शुक्रवार, 25 अगस्त 2023

बगुला भगत ऋषि रणदीप सुरजेवाला का श्राप

 

"बगुला भगत ऋषि रणदीप सुरजेवाला का श्राप"




जब से काँग्रेस राज परिवार के राजऋषि रणदीप सुरजेवाला ने हरियाणा के कैथल मे जनसभा को संबोधित करने के दौरान भाजपा को बोट देने वाले या समर्थन करने वाले लोगों को  राक्षस कहा और श्राप दिया!! लोग बड़े व्यग्र हैं!! बड़ा आश्चर्य और खेद का विषय हैं कोई योग्य, अनुभवि और  परिपक्व बुद्धिजीवि नेता देश के नागरिक मतदाताओं के लिये  "राक्षस" जैसे  अनुचित और घिनौने शब्दों का इस्तेमाल कैसे कर  सकता है? सार्वजनिक मंच से निश्चित ही ऐसी कुत्सित सोच और ज़बान  तो कोई कुपढ़ और अस्थिरचित्त व्यक्ति ही बोल सकता है जिसकी तीव्र भर्त्स्ना और निंदा की जानी चाहिए। लोकतन्त्र मे वैचारिक मतभेद और मतांतर होना साधारण बात है। नैतिक मर्यादाओं के भीतर रहकर  सकारात्मक आलोचना, दोष-विवेचना और टीका टिप्पड़ी राजनैतिक दलों का परम अधिकार है और जिसको करना भी चाहिये और जिसकी प्रशंसा भी की  जानी चाहिये। लेकिन प्रजातन्त्र, जिसमे देश की प्रजा का जनादेश सर्वोच्च होता है यदि उस पर  कोई राजनैतिज्ञ ईर्ष्या और द्वेष वश उन मतदाताओं को अनर्गल, निरर्थक और असंयमी भाषा का प्रयोग करें तो उसकी बुद्धि और योग्यता पर सवाल उठना लाज़मी है और वही सवाल आज देश की जनता काँग्रेस के राज्य सभा सांसद रणदीप सुरजेवाला से पूंछ रही है कि लोकतन्त्र मे आम जनों को मिले मतदान के मौलिक अधिकार से चुनी हुई सरकार के मतदाताओं को  आप "राक्षस" और "राक्षस प्रवृत्ति"  का कैसे कह सकते है? और ऊपर से तुर्रा ये कि उन मतदाताओं को महाभारत की धरती से श्राप देने का दुस्साहस!!   अर्थात उल्टा चोर कोतवाल को डांटे!! काँग्रेस का बंटाढार करने मे सुरजेवाला ही नहीं अपितु पवन खेड़ा, सुप्रिया श्रीनेत और दिग्विजय सिंह जैसे अनेक प्रवक्ताओं की पूरी टोली हैं। होना तो ये चाहिए था कि कॉंग्रेस पार्टी और उनके प्रवक्ताओं को देश के 23 करोड़ मतदाताओं को कोसने और उनको राक्षस कहने की बजाए अपने नीतियों-कार्यक्रमों, अपनी योजनाओं और पूर्व मे की गई अपनी उपलब्धियों को देश की जनता के सामने रखते ताकि लोग उनके विजन और सोच से प्रभावित हो उनके पक्ष मे मतदान कर सकते।

अब सवाल ये उठता है कि इस घोर कलयुग मे रणदीप सुरजेवाला के मन मे भगवान कृष्ण की कर्मभूमि और भारत की आस्था और अध्यात्म की पुण्यभूमि कुरुक्षेत्र मे अकारण और असमय "श्राप" देने का भाव  क्यों जागा? उन्हे  ये भी स्पष्ट करना चाहिए था  कि आखिर महाभारत मे वे कौरवों के पक्ष मे थे  या कि  पांडवों के?? क्योंकि यदि वे पांडव सेना के पक्ष मे थे जिसका नेतृत्व भगवान बासुदेव श्री कृष्ण कर रहे थे तो उन्हे श्रीमद्भगवत गीता मे भगवान श्री कृष्ण की शिक्षाओं का  भलीभाँति ज्ञान होगा। परंतु  कुटिल और कपट मानसिकता वाले बगुला भगत  ऋषि सुरजेवाला का भाजप के पक्ष मे मतदान करने वाले 23 करोड़ मतदाताओं से द्वेष करने वाले और उन्हे राक्षस प्रवृत्ति का बताने वाले सुरजेवाला स्वयं नहीं जानते कि श्रीमद्भगवत गीता के अध्याय 16 मे श्लोक संख्या 19 मे भगवान श्री कृष्ण ने उन जैसे व्यक्तियों को ही आसुरी (राक्षसी) योनियों मे डालने का उल्लेख करते हुए कहा है:-

तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान्।

क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु।।  {16.19}   अर्थात

 

ऐसे द्वेष करने वाले पापाचारी (और) क्रूरकर्मी नराधमों को मैं संसार मे बार-बार आसुरी योनियों में ही डालता हूँ।

तब रणदीप सुरजेवाला  को विचारमंथन करना चाहिये कि असुर अर्थात राक्षस कौन है? वे 23 करोड़ मतदाता जिन्होने उनके दल के विरुद्ध मत दान किया या वे स्वयं जो  मतदाताओं से द्वेष वश उन्हे राक्षस कह रहे है।       

इसलिए ये तो निश्चित है कि छल ऋषि सुरजेवाला पांडवों के पक्ष मे नहीं अपितु कौरवों के पक्ष मे खड़े हों, श्राप दे रहे थे। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी रामचरित मानस मे कहा हैं :-

"बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देई बिधता"॥  अर्थात

हे! तात! नरक मे रहना अच्छा है परन्तु विधाता, दुष्टों का संग कभी न दे।

तब कहीं ये तो नहीं भाजप के पक्ष मे मतदान करने वाले मतदाताओं ने इसी धारणा के वशीभूत बेशक!!, अभावों और कष्ट रूपी नरक मे रहने मे ही भलाई समझी हो  पर दुष्ट सुरजेवाला के संग न देने का संकल्प लिया हो?? तब फिर सुरजेवाला का शाप कैसे फलीभूत हो सकता है? पर सुना हैं काँग्रेस विध्वंस का श्राप तो  श्री करपत्रि जी महाराज द्वार द्वारा 7 नवंबर 1961 को दिया गया था जब श्रीमती गांधी ने संसद भवन के बाहर गो हत्या पर प्रतिबंध की मांग को लेकर धरना दे रहे साधु महात्माओं पर अंधा-धुन्ध फायरिंग कराई थी, जिसमे अनेक साधुओं का संहार किया गया था। श्री करपत्रि जी महाराज द्वार काँग्रेस को दिये गया  श्राप और उसके परिणाम  राजनीति के विध्यार्थियों के लिये  शोध और अनुसंधान का विषय हो सकता है। 

लोकतान्त्रिक तरीके से देश के मतदाताओं द्वारा एक सरकार को चुने जाने पर काँग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला द्वारा  यदि नागरिकों को  राक्षस प्रवृत्ति वाली उपाधि से कलुषित किये जाने और श्राप के कोपभाजन होने की इस कलियुगी सोच पर हंसी आती है। लग तो ये रहा था कि इस  कलयुगी ऋषि का श्राप न जाने किसको श्राप से भस्म  कर दे? या पत्थर बना दे? या कहीं किसी को पशु पक्षियों की योनि न बदल दे!!? एक तिनके को भी  शापित कर भस्म नहीं कर पाने वाले सुरजेवाला ने अपनी जग हँसाई ही कराई। बैसे  उनका ये श्राप सुनकर कोई हैरानी नहीं हुई क्योंकि सुरजेवाला उस कुल के ही रक्तबीज है जिन्होने 48 वर्ष पहले 1975 मे  देश मे आपातकाल लागू कर लोकतन्त्र की नृशंस हत्या का प्रयास किया था। आज फिर इनकी संताने भारत मे येन केन प्रकारेण सत्ता हथियाने के फेर मे अपने  पक्ष मे मतदान न करने वालों को श्राप दे रहीं हैं, धमका रहीं हैं।   

अपने निजी लोभ और लालच के वशीभूत, अधम सोच और स्वार्थ की मानसिकता से  जो व्यक्ति देश के लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गयी सरकार को चुनने वाले मतदाताओं को राक्षस और समर्थकों को राक्षसी प्रवृत्ति का बताएं उससे ज्यादा मूढ़ मति कौन होगा?  कलयुगी ऋषि रणदीप सुरजेवाला काँग्रेस राज परिवार की चापलूसी और चाटुकारिता मे इतने तल्लीन है कि इन्हे अच्छाई-बुराई का कोई भान नहीं है, नीति-अनीति के बारे मे इन मदांध मूढ़ व्यक्तियों से अपेक्षा करना व्यर्थ है। आप निश्चित मानिए काँग्रेस को किन्ही  बाहरी व्यक्तियों से नहीं अपितु इनके दल के अंदर ही उपस्थित रणदीप सुरजेवाला जैसे आत्मघाती  व्यक्तियों से खतरा है जो देश के मतदाताओं को "राक्षस", "राक्षसि प्रवृत्ति" और "शाप" जैसे गाली-गलौज वाली भाषा के  शब्दों के प्रयोग से अपनी नकारात्मक और अधम सोच से काँग्रेस की लुटिया डुबो देंगे पर कभी सुधरने का नाम नहीं लेंगे!! शायद ऐसे ही कुटिल और धूर्त व्यक्तियों के बारे मे राजा भर्तहरी ने अपने नीति शतक के श्लोक संख्या 11 मे लिखा हैं -:

शक्यो वारयितुं जलेन हुतभुक् छत्रेण सूर्यातपो

नागेन्द्रो निशिताङ्कुशेन समदौ दण्डेन गोगर्धभौ ।

व्याधिर्भेषजसंग्रहैश्च विविधैर्मन्त्रप्रयोगैर्विषं

सर्वस्यौषधमस्ति शास्त्रविहितं मूर्खस्य नास्त्यौषधम् ॥ [नीतिशतक श्लोक 11]  अर्थात

 

अग्नि जल से शांत होती है, सूर्य की धूप छाते से, मतवाले हाथी को तीक्ष्ण अंकुश से वश मे किया जा सकता है, बैल और गधे को डंडे से सही रास्ता दिखाया जा सकता है, बीमारियों का निदान औषधियों से और विष का उपशमन अनेक मंत्रों के प्रयोग से शांत किया जा सकता है अर्थात शास्त्रों मे सब प्रकार की औषधि है, परंतु मूर्ख मनुष्य के लिए कोई औषधि नहीं है।

विजय सहगल

शुक्रवार, 18 अगस्त 2023

कालीन की खेती

 

"कालीन की खेती"









मैंने अपने थिण्ड्लु गाँव के प्रवास पर ग्रामवासियों को विभिन्न कृषि गतिविधियों मे देख उनके पुरुषार्थ की हमेशा प्रशंसा की हैं। इसी श्रंखला मे पिछले कई दिनों  के श्रम के पश्चात आज मै  आपको एक नए कृषि घटना क्रम से अवगत कराऊंगा। अभी तक हम-आपने कालीन का उत्पादन फ़ैक्टरियों मे होते देखा या सुना है। कालीन के लिये प्रसिद्ध भदोही  जहां सैकड़ों कामगार दिन रात कालीन के बुनाई कर देश के आर्थिक विकास मे अपना बहुमूल्य योगदान देते है। लेकिन यदि आप से कहा जाए कि कालीन की खेती भी होती है तो आपको सुनकर कुछ आश्चर्य तो जरूर होगा ही। जी हाँ मैंने मखमली घास के कालीन की पैदावार खेतों मे होती देखी है।

