शनिवार, 25 जुलाई 2026

पीएम आवास पर राहुल गांधी का धरना-प्रदर्शन मे "मेरी मर्जी"

 

पीएम आवास पर राहुल गांधी का धरना-प्रदर्शन मे "मेरी मर्जी"












जिस  इंडि गठबंधन के महत्वपूर्ण घटक कॉंग्रेस सहित अन्य दल अपने बलबूते अब तक सरकार के विरुद्ध देश मे, कोई बड़ा जन आंदोलन नहीं चला सके, वे देश के लिए एक अज्ञात, अपरिचित और अजनबी कॉकरोच जनता पार्टी के आवाहन पर कल 21 जुलाई 2026 को उनके आंदोलन के समर्थन मे शामिल हुए। राहुल गांधी ने तो अपने को अलग दिखलाने की चाह मे सारे नियम कानून और शिष्टाचार को ताक पर रख कर अराजकता की स्थिति उत्पन्न कर प्रधानमंत्री आवास के सामने धरना प्रदर्शन शुरू कर दिया, जहां सामान्य तो क्या असाधारण स्थितियों या परिस्थितियों मे भी इस तरह के प्रदर्शन की किसी को अनुमति नहीं है। अपने पद और प्रतिष्ठा का दुर्पयोग और अनधिकृत राजनैतिक हित लाभ के लिए प्रधानमंत्री की सुरक्षा को खतरे मे डाला।  प्रधानमंत्री आवास देश का एक अति संवेदनशील, सुरक्षित और महत्वपूर्ण स्थान है जो देश की प्रतिष्ठा, प्रभाव और प्रताप से जुड़ा है, जो देश की एक सौ चालीस करोड़ जनता का प्रतिनिधित्व करने का केंद्र है, भले ही प्रधानमंत्री किसी भी राजनैतिक दल का रहा हो। प्रधान मंत्री का आवास कोई धरना प्रदर्शन की जगह नहीं है जहां आप सभी लोगो को सार्वजनिक तौर  धरना-प्रदर्शन मे शामिल होने का आवाहन करें?  देश को पहले ही इस बड़ी सुरक्षा चूक की कीमत दो-दो  प्रधानमंत्रियों के  बलिदान  दे कर चुकनी पड़ी है। राहुल गांधी तो इससे भलीभाँति परिचित हैं।   प्रधानमंत्री आवास की  सुरक्षा को संकट मे डालने के, राहुल गांधी के  धरना प्रदर्शन के इस अपरिपक्व, अनैतिक और अदूरदर्शी निर्णय की जितनी भी निंदा और भर्त्सना की जाय कम है।

यही नहीं नेता प्रतिपक्ष के प्रति आदर और सम्मान का भाव प्रकट करते हुए सरकार ने अपने एक केंद्रीय मंत्रिमंडल के कैबिनेट मंत्री जितेंद्र सिंह को विपक्ष के नेता राहुल गांधी से बात करने और  इस संवेदनशील स्थल से धरना समाप्त करने के लिए भेजा। केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह से बातचीत मे राहुल गांधी ने छात्र आंदोलन और नीट (राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा) पर संसद मे चर्चा कराने की एक मात्र मांग की। मंत्री जितेंद्र सिंह ने केंद्रीय नेतृत्व से बातचीत कर इस संबंध मे सरकार की सहमति प्रदान कर दी। जब इस निर्णय से राहुल गांधी को अवगत कराया तो उन्होने अपनी बात से पलटते हुए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग जोड़ दी। जब राहुल गांधी से उनके अपनी बात से पलटने की याद दिलाई गयी तो उनका जबाव था कि "मेरी मर्जी"! मैंने पहले संसद मे चर्चा की मांग की थी अब शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग भी जोड़ दी।   कॉंग्रेस के एक सांसद और नेता प्रतिपक्ष जैसे जिम्मेदार व्यक्ति से ऐसे गैरजिम्मेदार व्यवहार की अपेक्षा कदापि नहीं की जा सकती। यही नहीं मंत्री महोदय और गृह मंत्रालय के सचिव ने जब राहुल गांधी का ध्यान प्रधानमंत्री आवास जैसे संवेदनशील स्थल पर धरना-प्रदर्शन के निषेध की याद दिलाई तो उन्होने बड़ी ही हठधर्मिता से वहीं पर धरना देने की "मेरी मर्जी" से अवगत कराया। राहुल गांधी के प्रधानमंत्री आवास के  इस धरना  प्रदर्शन पर साथ देने समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव सहित बड़ी संख्या मे उनके कार्यकर्ता भी थे। जब कॉंग्रेस और समाजवादी सहित अन्य राजनैतिक दलों ने पीएम आवास पर आंदोलन समाप्त करने के सरकार के अनुरोध की  अवेहलना की, तो बाध्य होकर, आंदोलन समाप्त कराने के लिए पुलिस बल को बुलाना पड़ा। समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव ने राजनैतिक शिष्टाचार दिखाते हुए पुलिस के आग्रह को स्वीकारते हुए अपनी गिरफ्तारी दे दी, पर राहुल गांधी ने अखिलेश यादव का अनुरोध ठुकराते हुए, धरना स्थल पर डटे रहकर धरना स्थल पर लेटने-लोटने का निर्णय लिया, ताकि ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हों कि पुलिस बलों को राहुल गांधी को बलपूर्वक घटना स्थल से हटाने के लिए बाध्य होना पड़े। अपने इस मकसद मे वे बहुत हद तक कामयाब भी हुए। राहुल गांधी का अनुसरण उनकी सांसद बहिन प्रियंका गांधी ने भी किया। पुलिस बल को असहज स्थिति का सामना करते हुए नेता प्रतिपक्ष के सम्मान का ध्यान रखते हुए  न्यूनतम बल का प्रयोग किया और उनको उठा कर बस मे जबर्दस्ती बैठा कर गिरफ्तार करना पड़ा। एक छुटभैये राजनैतिक कार्यकर्ता द्वारा लोगों की निगाह मे आने, गिरफ्तारी के पूर्व हाथ पैर पटक कर नाटक नौटंकी करना तो उचित प्रतीत लगता है पर कॉंग्रेस के एक वरिष्ठ सांसद और नेता प्रतिपक्ष का ऐसा आचरण सामान्य शिष्टाचार और नैतिक मर्यादाओं के सर्वथा विपरीत था। जिसने नेता प्रतिपक्ष जिसे गरिमा पूर्ण पद की प्रतिष्ठा को धूमिल ही किया। 

