रविवार, 28 जून 2026

"धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे"

"धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे"












श्रीमद्भगवत गीता मे भगवान श्री कृष्ण ने कुरुक्षेत्र को धर्मक्षेत्र कह कर उद्धृत किया है। 29 नवंबर 2025 को गीता जयंती के शुभ और पवित्र अवसर पर मुझे परिवार सहित  कुरुक्षेत्र की तीर्थ यात्रा करना, किसी सौभाग्य से कम न था। श्रीमद्भगवत गीता और उससे जुड़े प्रसंगों और स्थानों से जुडने पर मै रायपुर मेडिकल कॉलेज के सेवानिवृत्त डीन स्व॰ डॉ॰ विनोद बिहारी सक्सेना के प्रति भावुकता से श्रद्धांवत होकर उनको स्मरण करता हूँ, जिन्होने 1996-97 मे मुझ सहित अनेक लोगों को गीता स्वाध्याय से जोड़ कर गीतामृत का पान कराया। मेरी रायपुर पदस्थपना पर्यन्त सन 2000 तक, मै गीता स्वाध्याय मण्डल, रायपुर से जुड़ा रहा और आज तक नित्य गीता स्वाध्याय करते हुए डॉ॰ सक्सेना के प्रति कृतज्ञता प्रकट करता हूँ क्योंकि उनके गीता स्वाध्याय मण्डल से जुड़े कदाचित ही  मै, दुनियाँ के इस महान, सर्वश्रेष्ठ और पवित्र ग्रंथ के सनिध्य मे आया होता। इसी तारतम्य मे मै अपने नोएडा प्रवास के लगभग पाँच साल मे श्री इंदर राज शर्मा, श्री रणजीत सिंह और श्री टंडन जी के सानिध्य मे रहा जिनके साथ भी श्रीमद्भगवत गीता का ज्ञान प्राप्त करता रहा।  

ऐसी किवदंती है कि कुरुक्षेत्र के इस ब्रह्म सरोवर को भगवान ब्रह्मा ने यज्ञ कर ब्रहमाण्ड की संरचना की थी इसलिए इसे आदि सरोवर भी कहा जाता है। सरोवर के मध्य सर्वेश्वर महादेव का मंदिर है ऐसा कहा जाता है कि इस पवित्र मंदिर की स्थापना ब्रह्मा जी ने की थी। यह  क्षेत्र महाभारत से भी जुड़ा है क्योंकि यहा महाभारत  का युद्ध लड़ा गया था। गीता जयंती और सूर्य ग्रहण के पावन अवसरों पर यहाँ स्नान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। महाभारत युद्ध के पश्चात पांडवों ने इसी सरोवर मे अपने पूर्वजों का पिंड दान किया था। यहाँ पर स्थित अर्जुन घाट, कृष्ण घाट और भीम घाट पर श्रद्धालु जल और तर्पण की क्रिया द्वारा अपने पूर्वजों का पिंड दान करते हैं।  