17 जुलाई 2023 को प्रातः भ्रमण के दौरान एक खेत मे कुछ कृषि श्रमकों को खेत मे एक विशेष प्रकार की मशीन से घास के एक बड़े मैदान मे एक  निश्चित लंबाई-चौड़ाई के टुकड़ों को न केवल बारीकी से काटते देखा बल्कि पीछे पीछे मजदूरों द्वारा घास के उन टुकड़ों को कपड़े के थान की  तरह रोल कर लपेटते देखा। जब मैने खेत मे श्रमिकों को कार्य करते देख इस घास की कीमत के बारे मे  पूंछा तो सभी मजदूर निरुत्तर थे और उन्होने एक किसान की तरफ इशारा करते हुए कहा कि खेत के मालिक श्री मुनियाँ गौड़ा ही इस  बारे मे बता सकते है। मै उन किसान की तरफ हैरानी से देख रहा था! क्योंकि खेते के मालिक श्री मुनियाँ गौड़ा भी एक साधारण मजदूर की तरह सभी खेतिहर मजदूरों के साथ काम मे जुटे हुए थे, अतः ये भेद करना कठिन था कि कौन श्रमिक और कौन खेत का स्वामी है।  कार्पेट ग्रास रूपी इस  कृषि उत्पाद मे रांची से आये श्रमिक श्री प्रसाद और अशोक तथा उनके परिवार के अन्य सदस्य  नियमित रूप से गौड़ा जी के सहायक के रूप मे हिस्सा बंटाते है।   श्री गौड़ा जी जो एक उन्नतशील किसान हैं, ने बताया इस मखमली कार्पेट घास को इस रूप मे पहुंचाने के पूर्व एक कठिन रास्ता तय करना पड़ता है। खेत मे पहले लाल दुमट  मिट्टी की लगभग 6-8 इंच मोटी मिट्टी की परत खेत मे बिछाई जाती है ताकि इस मिट्टी से कार्पेट ग्रास के 3-4 फसल लगातार प्राप्त की जा सके।  खाद और कीटनाशकों से मिश्रिण से तैयार इस मिट्टी की परत मे तैयार घास के छोटे छोटे गुच्छे बिखेर कर लगाए जाते है तत्पश्चात पानी की अच्छी और गहन सिंचाई के पश्चात घास पूरे खेत मे फैल जाती है और ये ही घास घनी होकर मखमली कालीन का रूप धारण कर लेती है।

तैयार खेत मे कीट नाशकों और रसायनिक खादों का छिड़काव निरंतर चलता रहता है। कटिंग के लिये तैयार इन खेतों मे पहले प्लास्टिक के पाइप और 10-12 फुट लंबी रस्सी की सहायता से  3-3  फुट के अंतराल पर तीखी धार वाले हँसिये से सिर्फ चौड़ाई मे 1.5 फुट चौड़ी लकीर की गहरे निशान लगाए जाते है। अन्य मजदूर निशान लगाने के दौरान निकली घास के तिनकों  को पीछे-पीछे साफ करते नज़र आयें। मुनियाँ गौड़ा जी ने बताया लगभग 7-8 लाख रुपए कीमत की इस पेट्रोल चालित मशीन का रख रखाब काफी महंगा है और डालर की बढ़ती कीमत के कारण भी मशीन के पुर्जे आयात करना काफी खर्चीला है। अब उक्त आयतित मशीन से तैयार खेत मे से 1.5X3.00 फुट के टुकड़े काटने की बारी थी। श्री गौड़ा जी ने मशीन को जैसे ही स्टार्ट किया तो रस्सी की सहायता से बनाए गये पथ पर मशीन को चलाना शुरू कर दिया। मशीन के  पहिये के एक ओर लगे शार्प ब्लेड घास सहित मिट्टी की पतली सतह को तेजी से काटने लगे। पीछे पीछे कृषक मजदूर डेढ़ फुट चौड़े और तीन फुट लंबे अर्थात 4॰5 वर्ग फुट के  घास के टुकड़ों को को कपड़ों के थान की तरह तीन तहों मे लपेट कर रखने लगे। कुछ ही मिनटों मे पूरे खेत मे समान रूप से मुड़े कार्पेट ग्रास के गट्ठर नज़र आने लगे। मांग और पूर्ति के हिसाब से स्थानीय बाज़ारों मे इस कार्पेट ग्रास की कीमत लगभग 15 रुपए वर्ग फीट थी। इस ग्रास को राज्य और देश के दूर दराज़ हिस्सों मे तुरंत रवाना कर दिया जाता है। परंपरा गत रूप की कृषि से हट  कर लगभग 90 दिन मे उत्पादित इस कृषि उत्पाद, कार्पेट ग्रास का उत्पादन यहाँ के किसानों की आर्थिक आय मे एक महत्वपूर्ण योगदान करता है जिसका अनुमान  आप गाँव के किसानों की समृद्धि और संपन्नता का अनुमान उनके घर और रहन सहन को देख, सहज रूप से लगा सकते है।    

