शनिवार, 25 फ़रवरी 2023

संकुआं कुंड-सेवढ़ा (जि॰ दतिया-मध्यप्रदेश)

 

"संकुआं कुंड-सेवढ़ा (जि॰ दतिया-मध्यप्रदेश)"









कभी कभी छोटे से गाँव कस्बों मे भी कोहनूर हीरा रूपी प्राकृतिक रमणीय स्थान देखने को मिलते है जिसे ईश्वर ने अपने   प्राकृतिक उपहारों, दैवीय सुंदरता रूपी आशीर्वाद से कृतार्थ किया होता है ऐसे ही एक स्थान का यहाँ हम उल्लेख करेंगे वो है "संकुआं कुंड"!! इस स्थान को देखने की इच्छा काफी दिनों से थी पर सुयोग 29 जनवरी 2023 को बना। चिंता ये थी कि "संकुआं कुंड"!! तक का 75 किमी॰  मार्ग कैसा होगा? कहीं एक मार्गी या कच्चा रास्ता तो नहीं? पर आधे रास्ते मे संगीत सम्राट तानसेन की जन्म और साधना स्थलि बेहट  थी तो इतना तो विश्वास था कि बेहट तक का रास्ता तो ठीक होना चाहिये क्योंकि प्रति वर्ष होने वाले विश्व प्रसिद्ध संगीत समारोह के तीसरे दिन की सभा यहाँ ही आयोजित होती है जिसमे प्रदेश की  राजनैतिक हस्तियों, प्रशासन के आला अधिकारियों के साथ देश के मूर्धन्य संगीतकार और शास्त्रीय गायक यहाँ अपनी हाजरी देकर तानसेन जी को अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करते है।    जैसा सोचा था, सड़क उससे भी अच्छी थी। बेहट से आगे का मार्ग भी भिंड जिले से होकर "संकुआं कुंड" तक जाता है, वो भी न केवल अच्छा था बल्कि इस दोहरे मार्ग मे ट्रैफिक न के बराबर होने के कारण ड्राइविंग तनाव रहित सुखद अहसास लिए थी। जिला दतिया मध्यप्रदेश के सेवढ़ा तहसील मे स्थित "संकुआं कुंड" सिंध नदी के मुहाने पर स्थित है।

"संकुआं कुंड" मे प्रवेश करते ही कार, जीप और अन्य छोटे वाहनों की लाइन लगी देख मन मे जिज्ञासा हुई कि आखिर इतने कम ट्रैफिक के बावजूद लाइन लगाने का क्या औचित्य? तब ज्ञात हुआ कि आगे अग्रेजों के जमाने का पुरानी विरासत कालीन, स्वतन्त्रता पूर्व निर्मित,  अति संकरा देशी रपटा अर्थात एकल  मार्गीय चूने और पत्थर से निर्मित पुल तक ही  भिंड और ग्वालियर से आने वाली बसें एवं अन्य बड़े वाहन "संकुआं कुंड" के लिए यहाँ तक ही आ सकते है।  सिर्फ  कार, जीप और अन्य हल्के चार पहिया और दो पहिया वाहन ही पुल से होकर दूसरी तरफ आ-जा सकते है। जब एक ओर से कार और अन्य छोटे वाहन छोड़े जाते तो दूसरी ओर से आ रहे किसी भी तरह के वाहनों को दूसरी तरफ से रोक दिया जाता है। सिंध नदी पर बना हुआ यह पुल ही भिंड और दतिया जिले के इस "संकुआं कुंड" को जोड़ता है। पुल के  इन दोनों छोरों के बीच ही "संकुआं कुंड" स्थित है। ऐसा नहीं था कि विकास का सेतु स्वतन्त्रता के 75 वर्ष पश्चात भी इस दोनों किनारों को जोड़ने वाला  एक आधुनिक पुल न दे सका हो? ऐसा भी नहीं था कि पुल रूपी विकास की बयार के  चरण यहाँ न पड़े हों पर भ्रष्टाचार की बुनियाद पर खड़ा यहाँ बना पक्का, सीमेंट और रेत से बना  आधुनिक  पुल 4 अगस्त 2021 की बाढ़ मे, कम सीमेंट और अधिक रेत के कारण  बह गया।

अपनी बारी की प्रतीक्षा के बाद हम अपनी कार को मंथर गति से चलाकर पुल के उस पार पहुंचे। लगभग 200 मीटर लंबे पुल के नीचे बह रही सिंध नदी को देख नहीं लगा कि इसके नजदीक ही जल प्रपात है जो संकुआं कुंड मे गिरता है। पुल के दूसरी ओर सिवाय स्थानीय नागरिकों के अलावा पर्यटकों या दर्शकों की कोई बहुत ज्यादा आमद नहीं थी। एक दो पान और गुटके की गुमटी के अतिरिक्त कोई चाय-पानी या खान पान का इंतजाम नहीं था। वो तो अच्छा था कि हम लोग अपने साथ  खाना-पानी का प्रबंध कर चले थे अन्यथा स्वल्प या दीर्घ आहार का यहा कोई इंतजाम नहीं था। स्थानीय रहवासी बीड़ी, पान तंबाकू के साथ पत्ते खेलने मे व्यस्त थे। लगभग एक-डेढ़ बजे का वक्त था घूमने के पूर्व सभी ने पेट पूजा करने का निश्चय किया ताकि घुम्मकड़ी के लिए कुछ अतिरिक्त ऊर्जा का संचय किया जा सके।