इस के पास ही 7-8 किमी दूर स्थित ज्योतिसर क्षेत्र जो कि श्रीमद्भगवत गीता की जन्मस्थाली है। ये वही पवित्र, पावन और पुनीत स्थान है जहां भगवान श्री कृष्ण ने अपने प्रिय भक्त अर्जुन को गीता के उपदेश दिये थे। हम परिवार सहित प्रातः 8 बजे गुरुग्राम से चलकर मुरुथल के प्रसिद्ध अमरीक-सुखदेव के ढाबे पर गरमा गर्म आलू-गोभी के पराँठे का नाश्ता कर लगभग एक बजे कुरुक्षेत्र के ब्रह्म सरोवर पहुँच गए। इन दिनों कुरुक्षेत्र मे दिनांक 15 नवंबर से 5 दिसंबर 2025 तक हरियाणा सरकार द्वारा अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव-2025 का आयोजन किया गया था। पूरे कुरुक्षेत्र शहर मे  गीता महोत्सव की सजावट और लोगो की भीड़ इस बात की गवाह थी कि आयोजन मे सरकार के साथ साथ लोगो की बड़ी भागीदारी है। मुख्य समारोह ब्रह्मसरोवर के चारों ओर बने बड़े और चौड़े गलियारे मे मेले जैसा दृश्य था। 3600 फुट लंबे और 1500 फुट चौड़े ब्रह्म सरोवर जो कि एशिया का सबसे बड़े मानव निर्मित सरोवरों/तालाबों मे से एक माना जाता है। लगभग 1 किमी क्षेत्रफल के इस सरोवर के बारे मे पौराणिक मान्यता हैं कि इस सरोवर की रचना स्वयं भगवान ब्रह्मा ने की थी। 45 फुट गहरे सरोवर और उसके चारों ओर बने व्यावसायिक दुकानों, प्रतिष्ठानों, सरकारी और गैर सरकारी प्रदर्शिनियों, विदेशी वस्तुओं के विक्रय कार्यालयों के बीच बने लगभग  150 फुट चौड़े कॉरीडोर या रास्ता, लाखों लोगो को अपने परिसर मे भारतीय सांस्कृति, सभ्यता और  देश के विभिन्न प्रेदेशों की वेषभूषा की झलक यहाँ देखने को मिली।  कहीं जलेबी की मीठी खुसबू, देशी कुल्फी, चाट पकौड़ी की दुकाने भारतीय व्यंजनों की खुशबू बिखेर रहे थे। पारंपरिक नृत्य करने वाली जाति  नटों  द्वारा रस्सी मे चल कर करतब और कमाल दिखलाना, हिंडोले और झूले पर बच्चों के साथ बड़ों का झूलना ग्रामीण परिवेश की एक झलक दिखला रहा था। रंग-बिरंगी बुढ़िया के बाल वाली मीठी मिठाई बच्चों को आकर्षित कर रही थी। धागे से खींच कर काले समुदिर मगर को आगे पीछे दौड़ना उस समय की याद दिला रहा था जब हम खुद बच्चे थे और झाँसी मे मेलों मे उक्त देशी खिलौने को एक टक देखते थे।  समुद्र की तरह दिखलाई पड़ने वाले इस विशाल सरोवर के बीचों बीच श्री सर्वेश्वर महादेव का मंदिर एक द्वीप की तरफ प्रतीत हो रहा था जहां श्रद्धालुओं की बड़ी भीड़ दर्शन हेतु उमड़ रही थी।

इस महोत्सव के एक संग्रहालय मे भगवान श्रीकृष्ण के संदेशों को दर्शाती 60 से अधिक भाषाओं मे श्रीमद्भगवत गीता के संग्रह को देखना अत्यंत हर्षोल्लास का विषय था। यही कारण हैं कि बिना राज्याश्रय (राज्याश्रय से तात्पर्य अन्य धर्मों की पुस्तकों को, जिंका  मुफ्त मे वितरण होता है जबकि इसके विपरीत श्रीमद्भगवत गीता को क्रय कर चिंतनमनन, पठन-पाठन  करने से है) के दुनियाँ मे सबसे ज्यादा पठन पाठन वाली पुस्तक हैं। यह धार्मिक पुस्तक ही नहीं अपितु दुनियाँ मे मानव मात्र के जीवन जीने का मार्ग की ओर सन्मुख करती एक मात्र पवित्र पुस्तक हैं। निष्काम कर्म को भगवान को समर्पित करने को सर्वोच्च कर्तव्य का निरूपण तो सिर्फ गीता मे ही है।

श्रीमद्भगवत गीता के शीर्ष दृश्य जिसमे भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को उपदेश देने एवं पृष्टभूमि मे सात घोड़ो के रथ का दृश्य अद्व्तिय था। प्रायः हर भ्रमणकारी, श्रद्धालु इस मूर्ति के साथ अपने यादगार क्षणों को मोबाइल मे कैद करने से वंचित नहीं रहना चाहता था। हमारा परिवार भी इस इस दृश्य को मोबाइल मे कैद करने के लोभ से नहीं बच सके। आगे ही इस महोत्सव मे एक सांस्कृतिक मंच भी बनाया गया था जहां धार्मिक गतिविधियों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और धार्मिक साधू संतों, राजनैतिक हस्तियों आदि के कार्यक्रम सुबह से शाम तक चलते रहते थे। जहां एक ओर पर्यटक, श्रद्धालु यहाँ की विविध कार्यक्रमों को देखते और हाल के पिछले हिस्से मे बैठे दर्शक सबसे बेखबर हो आँख बंद कर आराम फरमाते। साफ सफाई की समुचित व्यवस्था थी और कुछ कुछ दूरी पर पुरुष और महिलाओं के लिए प्रसाधन की समुचित व्यवस्था थी। इस तरह पूरे ब्रह्मसरोवर की एक परिक्रमा पूर्ण कर  हम लोग कुरुक्षेत्र मे स्थित अन्य महत्वपूर्ण स्थलों के दर्शन हेतु आगे बढ़ लिए।

