनियम, ("पीटा एक्ट") के नियमों के चलते बकरे पर क्रूरता को दरकिनार  नाग पंचमी पर सपेरा जाति के समुदाय को साँपों के पकड़ने के नाम पर जब तब उत्पीढन किया जा रहा हो तो धार्मिक संस्थाओं को आगे आकर इन सँपेरा जाति के समुदाय के साँपों के बारे मे सोच, समझ, ज्ञान  और अनुभव का लाभ साधारण जन सामुदाय के साँपों के बारे मे पूर्वाग्रह और भ्रांतियों का निवारण कर शिक्षित करने मे तथा गाँव शहर, कस्बों, महानगरों मे आबादी के बीच निकले साँपों को पकड़ने मे  करना चाहिये जिससे उक्त समुदाय आर्थिक विकास भी होगा और जन साधारण का साँपों के बारे मे ज्ञानवर्धन भी। 
   
विजय सहगल
          

कोई टिप्पणी नहीं: