रविवार, 28 अप्रैल 2019

सेवानिव्रत बेरोजगार


सेवानिव्रत बेरोजगार




युवा अवस्था मे जब रोजगार की तलाश थी तब चाहत थी एक अदद नौकरी की ताकि नौकरी कर अर्थ उपार्जन किया जा सके। प्राथमिकता धन अर्जन थी। पर आज लगभग 40 साल की बैंक सेवा के बाद जब अप्रैल 2018 मे सेवानिव्व्रत हुआ तब कभी सोचने का समय ही नहीं मिला कि रिटायरमेंट के बाद क्या करेंगे या कैसे समय व्यतीत करेंगे? चूंकि रिटायरमेंट के पूर्व  अप्रैल मे ही हमने हमारे मित्र यशवीर सिंह के साथ जून 2018 मे श्री अमरनाथ यात्रा जाने का परिवार सहित कार्यक्रम बना लिया था अतः सेवा निव्रति के बाद यात्रा का परमिट, मेडिकल सर्टिफिकेट आदि मे और यात्रा के उपयोग मे आने बाले समान जैसे, गरम कपड़े, बरसाती, जूते, छाता आदि की व्यवस्था करने मे 2 महीने कैसे निकल गये पता नहीं चला। 7 जुलाई 2018 मे यात्रा की बापसी  के कुछ समय बाद से सेवानिव्व्रत जीवन का अहसास होना शुरू हो गया। जुलाई के अंत तक खाली बैठने का अहसास खलने लगा था। अब प्राथमिकता अर्थ उपार्जन नहीं था अपितु समय का उपयोग न  हो पाना अब कुछ-कुछ समस्या होने लगी थी। भगवान श्री कृष्ण ने श्री भगवत् गीता के  एक श्लोक मे कहा हैं जिसके अनुसार मनुष्य एक पल भी बिना कर्म किये नहीं रह सकता।  इसलिये अब  अकर्मणता कुछ कुछ कष्टप्रद होने लगी थी।  कभी विचार भी आया तो ये सोच कर कि 40 साल बैंक की सेवा का अनुभव हैं कहीं न कहीं अनुभव का लाभ लेकर अपना समय व्यतीत कर लेंगे।

हम सोच कर खुश थे कि बैंक ने एल॰आर॰एम॰रिव्यूर का कार्य सेवानिव्रत अधिकारियों से कराना शुरू कर दिया हैं। इस तरह कुछ समय तो व्यस्त रहकर टाइम पास हो जायेगा, लोगो से मेल-मुलाक़ात एवं कुछ आर्थिक लाभ तो अतरिक्त फायदे के रूप मे होगा ही। यही सोच कर हमने  सेवानिव्रति के बाद एल॰आर॰एम॰ रिव्यूर के लिये  बैंक मे दो बार आवेदन डाला, सोचा निरीक्षण विभाग मे 6-7 साल एवं 39 साल का बैंक सेवा  के अनुभव का लाभ मिलेगा पर एक साल बाद तक भी कुछ जबाब नहीं आया। हो सकता हैं कुछ पैमाने पर नियम शर्ते मैं पूरी न कर पाया हूँ।  

जैसे जैसे समय व्यतीत होने लगा समय का उपयोग या अपने को व्यस्त रखने के प्रयास करने की  धारणा दिन-व-दिन गहरी हो रही थी वेशक अर्थ उपार्जन न हो।

चूंकि हम लोग गायत्री परिवार से जुड़े थे संस्था से संपर्क किया कि क्या  मैं समय दान कर संस्थान की  कुछ सेवा अपने प्राप्त अनुभव के आधार पर कर सकता हूँ? तो हमे बताया गया कि इस संबंध मे उनके कुछ नियम है जिसके अनुसार प्रत्येक सेवक को हरिद्वार मे 9 दिवसीय सत्र मे शामिल होना होगा उसी दौरान या उसके बाद ही आप समय दान देने की पात्रता रखेंगे। यह सोच कर हमने अगस्त 2018 मे 9 दिवसीय सत्र मे श्रीमती जी के साथ भाग लिया। अद्भुद अनुभव रहा यध्यपि दिनचर्या कठिन थी। पर विभिन्न शहरों से आये परिजनों के साथ बड़ी आत्मीयता के साथ रहकर समय कैसे व्यतीत हुआ पता ही नहीं चला। पर बाद मे पता चला कि इस 9 दिवसीय सत्र के बाद 1 माह का विशेष सेवा सत्र करने के बाद ही आप समय दानी कार्यकर्ता बन सकेंगे। कुछ परिस्थिति ऐसी बनी कि एक माह के सत्र के लिये समय नहीं निकाल सके और ये मिशन भी अधूरा छूट गया। इसी दौरान चेतना केंद्र जो कि गायत्री परिवार का एक बड़ा केंद्र नोएडा मे हैं के एक परिजन से संपर्क हुआ कि शायद नोएडा मे ही कुछ समय दान देकर अपनी  कुछ दिनचर्या मे व्यस्त रहा जाय परंतु एक-दो बार वहाँ गये भी और आने का अपना आशय बताया, उन्होने हमारा मोबाइल नंबर नोट कर लिया कि समय आने पर हम आपको सूचित करेंगे पर कोई भी सूचना कभी नहीं आयी हम फिर सेवानिव्वृत बेरोजगार बने रहे।

एक बार प्रधानमंत्री के ट्वेट्टर अकाउंट पर सेवानिव्रत अधिकारियों कर्मचारियों कि सेवाये देश और समाज हित मे लेने का आग्रह किया हमने लिखा मेरे जैसे लाखों लोग वगैर किसी आर्थिक लालच या लाभ लिये देश और समाज के लिये अपना समय दान देने को तैयार हैं, आप इन लाखों रिटायरमेंट व्यक्तियों की सेवा और अनुभव का निशुल्क  लाभ ले सकते हैं। ये कुछ भी कार्य हो सकता हैं जो वरिष्ठ नागरिकों के सम्मान, पद और प्रथिष्टता के अनुरूप हो। पर कोई जबाब आना  नहीं था, न आया, बैसे हमे इसकी अपेक्षा भी नहीं थी।

इसी उधेड्बुन मे हर रोज नये विचार आते, बनते और विखर कर टूट जाते। कभी एक दो बहुत नजदीक मित्रों श्री यशवीर और श्री संजय पांडे से इस सेवानिव्रत बेरोजगारी पर लंबी चौड़ी  चर्चा होती पर बगैर किसी नतीजे पर पहुंचे बंद हो जाती। हाँ एक बात अवश्य होती चर्चा का बह समय या यों कहे गपशप  बहुत अच्छे से  व्यतीत हो जाता। समय यों ही अपनी गति से आगे बढ़ता रहा। सुवह-शाम की सैर और थोड़ा लेखन मे समय व्यतीत होता रहता था पर फिर भी कहीं न कहीं खाली समय का उपयोग करने की जद्दोजहद चलती रहती। इसलिये जब कभी भी अपने पैतृक घर, झाँसी  या निवास ग्वालियर/भोपाल या कहीं भी जाने का कोई भी बहाना मिलता मैं बगैर किसी देरी के  वहाँ चल देता ताकि किसी भी तरह समय पास हो। एक बार जब मैं शायद 8-9 मार्च 2019 मे  नोएडा मे होशियारपुर से होकर निकल रहा था वहाँ मैंने छोटे छोटे मजदूर गरीब  बच्चों की दशा देखी तो दिल के किसी कोने मे उनके लिये कुछ करने का मन किया। जिसका उल्लेख हमने अपने ब्लॉग "उड़ान" मे भी किया था। लेकिन क्या शुरू करे कुछ स्पष्ट नहीं सोच पा रहा था। हमारे मन मे हमारे एक सेवानिव्रत साथी श्री डी॰ आर॰ कालिया जी का उदाहरण कही जहन मे था जिसमे उन्होने अपने फ़ेस बुक पोस्ट मे अपने गाँव मे 10वी-12वी के बच्चों को पढ़ाने का उल्लेख किया था। एक दिन जब मैं सैक्टर 50 स्थित सफल सब्जी केंद्र के पीछे बनी झुग्गी बस्ती मे नवरात्रों मे बच्चों को कुछ खाने की वस्तुएँ देने  गया था तो ढेर सारे बच्चे उस बस्ती मे  मिले थे। उन बच्चों से एक बार फिर से मिलने का मन हमे हुआ। उन से कैसे मिले, क्या कहे, उनके माँ-बाप से मिले, वे कैसे प्रतिउत्तर देंगे इन्ही सवाल-जबाबों मे अनेकों दिन  उलझा रहा। अनेकों बार हमने उनकी झुग्गी बस्ती मे जाने का मन  बनाया पर हर बार हमारे सामने हमारी पद-प्रतिष्टिता, नाम-ज्ञान-सम्मान, श्रेष्ठता का भाव   जैसे  छद्म आवरण आड़े आ जाते। पर इस चैत्र नवरात्रों के शुरू होने के कुछ दिन पूर्व एक दिन बैठे-बैठे अचानक मैं  बगैर घर मे किसी को बताये सारे छद्म आवरणों को पूरी ताकत के साथ  उतार फेंक कर उन की झुग्गी बस्ती की ओर  चला दिया। निर्मांधीन आवासीय बिल्डिंग "अंबिएंस" जो कि सैक्टर 50 मे जैन मंदिर के पास हैं। जब मैंने वहाँ स्थित गार्ड श्री सुशील से बच्चों के बारे मे जानकारी चाही तो उसने बताया  उक्त बिल्डिंग के निर्माण मे लगे मजदूरों के परिवार बच्चों के साथ  उस बिल्डिंग के सामने टीन शेड से बनाई गई झुग्गी बस्ती मे रहते हैं। उसने आवाज देकर सारे बच्चों को बुलाया जो यों ही खेल-कून्द कर रहे थे। 4 साल से 10-11 साल के लगभग 25-30 बच्चे उस बस्ती मे थे। जब हमने उनसे पूंछा की कौन कौन बच्चा स्कूल जाता हैं तो पता चला सिर्फ 3-4 बच्चे ही स्कूल जाते हैं बाकी सभी बही झुग्गी के आसपास खेल कर यूं ही समय व्यतीत करते  रहते हैं। बहुत से बच्चों ने बताया की  बे यहाँ आने के पूर्व  अपने गाँवों मे स्कूल जाते थे। कोई बच्चा  दूसरी- तो कोई तीसरी या अन्य क्लास मे जाते थे। बच्चों ने बात चीत मे बताया वे भी पढ्न चाहते हैं। मैंने गहन विचार किया जो बच्चे स्कूल जाते हैं उनके लिये तो शायद सुविधायें कुछ कम-ज्यादा मिल ही जाती हैं, पर  ये जो बच्चे अपने माँ-बाप के जीवाका उपार्जन के कारण और आर्थिक कमी के कारण स्कूल नहीं जा पा  रहे हैं क्यों न ऐसे बच्चों के साथ पढ़ाई की क्लास शुरू की जाये?? हमने गार्ड श्री सुशील से इन बच्चों के माँ-बाप से मिलने की इच्छा  जाहिर की, गार्ड साहब भले आदमी थे उन्होने हमे शाम 7 बजे पर बुलाया। जब हम 7 बजे झुग्गी बस्ती पहुंचे और बच्चों के माँ-बाप से बातचीत की। हमने बच्चों को पढ़ाने की इच्छा  बताई। माँ-बाप ने संकुचाते हुए  सोचा शायद कोई फीस लेंगे उनमे से एक ने ऐसी शंका भी प्रकट की। मैंने बताया हम कोई पैसा या फीस नहीं लेंगे बच्चों को फ्री पढ़ायेंगे। अब मेरा अगला लक्ष्य क्लास के लिये जगह एवं पढ़ाई के साधन जुटाने मे था। जब जगह के लिये हमने गार्ड साहब से पूंछा तो उन्होने मुंशी जो मजदूरों का ठेकेदार था बात की उसने हमे कल बुलाया, गार्ड ने झुग्गी के प्रवेश द्वार पर जगह की सफाई कराने का आश्वासन दिया, जब दूसरे दिन 4 अप्रैल को  गये तो न तो जगह साफ हुई न ही मुंशी मिला मोबाइल पर बात की तो शाम को आने के लिये बोला। शाम को गये तब भी बही हल। इस बीच मैं मन  बना चुका था कि नवरात्रि अच्छा दिन हैं क्यों न क्लास कि शुरुआत 6 अप्रैल नवरात्रि को करें। अब मात्र एक दिन था 5 अप्रैल को भी सुबह जब पहुंचे तो गार्ड जी ने अपनी लाचारी दिखाई कि जिसे सफाई के लिये बोला था बो आया नहीं आदि आदि। तब मैंने कहा गार्ड साहब मैं 6 अप्रैल को किसी भी कीमत पर बच्चों कि क्लास शुरू करूंगा चाहे व्यवस्था बने या न बने। 5 को भी जब कुछ नहीं हुआ तो सबसे पहले हमने पढ़ाई के लिये सामाग्री कि तलाश शुरू की। अब जगह से ज्यादा सामाग्री की आवश्यकता थी। न तो वर्ण माला की कोई किताब हमारे पास थी। हम जब पास ही मार्केट मे गये तो एक मात्र किताबों की दुकान पर  अँग्रेजी की ही किताब या चार्ट थे गिनती का भी चार्ट भी हिन्दी मे नहीं था। तब शाम को हमने इंटरनेट का सहारा लिया। बचपन मे हमने हिन्दी बलपोथी की किताब से पढ़ाई की थी। नेट पर हिंदीबालपोथी का पीडीएफ़ कॉपी प्राप्त हो गई उसे हमने अपने लेपटोप पर डाऊनलोड कर लिया। हमे दुगनी खुशी हुई, एक तो हिंदीबालपोथी की किताब लगभग 55 साल बाद देखी, बैसी-की-बैसी, दूसरी खुशी  कुछ सामाग्री मिलने की थी, ताकि नवरात्रि पर कक्षा तो शुरू हो सके। 6 अप्रैल 2019 को सुवह 10 बजे  नहा धोकर ईश्वर को याद कर हम लेपटोप लेकर झुग्गी मे पहुँच गये। सभी बच्चों को झुग्गी मे आवाज देकर बुलाया। एक दो बड़े बच्चे जो 9-10 साल के होंगे उनको लेकर झुग्गी बस्ती का चक्कर लगाया ताकि क्लास के लिये जगह तलाशी जा सके। पींछे एक नई झुग्गी बनाई गई थी किसी नये मजदूर परिवार के लिये वह खाली पड़ी थी। एक कर्मचारी ने कहा जब तक मजदूर परिवार नहीं आता तब तक आप क्लास यहाँ लगा लो। हमे खुशी हुई चलो शुरुआत हो गई आगे  ईश्वर पुनः राह दिखा सहायता करेंगी। एक बच्चे ने झाड़ू लगा दी। बच्चे भी बड़े खुश एवं उत्साहित थे। लगभग   18-19 बच्चे एकत्रित हो गये। क्लास के पूर्व भगवान की प्रार्थना भी शुरू करनी थी। मोबाइल पर फिल्म अंकुश की प्रार्थना "इतनी शक्ति हमे देना दाता........." डाउन लोड कर प्रार्थना शुरू कर दी। कुछ बच्चे  हँसते कुछ बात करते प्रार्थना गुनगुनाते क्लास का शुभारंभ हो गया। सभी बच्चों का एक रजिस्टर मे नाम लिख कर उस दिन की हाजिरी लगाई। हाजरी के जबाब मे बच्चों के साथ "जय हिन्द सर" बोलना  तय हो गया। बच्चों को इसमे भी मजा आ रहा था।   लेपटॉप पर हिन्दी बाल पोथी की वर्णमाला एवं एक से सौ तक गिनती पढ़ाई। एक दो वर्णमाला के कार्टून गीत और "मछ्ली जल की रानी हैं" का विडियो भी बच्चों को दिखाया। क्लास के अंत मे एक-एक टोफ़्फ़ी देकर लगभग 2 घंटे मे क्लास समाप्त की। बहुत शानदार शुरुआत हुई। अगले दिन मजदूर परिवार के बगल मे दूसरी झुग्गी मे कक्षा लगाई इस क्लास  मे आधे मे टीन शेड था आधे मे नहीं। कुछ दिन बाद इसे भी खाली करना पड़ा।  दो दिन खुले मे  झुग्गी के बीच क्लास लगाई पर आधा घंटे मे ही धूप आने के कारण पुनः जगह बदली और झुग्गी बस्ती के प्रवेश द्वार पर एक पेड़ के नीचे कक्षा अब प्रातः 10 बजे से  नियमित चलने लगी हैं। एक दिन दरिया गंज मार्केट दिल्ली मे से वर्णमाला, गिनती, पशु, पक्षी, फल, सब्जी के चार्ट लेकर आये और बाजार से हिन्दी बलपोथी लाकर बच्चों मे बांटी ताकि क्लास नियमित चले। अब कुछ क्लास मे  स्थिरता बननी शुरू हो गई हैं। बच्चे बड़े होनहार हैं। बड़े स्कूल के बच्चों की तरह पानी की बोतल आधा लीटर से 2 लीटर तक की कोल्ड ड्रिंक की खाली बोतलों मे पानी लाते हैं, हर 15-20 मिनिट मे टॉइलेट की अनुमति मांगते वक्त उन के चेहरे कि शैतानी अलग झलकती। बैठने की जगह पर झाड़ू हर दिन कोई नया बच्चा लगता और उसकी कृतज्ञता को ज्ञापित करने के लिए सारे छोटे बच्चे सफाई करने बाले भैया को एक स्वर मे "थैंक यू भैया" कहकर आभार व्यक्त करते हैं। चप्पल भी हर बच्चे की करीने से लाइन मे लगा कर रखी जाती हैं। सुबह मेरे पहुँचते ही सभी बच्चे दौड़ कर नमस्ते सर कह कर हमारे बैग को उठाने की चाहत मे  एकत्रित हो जाते हैं। उन  बच्चों का हर  दिन जीवन के  अस्तित्व के लिये  एक नया संघर्ष की तरह होता क्योंकि पढ़ने परिस्थितियाँ ही कुछ  ऐसी हैं?    