जल प्रपात की गूंज तो सुनाई दे रही थी पर प्रपात के दर्शन अभी दूर थे। किनारे से जैसे जैसे हम लोग जलप्रपात की ओर बढ़े तो इस अप्रितम अविश्वसनीय, अति सुंदर जल प्रपात की धाराओं को बड़े वेग और गर्जना के साथ बहता देख एकटक देखता ही रह गया। जल कुंड का भ्रमण कराने के लिये उपलब्ध एक मात्र नाव से सैर करने के विचार ने ही रोमांच से भर दिया। नाव के नाविक श्री पंकज जो कि एक 22-23 वर्ष का शालीन नवयुवक एक  कुशल नाविक भी  था, जिसने हमारे परिवार के सदस्यों को सुरक्षा की दृष्टि से 4-4 की संख्या मे नाव की सैर कराने के आमंत्रण दिया। ऐसा माना जाता है कि एक ही नाव मे बैठ कर  मामा भांजे नदी मे यात्रा नहीं करते अतः पहली बारी मे मै अपनी पत्नी और बहिनों के साथ नाव मे सवारी के लिए तैयार था। पहाड़ी से नीचे उतर, घाट से हम लोग नाव मे सवार हुए। जिस जलप्रपात की गर्जना दूर से इतनी तेज़ थी अब हम उसके नजदीक, बिल्कुल नजदीक जाने वाले थे। 

जब पंकज ने हम लोगो को बैठा कर, अपनी नाव को कुंड मे गिर रहे प्रपात की ओर खेना शुरू किया तो रोमांच के साथ मन के किसी कोने मे जल धाराओं के नजदीक जाने पर डर भी लग रहा था। पानी की धाराओं का शोर कानों की पर्दों को बेधने को तत्पर था। धाराओं के किनारे से निकलती नाव मे आपस की बातचीत भी  एक दूसरे को सुनाई नहीं दे रही थी। कुंड मे गिर रहे जल धाराएँ, कुंड से उठ रहे   सफेद झाग से, दूध के सागर सा अहसास करा रही थी। पंकज ने जिस कुशलता और प्रवीणता से नाव को खे कर  जल धाराओं के  3-4 मीटर की दूरी से निकाल शिव मंदिर पर किनारे लगाया तो हम सभी उसकी सुघड़ और निपुण  नाव चालन की तारीफ किए बिना न रह सके। कुछ ही मिनटों मे हम जल प्रपात के दूसरे छोर पर थे। नाव से उतर मंदिर मे शिवार्चन कर हम लोगो मंदिर की छत्त से जल प्रपात का सौन्दर्य देखने लगे। जलप्रपात से निकल रही धाराओं से उठ रही नन्हें नन्हें जल की फुहारे हम पर्यटकों का स्वागत ऐसे कर रही थी जैसे पाणिग्रहण संस्कार मे शामिल अतिथियों का स्वागत मानों क्षत्रों मे भरे गुलाब जल छिड़क कर किया जा रहा हो। छत्त पर से वॉटर फॉल को निहारना ऐसे था  मानों साक्षात ईश्वर रचित नितांत रमणीय, नयनाभिराम रचना के माध्यम से परमात्मा से  साक्षात्कार कर रहे हों। पुनः एक बार मंदिर के घाट से नाव मे सवार हो कुंड की शांत जल धाराओं पर नाव से डोलना मन को  आनंद, सुख और हर्ष देने वाले क्षण थे। कुछ आगे बढने पर पतली पतली स्लेट रूपी चट्टानों से बनी एक प्रकृतिक आर्क या दरवाजा दिखाई दिया जो माल्टा देश के सर्वाधिक आकर्षण का केंद्र अजूर विंडो से मिलता जुलता था। कुंड के चारों ओर छोटे बड़े अनेकों मंदिर बने हुए थे। कहते है कि बरसात के समय कुंड के चारों ओर पानी की विशाल जलराशि से "संकुआं कुंड" का सौन्दर्य देखते ही बनता है।

नाव भ्रमण के बाद कुंड के इस छोर पर जाने की अभिलाषा को मै न रोक सका और छोटी और फिसलन भरी जल धाराओं के बीच पैदल पैदल चल पड़ा। चट्टानों पर लगी काई के कारण अत्यधिक  फिसलन थी फिर भी पैरों को मजबूती के साथ जमाते हुई धीरे धीरे धाराओं को पार किया। कुछ दूर सूखी चट्टानों से होते हुए जा मुख्य जलप्रपात के इस  छोर पर पहुंचा!! यहाँ से जलप्रपात का अनुभव भी बैसा ही था जो दूसरी  तरफ से महसूस हुआ था।  मुख्य धारा से कुछ हट कर बने घाट पर बच्चे तैरते हुए नहा रहे थे। एक बारगी तो मन मे आया कि कपड़े उतार कर इन बच्चों के साथ तैरने का आनंद लिया जाये!! पर तब तक बच्चे घाट से जा चुके थे। तैरना जानने के बावजूद भी एक अंजान और सुनसान जगह पर घाट पर तैरना मैंने उचित नहीं समझा। उपर से चट्टानों की छत्त के नीचे बने मंदिर, दलानों को देखना भी कौतूहल से कम न था, किस तरह चट्टानों को नीचे-नीचे काट कर मंदिर और शैल आश्रय बनाना किसी पुरुषार्थ से कम न रहा होगा।

मध्यप्रदेश एक ओर जहां "संकुआं कुंड" के प्राकृतिक सौन्दर्य को निहारना सुखद था पर वही  घाट पर जगह जगह पान मसाले, खैनी-तंबाकू की पीक, सैम्पूं और तेल के खाली पाउच से फैली गंदगी को देख कर मन आत्मग्लानि से भर गया। यहाँ आने वाले स्थानीय नागरिकों और बच्चों की इस लापरवाही से मन व्यथित था। दुर्भाग्य से स्थानीय निवासियों, जन प्रतिनिधियों, शासन प्रशासन की अक्रियाशीलता, अकर्मण्यता, निष्क्रियता और अकुशलता  के कारण "संकुआं कुंड"  वैसी ख्याति अर्जित नहीं कर पाया जिसका वो वास्तव मे हकदार है। मैंने 11 दिसम्बर 2018 के अपने ब्लॉग "गढ कुण्डार का किला" https://sahgalvk.blogspot.com/2018/12/blog-post_11.html 11 decembar 2018 gadh kudhar

मे भी मध्य प्रदेश के पर्यटन विभाग की निष्क्रियता का उल्लेख किया था तब से आज तक कदाचित ही उनकी रीति-नीति मे कोई बदलाब देखने को मिला, जो बड़ा पीढ़ा दायक था।

विजय सहगल   

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2023

स्व॰ प्रभाष जोशी

 

"स्व॰ प्रभाष जोशी"

 


घर मे बचपन से अखबार आते देख कुछ ऐसी आदत बन गई थी कि हर उम्र और स्थान के हिसाब से अलग अलग समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के संपर्क मे रहा। बचपन मे झाँसी मे सन् 1965-66 मे  एक दो अखबार निकलते जरूर थे पर प्रसार संख्या की दृष्टि से दैनिक जागरण मुख्य समाचार पत्र था। दैनिक भास्कर और दैनिक मध्य देश भी निकलता था लेकिन कम कीमत और कम पेज  के कारण  ये अखबार हेअर कटिंग सेलून अर्थात नाइयों की दुकान, टी स्टॉल, छोटे हॉकर  के अखबार माने जाते थे जो उनकी दुकान पर आने वाले ग्राहकों द्वारा सुबह से शाम तक पढ़ कर जिनका पूरा कचूमर निकाल लिया जाता था जिनको बाद मे पौंछा या सामान की पुड़ियाँ बना कर उपयोग किया जाता। उन तीनों दैनिक समाचार पत्रों मे कोई ऐसा  प्रभावशाली लेखक या संपादक नहीं था जो  अपनी लेखनी का प्रभाव छोड़ सके या  जिन्हे उनकी लेखनी के कारण स्मरण किया जा सके।

साहित्यिक पत्रिकाओं मे धर्मयुग एवं साप्ताहिक हिंदुस्तान प्रसिद्ध थे जो सामान्य पाठकों की पहली पसंद थी। "नवनीत" "सरिता", निहारिका भी अच्छी साहित्यिक पत्रिकाओं मे सुमर थी लेकिन इलाहाबाद से प्रकाशित पत्रिका "मनोहर कहानियाँ" प्रचार प्रसार मे नंबर एक थी पर इस पत्रिका को श्रेष्ठी परिवारों मे सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता था। सत्य घटनाओं पर आधारित कहानियों के घटना क्रम को इतना मिर्च-मसाला लगा कर परोसा जाता मानों लेखक पूरे घटनाक्रम मे दिव्य अलौकिक दृष्टि के साथ हमेशा अदृश्य रूप से पूरी घटना का साक्षात चश्मदीद गवाह रहा हो!! प्रबुद्ध और बुद्धिजीवी, राजनैतिक घटना क्रम का सार समेटे साप्ताहिक पत्रिका "दिनमान" पत्रिका काफी पॉप्युलर थी। नेहरू पुस्तकालय झाँसी मे पाठकों के बीच अन्य पत्र पत्रिकाओं एवं समाचार पत्र बड़ी डिमांड मे रहते थे इसके विपरीत दिनमान पत्रिका,  उपस्थित पाठकों के बीच यूं ही कभी भी पढ़ने के लिये उपलब्ध रहती थी जिसकी डिमांड न के बराबर थी।  उम्र के विकास के साथ साप्ताहिक पत्रिका "रविवार"  और भारत मे आपातकाल के दौरान मुंबई से प्रकाशित साप्ताहिक ब्लिट्ज़  ने भी खूब वाहवाही बटोरी रविवार जिसके संपादक  शायद उदयन शर्मा एवं ब्लिट्ज़ के संपादक रूसी करंजिया थे। यध्यपि झाँसी मे  मैथली शरण गुप्त, स्व॰ वृन्दावन लाल वर्मा जैसे विश्वस्तरीय कवि और लेखक दिये लेकिन झाँसी शहर के समाचार पत्र तब से आज तक कोई साहित्यिक वातावरण या गोष्ठियों के आयोजन कराने मे असफल और निष्फल रहे जो समय समय पर लेखकों, कवियों और साहित्यिक मनीषियों के उत्साहवर्धन मे उत्प्रेरक का कार्य कर सकती थी।

उन दिनों कॉलेज स्तर पर 1975 मे जब देश के संविधान को ताक पर रख आपात काल घोषित किया तो साप्ताहिक बिलिट्ज़ जो श्री आर के करंजिया के संपकीय निर्देशन मे निकलता था एवं जनसत्ता जो कि प्रभाष जोशी जी के प्रधान सम्पादकत्व और निर्देशानत्व मे छापता था, के संपर्क मे आया। उन दिनों अधिकतर अखबारों श्रीमती गांधी के सामने शष्टांग दंडवत थे या बलपूर्वक करा दिये गए थे।  लेकिन तत्कालीन सरकार के अवैधानिक कुकृत्यों के विरुद्ध किसी संपादक ने देश और देशवासियों के प्रति अपनी निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता, ईमानदार लेखन और अनासक्त भाव से  कर्मण्येवाधिकारस्ते...... के आदर्श सूत्र वाक्य के माध्यम से अपनी कर्तव्यों  का निर्वहन जिस ज़िम्मेदारी के साथ किया उसकी मिसाल स्व॰ प्रभाष जोशी के रूप देखने को मिलती है। मै श्री प्रभाष जोशी से कभी मिला नहीं, कभी देखा नहीं, दुर्भाग्य से उनकी फोटो को  भी उनके देहावसान के बाद देखने को मिली पर जनसत्ता मे उनकी लेखनी का मै बड़ा कायल था। बाद के वर्षों मे भी प्रभाष जोशी जी  के संपादकत्व मे जनसत्ता ने एक अलग पहचान बनायी। जनसत्ता और प्रभाष जोशी के लेखों के प्रति मेरी इतनी आसक्ति थी कि मैंने लंबे समय तक संपादकीय परिशिष्ट नियमित तौर पर पढता रहा था।

अस्सी के दशक मे जब पंजाब मे उन दिनों खालिस्तानी  आतंकवादियों का बोलबाला था। पंजाब केसरी दैनिक के संस्थापक सदस्य लाला जगत नारायण जैसे सच्चे देशभक्त और निडर पत्रकार की 9 सितम्बर 1981 को इन आतंकवादियों ने हत्या कर दी थी। तब प्रभाष जोशी ने जनसत्ता मे अपने लेख के माध्यम से उन आतंकवादियों को खुली चुनौती देते हुए उन के कायरता पूर्ण, अधम कृत्यों  की निंदा करते हुए उन्हे ललकारते हुए लिखा था कि "तुम मे हिम्मत हो तो उनकी हत्या करके दिखाओ"। उन्होने लिखा था, "मै किसी सुरक्षा दस्ते के बिना अपने घर और कार्यालय मे रहता हूँ"। उन दिनों पंजाब के उन आतंकवादियों को इस तरह की चुनौती एक दुस्साहस ही कहा  जायेगा। लेकिन श्री प्रभाष जोशी की पैनी लेखनी के साहस और दिलेरी के ऐसे अनेकों किस्से थे, उन्होने अपनी लेखनी मे  सत्य और निर्भीकता के उच्चतम मानदंड तय कर रक्खे थे। उनकी कलम को आज के पीत  पत्रकारिता से तुलना "सूरज" और "दिये" की तुलना होगी।

उनकी पत्रकारिता मे निर्भीकता की एक बानगी उनके एक लेख मे देखने को मिली जब उन्होने एक स्वर्गीय पूर्व प्रधानमंती के नैतिक चरित्र पर लांछन लगाते उन पर परस्त्रीगमन का आरोप लगा उन्हे खुली चुनौती दी थी  कि, "हिम्मत है तो उन पर मानहानि का दावा लगाएँ!!"  "कागद कारे साप्ताहिक स्तंभ के अंतर्गत बिना किसी अधिसूचित विषय पर जो मन मे आये लिखने की नीति ने  उनका "कागद कारे" स्तंभ को जितनी प्रसिद्धि मिली वो एक मिसाल थी।   उनकी लेखनी की जितनी भी प्रशंसा की जाये कम होगी। उनकी लेखनी एक साधारण भारतीय जनमानस की आवाज की अभिव्यक्ति थी। उनका क्रिकेट के प्रति लगाव तो आश्चर्य जनक था मानों वे एक सिद्धहस्त खेल संपादक हों। मैंने कभी  क्रिकेट के विषय मे कभी कोई स्तंभ या समाचार दिल्चस्वी लेकर नहीं पढा, पर प्रभाष जोशी जी के सचिन तेंदुलकर , गावस्कर और उनके क्रिकेट पर लिखे लेखों को मैंने अपनी अभिरुचि के विरुद्ध जा कर प्रत्येक लेख को दिल्चस्वी लेकर पढ़ा। उनकी लेखनी की भाषा शैली ही कुछ ऐसी थी कि बगैर पढे नहीं रहा जाता था।

मै कभी भी महानायक श्री अमिताभ बच्चन के अभिनय का कोई बहुत बड़ा प्रशंसक नहीं रहा, पर श्री  प्रभाष जोशी जी द्वारा जनसत्ता मे प्रकाशित लेख मे  उनकी कंपनी एबीसी लिमिटेड पर सरकारी कर अदायगी का दोषी ठहराये जाने के बाद दिवालिया घोषित होने के उपरांत कैसे अपने धन संपत्ति और घर जायदाद को गिरमी रख टैक्स  की एक-एक पायी चुकाने के कृत की भूरि भूरि प्रशंसा की थी जिससे  मै काफी प्रभावित था।

1988-89 मे मै अपनी सागर, मध्यप्रदेश  पदस्थपना के दौरान, स्थानीय समाचार पत्र मे अंशदान के बाद जनसत्ता समाचार पत्र के संपादक श्री प्रभाष जोशी जी की लेखनी के आकर्षण के कारण उक्त समाचार पत्र को शाखा का हिस्सा बनाया था क्योंकि दिल्ली से आने कारण उसका वितरण दिन मे बारह-एक बजे के बाद ही संभव  होता था। हाँ रविवार के साप्ताहिक अंक मे "कागद कारे"  कॉलम के आकर्षण के कारण मैंने पेपर हॉकर से विशेष अनुरोध कर रविवार का समाचार पत्र अपने घर मे मँगवाता था जो शाखा के नजदीक ही स्थित था। रविवार के अंक की  1-2 घंटे के  अध्यन  की तुष्टि से मिली संतुष्टि के कारण छुट्टी की सार्थकता सिद्ध हो जाती थी।

आज यों ही उनका स्मरण हो आने के कारण मै उन्हे स्मरण कर उन्हे  भवभीनि श्रद्धांजलि, अदरांजलि  अर्पित कर उन्हे और उनकी लेखनी को  नमन करता हूँ।

विजय सहगल

सोमवार, 6 फ़रवरी 2023

"भैया की शादी"

 

"भैया की शादी"







60-70 के दशक मे बचपन की कुछ घटनाएँ अन्तश्चेतना पटल पर आज भी इतनी सुस्पष्ट है जैसे लगता है अभी कल की ही बात हो। गर्मियों की छुट्टी के दौरान झाँसी मे लगभग दो दर्जन कुनबे वाले हमारे  संयुक्त परिवार के घर मे हर दिन एक उल्लास और उमंग से परिपूर्ण होता था। सुबह शाम के भोजन मे चाचा, ताऊ के घर से सब्जी की कटोरियों की अदला-बदली नित्य का क्रम थी। तीनों  आँगन मे पकने वाले शाम के भोजन बेशक अलग दालान और पौर मे बैठ कर  खाया जाता था   पर भोजन के दौरान होने वाली चर्चा का श्रवण, चिंतन-मनन मे सभी समूहिक रूप से शामिल होते। परिवार मे चचेरी बहन "मीरा बहिन जी" जो हम सब से बड़ी थी प्रायः भोजन की थाली के साथ हमारी ओर शामिल रहती। सुबह से लेकर रात तक की अलग अलग दिनचर्या के विभिन्न रूप देखने मे आते। दोपहर मे सारे बच्चे कोटपीस, छकड़ी और सीप जैसे ताश के खेलों मे रत रहते। कुछ सदस्य इन अलग अलग खेलों मे पारंगत हो प्रवीणता की सूची मे अपना स्थान रखते थे। इमली के बीजों को फोड़ कर जमीन पर खड़िया से चंद लकीरों को खींच कर चंदा पउआ खेलना हम बच्चों का सबसे प्रिय खेल था।

गर्मियों की छुट्टी मे खेलों के साथ-साथ  साल भर के उपयोग के लिए खाने की वस्तुओं के भंडार के लिये आलू के पापड़, चिप्स, मूंग के दल के पापड़, आम का आचार, मुरब्बा, आचारी एवं सिमईयाँ बनाने के कार्यक्रम भी साथ साथ चलते रहते। हाँ शाम के समय हम लड़कों का घर की  छत्तों से पतंग उड़ाना कभी नहीं छूटता। छत्तों पर पीने के पानी के लिये छोटे घड़े भर पानी लाने की ज़िम्मेदारी भी सभी मिल कर कर लेते। आसमान मे चारों तरफ उड़ रही सैकड़ों रंग बिरंगी पतंगों से आकाश आच्छादित हो जाता। कुछ पतंगे पुंछल्ले वाली भी होती जो पूँछ लहराती आसमान मे एक अलग ही दृश्य उत्पन्न करती। उन दिनों बाबा का मुट्टा बड़ा प्रसिद्ध था जिसका उल्लेख मैंने अपने ब्लॉग "बाबा का मुट्टा"  https://www.blogger.com/blog/post/edit/3862879843126919997/3521790630080511020 मे किया है।   

रोजाना की  इस दिनचर्या मे तब दिन विशेष हो जाता जब हम सब मे बढ़े हमारे चचेरे भाई जिन्हे हम सभी "हरी भैया" कह कर बुलाते,  जबलपुर से छुट्टियों मे घर आते। वे वहाँ से इंजीन्यरिंग की पढ़ाई कर रहे थे। कभी चिट्ठी से, "पूर्व  सूचना" और कभी कभी बगैर सूचना के जब उनका तांगा सुबह सुबह स्टेशन से उन्हे लेकर घर पहुँचता तो घर मे एक अलग उत्साह और उमंग का माहौल हो जाता। घर के बाहर से सिर्फ एक संदेश प्रसारित होता, "भैया आ गाये"! "भैया आ गाये"!! जो भी देखता तो प्रसन्नता से "भैया आ गाये" कह कर अपनी खुशी का इज़हार करता। हम छोटे बच्चे भी उनके आने से खुश होते क्योंकि वे हमेश अपने साथ "रावल गाँव" की चॉकलेट का डिब्बा लाते। सफ़ेद कागज पर हरे, लाल, कत्थई रंग मे लिपटी विभिन्न स्वाद की चॉकलेट उनके आने की खुशी दुगनी कर देता था। इलाइचि के स्वाद वाली चॉकलेट की  खुशबू से मन मे प्रसन्नचित्त  हो जाता।

कालांतर मे भैया, पढ़ाई के बाद नौकरी मे आ गये और कुछ समय बाद तालबेहट मे विवाह संबंध तय होने के समाचार पर घर मे सभी हर्षित थे। सगाई के कार्यक्रम के पहले  मुहल्ले की  बच्चा पार्टी उत्साहित थी। उन दिनों बाज़ार से रंग बिरंगी पतंगी कागज को त्रिभुज आकार मे काट कर झंडियाँ काटी जाती। उन झंडियों के सिरे पर लेई लगा कर सूतली की पतली रस्सी पर चिपकाया जाता। इस काम मे छोटे बच्चे दिलों जान से जुटे रहते। पूरे घर मे यही एक काम चारों तरफ बिखरा दिखाई देता। सूतली मे रंगो के क्रम का विशेष ध्यान दिया जाता। कहीं पर झंडियों की लेई सूखने के लिए कतार मे बांधा जाता। तैयार और सूखी झंडियों को इस प्रकार लपेट कर रक्खा जाता कि कहीं उलझ ने जाये। सगाई के एक दो दिन पहले घर के बाहर सड़क पर पंडाल बांधा हुआ था जिसके नीचे महीने भर से तैयार की जा रही झंडियों को बांधा गया। इस दौरान पूरा ध्यान रक्खा जाता कि सड़क से निकल रही सामान भरी बैलगाड़ी, ठेला या नगर निगम का ट्रक उन झंडियों की लड़ी को तोड़ न डाले। हम बच्चों को सगाई आदि के प्रोग्राम  देखने मे कम  कार्यक्रम के  पश्चात कागज की रंगीन थैलियों मे मिलने वाले चार बूंदी के लड्डुओं को मिलने का इंतज़ार ज्यादा था।

शादी की तैयारियाँ महीनों से पहले शुरू हो गई थी। घर के बड़े लोग खाने-पीने के भंडारण, कार्ड छपवाने रिशतेदारों को बुलाने चलाने मे व्यस्त रहते। कार्ड मे पहली बार विनीत/स्वागत अभिलाषी मे अन्य भाइयों के साथ अपना नाम पहली बार छपा देखकर मुझे जो प्रसन्नता हुई थी शायद वर के रूप भैया को अपना नाम देख कर भी न हुई होगी। सभी लोगो के नये नये कपड़े सिलने के लिए टेलर मास्टर को महीनों पहले दे दिये गये थे। घर के बाहर ही भगवनदास टेलर मास्टर द्वारा सिला गया वो मेरा पहला  कोट आज भी मुझे याद है  जिसमे गहरे हरे, ब्राउन और काले रंग की हल्की से धारियाँ थी। पहली बार शादी मे अपने शहर झाँसी से दूर बस से तालबेहट जाना था। बस स्टैंड पर मुख्य सड़क के किनारे स्थित स्कूल मे "जनवासे" अर्थात बारात मे आये मेहमानों के रुकने व्यवस्था की गई थी। मै भी अपने मुहल्ले के मित्र मंडली और भाई बहिनों के साथ स्कूल की पहली मंजिल पर स्थित कमरों मे से एक मे ठहरा था। जनवासे का वो स्कूल आज भी वैसे का वैसा बना हुआ है। उस दिन शाम से ही बारात मे शामिल होने की  तैयारियाँ शुरू  होने लगी। कुछ युवा और प्रौढ़ नाई से सेविंग और चंपी मालिश करा रहे थे। पोलिश वाले से हमने भी अपने जूते पोलिश कराये। 10-12  वर्ष की उम्र मे बारात वाले दिन पहली बार टाई बांधी थी। टाई लंबी पूंछ वाली नहीं थी जिसमे नॉट बांधने की जरूरत नहीं पड़ती थी अपितु प्लास्टिक के हुक मे पहले से ही नॉट बंधी हुई थी। सिर्फ हुक को शर्ट के कॉलर मे फंसाना था। उस छोटे से कस्बे मे टाई बांध कर बारात मे शामिल होने मे जो रुतबा बच्चों, बाल मंडली और बारात देख रहे कस्बाइयों के बीच महसूस किया उसके क्या कहने थे मानों खुले आसमान मे, मै हवा मे उड़ रहा हूँ।

बारात मे उस दिन  मेरे सहित सारे बराती बैंड बाजे की धुन मे क्या मस्ती से डांस कर रहे थे एक अजब ही उल्लास और आनंद का माहौल था। आज-कल  की तरह उन दिनों भी नागिन डांस का खूब बोलबाला था। बीन की धुन पर एक बराती मुंह मे रुमाल लिये बीन बजाता और दूसरा दोनों हाथों को मिला सिर पर रख नाग/नागिन की तरह मस्त हो कर जो डांस करता उसका कहना ही क्या था? देर रात तक कार्यक्रम चलता रहा पर हमारी बच्चा मित्र मंडली पत्तल मे बैठ भोजन करने के बाद बापस जनवासे मे आ कर सो गयी।

रात भर की धमा चौकड़ी के बाद देर सुबह  तक सोते रहे तभी जनवासे मे कमरे के बाहर कुछ कहा-सुनी की आवाज आयी तो उनींदे उठ कर कमरे के बाहर आये! तब  एक रिश्तेदार जो कद काठी और रुतबे से प्रभावशाली लग रहे थे, नाराज होकर यहाँ से वहाँ चहल कदमी कर रहे थे। पता चला उनकी लैदर की चप्पल जो कमरे के बाहर रखी थी, नहीं मिल रही। कोई बाराती सुबह जाने-अनजाने उनकी चप्पल पहन कर कहीं घूमने-घामने निकल गया। ज्यों ज्यों समय बीतता गया उनकी चहल कदमी उनके क्रोध की तरह तेज होती गई। उसी समय मुझे भी अपने मित्रों संग तालबेहट के तालाब पर मस्ती करने, नहाने जाना था। लेकिन उन रिश्तेदार के पारा चढ़े तेवर को देख सभी ठिठक कर एक कोने मे चुप-चाप खड़े रहे। हम लोग भी सोच-सोच कर बेचैन थे कि आज किसी  गरीब की शामत आने वाली है?  सारा गुस्सा उस पर फट पड़ेगा जो उनकी चप्पल पहन कर गया होगा!! लगभग आधा-पौना घंटे बाद हमारे कुछ रिश्तेदार सीढ़ियों से चढ़ कमरे की ओर बढ़े ही थे कि क्रोधावेश मे घूम कर  अपनी चप्पलों का इंतजार कर रहे रिश्तेदार ने उनकी चप्पल पहने घूम रहे सज्जन को देख जबर्दस्त ऊंची आवाज मे लताड़ना शुरू किया।  नाराजी भरे लहजे मे तमाम कही-अनकही बातों से खूब डांटा!! लंबे समय से इंतज़ार करने और कहीं न जा पाने का उलाहना भी दिया। "शौक है तो खुद की चप्पल ख़रीदों" जैसे न जाने कितने कहे-अनकहे  शब्दों से अपनी क्रोधाग्नि को शांत किया। चप्पल पहन कर गए सज्जन की तो सिट्टी-पिट्टी-गुम हो गई। किम कर्तव्य विमूढ़ की स्थिति मे मुंह से कोई बोल भी न निकलने पाये। लगातार अपने किये पर पछतावा प्रकट कर माफी मांगते रहे।  अपनी लैदर की  चप्पल पाकर  अब तक रिश्तेदार जी का  क्रोध शांत हो गया था। मै डरा सहमा बच्चा कैसे और किस मुंह से रिश्तेदार को उलाहना देता कि जिस रबर की  चप्पल को पहन वे अपनी लैदर की चप्पल का इंतज़ार कर रहे थे, दरअसल वो रबर की चप्पल मेरी थी। जैसे ही रिश्तेदार जी ने  अपनी लैदर की चप्पल पहनने के लिये पुरानी रबर की चप्पल उतारी मै तुरंत ही अपनी रबर की चप्पल की ओर लपका और उन्हे पहन कर अपनी मित्र मंडली की ओर दौड़ा जो तालाब जाने के लिये मेरा इंतज़ार कर रही थी। पर उस दिन मेरे साथ मेरी चप्पल पहन के जो जुल्म ज्यादती मेरे साथ हुई उसे किसी ने न देखा।  "छोटा बच्चा जान के मुझ ना समझाना रे".............  .......... डिग्गी डिग्गी डम डम......... । 