भारतीय राजनीति का खोखलापन इस आंदोलन मे स्पष्ट दिखलाई दिया। कॉंग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कॉंग्रेस, डीएमके, शिवसेना, आप और एनसीपी जैसी स्थापित पार्टियां भी मोदी सरकार के विरुद्ध पिछले बारह साल मे कोई बड़ा जन आंदोलन खड़ा नहीं कर सकी, वहीं कॉकरोच जनता पार्टी जैसी नवजात पार्टी ने अपने अस्तित्व के बाद सभी विरोधी दलों को अपना पिछलग्गू बना दिया। अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए इंडि गठबंधन के धुरंधर नेतागण  भी कॉकरोच जनता पार्टी के प्रमुख अभिजीत दीपके जैसे अनजान, अपरिचित और अज्ञात  नेता के दरबार मे हाज़िरी लगाने को मजबूर हुए!    ऐसा प्रतीत होता है कि राहुल गांधी एक के बाद एक मिली असफलताओं के कारण हीन  भावना से ग्रसित होकर एक अनाम, गुमनाम और बेनाम  कॉकरोच जनता पार्टी जैसे दल के मंच पर जाकर आंदोलन, धरना प्रदर्शन की सफलता  का श्रेय कॉकरोच पार्टी को न देकर इस आंदोलन का श्रेय स्वयं लेने के लोभ से वंचित नहीं रहना चाहते थे, इसलिए उन्होने जंतर मंतर के जगह प्रधाममंत्री आवास पर धरना देने के स्वार्थ पूर्ण निर्णय लेकर न केवल पीएम आवास की सुरक्षा को संकट मे डाला अपितु अपनी  अधम राजनैतिक स्वार्थपरता, अवसरवादिता और खुदगरजी का परिचय दिया जो निंदनीय है।

ऐसा नहीं था कि एनईईटी  पेपर लीक की घटना कोई पहली अनोखी घटना थी। कॉंग्रेस शासित राजस्थान मे अशोक गहलोत सरकार के कार्यकाल मे 17 पेपर लीक की घटनाएँ हुई जिनमे सब इंस्पेक्टर परीक्षा, जेईएन परीक्षा 2021, आरईईटी परीक्षा, कांस्टेबल भर्ती परीक्षा प्रमुख हैं। कॉंग्रेस शासित हिमाचल प्रदेश मे भी जेओए-आईटी परीक्षा 2022, पुलिस कांस्टेबल भर्ती परीक्षा 2022, सीपीएमटी परीक्षा 2006 के पेपर भी लीक हुए थे। तेलेंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडू राज्यों मे भी पेपर लीक की घटनाएँ देखने को मिली। उत्तर प्रदेश मे मुलायम सिंह की सपा सरकार के कार्यकाल मे भी  एक जाति विशेष के लोगों की बहुतायत मे पुलिस भर्ती की अनियमितताएँ हुई। लेकिन इन सरकारों ने भी अपने स्तर पर कड़ी कानूनी कार्यवाही कर अपराधियों के विरुद्ध कार्यवाही की गयी। एनईईटी परीक्षा लीक कांड  के भी 13 अपराधियों को गिरफ्तार कर सरकार ने कड़ी कार्यवाही की है। लीक परीक्षा को निरस्त कर दुबारा परीक्षा कराई गयी ताकि परीक्षार्थियों को न्याय मिल सके और ऐसा हुआ भी। हजारों सफल परीक्षार्थियों ने अपनी इस दुबारा हुई एनईईटी परीक्षा का जश्न मनाया। योग्य अभ्यर्थियों का चयन दुबारा से की गयी परीक्षा मे किया गया। कल प्रधानमंत्री ने भी दुबारा,  मंगलवार 21 जुलाई 2026 को  एनडीए संसदीय दल की बैठक मे पुनः अपनी इस प्रतिबद्धता को  दोहराया कि नीट पेपर लीक के दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा और उनके विरुद्ध मिसाल कायम करने वाली सख्त कार्यवाही की जाएगी। छात्रों का भविष्य प्रभावित न हो इसीलिए नीट को दुबारा कराया गया।

इसीलिए आवश्यकता इस बात की है कि सरकार सहित विपक्षी दलों को मिल बैठकर पेपर लीक की इस गंभीर समस्या पर संसद मे सार्थक चर्चा कर सर्वमान्य हल निकालना चाहिए और किसी कड़े नए कानून बनाने की पहल करना चाहिए  ताकि असामाजिक और अराजक तत्व देश के युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ न कर सकें।

विजय सहगल                               

              

रविवार, 19 जुलाई 2026

पेन की दुकान, वाराणसी

 

"पेन की दुकान, वाराणसी"










24 अक्टूबर 2025 को वाराणसी के बाज़ारों और गलियों मे निरुद्देश्य  भटकने, घूमने का एक अलग ही मजा है। पहले बचपन मे अपनी बुआ और ताऊ के साथ वर्षों पहले शायद 1971-72 मे बनारस जाना हुआ था। 7-8 दिन का प्रवास था। गोदौलिया मे सत्यनारायण धर्मशाला मे रुके थे, इस दौरान धर्मशाला से दशाश्वमेध घाट मे सुबह स्नान और विश्वनाथ मंदिर दर्शन लगभग नित्य का क्रम था। इन तीनों जगह को जोड़ने और मोड़ने वाली  गलियों और मुहल्लों मे भटकने और घूमने से रास्ते लगभग याद हो गये थे। एक बार फिर से आज पुरानी घुम्मकड़ी और यायावरी की यादें ताजा हो आयी। भटकाव और घूमने फिरने के बावजूद एक प्राचीन सत्यनारायण मंदिर तो दिखा  लेकिन फिर भी  वो धर्मशाला और उसमे स्थित भगवान विष्णु की भव्य प्रतिमा का मंदिर  नहीं मिला। बाजार मे एक ठेले पर ड्रैगन फ्रूट के सुंदर गुलाबी रंग मे सजे फलों और एक फुटपाथ पर बांस की तीलियों और खपच्चियों से बने सूप, डलियाँ और दौल्ले को देख उनकी फोटो के लोभ से मै न बच सका। दशाश्वमेध घाट से बापसी के दौरान पेन को॰ नाम की एक पेन की दुकान ने भी मेरा ध्यानकर्षण किया जहाँ मै ठिठक कर  रुके बिना नहीं रह सका। दुकान का बाहरी आवरण और रूप और साज सज्जा बड़ी आकर्षित तो थी ही परंतु आज के कम्प्युटर युग मे स्याही-पेन, निब जैसी वस्तुओं की दुकान को देखना किसी आश्चर्य और अचरज के समान था क्योंकि आज के कम्प्युट्रीकरण ने लिखने-लिखाने के इन माध्यमों को चलन और प्रचलन से बाहर कर दिया है।

हमे याद है कि हमारे स्कूल के समय मे कलाम, दवात हमारे पढ़ाई-लिखाई का एक अहम हिस्सा हुआ करती थी। स्याही से कॉपी पर लिखना तो कम होता पर स्याही से हाथ और स्कूल ड्रेस की रंगाई पुताई ज्यादा होती थी। काँच की छोटी शीशी कहीं किसी साथी के पैर का निशाना बन लुड़कती-पटकती चारों खाने चित्त हो जाती और दवात, स्याही से अपनी यात्रा के निशान चारों तरफ छोड़ जाती। स्कूल जाते या घर आते मे कभी दवात की स्याही जेब या स्कूल बस्ते  मे ही खाली हो जाती और अंतरंग अंगों और स्कूल किताबों/कॉपी को सराबोर कर जाती। किसी साथी की शर्ट पर पीछे  स्याही छिड़कर शैतानी करना बच्चों का प्रिय शगल था। बैसे तो प्रचलन मे नीली स्याही ही ज्यादा चलन मे थी पर काली और लाल स्याही का चलन भी था। कभी कभी प्रधानाचार्य या अन्य अध्यापकों द्वारा हरी स्याही का भी उपयोग किया जाता जो आभिजात्य वर्ग की पहचान होता था। साधारण स्याही तो एक टिक्की (दवाइयों की गोली की तरह) को पानी मे घोलकर बन जाती थी लेकिन कैमलिन कंपनी  नाम की स्याही आम प्रचलन मे थी पर उच्च श्रेणी की स्याहियों मे चेल्पार्क जेट ब्लैक, पार्कर क्विंक भी चलन मे थी जो बड़े शहरों मे ही बड़ी दुकानों मे मिलती थी।

जब पाँचवी कक्षा मे था पहली बार बांस की कलम की जगह फाउंटेन इंक पेन का इस्तेमाल किया था। एक अलग है रौब और रुतबे के साथ पेन को  स्कूल बस्ते मे रख कर अकड़ कर चलते थे मानों कोई बहुत बड़ी बंदूक हाथ लग गयी हो। पहली पहली बार इंक पेन हाथ लगा था। उसके सभी पार्ट्स यथा, निब, निब को सपोर्ट और स्याही की निर्बाध आपूर्ति करने वाला प्लास्टिक का फीड, निब और फीड को एक एक खोखले  के ऊपर मे फँसाने वाला हिस्सा जिसके निचले हिस्से को स्याही की ट्यूब के साथ चूड़ी से कसने वाला हिस्सा,  स्याही की टंकी या ट्यूब, ढक्कन और हुक जिसकी सहायता से पेन को शर्ट की जेब मे पेन को लगाते हैं। प्रायः स्याही की टंकी और निब के हिस्से से स्याही लीक कर जाती जिससे हाथों के साथ शर्ट की जेब भी खराब हो जाती। निब के पॉइंट से लिखते लिखते कभी कभी निब का आकार-प्रकार बिगड़ जाता जिसे ऊपर नीचे कर कभी पेन चल जाता और कभी उसके सिरे का एक हिस्सा टूट कर निब बेकार हो जाता। निब भी अनेक ब्रांड के बाजार मे मिल जाते। फाउंटेन पेन के साथ स्याही की निब वाली कलम भी चलन मे थी जिसे स्याही दवात मे डुबो डुबो कर लिखा जाता था। उन दिनों ओम स्पेशल पेन का चलन झाँसी मे होता था, हमारे एक परिचित प्रदीप कंचन ने भी अपने घर पेन की फ़ैक्टरि लगाई हुई थी।  अनेक रंगों और आकार प्रकार के पेन मिलते थे। कागज के डिब्बों मे दस की संख्या मे रंग-बिरंगे पेन के डिब्बे आकर्षण का केंद्र होते थे। जब कभी फाउंटेन इंक पेन नहीं चलते तो हाथ से स्याही को छिड़क छिड़क कर चलाने का प्रयास करते। परीक्षाओं मे एक-दो अतिरिक्त पेन आकस्मिक उपयोग के लिए रक्खे जाते कहीं किसी पेन ने धोखा दे दिया तो परीक्षा मे उत्तर लिखने कहीं कोई चूक या कमी न हो जाय।

पेन को॰ दुकान मे पेन की अनगिनित रंग-रूप की श्रेणियाँ देख कर मुझसे दुकान मे प्रवेश करने से रहा न गया। सामने काउंटर पर दुकान के मालिक एक नौजवान से जिसने अपना परिचय निशांत साहू नाम से कराया। उन्होने बतलाया कि ये दुकान उनके दादा स्व॰ तारा प्रसाद साहू ने 1946 मे शुरू की थी, वे तीसरी पीढ़ी हैं जो अपने पैतृक व्यवसाय को आगे बढ़ा रहे हैं। मैंने अपना मन्तव्य/उद्देश्य  निशांत को बतलाते हुए कहा कि मै  आपकी दुकान की तरफ इसलिए आकर्षित हुआ क्योंकि आपकी दुकान ने अस्सी-नब्बे दशक की यादें ताज़ा कर दी और दूसरे मेरी जिज्ञासा थी कि  आज के कम्प्युटर युग मे  महज लेखनी, पेन स्याही के व्यापार  विनिमय से जीवन यापन कैसे संभव, सहज और सुलभ हो रहा होगा? निशांत ने बतलाया कि आज भी पुराने स्याही पेन के पारखी, प्रशंसक और क़द्रदान इस संस्कारधानी बनारस मे हैं। उनकी दुकान पर दस-पंद्रह रुपए से दो  लाख रुपए तक का मोंटब्लंक कंपनी का पेन हैं जो नक्काशीदार कारीगरी का नायाब नमूना है जो पूर्णत: अखरोट की लकड़ी से बना है। इस पेन को वे दुकान के एक छोटे लॉकर मे सुरक्षित बंद कर रखते हैं। आज ये शहर की इकलौती दुकान हैं जहां देश विदेश के फाउंटेन पेन, स्याही और अन्य संबन्धित सामाग्री मिलती हैं। कुछ चमत्कारिक और अजूबे पेन का संग्रह भी इनकी दुकान मे प्रदर्शित है।  पूर्व ब्रिटिश प्राइमिनिस्टर विसटन चर्चिल सहित अनेक  नाम चीन हस्तियाँ हमारी इस दुकान पर आ चुकी हैं। आज भी पुराने पेन की मांग हैं जिन्हे खरीदने लोग यहाँ आते हैं। इंडिया टूड़े के राजदीप सरदेसाई ने इनकी दुकान के बारे मे एक छोटी डॉकयुमेंट्री भी प्रसारित की है। विभिन्न प्रकार के पेनों के साथ विभिन्न प्रकार की स्याही की आकर्षक दवात भी उनकी दुकान मे देखने को मिली जो एक अद्भुत अनुभव था।

अगली बार जब आप वाराणसी जाय तो  बाबा विश्वनाथ के दर्शन कर वाराणसी के अन्य प्रसिद्ध स्थलों के साथ पेन को॰ पेन की दुकान का भी अवश्य भ्रमण करें।

 

विजय सहगल                       

शनिवार, 11 जुलाई 2026

बिच्छू का मंत्र न जाने साँप के बिल मे हाथ डाले

 

"बिच्छू का मंत्र न जाने साँप के बिल मे हाथ डाले"!!










28 जुलाई 2024 की बात है। दाना पानी संस्था के प्रमुख आदरणीय राज चड्ढा जी ने ग्वालियर स्थित शारदा बाल ग्राम मे एक वृहद वृक्षा रोपण का कार्यक्रम रक्खा था। यहाँ मै संक्षिप्त मे वृक्षा रोपण की चर्चा कर इस ब्लॉग के  मूल शीर्ष बिच्छू का मंत्र न जाने........ पर ज्यादा ज़ोर दूंगा।  राज चड्ढा जी ने दो-तीन दिन पहले से शारदा बाल ग्राम की पहाड़ी पर अपने प्रयास और प्रभाव से लगभग 500 गड्ढे कराये थे। पेड़ो और पौधों की व्यवस्था भी रोपने के एक दिन पहले भली भांति कर ली गयी। तय वक्त और दिन पर आश्रम के प्रमुख स्वामी श्री ब्रह्मयोगानन्द जी अगुआई मे आश्रम के प्रबन्धक संजय करकरे एवं आश्रम मे रहने वाले बच्चे-बच्चियों के अलावा बड़ी संख्या मे दाना-पानी संस्था के सदस्य उनके परिवार और बच्चों की शारदा बाल ग्राम मे उपस्थिति ने वृक्षा रोपण कार्यक्रम को अति भव्य और महत्वपूर्ण बना दिया था। हर कार्यक्रम मे अपनी सक्रिय भागीदारी दर्ज़ कराने वाली श्रीमती नीति चड्ढा भी उस कार्यक्रम मे  उपस्थित थी, दुर्भाग्य से वे आज हमारे बीच नहीं हैं, हम उन्हे सादर नमन करते हैं। सभी लोगो मे बड़ा उत्साह था। छोटे छोटे बच्चों बड़े बुजुर्गों और नौजवान किशोरों ने वृक्षारोपण कार्यक्रम का लगभग 500 पेड़ो को रोप कर और उनमे तुरंत ही दूर दराज से पानी लाकर, पेड़ों डाल  कर अत्यंत सफल बनाया। कार्यक्रम के बाद आश्रम के बच्चों सहित सभी उपस्थित समूह के लिए स्वल्पाहार की व्यवस्था थी जिसकी ज़िम्मेदारी मेरे ऊपर थी। 

शारदा बाल ग्राम की एक-डेढ़ किमी॰ क्षेत्र मे फैली पहाड़ी पर  लगभग दो घंटे के इस श्रमसाध्य वृक्षा रोपण के बाद, सभी लोगो को शारदा बालग्राम मे स्थित शिकागो भवन के मुख्य द्वार पर एकत्रित होना था जहाँ छोटे-बड़े लगभग डेढ़ सौ लोगो के स्वल्पाहार के लिए समोसे और फल की व्यवस्था की गई थी। शिकागो भवन जो एक छोटी ऊंची पहाड़ी के मध्य मे बना है और उसके दोनों ओर आने जाने के दो रास्ते अलग अलग बने है।   आश्रम का मुख्य दरवाजा शिकागो भवन से लगभग आधा-पौना किमी॰ अंदर था, मैंने ये सोच कर कि बालग्राम मे पौधों, पानी, स्वल्पाहार आदि कार्यों को सुचारु रूप और त्वरित गति से संपादित करने हेतु अपनी टाटा-नेक्सोन कार की सेवाएँ लेना उचित समझा जिसे कुछ माह पूर्व ही मैंने क्रय किया था। मै टाटा की इस कार को चलाने मे अभी इतना निष्णात, निपुण दक्ष नहीं था। यध्यपि, मेरा इस दौरान दो-तीन बार कार से शिकागो भवन के एक रास्ते से प्रवेश कर दूसरे रास्ते की ढलान पर कार के  हैंड ब्रेक अच्छी तरह लगा कर, एक तरफ रोक कर खड़ा करना हुआ था। कहीं किसी तरह की कोई परेशानी नहीं थी। इसी क्रम मे इस बार भी किसी कार्यवश फिर से कार से आना हुआ और जल्दीबाजी या यूं कहें नासमझी मे मैंने इस बार भी कार को एक तरफ से चढ़ा कर दूसरी तरफ की ढलान पर खड़ा कर दिया और हैंड ब्रेक लगाना भूल गया। जैसे ही मै कार से नीचे उतर कर  कार्यक्रम स्थल की ओर कुछ कदम  बढ़ा पाता, वही कार्यक्रम स्थल पर खड़ी मेरी श्रीमती जी ने कहा कार आगे बढ़ रही है, क्या ब्रेक नहीं लगाया? जब तक मै पीछे मूढ़ कर, कार को रोकने के लिए दौड़ता कार धीरे-धीरे ढलान की ओर बढ़ गयी। गनीमत थी कि रास्ते मे कहीं कोई बच्चा या बड़ा नहीं आया और साथ ही  रास्ते के एक दूसरे किनारे पर नाली बनाने के कारण मिट्टी का ऊंचा ढेर था जिस पर कार आगे बढ़ी। मै तो ये सोच कर सिहर उठा कि अब कार मिट्टी के ढेर को लांघ कर नाली के गड्ढे मे गिरी!! नई कार को इस तरह अपनी आँखों के सामने गड्ढे की ओर बढ़ते, गिरने की सोच कर ही मेरे रोंगटे खड़े हो गए। लेकिन ये क्या!! कार मिट्टी के ढेर पर तो चढ़ी और उसके दोनों अगले  पहिये हवा मे लटक कर झूलने लगे और कार के नीचे की तली मिट्टी के ढेर से रगड़ कर रुक गयी। अगर कुछ कदम कार और बढ़ती तो निश्चित ही आगे गड्ढे मे गिर जाती!! ईश्वर का लाख लाख शुक्र था कि घटना स्थल के पास इतने बच्चों-बड़ों की भीड़ के बावजूद कोई बड़ी अनहोनी, दुर्घटना होने से बच गई और कार को भी कुछ नुकसान नहीं हुआ।

जो जैसा हुआ वो यहाँ तक तो फिर भी  ठीक रहा, लेकिन इसके बाद जो हुआ वो इस ब्लॉग के हेडिंग या शीर्षक को चरितार्थ करने वाला भयावह अनुभव था, जिसको याद कर भय से पूरे शरीर मे सिहरन पैदा हो जाती है। हुआ यूं कि कार के अगले पहिये अब भी हवा मे झूलते हुए लटकी थी। मै तो हक्का-बक्का हो किंकर्तव्य विमूढ़ता को प्राप्त,  अपनी सुधि-बुध खो बैठा। दुर्घटना स्थल को देख मेरे  हाथ-पैर फूल  गए कुछ सूझ नहीं रहा था कि क्या करूँ? अचानक वहाँ भीड़ मे उपस्थित एक सज्जन अति उत्साह से आए बोले मैंने बड़े बड़े मंत्रियों की कार चलाई हैं, लाओ मै गाड़ी को बैक कर निकलता हूँ। मै उन सज्जन को नहीं जानता था इस लिए संकट की इस घड़ी मे उनको, अपनी कार की चाबी दे दी। उन्होने अति उत्साह से कार का दरबाजा खोल, ड्राईवर सीट पर बैठ कर कार स्टार्ट की। अब तक मै संयत हो चुका था मैंने उन सज्जन को सौजन्यता वश धन्यवाद देते हुए कहा,  "कि आप बैक गियर मे गाड़ी चलाये हम एक दो लोग बोनट पर आगे से कार को पीछे की तरफ धकेलते है। जैसे ही अगले पहियों को जमीन की थोड़ी सी पकड़ भी  मिलेगी तो  कार पीछे हो जाएगी और धीरे से कार को मिट्टी के ढेर से उतार लेगी।     