इन कार्पेट ग्रास के टुकड़ों को राज्य सरकार के कार्यालयों, विधान सभाओं, स्टेडियम और अन्य संस्थानों मे पहले से तैयार जमीन मे चादर की तरह बिछा दिया जाता है। इन कालीन के टुकड़ों पर पानी के गहरी सिंचाई से पहले से तैयार जमीन पर रोप दिया जाता है। बैसे छोटे छोटे घरों और निजी कार्यालयों पर भी मखमली घास की चादर बिछाना और उसका रखरखाब करना साधारण मानवी की क्षमता के बाहर है। केंद्र और राज्याश्रय के संरक्षण के बिना इस मखमली कार्पेट घास के सौंदर्य का आकर्षण एक विलासता का पर्याय ही होगा। इस स्वर्गिक वातावरण और सुंदर मौसम के बीच गौड़ा जी का मकान किसी हिल स्टेशन पर बने बंगले से कम नहीं दिखाई दे  रहा था।

अतः आज के बाद जब कभी आप सरकारी कार्यालयों, राज्य की विधान सभाओं, लोक सभा या अन्य खेल मैदानों या सरकारी कार्यालयों मे हरी मखमली घास के मैदान देंखे या उन पर चलें  तो आप निश्चित मान के चले कि इस मखमली कार्पेट घास का प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से संबंध कर्नाटक के गाँव थिण्ड्लु से अवश्य होगा।

विजय सहगल       

शुक्रवार, 11 अगस्त 2023

एक सुहानी सुबह

 

"एक सुहानी सुबह"





जब से 23 जुलाई 2023 को प्रातः भ्रमण के दौरान तमिलनाडू के कग्नूर गाँव जाना हुआ तब से अब, सुबह की घुम्मकड़ी का ऐसा क्रम बना कि तमिलनाडू के इस छोटे से गाँव कग्नूर  से कुछ  आसक्ति हो गयी कि प्रातः  कर्नाटक के थिण्ड्लु गाँव से 2-2.5 किमी दूर   मोटरसाइकल से घर से निकल कर कग्नूर पहुंचता और वहाँ मंजूनाथ की टी स्टाल पर बाइक रख घूमने निकल जाता। वहाँ से पैदल भ्रमण के दौरान मोबाइल पर विविध भारती के  एफ़एम रेडियो पर "वंदनवार", "रामचरित मानस", "संगीत सरिता", "भूले विसरे गीत" और "हम है राही प्यार के" कार्यक्रमों पर भजन, पुराने गानों के बाद  समाचार बुलेटिन सुनता जो मनोरंजन के साथ-साथ समय की सूचना देते  रहते। इस पृक्रिया के बाद जब 24 घंटे चलने वाला चैनल रागम पर दक्षिण भारतीय क्लासिकल संगीत सुनने को मिलता तो समय का पता ही नहीं चलता और ये क्रम तब तक चलता रहता जब तक गूगल फिट पाँच  हजार कदमों की संख्या पूरी होने का संकेत नहीं दे देता। जैसे ही पाँच हजार कदम पूरे होते उल्टे कदमों से घर बापसी शुरू हो जाती।  

कग्नूर गाँव से ये अनुराग यूं ही नहीं हुआ, दरअसल इसका एक बहुत बड़ा कारण कर्नाटक सीमा से जैसे ही तमिलनाडू सीमा मे आप प्रवेश करते है तो सड़क का आकार दुगना अर्थात  2 लेन सड़क से चार लेन सड़क का हो जाना है। सड़क की इस चौड़ाई के कारण घूमने मे सुरक्षा का भाव बना रहता, वहीं  मौसम की गुलाबी सर्द ठंडी हवाएँ  सड़क किनारे घूमने के सहज और सुंदर भाव पर  सोने पर सुहागा बनाने का कार्य कर देती। आज 3 अगस्त 2023 इस सुहानी सुबह, ऐसा ही कुछ मौसम था। मंजूनाथ की टी स्टाल से बगलूर (तमिलनाडू) लगभग 6 किमी था। इसलिए सुबह की घुम्मकड़ी इस निश्चय के साथ शुरू की, कि आज गूगल फिट के पाँच हज़ार कदमों के बाद उल्टे कदम बापसी के बजाय सीधे एक दिशा मे दस हजार कदम बगलूर (बेंगलुरु नहीं) तक चलकर पूरे किए जाए और बगलूर से कग्नूर तक बापसी बस से पूरी की जाय।