कुछ दिन पूर्व हरी भैया की शादी की सालगिरह थी और आज उनका जन्मदिन है इस अवसर पर उन्हे हार्दिक बधाई और शुभकामनायें।

विजय सहगल  

शनिवार, 4 फ़रवरी 2023

राम बाग -झाँसी

 

राम बाग -झाँसी









मै अपनी लगभग 40 साल की सेवा के दौरान देश के लखनऊ, ग्वालियर, रायपुर, भोपाल सागर मुरैना होते हुए अंततः देश की राजधानी दिल्ली से अप्रैल 2018 मे सेवानिवृत्त हुआ पर शायद ही कोई काल ऐसा रहा हो जब मै अपनी जन्मभूमि झाँसी की जड़ों से जुड़ा न रहा हूँ। यही कारण है जब भी मै अपने गृह नगर जाता हूँ तो अपनी जड़ो की तलाश मे निकाल जाता हूँ। इस बार भी मै 2 दिसम्बर 2022 को अपने मित्र की बेटी की शादी मे शामिल होने अपने मूल स्थान झाँसी मे था। इस दिन इस समारोह के साथ अपने बचपन के उन स्थानों पर गया जहां आज से पाँच दशक पूर्व बड़े उत्साह और उमंग से जाता था। लक्ष्मी गेट बाहर उन दिनों आबादी बहुत कम हुआ करती थी, पर सावन के महीने मे ये स्थान 4-5 दिन झाँसी के धर्म प्रेमी धर्मावलंबियोंसे भरा रहता था। भगवान कृष्ण की झाँकियों की शुरुआत गोपाल धर्मशाला, मुरली मनोहर मंदिर (मुरली मनोहर मंदिर पर मेरा ब्लॉग https://sahgalvk.blogspot.com/2020/11/blog-post.html दिनांक 02 नवम्बर 2020) से शुरू होकर लक्ष्मी तालाब के किनारे बने काली जी के मंदिर, लक्ष्मी मंदिर, रामबाग और तालाब के किनारे स्थित शंकर जी के मंदिर पर समाप्त होती थी। देर रात तक सजी झाँकियों  को देखने शहर, सदर और सीपरी बाज़ार से लोग बड़ी संख्या मे आते थे। 60-70 के दशक मे धार्मिक अवसरों पर लोग  टोलियों  बना कर पैदल यात्रा करना पसंद करते थे। कुछ लोग लक्ष्मी तालाब के दूसरे छोड़ पर बने अठखम्मा मंदिर के लिए लंगड़ की नाव की सेवाए भी लिया करते थे जो लक्ष्मी तालाब मे चलने वाली एक मात्र नाव का सहृदय, दयालु और नर्मदिल नाविक था। पास ही झाँसी के राजा स्वर्गीय गंगाधर राव की समाधि बनी हुई थी जो उन दिनों देखरेख के अभाव मे उजाड़ थी पर आज अपने रखरखाव के कारण एक दर्शनीय स्थल का रूप ले चुकी है।

सड़क के बीचों बीच बने "राम बाग" या "सरावगी की बगिया" का मुख्य द्वार तो बंद था जो झाँकियों  के समय मुख्य प्रवेश द्वार हुआ करता था पर मध्य का द्वार हर बार की तरह खुला था। आज मुझे  दशकों बाद एक बार पुनः राम बाग जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ जो इस दौरान विकास से अछूता रहने के बावजूद रखरखाव मे अव्वल था। राम बाग को दशकों पूर्व के अपने मूल रूप मे  हू-ब-हू अक्षुण देख बहुत अच्छा लगा। प्रवेश द्वार से अंदर जाते ही हनुमान जी के मंदिर के दर्शन हुए। षठकोण रूप मे निर्मित मंदिर मे प्रवेश के बारहदरी अर्थात बारह द्वार बने थे जिसके अंदर परिक्रमा पथ के अंदर मुख्य मंदिर मंडप मे  भव्य आकर्षक हनुमान जी की प्रतिमा के दर्शन हुए जहां बचपन मे सावन के महीने मे दर्शनार्थियों की लंबी लाइन लगी रहती थी। मंदिर के सामने बगिया के पथ के पार एक आखाडा बना था जो आज भी अपने मूल रूप मे अब भी बैसा का बैसा बना था। अखाड़े के सेवक श्री चौधरी जी फावड़े से मिट्टी की गुड़ाई कर रहे थे उस फावड़े का  बजन 20 किलो से कम न रहा होगा। मुझे सत्तर के दशक मे इस अखाड़े मे लंबी चौड़ी कद काया के गुरु (श्री प्रभु तिवारी) की याद हो आई जो अधिकतर समय इस अखाड़े मे बच्चों को पहलवानी के दांव पेंच सीखाते थे। उन दिनों अखाड़े के बाहर विभिन्न आकार और बजन के लकड़ी के बड़े बड़े  और बजनी मुगदर घुमा कर अखाड़े के प्रशिक्षार्थी अपने शरीर सौष्ठव का निर्माण करते थे। कहते है कि पुराने समय मे अखाड़े की इस मिट्टी मे "मनों" (एक मन बराबर 40 किलो) शुद्ध घी मिला कर मिट्टी को नरम और भुरभुरा बनाया जाता था। अब इस दौर के अखाड़े बिरासत की बात हो गये।