हम एक दो लोग कार के आगे खड़े हो बोनट से पीछे की ओर धकेलने लगे लेकिन जब  कार के पहियों को  पीछे  घूमते न देख, आगे की ओर घूमते देखा तो मुझे समझते देर न लगी कि कार मे बैठे सज्जन को नेक्सोन कार चलाने का अनुभव नहीं, क्योंकि नेकसोन कार का पिछला गेयर और छठा गैयर दाहिने साइड मे पीछे एक ही दिशा मे लगते हैं।  फर्क सिर्फ इतना है कि बैक गेयर लगाते समय गेयर बॉक्स के, एक लीवर को साथ साथ ऊंचा उठाना पड़ता है। गनीमत ये रही कार के स्वतः आगे बढ्ने पर तो कोई बड़ी दुर्घटना नहीं हुई पर उन नासमझ  सज्जन ने बैक गेयर के बजाय गाड़ी को छठे गैयर मे आगे गेयर को लगा दिया था, जिसेस कार आगे बढ़ जाती!! पर कार के पहिये आगे घूमने के बावजूद आगे नहीं बढे  क्योंकि उसके दोनों अगले पहिये हवा मे झूल रहे थे।  इस तरह, होने वाली संभावित दुर्घटना केवल इस लिए नहीं घटी क्योंकि कार के पहिये हवा मे झूल रहे थे। यदि उन सज्जन के छटे गेयर मे गाड़ी चलाने मे पहियों को कुछ जमीन का आधार मिल जाता तो गाड़ी आगे तेजी से बढ़ती और मेरे सहित अन्य लोग जो कार के आगे खड़े होकर, पीछे धकेलने का प्रयास कर रहे थे, रौंदते हुए निश्चित ही कार गड्ढे मे गिर जाती और एक और बड़ी अनहोनी दुर्घटना  हो सकती थी? पर कहते हैं जाको राखे साइयां मार सके न कोय!!

ईश्वर का निश्चित ही मेरे ऊपर अपार स्नेह और आशीर्वाद था, मित्रो की शुभकामनायें थी कि पहली दुर्घटना मे जहां कार गड्ढे मे गिरने से बची वहीं दूसरी दुर्घटना मे यदि कार आगे बढ़ जाती तो पहली घटना से बड़ी दुर्घटना हो सकती थी जिसमे आगे खड़े लोगो की  जान को खतरा हो सकता था। फिर मैंने शांत और संयत होकर स्वयं ही गाड़ी को पीछे किया। अनहोनी टल चुकी थी। ईश्वर को पुनः एक बार आभार ज्ञापित कर हम बच्चों की खुशियों मे शामिल होकर उनके सांझीदार बने। कहने का तात्पर्य यह है अतिउत्साह और जोश मे ऐसे किसी कम को न करें जिसकी जानकारी आप हो ही नहीं अर्थात बिच्छू का मंत्र न जाने और साँप की बाँबी मे हाथ डालें!!

विजय सहगल              

रविवार, 5 जुलाई 2026

सोहन लाल का सुनहरा संसार? (कहानी )

 

"सोहन लाल का सुनहरा संसार?"



आज तो संध्या ने बाथरूम से निकलते ही आसमान सिर पर उठा लिया! अब तो हद हो गयी!! बाथरूम है या ड्राइंग रूम? किसने रक्खी कुर्सी बाथरूम मे? बाथरूम से निकलते हुए उसने अपने पति रूपेश से लगभग चींखते हुए कहा! अब तो एक-एक दिन काटना मुश्किल हो गया है इस घर मे। अजीब अजीब काम देखने को मिलते हैं इस घर मे!! रूपेश जो ऑफिस जाने की तैयारी कर रहा था, अचानक संध्या के इस तरह चिल्लाना सुनकर, भागते हुए बाथरूम की तरफ दौड़ा। क्या हुआ डार्लिंग!! पूंछते हो,  क्या हुआ? देखो अपने पापा की करतूत बाथरूम मे कुर्सी लेकर क्या उपन्यास पढ़ रहे थे? क्या कोई ऐसे बाथरूम मे कुर्सी रखता हैं? बैसे ही तो बाथरूम छोटा हैं बमुश्किल खड़े होने की जगह नहीं, क्या जरूरत थी बाथरूम मे कुर्सी रखने की।