यध्यपि सेवानिव्व्रति के बाद इस रोजगार से मैं खुश और संतुष्ट हूँ पर  इतिहास इस बात का गवाह हैं अमीरों के महल रूपी यज्ञ मे हमेशा गरीबों की  झुग्गी-झोपड़ी रूपी आहुतियाँ डाली जाती हैं। अभी इस झुग्गी बस्ती के मजदूरों  द्वारा निर्माणाधीन बिल्डिंग का कार्य पूर्णता की ओर हैं।  इसे विडम्बना ही कहेंगे इस अंधे विकास में जैसे-जैसे  इस बहुमंजिला इमारत का कार्य समाप्ति  की ओर होगा इस सोसाइटी मे विकास के अधिकारी पुरुष रहने  आयेंगे बैसे-बैसे इसके सामने की झुग्गी बस्ती का विनाश भी बढ़ता जायेगा और एकदिन समाप्ति की ओर अग्रसर  होकर "अमरता" को प्राप्त हो इतिहास के काल खंड का हिस्सा बन  जायेगा। साथ मे  समाप्त हो जायेगी इन मासूम बच्चों की पढ़ने की चाहत, इनकी रोज की प्रार्थना, इनकी रोज हाजरी रजिस्टर से हाजरी, इनकी वर्णमाला एवं गिनती और साथ मे इनकी कक्षा भी!!  जो नहीं समाप्त होगा बो कक्षा के इन बच्चों की यादें, इनकी मीठी मुस्कान, निश्चल प्रेम और समर्पण, इनके नेक इरादे और इन की पढ़ने और बढ्ने की चाहत एवं आत्मविश्वास। जैसा कि इन पंक्तियों मे इन मेहनतकश मजदूरों के बारे मे कहा हैं:-

अधिकतर हैं, पर कुछ हैं जो बिकते नहीं हैं।
हम वो नीव के पत्थर हैं जो लगते हैं, पर दिखते नहीं हैं॥

आइये, ऐसा कुछ होने के पूर्व हम आपको आमंत्रण दे रहे हैं इन बच्चों के साथ कुछ वक़्त  बिताने का??

आप आयेंगे न ??

आपके इंतज़ार मे हम नन्हें मुन्ने बच्चे :- इमरान, सुमित, राकेश, शाकिर, रिंकू, रोशनी, निशा, मुस्कान, फिजा, नाज़ परवीन, मासूम, गौतम, गोलू, किशन, धर्मेंद्र, परवीन खातून, सलमान, खुशी, आहिद तेजपाल, और पार्वती। 

विजय सहगल

मंगलवार, 23 अप्रैल 2019

दुर्बल को न सताइये


दुर्बल  को न सताइये

भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी जिन्होने देश पर लगभग  सन् 1966 से 1977 तक एवं 1980 से मृत्युपर्यन्त 1984 तक  15 साल शासन किया। अपने तेज तर्रार व्यक्तित्व एवं तीव्र बौद्धिक क्षमता के लिये लोग उन्हे अब तक याद करते हैं। 1971 मे पाकिस्तान के दो टुकड़े कर अपनी नीति एवं निर्णायक क्षमता का लोहा उस समय के देश एवं अंतर्राष्ट्रीय क्षितिज पर मनवाया। 18 मई 1974 को भारत का प्रथम परमाणु बम विस्फोट परीक्षण कर भारत को परमाणु सम्पन्न राष्ट्र बनने पर सारे विश्व मे भारत की कीर्ति पताका विश्व मे लहराई।  1999 मे बीबीसी द्वारा उन्हे सहस्त्राव्दी की महिला घोषित किया गया। अपने राजनैतिक कौशल की वजह से विपक्ष के नेता भी उन की तारीफ करते थे। उन्हे सन् 2011 भारत देश के सबसे बड़े सम्मान "भारत रत्न" एवं 2012 मे बांग्लादेश के सबसे बड़े सम्मान  "बांग्लादेश स्वाधीन सम्मान" से अलंकृत किया गया। उनकी देश भक्ति एवं देश के लिये की गई सेवाओं को सभी लोग आदर और सम्मान की द्रष्टि से  देखते हैं। तत्कालीन राजाओं का "प्रविपर्स" समाप्त करना और बैकों का राष्ट्रीयकरण भी उनकी बहुत बढ़ी उपलब्धि रही थी।