राम बाग के प्रवेश द्वार से अंत तक पत्थर का एक गलियारा बनाया गया है। जिसके छोर पर पानी की एक बावड़ी को देख कर संतोष हुआ जिसमे उन दिनों युवा और किशोर उपर से छल्लान्ग लगा कर कूदते थे। वहीं पास मे उन दिनों धनाढ्यता का प्रतीक घोडा बग्घी रहा करती थी जो आज नहीं दिखाई दी। आवागमन के नए नए साधन आ जाने के कारण अब शायद घोडा बग्घी की प्रासंगिकता कहीं खो गई। ज्ञातत्व हो कि स्व॰ सुंदर लाल सरावगी द्वारा स्थापित रामबाग और उनके पुत्र स्व॰  श्री हरचरन लाल सरावगी की गिनती उन दिनों झाँसी शहर के  गिने चुने  धनपतियों मे  होती थी।  स्व॰ हरचरन लाल सरावगी को मुझे बचपन मे सानिध्य का सौभाग्य प्राप्त हुआ था जब वे राम बाग स्थित मंदिर मे भगवान के वस्त्रों को सिलवाने हेतु मेरे घर के बाहर स्थित भगवान दास टेलर मास्टर की दुकान पर आते थे।   

राम बाग के मध्य मे स्थित राम जानकी मंदिर की भव्यता देखती ही बनती है। दशको पूर्व मे जिस मंदिर के प्रांगण मे शास्त्रीय गीत संगीत की सभा- समागम होती थी  उसके  सौदर्य की  आभा आज भी जस के तस है। सावन की झांकियों के दिनों मे दर्शनार्थी मंदिर के आँगन से मुख्य मंदिर तक भगवान के दर्शनार्थ लंबी लाइनों मे खड़े हो विलंबित प्रतीक्षा करते थे। मंदिर के बाहर खुले आँगन मे फब्बारे बने हुए थे जिनसे निकला पानी आगे झरनों के रूप मे सीढ़ियों के नीचे बहता हुआ सुंदर प्रतीत दिखाई देता था। बेशक उन दिनों की भांति झरने का पानी कल कल बहता नज़र तो न आया पर अपने पुरानी भव्यता की कहानी मुझे स्पष्ट दिखाई दे रही थी। राम बाग के ट्रस्टीयों को चाहिए कि शासन के सामंजस्य से इस राम बाग को "ऐतिहासिक विरासत" का रूप देकर संरक्षित और सुरक्षित रखने का प्रयास करें।        

उन दिनों पानी से लबालब भरे लक्ष्मी तालाब का प्राकृतिक सौन्दर्य देखते ही बनता था। पानी वाली धर्मशाला के बाद बड़े बड़े तैराकों के लिये लक्ष्मी  तालाब तैराकी के शिक्षण और प्रशिक्षण हेतु झाँसी मे एक अहम स्थलों मे से एक था। तैराकी के कुशल शिक्षकों मे उन दिनों बद्री प्रसाद लाहौरी की बड़ी भूमिका थी और  जिनका झाँसी के गणमान्य नागरिकों मे एक बड़ा नाम था। सावन के महीनों के इन 5-6 दिनों मे मुरली मनोहर मंदिर, काली जी, राम बाग सहित अनेक   स्थानों मे देश के गीत, शास्त्रीय संगीत के जाने माने बड़े बड़े दिग्गज कलाकारों का जमघट लगा रहता था। झाँसी के रसिक श्रोता इन शास्त्रीय संगीत की सभाओं मे आने वाले उस्ताद और गुरुओं  से खयाल, दादरा, ठुमरी, कजरी आदि सुनने के लिये देर रात तक अपनी भागीदारी सुनिश्चित करते थे। शास्त्रीय संगीत के ये  कलाकार भी इन कार्यक्रमों मे अपनी प्रस्तुति को अपना सौभाग्य मान संगीत की इन महफिलों मे शामिल होने को अपना परम सौभाग्य मान ईश्वर को अपना धन्यवाद ज्ञपित करते थे। संध्या आरती के समय काली जी मंदिर से शंख, झालर और आरती के घण्टियों की आवाज शाम के अंधेरे मे एक सुमधुर संगीतमय ध्वनि उत्पन्न करती थी जो तालाब की लहरों पर सवार होकर  तैरता हुआ इस शास्त्रीय घोष को तालाब के दूसरे छोर तक ले जाता और जहां से प्रतिध्वनि के रूप मे साफ सुनाई देता था। सावन की घटाओं मे मंदिरों मे जगमगाते विधुत प्रकाश को तालाब मे उत्पन्न प्रतिविम्ब लहरों के माध्यम झिलमिलाता नज़र आता था।

नगर निगम झाँसी ने इन धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व के मंदिरों सहित पास मे ही स्थित झाँसी के राजा गंगाधर राव की समाधि को सहेज कर रक्खा है। लक्ष्मी तालाब के सौंदरिकरण का कार्य भी प्रगति पर है। तालाब के बीच रानी झाँसी की प्रतिमा स्थापित हो चुकि है पर उसके चारों ओर के निर्माण का कार्य अभी निर्माणाधीन है आशा करते है कि निर्माण के बाद न केवल शहर वासियों अपितु पर्यटन की दृष्टि से भी इन इमारतों के रूप को निखार कर झाँसी और झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई के गौरव और यश गाथा को  उसी तरह पुनर्स्थापित किया जायगा  जैसा कि प्रसिद्ध कवियत्री और लेखिका सुभद्रा कुमारी चौहान ने अपनी कविता मे लिखा था:-

"बुंदेले हरबोलों के मुंह, हमने सुनी कहानी थी"।

"खूब लड़ी मर्दानी वह तो, झाँसी वाली रानी थी॥" 

 

विजय सहगल