जबसे सोहन लाल के छोटे बेटे रूपेश की शादी हुई है उसकी पत्नी संध्या का व्यवहार अपने सास ससुर के प्रति अच्छा नहीं रहा। बात बात पर अपने मायके की समृद्धि का उल्लेख तो समझ आता हैं पर घड़ी-घड़ी, छोटी-छोटी बात मे बूढ़े सास ससुर को तिरिस्कार और निरादर करने वाले शब्द बाणों से आहत करना सोहन लाल जी और उनकी धर्मपत्नी सरला के दिल मे  अंदर ही अंदर कष्ट और वेदना के गहरे घाव देता, पर मजबूरी थी कि सारी ज़िंदगी छोटे से व्यापार मे दोनों बच्चों के परवरिश और पढ़ाई लिखाई मे इतनी संपत्ति न जोड़ सके कि बुढ़ापे के लिये सिर पर एक छोटी छत्त बना पाते। सोहन लाल जी ने दोनों बेटे, महेश और रूपेश की शिक्षा मे कोई कसर नहीं छोड़ी थी।  दोनों ने ही देश के सर्वोत्तम आईआईटी संस्थानों से  इंजीन्यरिंग की डिग्री हंसिल की थी और देश की सर्वोत्तम कंपनियों मे उच्चपदासीन पद पर  आरूढ़ थे। घर मे पैसे की कोई कमी नहीं थी। दोनों पुत्रों का रिश्ता अपने ही समाज के धनाढ्य परिवारों की लड़कियों के साथ हुआ था। सोहन लाल जी सारी उम्र अपना व्यवसाय देश की आईटी सिटी बेंगलोर   मे किया था इसलिये बेंगलोर  शहर से उन्हे एक अलग ही तरह का  लगाव था। लगाव होता  भी क्यों न, व्यापार से सेवानिवृत्ति के बाद बेंगलोर  की आलीशान, सन सिटी   कॉलोनी मे वे अपने छोटे बेटे रूपेश के साथ जो रहते थे। रूपेश ने यध्यपि बेंगलोर मे अब तक मकान तो नहीं लिया था लेकिन शीघ्र ही एक फ्लैट क्रय करने का विचार था। लेकिन  जब से रूपेश ने बेंगलोर की सन सिटी सोसाइटी मे किराये से मकान लिया,  सोहन लाल इस कॉलोनी मे काफी खुश थे, इस शानदार कॉलोनी के पार्क मे सुबह-शाम अपने हम उम्र वरिष्ठ साथियों के साथ उठना बैठना और गप्प शप्प करना उनके दैनिक जीवन का एक हिस्सा हो गया था।             

लेकिन आज तो संध्या के तीखे शब्द वाणों ने सोहन लाल के दिल को छलनी कर दिया था। फिर भी उन्होने शांत और संयत होकर अपनी बहू संध्या से  कहा, बेटा कल ग्रुप मे चर्चा हो रही थी कि उनके एक सदस्य का बाथरूम मे पैर फिसलने के कारण कूल्हे की हड्डी टूट जाने के कारण पिछले एक हफ्ते से अस्पताल मे इलाज़ चल रहा  हैं। कल उनका एक बड़ा ऑपरेशन होगा जिसमे एक स्टील की छड़ डाली जाएगी। पूरी प्रक्रिया काफी कष्टसाध्य और खर्चीली होने वाली थी। गोयल जी के साथ हुई घटना से सवक लेकर वरिष्ठ जनों ने आपसी चर्चा के दौरान बाथरूम मे कुर्सी पर बैठ कर नहाने और अंडर गारमेंट कुर्सी पर बैठ कर चेंज करने की सलाह दी थी, ताकि खड़े होने पर स्लिप होने या लड़खड़ाने की नौबत ही न आये। साथियों की सलाह को देखते हुए ही मैंने बाथरूम मे कुर्सी रक्खी थी। कुर्सी का उपयोग  मै पिछले कई दिन से कर रहा था, पर आज बाथरूम से स्नान के बाद कुर्सी निकालना भूल गया था। बेटा!, आगे से अब ऐसा नहीं होगा। लेकिन संध्या को तो बस अपने सास ससुर को उलहना देने का कोई न कोई बहाना चाहिए होता था। बड़ा बेटा महेश मुंबई  की एक बड़ी बहुमंजिला इमारत मे रहता था। कभी कभी सोहन लाल दंपत्ति का मुंबई  जाना तो होता, पर उनके सांस की बीमारी के चलते  मुंबई  के आर्द्रता पूर्ण मौसम उनके लिये माफिक न होने के कारण उनका मुंबई   प्रवास प्रायः संक्षिप्त ही रहता। पर महेश भी कभी आग्रह पूर्वक अपने माता  पिता को बेंगलुरु आने और रुकने के लिये नहीं कहता। सोहन लाल जी को अपने बेटे का ऐसा व्यवहार भी दिल ही दिल मे कचोटता।

आज मोहनलाल जी का मन बड़ा अशांत और बेचैन था। क्लेश, दुःख और पीड़ा के भाव उनके चेहरे पर स्पष्ट पढे जा सकते थे।   बेटा ऑफिस जा चुका था। संध्या सुबह से ही मुंह फुला कर अपने कमरे मे बैठी रही। खाना बनाने वाली बाई ने नाश्ता बना कर टेबल पर रक्ख तो दिया था लेकिन सोहन लाल दंपत्ति से नाश्ता खाया न गया। आज सोहन लाल जी मन ही मन आत्मग्लानि और अपराधबोध के भाव से बुरी तरह ग्रसित थे। जिन बच्चों को इतने लड़-प्यार से पाला, अच्छी और ऊंची शिक्षा दिलाई, आखिर बच्चों के पालन पोषण और संस्कारों मे कहाँ कमी रह गयी थी, जो उम्र के इस आखिरी पढ़ाव मे ऐसे दिन देखने को मिल रहे हैं। दो वक्त की रोटी भी इतने तिरिस्कार और अपमानित हो कर मिल रही है, कदाचित ही किसी माँ बाप को ऐसे दिन देखने को मिले। काश अपनी जवानी के दिनों मे चार पैसे जोड़ लिये होते तो दूसरों पर आश्रित होकर ऐसे दिन न देखने को मिलते।  पत्नी सरला ने बगैर कुछ सुने ही पति के चेहरे के भावों को महसूस किया और दोनों आँखे नम हो गयी। सोहन लाल जी ने पत्नी के कंधों पर हाथ रक्ख उसे ढांढस बधाई!! मन ही मन, अपनी बेबसी और लाचारी के लिये शर्मिंदा हो, उम्र की इस दहलीज़ पर पति के रूप मे अपनी ज़िम्मेदारी पूरा  न करने की लाचारी  के लिये  मानो, सरला से माफी मांग रहे हों।  सरला ने उन्हे शांत करने की बहुत कोशिश की, पर वे आज  काफी तनाव ग्रस्त थे।  इसी उधेड़-बुन, सोच-विचार और हीन भावना के चलते भरी दोपहरी उनकी आँख  लग गयी और कब वे गहरी नींद मे सो गये पता नहीं चला। जब शाम को सोहन लाल जी पार्क मे अपने साथियों के बीच पहुंचे तो उनके चेहरे के हाव-भाव देख साथियों ने उनके कुशलक्षेम  पूंछ उनके चेहरे पर चिंता की लकीरों के बारे मे पूंछा। लेकिन उन्होने सरलता पूर्वक अपनी चिंताओं को छुपा कर मुस्कराते हुए यूं ही थोड़ी अस्वस्थता का बहाना बना दिया, पर अपने निकट मित्र रविंदर   से उनकी दुःख और चिंता छुप न सकी। एकांत मे उन्होने रविंदर  को अपनी ब्यथा कह सुनाई।