पर 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक अपने स्वार्थ और राजनैतिक अस्तित्व के खातिर न केवल देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था को ताक पर रख चुनावों को स्थगित कर दिया बल्कि विपक्ष के सभी मुख्य-मुख्य नेताओं के साथ साथ उनके लाखों कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कराया। इस दौरान 21 माह तक  आम जनता के सभी लोकतान्त्रिक अधिकारों को समाप्त कर दिया गया।
श्रीमती इन्दिरा गांधी   के इस कृत की क्या इस कारण आलोचना नहीं होना चाहिये कि उन्हे "भारत रत्न" सम्मान मिला हैं?  आपातकाल के लिये श्रीमती गांधी की निंदा क्या इसलिये नहीं होनी चाहिये थी कि  उनकी देश भक्ति पर किसी को कोई शक था, उन्होने भारत के जन्मजात शत्रु पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिये?? आपातकाल के लिये श्रीमती गांधी की भर्त्स्ना  क्या इसलिये नहीं होनी चाहिये थी कि उन्होने भारत को परमाणु सम्पन्न राष्ट्र के रूप मे स्थापित किया??  लंबे समय ताक देश भक्ति पूर्ण सेवायें देश को देने के बाबजूद भी श्रीमती इन्दिरा गांधी की आपातकाल लागू करने के कारण 1975 से आज तक प्रत्येक बर्ष 25 जून को देश मे लोकतन्त्र को नष्ट करने के कारण, आम जनता के संवैधानिक अधिकारों  समाप्त  करने के कारण प्रायः लोकतन्त्र मे विश्वास करने बाले हर व्यक्ति, संस्थान और राजनैतिक दलों द्वारा उनकी आलोचना होती हैं,  निंदा होती हैं, भर्त्स्ना होती हैं। श्रीमती इन्दिरा गांधी की 16 साल तक प्रधान मंत्री पद पर दी गई अपनी देशभक्ति, गौरवपूर्ण  सेवाओं के बावजूद भी आपातकाल के निर्णय को न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता था। इसलिये एक ओर जहां उनके देशभक्ति पूर्ण, गौरवशाली और विकासशील कार्यों की प्रसंशा भी होती हैं तो बही दूसरी ओर उनके अलोकतांत्रिक "आपातकाल" और "गरीबी हटाओं" कार्यक्रम की असफलता पर उनकी आलोचना एवं निंदा भी होती हैं।   
    
एक अन्य उदाहरण मेजर लीतुल गोगई द्वारा 10 जुलाई 2017 को सेना द्वारा  आतंकवादियों के विरुद्ध की जा रही कार्यवाही मे बाधा पहुचाने के उद्देश्य से कश्मीरी युवकों द्वारा सेना के जवानों पर पत्थर फेंके जा रहे थे। चूंकि भटके हुए अपने ही देश के नौजवानों पर गोली चलाने के आदेश भारतीय सेना को  न होने के कारण एक पत्थरबाज नौजवान को सेना की जीप के सामने बांध कर एक मानव कवच बनाया इससे उस दिन एक अप्रिय घटना होने से बच गई और पत्थरबाजों की भीड़ ने फिर कोई पत्थरबाजी सेना के जवानों पर नहीं की। मेजर लीतुल गोगई द्वारा मानव कवच बना कर की गई कार्यवाही को  अधिकतर देशवासियों का समर्थन मिला। कुछ मानवाधिकार  संगठनों और कुछ राजनैतिक दलों द्वारा इस कार्यवाही की निंदा की लेकिन आवाम की आवाज़ के कारण मेजर लीतुल गोगई की कार्यवाही की सभी लोगो ने प्रशंसा की अन्यथा इस अप्रिय पत्थरबाजी की घटना मे भटके हुए पत्थरबाज़ कश्मीरी युवकों की गोलीबारी से मृत्यु हो सकती थी। सेना द्वारा भी अपने मेजर को तत्कालीन परिस्थिति से मानव कवच की रचना मे प्रशंसा मिली। लेकिन अगस्त 2018 मे सेना के निर्देशों की अवहेलना और अनुशासनहीनता  के कारण उनका कोर्ट मार्शल हुआ और यथोचित कार्यवाही हुई। तो क्या  मेजर लीतुल गोगई पर  सेना के आदेश की अवहेलना पर सजा क्या इसलिये रोकी जानी चाहिये थी या कोई कार्यवाही इसलिये नहीं की जानी चाहिये थी कि उन्होने मानव कवच के रूप मे एक कश्मीरी पत्थरवाज़ के उपयोग कर अप्रिय घटना को रोका था। मेजर लीतुल गोगई की प्रशंसा अपने साथी नौजवानों को सूरक्षित करने मे की गई, पर अनुशासन हीनता पर उनके विरुद्ध कार्यवाही भी उचित थी।

26 नवम्बर 2008 को मुंबई पर पाकिस्तानी  आतंकवादियों का एक सुनियोजित कायरता पूर्ण हमला हुआ था। इस नृशंस  हमले मे 26 विदेशी नागरिकों सहित 166 लोग मारे गए। मुंबई के 5-6 स्थानों मे हुए इस हमले को नियंत्रित करने मे सुरक्षा बलों को लगभग 60 घंटे का समय लगा। इस आतंकवादी हमले मे विभिन्न सुरक्षा बलों के 11 अधिकारी भी शहीद हुए। जिनमे से मुख्यतः आतंकविरोधी दस्ते के प्रमुख श्री हेमंत करकरे भी थे। श्री हेमंत करकरे ने देशभक्ति  पूर्ण  इस शहादत मे उन्होने अपने प्राणों कि आहुति देकर सर्वोच्च बलिदान का उदाहरण प्रस्तुत किया हैं। 2009 मे  श्री हेमंत करकरे को सेना का सर्वोच्च सम्मान अशोक चक्र, मरणोपरांत  प्रदान किया गया। श्री करकरे का बलिदान एवं देशभक्ति किसी भी शंका से परे हैं। उनकी देश भक्ति एवं बहदुरी पर हर भारत वासी को गौरव हैं। आतंकवादियों से संघर्ष करते हुए श्री करकरे ने अपने कर्तव्यों को सेर्वोपरि रखते हुए देश और मुंबई की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दी। श्री हेमेंत करकरे के बलिदान एवं देश भक्ति पर  किसी भी भारतवासी को लेशमात्र भी शक नहीं हैं। अभी हल ही मे 29 सितम्बर 2008 को मालेगांव ब्लास्ट केस मे जमानत पर रिहा साध्वी प्रज्ञा ठाकुर का बयान/साक्षत्कार प्रसार माध्यमों मे आया, जिसमे साध्वी प्रज्ञा ठाकुर द्वारा आतंकविरोधी दस्ते के प्रमुख रहे स्व॰ श्री हेमंत करकरे पर संगीन आरोप लगाये गये। उन आरोपों मे साध्वी प्रज्ञा द्वारा कहा गया कि आतंकविरोधी दस्ते के प्रमुख स्व॰ श्री हेमंत करकरे ने मालेगांव ब्लास्ट केस मे आधारहीन आरोपों के आधार पर न केवल   झूठा केस दायर किया बल्कि गैर कानूनी तौर पर हिरासत मे रखा एवं पूंछताछ करते समय हिरासत मे हिंसक तरीके से मारपीट एवं अत्याचार किये गये। आतंकविरोधी दस्ते के प्रमुख स्व॰ श्री हेमंत करकरे एवं उनकी टीम ने लगातर 23-24 दिन तक दिन रात मारपीट की एवं एक औरत की अस्मिता के विरूद्ध गाली गलौज भाषा का इस्तेमाल किया। तत्कालीन राजनैतिक प्रभाव बाले श्री चिदंबरम एवं श्री दिग्विजय सिंह द्वारा अपने प्रभाव का दुर्पयोग कर हिन्दू आतंकवाद शब्द को गढ़ा गया। इतिहास इस बात का गवाह हैं जब जब राजनैतिक नेताओं और ब्यूरोक्रेसी के बीच ठकुर सुहाती हो जाय तो दोनों की सांठगांठ से  देश के कानून का दुर्पयोग कर किसी व्यक्ति या संस्थाओं के विरूद्ध बदले की भावनाओं से कार्य करने की आज़ादी राजनैतिक नेताओं और ब्यूरोक्रेसी को मिल जाती हैं। साध्वी के केस के संबंध मे भी ऐसा कुछ हुआ हैं? जिसके संबंध मे विस्तार पूर्वक जांच होनी चाहिये। ये एक मानवीय  कमजोरी हैं जब   किसी अवला नारी के विरूद्ध लगातार 24-25 दिन तक गैर कानूनी मारपीट, हिंसात्मक शारीरिक उत्पीढन किया जाये तो औरत तो क्या कोई भी मजबूत से मजबूत  कद काठी के पुरुष के  विरूद्ध भी ऐसी हिंसा हो तो पीढ़ा देने बालों के विरूद्ध पीढ़ित की यही बददुआ निकलती जिसे कबीर दस जी ने अपने इस दोहे मे उद्धरत किया हैं:-
दुर्बल को न सताइये, जा की मोटी हाय ।
बिना जीव की श्वास सौं, लोह भसम हो जाय ॥
अर्थात:- संत कबीर दास जी कहते हैं कि शक्तिशाली व्यक्ति को कभी अपने बल के मद में चूर हो कर किसी दुर्बल पर अत्याचार नहीं करना चाहिए क्योंकि दुखी ह्रदय कि हाय बहुत ही हानिकारक होती है। जिस प्रकार लोहार कि चिमनी निर्जीव खाल होते हुए भी लोहे को भस्म करने कि शक्ति रखती है ठीक उसी प्रकार दुःखी व्यक्ति कि बद्दुआओं से अत्याचारी का नाश हो जाताहै ।