इस नेक इरादे के साथ मैंने प्रातः भ्रमण की अपनी पद यात्रा शुरू की। यूं तो सड़क पर वाहनों की आवाजाही ज्यादा न थी पर यदा-कदा  रेती, पत्थर, गिट्टी से लदे 12 चक्के वाले बड़े बड़े डंपर, सड़क के यातायात मे तीव्र शोर के साथ हलचल पैदा कर देते। तीव्र गति से आ राही कुछ कारों के बीच मे बेंगलुरु और हुसूर के बीच दैनिक आवागमन करने वाले दुपहिया वाहनों की बहुतायत रहती। शायद ही कोई दुपहिया वाहन चालक सवार महिलाएं या पुरुष सर्द हवाओं से बचने के लिये  गर्म स्वेटर, फुल जैकेट या हुड सहित जैकेट के बिना दिखेँ हों। मुझे भी अपने आवास से दो-ढाई किमी॰ जाने मे अच्छी ख़ासी सर्दी का सामना करते हुए कग्नूर तक जाना पड़ता। सर्दी का प्रकोप दिन के नौ बजे के बाद कम होना शुरू हो जाता है लेकिन हवा मे नमी और ठंडक पूरे दिन बनी रहती। बच्चों की स्कूल बस, माता-पिता द्वारा बच्चों को स्कूल तक स्कूटी से छोड़ने और कुछ बच्चों का पैदल ही स्कूल जाने का क्रम मुझे अपने स्कूल के दिनों की याद दिलाता रहता। बीच बीच मे बच्चों से नमस्ते या गुड मॉर्निंग करते हुए मै  अपनी मंजिल की ओर बढ़ता रहा। इस दौरान रास्ते मे गवर्नमेंट हाइ स्कूल मे पढ़ने वाले बच्चों वैशाली, सौजन्या और यशराज से भी भेंट हुई जो मुख्य सड़क से लगभग एक किमी॰ अंदर कोठापल्ली  अपने स्कूल जा रहे थे। इन बच्चों से बातचीत मे  जब इन बच्चों से इनके भविष्य के बारे मे पूंछा तो इनके उत्तर मे आत्मविश्वास की झलक स्पष्ट देखने को मिली जब इन बच्चों ने वकील, पुलिस अधिकारी और पायलट बनने की इच्छा बताई।



एक जगह पारदर्शी पोलिथीन से ढके एक बड़े "पॉली हाउस" को देख उसके अंदर जाने की इच्छा के  लोभ संभरण से अपने आप को न रोक सका, जिसके अंदर "डहेलिया" के फूलों की बागवानी हो रही थी। आठ दस मजदूर फूलों को तोड़ एकत्रित कर रहे थे। वाराणसी के धर्मेन्द्र सहित उनके परिवार के लोग यहाँ मजदूरी के लिए आए थे। पूरी तरह वैज्ञानिक संसाधनों के साथ फूलों का व्यापारिक उत्पादन होते देखना एक अच्छा अनुभव था। पूरे फार्म हाउस मे चार रंगों के फूलों को एकत्रित करने का काम चल रहा था। लाल, पीले सफ़ेद और गुलाबी फूलों को इन मालियों ने लगभग एक फुट टहनी के साथ तोड़ कर डिब्बों मे एकत्रित किया था। गुलाबी रंग के डहेलिया के फूलों ने मन मोह लिया। पॉली हाउस के प्रबंधन देख रहे श्री निवास ने बताया कि हर दिन एक लाइन को छोड़ एक लाइन से फूल चुने जाते है ताकि इनको तोड़ने का नित्य क्रम चलता रहे।




एक जगह सड़क के किनारे पेड़ के चारों तरफ एक नयी रेशम की साड़ी को बांधा गया था जो शायद अखंड सौभाग्य की निशानी थी। इस तरह के चलन स्थानीय स्तर पर कहीं कहीं दिखाई दे जाते। क्षेत्र मे इस तरह के प्रचलन या किवदंतियों पर यदि किसी सुधि पाठक को विस्तृत  जानकारी हो तो कृपया सबके साथ सांझा करें तो खुशी होगी?