विजय सहगल    

  


सोमवार, 22 जून 2026

नागवासुकि मंदिर - प्रयागराज

 

"नागवासुकि मंदिर - प्रयागराज"








बैसे तो प्रयागराज अनेकों बार जाना हुआ, और पिछले दिनों महाकुंभ मे भी जाना हुआ पर दुर्भाग्य से प्रयाग के एक प्रसिद्ध और आराध्य देव नागवासुकि जाना नहीं हो पाया। लेकिन अक्टूबर 2025 मे  अपने काशी, बैजनाथ धाम, अयोध्या के  तीर्थाटन प्रवास पश्चात पुनः प्रयागराज जाना हुए तो हमारा दृढ़निश्चय रहा कि मै अपनी अर्धांग्नि के साथ नागवासुकि, लेटे हनुमान  और किले मे स्थित वट वृक्ष के दर्शन करूँ। हमारे इस प्रयास मे हमारे समधि श्री जेके रावल और उनकी धर्मपत्नी श्रीमती रीना रावल जी का महत्वपूर्ण योगदान रहा स्थानीय रहवासी होने से दर्शन सुगम और सरल हो गए।

तो आइये सर्वप्रथम नागवासुकि की धर्मयात्रा करते हैं। प्रातः त्रिवेणी के पवित्र संगम मे स्नान ने एक बार फिर से महाकुंभ के स्नान की यादें ताज़ा कर दी यध्यपि कुम्भ के महायोजन और अभी के संगम स्नान मे जमीन आसमान का अंतर था। तब महाकुंभ की व्यवस्था, "न भूतो ने भविष्यति (एक संस्कृत वाक्यांश)  अर्थात जो न  पहले कभी हुआ हो और न भविष्य मे कभी होगा!! फिर भी प्रयागराज का  पवित्र संगम मे स्नान  तो वह धार्मिक कृत्य और आस्था  हैं जिसका हमारी सनातन संस्कृति मे सर्वोच्च कल्याण कारी और पवित्र कार्य माना जाता है।

संगम स्नान के पश्चात अब हमारा लक्ष्य नागवासुकि मंदिर के दर्शन करना था। इस समय अधिकमास होने के कारण कुछ भीड़ थी लेकिन महाकुंभ मे हुई भीड़ के मुक़ाबले अपेक्षाकृत काफी कम थी क्योंकि तब इसी कारण हम नागवासुकि के दर्शन नहीं कर सके थे। गंगा नदी के तट के विपरीत तरफ काफी ऊंचाई पर लाल पत्थर से बने  नागवासुकि मंदिर जाने के लिए बनी  सीढ़ियो से होकर जब हम मंदिर मे पहुंचे तो नीचे गंगा नदी के तट से मंदिर का दृश्य और उपर मंदिर से गंगा नदी का तट बड़ा विहंगम दृश्य प्रस्तुत कर रहा था। मंदिर की सीढ़ियों के दाहिनी तरफ दीवार पर समुद्र मंथन की विशाल पेंटिंग नागवासुकि मंदिर के महत्व को दर्शा रहा था।    रावल साहब ने बताया कि बरसात मे बाढ़ की स्थिति निर्मित होने पर गंगा नदी का पानी तटों को तोड़ कर मंदिर की सीढ़ियों तक को डुबो देता हैं। ऐसे वक्त पर नदी की अथाह जलराशि के भयावह जलराशि की कल्पना ही की जा सकती है।