कहने का तात्पर्य यह है कि भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश मे स्व॰ श्री हेमेंत करकरे कि शहादत और उनके वीरता पूर्ण कार्य को जिसमे उन्होने देश कि रक्षा हेतु अपने प्राणों कि आहुति दी उनकी इस शहादत को हर भारतीय सिर झुका कर नमन करता हैं, किन्तु क्या उनके द्वारा यदि एक महिला साध्वी के विरूद्ध गैर कानूनी शारीरिक हिंसा एवं मानसिक यंत्रणा दी गयी हो तो इस कृत के लिये क्या उनकी  "आलोचना" या "निंदा" नहीं की जानी चाहिये?? यह एक विचारणीय प्रश्न हैं????

विजय सहगल









शनिवार, 20 अप्रैल 2019

लाइन का जीवन


लाइन का जीवन

देश मे मध्यम वर्ग को जीवन यापन के लिये पग-पग पर कठिन  संघर्ष करना पड़ता हैं। एक ओर तो जहां इन परिवारों को अपनी सामाजिक हैसियत बनाये रखने के लिये  अपने रहन सहन के लिये  आर्थिक हालातों से जूझना और समझौता करना पड़ता हैं बही दूसरी ओर आये दिन के होने बाले खर्चों को पूरा करने के लिये पूरा जीवन आर्थिक अभावों और ऋण लेकर जीवन यापन करने मे विताना पड़ता हैं। हम या हमारे जैसे अधिकतर परिवारों की कमोवेश यही स्थिति जीवन के शुरुआती समय मे रही हैं।
झाँसी मेरा जन्म स्थान हैं। यहाँ जीवन मे लाइन से पहला साक्षात्कार मुझे हमेशा याद हैं।  बचपन के उन दिनों मे सस्ता राशन कंट्रोल की दुकानों मे मिलता था। हमारे बार्ड की राशन की दुकान सागर गेट स्कूल के पास थी जिसके मैनेजर निगम बाबू हुआ करते थे। एक पक्के चबूतरे के सामने रखी लकड़ी की टेबल पर अपने लंबे चौड़े रजिस्टर पर लिखा पड़ी करते। बही बगल मे 2x2 फुट की खिड़की से बो बाहर खड़ी जनता को उनकी बारी पर सम्बोधन कर बुलाते।  बही टेबल के दूसरी ओर सैकड़ो की संख्या मे रखे राशन कार्ड के ढेर पड़े रहते, राशन की दुकान मे जहां एक ओर बड़ी से तराजू दुकान की छत्त से लटकी हुई थी। तराजू के बगल मे छोटे-छोटे 1, 2, 5 किलो के  बाँट के साथ  10, 20, 50 किलो के बड़े बाँट भी पड़े थे। बही दुकान के आधे से ज्यादा हिस्से मे गेहूं, चीनी, चावल के बोरे एक के उपर एक रखे रहते थे। दुकान के अंदर कम  और बाहर पचासों आदमी-औरते अपनी बारी की प्रतीक्षा करते, बच्चों के रूप मे मैं अपने घर का प्रतिनिधित्व करता भीड़ मे अपनी बारी का इंतज़ार करता। निगम बाबू के मुह लगे कुछ लोग राशन के कार्डों को उपर-नीचे कर  हेर-फेर, कर अपना नंबर आगे कर लेते  बाहर लोगो को इसका इल्म भी नहीं होता। उस समय हमे लगता था कंट्रोल की दुकान का मैनेजर, निगम बाबू ही दुनियाँ का सबसे बड़ा आदमी हैं उसकी एक आवाज से खड़े पचासों आदमी सहम जाते थे। उस समय मेरी उम्र 10-11 साल रही होगी। जैसे ही अंदर दुकान से राशन कार्ड मे घर के मुखिया का नाम बुलाया जाता बह या उसके परिवार का सदस्य चेहरे पर राशन मिलने की खुशी लिये अपने झोले-थैले के साथ अंदर दुकान की ओर बढ़ता। अंदर निगम बाबू रजिस्टर मे आवश्यक औपचारिकता के बाद आवाज लगा कर तौलने बाले व्यक्ति को आदेश देता। ऐसे ही जब  मेरी बारी आती  और मेरा नाम बुलाया तो मैं भी कभी अकेले या कभी भाई के साथ राशन की लाइन मे लग जाता उस भीड़ मे राशन के झोले-थैले, के साथ राशन के पैसे को सम्हालना एक बड़ी ज़िम्मेदारी होती। इन रोज के संघर्ष ने हमे हमारी उम्र से ज्यादा परिपक्व बना दिया था। राशन लेते समय बचपन से ही कुछ अतिरिक्त सावधानी हम वर्तते थे, जैसे राशन तौलते वक़्त तौलने बाले की हरकतों को ध्यान से देखना कि बह सही-सही तौले, कोई दांडी मारकर कम राशन न तौले और राशन के सही पैसे निगम बाबू ले,  खुले पैसे के बहाने कही ज्यादा पैसे न ले ले। क्योंकि उनके दुवारा लिये गये ज्यादा  पैसे हमारे पॉकेट खर्चे मे कमी कर देते थे। उस भीड़ मे किसी के पैसे खोने या गिरने की शिकायत प्रायः सुनने मे आती रहती थी। शुरू शुरू मे रजिस्टर की औपचारिकता के बाद जब निगम बाबू रजिस्टर मे हस्ताक्षर के रूप मे पास रखे इंक पैड से हमारा अंगूठा लगवाते थे। क्योंकि अधिकतर लोग रजिस्टर मे अंगूठा लगाते थे। जब एक बार हमने कहा मैं तो हस्ताक्षर कर सकता हूँ और तब से मैं राशन लेते समय हस्ताक्षर करने लगा। क्योंकि ये सब हर महीने का कार्य था। राशन की दुकान की लाइन से साक्षात्कार हर महीने मे 3-4 बार की बात थी। राशन की दुकान खुलने-बंद होने का कोई निश्चित समय तो था नहीं, कई-कई चक्कर तो यूं ही लग जाते दुकान पर एक बोर्ड लटका रहता "राशन लेने गये हैं"। शायद कानूनी बचाव का एक जरिया था ताकि इस बोर्ड से समय के अनुपालन को उचित ठहराया जा सके।
एक अन्य लाइन जो मुझे याद हैं बह थी मिट्टी के तेल लेने के लिए लाइन। उन दिनो केरोसिन ऑइल का उपयोग कुछ उन्नतशीलता का प्रतीक हुआ करता था। पर मिट्टी के तेल लेने  के लिये भी राशन की तरह बड़ी मशक्कत करनी पड़ती थी। दुकानदार द्वारा तेल कम नापना तेल बालों का  राष्ट्रीय चरित्र था। कभी लीटर को टेड़ा कर कम नापना या लीटर की पैंदी को अंदर की तरफ ठोक कर आयतन को कम कर कम तेल नापना  दूकानदारों का जन्मसिद्ध अधिकार था। ऐसा नहीं कि ये कार्य मिट्टी के तेल नापने बाले करते थे बल्कि दूध नापने बाले, खाध्य तेल और अन्य तरल पदार्थ बेचने बाले भी ये तरक़ीब आजमाते थे। गेहूँ का आटा पिसवाने मे भी तौल मे घट-बढ़ आम बात थी।  शिकवे-शिकायत का तो कोई नियम नहीं था आप खुद ही यदि संघर्ष करने मे सक्षम हैं तो ठीक अन्यथा लूट के इस कारोबार मे मौन हो कर पिस्ते रहे बस।