साथियों ने उन्हे बड़े बेटे के पास शिफ्ट होने के सलाह दी लेकिन स्वास्थ और उसके व्यवहार से भी वे मुंबई  जाना टालते रहे। अब तक उन्होने अपनी आवश्यकतायेँ इतनी सीमित कर ली थी कि किसी भी विषय मे परिवार से कदाचित ही कोई  मतभेद की नौबत उनकी तरफ से आये। अपने आप को उन परिस्थितियों मे ढाल लिया कि बहू संध्या से किंचित मात्र, वाद-प्रतिवाद की संभावना बने। ईश्वर भी इतना निष्ठुर हो सकता हैं कि सारी ज़िंदगी सम्मान और स्वाभिमान से बिताने वाले सोहन लाल जी को उम्र की आखिरी दहलीज लांघने के लिये इतना तिरिस्कार और अपमान झेलना पड़े? लेकिन आज तो मोहनलाल जी पर दुःखों का पहाड़ वज्राघात बन कर टूट पड़ा!! जब रूपेश ने ऑफिस से आकर ये बतलाया, पापा मै और संध्या इस रविवार दूसरी सोसाइटी मे मकान लेकर शिफ्ट हो रहे हैं। सुनकर सोहन लाल जी और सरला को अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ? मानो पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई!!               

रविवार को सोसाइटी के नीचे सामान शिफ्ट करने हेतु मजदूरों के साथ एक ट्रक खड़ा देख पड़ौसियों ने पूंछा सोहन लाल जी अचानक यहाँ से शिफ्ट कर रहे हों बताया नहीं? सोहन लाल ने कहा हाँ! रूपेश ने एक बड़ा घर ले लिया, हाँ उसका प्रमोशन भी हो गया न। अपने चेहरे पर आए दुःख को छुपाते हुए उन्होने पड़ौसियों को बताया। लेकिन शाम को सोहन लाल जी को उसी फ्लैट मे देख पड़ौसियों को सोहन लाल ने खुद ही बताया हम लोग माह के अंत मे यही से बड़े बेटे के पास चले जाएंगे रूपेश को छुट्टी की प्रोब्लम थी इसी लिये पद्रह दिन पहले शिफ्ट हो गया हम लोग पद्रह दिन बाद इसी माह के अंत मे जाएंगे।  इस महीने का किराया तो बेटे ने एडवांस मे दे दिया था इसलिये महीने के आखिर तक पंद्रह दिन तक तो कोई दिक्कत नहीं थी लेकिन पंद्रह दिन बाद की चिंता उन्हे खाये जा रही थी। आमदनी के स्रोत सीमित थे। शाम को रविंदर  से अपनी चिंता बतला कर कुछ दुःख हल्का करने की नाकामयाब कोशिश उनके चेहरे पर साफ छलक रही थी। रविंदर ने  क्लब के सभी साथियों से सोहन लाल जी पर आए संकट को सांझा किया। निर्णय शीघ्र लेना था। सन सिटी सोसाइटी से 20 किमी दूर एक छोटे से घर मे शरण लेना मजबूरी थी किराया भी पाँच हजार जो था। नये घर मे जब से सोहन लाल जी आए थे काफी चिंतित और परेशान रहने लगे थे। रह रह कर रूपेश के व्यवहार ने उन्हे दुःखी कर रक्खा था और इस संताप और संकट को वे किसी के साथ सांझा भी न कर सके। इस अचानक आयी विपत्ति ने उन्हे बीमार कर दिया और इसी विपदा ने एक दिन उनके प्राण हर लिए!!

एक दिन रविंदर जी को सोहन लाल जी के निधन का दुखद समाचार उन्हे मिला वो तुरंत सरला भाभी से मिलने पहुंचे तो लोगो ने बताया कि सोहन लाल जी के देहांत के बाद उनका बेटा उन्हे अपने साथ ले गया। रविंदर जी पूंछते पाँछते  रूपेश के घर पहुंचे और सरला भाभी के हाल चाल लिए। उनको समझते देर न लगी कि बेटे-बहु  के पास रहने की मजबूरी और पति से अचानक ऐसे विछुड्ने  ने उन्हे अंदर तक तोड़ दिया था।  रविंदर जी ने अगले ही दिन क्लब को सूचित किया कि सोहन लाल जी नहीं रहे!! अचानक क्लब के सदस्यों को सोहन लाल जी के इस दुनियाँ मे न रहने की सुन सहसा विश्वास नहीं हुआ। बेटे रूपेश ने सोहन लाल जी, के निधन की सूचना तक क्लब के सदस्यों या रविंदर अंकल को नहीं दी जो उनके सबसे करीबी थे! हीं भावना से ग्रसित रूपेश नहीं चाहता था कि उसके और उसकी पत्नी के मोहल लाल जी से किए गए  व्यवहार का लोगो को पता चले।

 

विजय सहगल