जब हम लोग नागराज वासुकि को समर्पित इस मंदिर की सीढ़ियों पर चढ़ कर मंदिर के प्रांगण मे पहुंचे तो मुख्य मंदिर के चारों ओर बने बरामदों पर आचार्यों, ब्राह्मणों और पुरोहितों द्वारा पितृ दोष और काल सर्प दोष के निवारणार्थ पूजा हो रही थी या उसकी तैयारी चल रही थी। चावल को विभिन्न रंगों मे रंग कर लकड़ी की चौकियों पर पुरोहितों द्वारा आकर्षक ढंग से नवग्रह, राहू केतू, और काल सर्प की आकृतियाँ बनाई गई थी जो देखते ही बनती थी। मंत्रों और पूजन विधि विधान से सम्पन्न कराये जा रहे थे। ऐसी ही आकृति और पूजन विधि मैंने हैदराबाद के आईपीएस अकादमी के नजदीक बने एक मंदिर मे देखी थी। पुराणों मे उल्लेखित किवदंतियों के अनुसार जब देवासुर संग्राम के दौरान समुद्र मंथन के लिए मथानी के रूप मे उपयोग किए गए मंदराचल पर्वत को मथने के लिए रस्सी के रूप मे नागराज वासुकि ने उपयोग के लिए अपने आपको समर्पित  किया। स्कन्द पुराण मे नागवासुकि के इस मंदिर स्थान को पृथ्वी पर नागहृद तीर्थ कहा जाता है। प्रतिवर्ष नागपंचमी पर यहाँ एक विशाल मेले का आयोजन किया जाता है। ऐसी मान्यता और विश्वास है कि प्रयागराज मे त्रिवेणी संगम या गंगा स्नान  के पश्चात नागवासुकि मंदिर मे शेषनाग के दर्शन करने से  पापों का नाश होता है और पितृ दोष/काल सर्प दोष का सदा सदा के लिए निवारण हो जाता है। एक अन्य कथा के अनुसार भगवान कृष्ण जब अपने ग्वाल बालों के साथ गेंद खेल रहे थे तो नाग वासुकि ने उनकी गेंद चुरा ली थी। तब कृष्ण ने नागवासुकि के घर मे जा कर भीषण युद्द कर गेंद बापस ली और पंचमुखी नाग के फन पर खड़े होकर नदी से बाहर आए।  

प्रांगण के मध्य मे बने नागराज वासुकि के मंदिर के गर्भ गृह मे दर्शन और आरती कर कुछ मिनटों के लिए हम दोनों परिवारों ने  मंदिर मे बैठ कर नागवासुकि का ध्यान किया। मंदिर के गर्भगृह तत्पश्चात मंदिर प्रांगण की एक परिक्रमा कर मंदिर प्रांगण मे पितृदोष और काल सर्प दोष के निवारनार्थ चल रही पूजा के दर्शन किए जो बड़ा मनोहारी दृश्य प्रस्तुत कर रहे थे। कुछ समय मंदिर मे व्यतीत कर जब हम लोग वापस नीचे जा रहे थे तो मंदिर के मध्य मे बैठे एक सपेरे को देखा तो साक्षात नाग राज के दर्शन की उत्कंठा प्रकट की। सपेरे ने कोबरा नाग के दर्शन कराये जब मैंने कोबरा नाग को सपेरे से लेकर अपने हाथ मे पकड़ा तो मानों चारों तरफ सन्नाटा खिंच  गया!! श्रीमती जी और रावल साहब साँप को बापस सपेरे को बापस करने का बार-बार आग्रह कर रहे थे। मैंने कहा भी कि जब सपेरा साँप को पकड़ कर रख सकता तो मै क्यों नहीं? मै जंतुविज्ञान का छात्र रहा हूँ, प्रायः ऐसे साँपों की विष  ग्रंथि और दांत को सपेरे निकाल देते हैं। ऐसा कृत्य  पशु अत्याचार निवारण के तहत आता हैं।

अनेकों बार प्रयागराज की यात्रा के बाद अंततः आज नाग वासुकि तीर्थ के दर्शन करना एक यादगार पल को अपने अन्तःकरण की स्मृतियों को अपने मन मे सँजोएँ हम अपने गंतवाय की ओर चल दिये।

विजय सहगल