बचपन से जवानी तक जीवन का एक बहुत बड़ा हिस्सा विभिन्न लाइनों मे लग कर बीता। हद तो तब हो गई एक बार जमाखोरी करते हुए वनस्पति घी डालडा के लिये भी लाइन लगानी पड़ी। कोई जैन की दुकान थी गंज मे माठू लाल मार्केट, झाँसी  मे।  घंटो की लाइन बंदी के बाद एक किलो डालडा घी का डिब्बा लेकर ऐसे घर पहुंचे जैसे कोई बहुत बड़े शेर का शिकार कर लाये हों।
घर मे कुछ निर्माण का कार्य होना था पर सीमेंट की उपलब्धता इतनी सरल एवं सहज नहीं थी। सीमेंट के लिये सप्लाइ ऑफिस के  दलालों के माध्यम से ही मिलना संभव था। बगैर रिश्वत के कोई भी कार्य संभव नहीं था, पर विध्यार्थी जीवन का जोश हर समय संघर्ष के लिये तत्पर रहता। जेल चौराहे के पास सप्लाइ ऑफिस था हर ऑफिस मे लालफ़ीताशाही का दरबार लगा रहता था। अफसरों के चापलूस कर्मचारी और चाटुकार दलालों की फौज इन अफसरों को घेरे रहती। जब मैंने ऑफिस मे जाकर सीधे ही दरबार लगाये अफसर से कार्यालय मे हो रहे भ्रष्टाचार से सीमेंट के परमिट मिलने मे हो रही परेशानी का जिक्र किया तो हमे तुरंत ही 5-6 सीमेंट बोरी का परमिट मिल गया।
उस समय झाँसी मे रसोई गैस की शुरुआत हो गई थी जैसे तैसे लाइन लगा कर गैस का कनैक्शन तो मिल गया पर हर एक डेढ़ महीने मे गैस की रिफिल कराना एक दुष्कृत कार्य था। खुली लूट कर रहे थे गैस वितरक। कोई नियम कानून नहीं था। घरों पर गैस सप्लाइ तो बहुत दूर की बात थी। भरा सिलेंडर लेने के लिये हमेशा वितरक के गोडाउन जाना पड़ता था या शहर मे आज के पुराने बस अड्डे के पास झिरने बाला गेट के पास  बाली जगह पर गैस का सिलेंडर लिये गैस वितरक का ट्रक खड़ा रहता। तीन चार सौ लोगो की लाइन सिलेंडर लिये खड़ी रहती। एक दो घंटे मे सिलेंडर खिसकाते-खिसकाते नंबर आता। गैस वितरक का मोटा भद्दी शक्ल लिये मैनेजर बगैर खुल्ले पैसे बापस किये सिलेंडर देता, होम डिलिवरी चार्जेस कम करने का तो सवाल ही नहीं। बड़े-बड़े पढे-लिखे उपभोक्ता कभी मुंह के थूक से या पास बह रही नाली के पानी से सिलेंडर का लीकेज चेक करते। सिलेंडर पर सील कभी नहीं देखी। सिलेंडर को तौलने का तो प्रश्न ही नहीं, सिलेंडर मिल गया ये ही बड़ी बात थी। निश्चित तौर पर सिलेंडर मे गैस की तौल मे कमी रहती थी। मैंने एक बार यमुना गैस ऐजन्सि की शिकायत तत्कालीन पेट्रोलियम मिनिस्टर स्व॰ श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह से की थी। पूर्व मे भी कई बार शिकायत की, पर कोई कार्यवाही नही होती थी। अंधेर नगरी के हालात थे। इन हालातों मे एक मध्यम वर्गीय परिवार को इस भ्रष्ट व्यवस्था से लड़ना एक कठिन कार्य रहा। पूरा सरकारी तंत्र और व्यापारी तंत्र जो सरकारी योजनाओं को लागू करने मे सरकार का सहयोग करता था आम जनता को लूटने मे कोई कसर नहीं छोड़ता था। कम तौलना या कम देना और नियत दाम से ज्यादा पैसे ले कर आम और गरीब जनता को धोखा दे कर जनता की गाढ़ी कमाई को लूटना इन दोनों भ्रष्ट तंत्रों की मिलीभगत का एक अटूट उदाहरण था। उक्त लूट-खसूट की परंपरा अखिल भारतीय स्तर से लेकर प्रदेश, जिले, शहर और ग्राम पंचायत तक समान रूप से व्याप्त थी, और ये सब तत्कालीन सरकार के गरीबी हटाओ-भ्रष्टाचार मिटाओ नीति और कार्यक्रम के तहत हो रहा था। सस्ते कपड़े के लिये भी लाइन सहकारी समिति के स्टोर जो माठू लाल मार्केट गंज मे था लगानी पड़ती थी।  
बीजली का बिल हो या पानी का बिल बगैर लाइन लगाये कोई काम मुमकिन ही न था। हर महीने बिजली का बिल रानी महल के सामने स्थित पावर हाउस मे जमा करने के लिये लाइन मे घंटो लगना पड़ता था। बाबू ऐसे मरे-मरे हाथ चलाता जैसे शरीर मे जान ही न हो। 99 रूपये का बिल हैं तो भी रुपये खुल्ले लाओ अन्यथा 100 का नोट हिसाब बराबर। जब कभी सिनेमा देखने जाओ तो सिनेमा हाल का बुकिंग बाबू और गेट कीपर अपने आपको जिला कलेक्टर से कम नहीं समझते थे। सिनेमा हाल मे हर सीट का नंबर और लाइन टिकिट पर लिखी रहती पर गेट कीपर अपनी आदत से कभी बाज़ नहीं आता, चाहे अनपढ़ हो या पढ़ा लिखा सभी को कहेगा चौथी लाइन मे सात सीट छोड़ कर या किसी को बोलेगा पाँचवी लाइन मे कोने की सीट छोड़ कर आदि आदि।
रेल से यदि कभी रिज़र्वेशन कराना हो तो आप किसी भी समय जाये  लंबी लाइन हमेशा लगी रहती। आप घंटो लाइन मे लगकर जब खिड़की पर पहुँचते तो सिर्फ और सिर्फ "न" मे ही उत्तर मिलता रिज़र्वेशन नहीं हैं। दलालों की सेटिंग से या जान पहचान से  किसी भी गाड़ी मे किसी भी तारीख का टिकिट आसानी से उपलब्ध हो जाता। रेल्वे और टेलीफ़ोन विभाग मे भ्रष्टाचार कूट-कूट कर समाया था। कहीं झाँसी से बाहर दिल्ली, लखनऊ कानपुर कॉल लगाना हो तो सिफ़ारिश के लिये जान पहचान निकालनी पढ़ती थी अन्यथा कॉल लगाना संभव ही नहीं था। स्कूल मे फीस की लाइन, बस और ट्रेन मे टिकिट की लाइन, हर साल स्कूटर का टैक्स जमा कराने की लाइन, घर का हाउस टैक्स, वॉटर टैक्स की लाइन, रोजगार कार्यालय मे पंजीकरण के लिये लाइन, टायपिंग टेस्ट के लिये रोजगार कार्यालय मे लाइन,  मार्क शीट या प्रमाण पत्र के सत्यापन की लाइन,  ऐसी अनेकों तरह की लाइनें थी इनमे से कुछ मासिक लाइनें तथा कुछ वार्षिक लाइनें थी। इनमे भी गैस सिलेंडर और राशन की लाइनें सबसे घिनोनी और कष्टप्रद थी जिनकी टीस या दर्द आजतक याद हैं।           
ऐसा नहीं था कि ये संघर्ष अकेले हम लड़ रहे थे। हमारे साथ उस मध्यम वर्गीय की जमात मे हिन्दू, मुसलमान, अगड़े-पिछड़े, अनुसूचित जाति-जनजाति के लोग भी उस संघर्ष मे साथ थे। पूरे बचपन के इस संघर्ष को हम आज भी याद करते हैं, क्या वे सभी भी जो हर मोर्चे पर उस समय ये लड़ाई अपने स्तर पर अलग-अलग या साथ साथ लड़ रहे थे, क्या उनको भी वो संघर्ष याद हैं??
विजय सहगल        

बुधवार, 17 अप्रैल 2019

स्कूल


"स्कूल"


उठो-उठो हे शंकर-भोला।
निकला सूरज कनक का गोला॥
भोर हुई हैं, चिड़ियाँ जाती।   
काली कोयल राग सुनाती॥
मोर नाचती, कौआ गाता।
मुर्गा "कूकड़ू" बांग लगाता॥
दौड़ लगाओ, होला होला।
उठो-उठो .....................

जैसे जैसे सूरज उगता।
बच्चे लेकर अपना बस्ता॥
दौड़ लगा  स्कूल को जाते।
हाथ जोड़ कर लाइन लागते॥
देर से हैं, जो बच्चे आते।
पीछे अपनी लाइन लगाते॥
हर बच्चे के हाथ मे एक-एक, मास्टर जी का डंडा बोला।  
उठो उठो .......................

कक्षा मे क-ख-ग पढ़ते।
एक-से-सौ की गिनती चढ़ते॥
जोड़, घटाना,  गुणा, भाग।  
दिनभर करते  इसको याद॥
बारह इंच का एक फुटाना।
एक रुपये मे सोलह आना॥
दो से दस तक पहाड़ा बोला।
उठो उठो .......................

खाने की जब छुट्टी होती।
धक्कम-धुक्का, लत्तम-लोती॥ 
खेल कबड्डी, छुआ-छूअल्ल।
कमल-मुरारी, धूल-धुअल्ल॥
छुट्टी मे  जब घर को जाते,
पीठ पे पड़ता, छड़ी  का शोला।
उठो उठो .........................

विजय सहगल

 

बुधवार, 10 अप्रैल 2019

पंचतत्व


पंचतत्व



हम बच्चे बगिया के तेरी, फूलों सा हमको महकाओं।  
आन पड़े विपदा जब भारी, आंचल को अपने लहराओं ॥   
कल कल, झर-झर नदियाँ बहती।
ईश्वर का संदेश ये कहती॥
जीवन जल हैं, जल ही जीवन।
अमृत पीकर महके उपवन॥
संरक्षित कर बूंद-बूंद को, इस धरती की प्यास बुझाओं।   
हम बच्चे बगिया के तेरी, फूलों सा हमको महकाओं।  
आन पड़े विपदा जब भारी, आंचल को अपने लहराओं॥
    
धरती माँ के आंचल से हम, अन्न-धन्न फल फूल हैं पाते।
मानव, जलचर पशु-पक्षी सब, अपनी-अपनी भूख मिटाते॥ 
श्वास-श्वास में इन सब की तुम, प्राण वायु बन करके आये।
जीवन चक्र की इस रचना को, हर क्षण हर पल गति मे लाये॥  
मंद-मंद ठंडी बयार से  निर्जन-बन, जीवन बिखराओं।  
हम बच्चे बगिया के तेरी, फूलों सा हमको महकाओं।  
आन पड़े विपदा जब भारी, आंचल को अपने लहराओं॥

खुला गगन संदेश ये देता, बनो विशाल जीवन प्रणेता।
"रवि"  ऊर्जा से भरपूर,  सदा निरंतर ऊष्मा देता॥
नभ मे तारे, परमेश्वर का घर।
देते  शक्ति  अनंत,  भास्कर॥
कर्मों के कुरुक्षेत्र मे पावन, पावक अजर अनल दहकाओं।   
हम बच्चे बगिया के तेरी, फूलों सा हमको महकाओं।  
आन पड़े विपदा जब भारी, आंचल को अपने लहराओं॥
 
विजय सहगल

रविवार, 7 अप्रैल 2019

"स्ट्रॉंग रूम "


"स्ट्रॉंग रूम "

हम कॉलेज टाइम से सुनते आये हैं कि परमाणु बम्ब सम्पन्न देशों  के राष्ट्रप्रमुख  और उपराष्ट्रप्रमुख  कभी भी एक साथ देश के बाहर  यात्रा पर नहीं जाते क्योंकि परमाणु बम का बटन या रिमोट कंट्रोल उन दोनों के पास रहता हैं। ताकि देश को आपात काल या आकस्मिक आवश्यकता के समय परमाणु हथियार का स्तेमाल की आवश्यकता पड़ने पर उसके स्तेमाल के लिये दोनों मे से कोई एक उपस्थित रह सके।  यह कहाँ तक सच हैं नहीं मालूम पर ये बिलकुल सच हैं कि बैंक के सेफ और स्ट्रॉंग रूम के गेट की डुप्लिकेट चाबियों के सेट को कभी भी उसी शाखा मे किसी भी कीमत पर एक साथ नहीं रखते हैं। प्रत्येक  बैंक की सुरक्षा नीति को मद्देनज़र यह स्पष्ट आदेश हैं। हम लोग शाखा निरीक्षण शुरू करते समय सबसे पहले डुप्लिकेट चाबियों के सेट को मंगा कर चाबियों की अदला-बदली कर शीघ्र से शीघ्र सील पैक कर बापस अन्य शाखा मे सुरक्षित सुपुर्दगी हेतु उसी दिन हर हालत मे भेज देते हैं। इस  बारे मे लगभग सभी अधिकारी-कर्मचारी जो थोड़ा बहुत भी सेवा का अनुभव रखते हैं इस प्रिक्रिया  से भलीभाँति परिचित हैं। पर कभी कभी हमारे साथी इस की गंभीरता को नजरंदाज कर न केवल बैंक द्वारा निर्धारित नीतिगत आदेश की अवहेलना करते हैं बल्कि बैंक की सुरक्षा को संकट मे डाल देते हैं। बैंक की चाबियों के खोने की तरह-तरह की घटनायें यदा कदा सुनने मे आती रहती हैं।  एक शाखा के निरीक्षण मे पाया गया कि उनके पास डुप्लिकेट चाबियाँ कहाँ किस शाखा मे रक्खी हैं कोई रिकॉर्ड ही नहीं हैं। मैनेजर,कैशियर या अन्य संबन्धित स्टाफ  को भी नहीं मालूम कि चाबियों का दूसरा सेट किस शाखा मे रखा हैं। तमाम खोजबीन के बाद भी कोई सुराग न मिल पाने के कारण चाबियों की अदला-बदली ही नही की जा सकी!!  

एक बार तो एक शाखा मे  लापरवाही की पराकाष्ठा सामने आयी। हमारी एक शाखा  नये भवन मे स्थानांतरित होकर आई थी। कुछ  ही दिन हुए थे। सेफ को तो नये परिसर मे ले जया गया इसलिये उस सेफ की डुप्लिकेट चाबियाँ तो अन्य शाखा मे रखी थी। पर  चूंकि नये शाखा परिसर मे नया स्ट्रॉंग रूम लगा था उसकी डुप्लिकेट चाबियों के सेट को दूसरी शाखा मे नही  रखा गया। स्ट्रॉंग रूम की चाबियों को दूसरी शाखा मे न रखा जाना संबन्धित स्टाफ की  घोर लापरवाही थी और इस संबंध मे  बैंक के निर्देशों की अवहेलना कर स्ट्रॉंग रूम की डुप्लिकेट चाबियाँ को शाखा के कैश सेफ मे ही  रख दिया गया। ये एक गंभीर चूक थी। स्ट्रॉंग रूम की आरिजिनल चाबियों से शाखा के कार्य समय पश्चात बंद कर दिया गया। कहते हैं कि मुसीबत समय देख कर नहीं आती,  उस दिन भी ऐसा ही हुआ। कुछ ऐसा दुर्भाग्य रहा, मुख्य खजांची महोदय से बैंक की समस्त  चाबियों का सेट घर जाते समय रास्ते मे कहीं गुम हो गया। स्थिति गंभीर थी। स्ट्रॉंग रूम की डुप्लिकेट चाबियाँ कैश सेफ मे पहले से ही बंद थी। प्रादेशिक कार्यालय को सूचित किया गया। चाबियाँ गुम होने की रिपोर्ट दर्ज़ कराई गई। अब सवाल था इस स्थिति से कैसे निपटा जाए। गोदरेज कंपनी से संपर्क करने पर निष्कर्ष निकला कि स्ट्रॉंग रूम की दीवार को सेंध लगा कर तोड़ा जायेगा  तब उस दीवार मे इतना बड़ा छेद किया जा सके ताकि आदमी उस छेद मे से स्ट्रॉंग रूम मे प्रवेश कर सके और सेफ को डुप्लिकेट चाबियों के माध्यम से खोला जा सके और स्ट्रॉंग रूम की डुप्लिकेट चाबियों से स्ट्रॉंग रूम खोला जा सके। ये एक पेचीदा काम था  पूरी तरह सामान्य स्थिति मे आने मे  जिसमे 3-4  दिन का समय  लग सकता था। तत्काल दो गार्ड की 24 घंटे रात-दिन की  ड्यूटि लगाई गई। एक-दो गार्ड को प्रादेशिक कार्यालय  से बुलवाया गया। छुट्टी बाले दिन चार पाँच मजदूरों ने ड्रिल मशीन जो कि पहाड़ मे होल करने के कार्य मे स्तेमाल होती थी की  सहायता से स्ट्रॉंग रूम  दीवार मे सेंध लगा कर  दीवार को तोड़ कर एक बड़ा सा छेद बनाया, गैस काटने बाली मशीन से दीवार के बीच मे स्थित लोहे की बीम को काटा गया ताकि एक आदमी उस छेद के माध्यम से स्ट्रॉंग रूम के अंदर जा सके। इस कार्य मे दिन भर लग गया तब कहीं जा कर दो आदमियों  स्ट्रॉंग रूम मे प्रवेश कराया गया। उन लोगो ने कैश सेफ  की डुप्लिकेट चाबियों से  सेफ को खोला उसमे से स्ट्रॉंग रूम गेट की डुप्लिकेट चाबियों को निकाल कर स्ट्रॉंग रूम को खोला। पर अभी तो आधा ही कार्य हुआ था। अभी स्ट्रॉंग रूम की टूटी हुई दीवार को ठीक कर बापस पूर्व की स्थिति मे लाना था ताकि सुरक्षा की द्रष्टि से दीवार पहले की ही तरह मजबूत हो। इंजीनियर की देख रेख मे उक्त कार्य सम्पन्न कराया गया। जिसका प्रमाणीकरण दूसरे इंजीनियर ने किया इस तरह  स्ट्रॉंग रूम की दीवार की मरम्मत का कार्य सम्पन्न हुआ। सेफ और स्ट्रॉंग रूम गेट की सारी चाबियों के सारे लॉक बदले गये तब शाखा का कार्य पुनः सामान्य तरीके चालू हो सका।

एक छोटी सी चूक या लापरवाही की बजह से न केवल बैंक को आर्थिक हानि उठानी पड़ी बल्कि बैंक को  पुनः सामान्य स्थिति तक लाने मे  लगभग एक  हफ्ते का समय भी व्यय हुआ। यध्यपि बैंक ने इस संबंध मे नियमानुसार कार्यवाही कर संबन्धित लोगो के विरुद्ध कार्यवाही की पर बैंक द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों को न मानने की एक कड़ी सीख सभी स्टाफ को सीखने को मिली।
कहने का तात्पर्य यह है कि बैंक कि चाबियाँ परमाणु बम्ब बेशक न सही पर बैंक की कार्यप्रणाली के मद्देनजर परमाणु बम्ब से कम भी नहीं हैं। बस फर्क इतना है कि परमाणु बम्ब के संदर्भ के लिये "दोनों राष्ट्र प्रमुख एक साथ  देश के बाहर नहीं जा सकते" और बैंक के संदर्भ के लिये "दोनों चाबियों एक-साथ बैंक के अंदर नहीं आ सकती"।  

विजय सहगल

मंगलवार, 2 अप्रैल 2019

गाँव का मेला



"गाँव का मेला"

दौड़ दौड़ बच्चों का रेला।
चला  देखने गाँव का मेला॥

नंदू, मुन्ना,  चुन्नू आगे।
देख हिंडोला सरपट भागे॥
नीचे-उपर, उपर-नीचे।
हंसी-ठिठोली पर आंखे मीचे॥
उपर से जब नीचे आते।       
गुद-गुदी तब रोक न पाते॥
हाल सभी का, यहीं  अकेला।
चला देखने गाँव का मेला॥  

भालू नाचा, बंदर आया।
मदारी ने जब खेल दिखाया॥
बंदर की थी चाल अनूठी।
बंदर की जब बंदरिया रूठी॥  
लाठी टेक जब चरखा चलाया।


भालू ने भी खूब रिझाया॥
दिया  सभी ने पैसा-धेला।
चला देखने गाँव का मेला॥

सर्कस मे भी भीड़ बड़ी थी।
लंबी-लंबी लाइन खड़ी थी॥
शेर दहाड़ा, ऊट भी  जागा।
कड़दम-कड़दम घोड़ा भागा॥
जोकर की जब बारी आई।
हाथ छोड़ के कार चलाई॥
हाथी ने फुटबाल से खेला।
चला देखने गाँव का मेला॥

हाथों मे थे रंग रँगीले। 
लाल हरे गुब्बारे पीले॥ 
गर्म जलेबी, मुँह को आती। 
बर्फ की चुस्की, मुन्नी खाती॥ 
गुड़िया के थे मीठे बाल। 
बच्चों ने भी किया धमाल॥ 
खत्म हुआ था रेलम-पेला। 
चला देखने गाँव का मेला॥      

-विजय सहगल