लगभग 40-45 मिनिट सैर के बाद एक साफसुथरे आंजनेय भगवान (हनुमान जी) के मंदिर मे दो मिनिट का विश्राम सुकून दायक था। इस दौरान मोपेड़ से आए एक सज्जन से भेंट हुई जो नित्य ही इस मंदिर मे पूजा के लिए आते है पर भाषा की संवादहीनता के कारण ज्यादा बातचीत न हो सकी सिर्फ इशारों से थोड़ा बहुत संवाद हो सका। ग्रामीण क्षेत्रों मे इस तरह के प्रसंग बड़ी साधारण बात है लेकिन भाषा की संवाद हीनता के बावजूद सफल संवाद प्रेषण की कला  से ही आपके बुद्धि कौशल की असली परीक्षा होती है।



कुछ आगे एक्सिस बैंक का एक एटीएम लगा देखा जिसके रास्ते मे उगे झाड़-झंकार, घास-फूस और कटीली झाँडियाँ को देख लगा, "बहुत कठिन है डगर पनघट की" कैसे मे भर लाऊं, पनघट (एटीएम) से मटकी (रुपए)!! लेकिन एटीएम तक पहुँचने का मार्ग भी नज़र नहीं आ रहा था!! क्योंकि रास्ते मे जंगली घास और कटीली झड़ियों ने एटीएम तक पहुँचने के मार्ग को बाधित किया हुआ था। ऐसी स्थिति को देख एटीएम से रुपए निकालने वाले ग्राहक पर जिगर मुरदाबादी की वो पंक्तियाँ याद आ गयी कि :-

"ये इश्क नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे", "इक आग का दरिया हैं और डूब के जाना है"।   

रास्ते मे स्थानीय नस्ल की गायों के गले मे बंधी घण्टियों की सुरीली आवाज करती गायों के  एक झुंड को देख मन प्रफ़्फुलित हो गया। स्थानीय गायों के सींगों की बनावट एक विशेष आकार प्रकार की होती है जिनकी संख्या अब इस क्षेत्र मे कम देखने को मिलती है।



अब तक बगलूर की लगभग सात  किमी॰ की दूरी तय कर चुका था। कुछ विश्राम की आकांक्षा की उम्मीद से तमिलनाडू इलैक्ट्रिसिटी बोर्ड के ऑफिस मे चला गया जहां वेंकटेश और प्रेम कुमार से मुलाक़ात हुई और बिजली विभाग से संबन्धित बातचीत का सिलसिला चालू हो गया। ये दोनों मीटर रीडर थे और इनका सामना हर रोज़ बगलूर के जन साधारण से होता है। इनका कहना था कि बिजली के बिलों की बसूली शतप्रतिशत हैं। जब हमने दिल्ली सहित उत्तर भारत सीधे कंटियाँ डाल कर खंभे से बिजली लेने की बात पूंछी तो उनके चेहरे पर सवालिया कुटिल हंसी दिखाई दी? उन्होने बताया कि यहाँ बगैर मीटर के कोई भी बिजली नहीं जलाता अर्थात बिजली चोरी न के बराबर हैं। बिजली की कीमत सौ यूनिट तक मुफ्त के बाद अलग स्लैब के अनुसार है जो अधिकतम छह रुपए प्रति यूनिट  के लगभग है।



इस विश्राम के बाद हम अपनी मजिल बगलूर पहुँच चुके थे। स्थानीय होटल पर चाय और कुछ स्वल्पाहार कर बस स्टैंड पहुँचे। बस हाल ही मे आयी थी और चालीस मिनिट के बाद  बापस जानी थी। एक सुहानी सुबह के सर्वोत्तम आनंद के बाद चालीस मिनिट के इंतज़ार ने मुझे "लौट के बुद्धू घर को आये" का अहसास कराने को मजबूर कर दिया।

विजय सहगल

शुक्रवार, 4 अगस्त 2023

"एलेक्जेंडर रोड्रिग"

 

"एलेक्जेंडर रोड्रिग"

 








1 अगस्त 2023 को कर्नाटक के सरजापुर से तमिलनाडू सीमा के पहले गाँव कागनूर से नल्लुर मार्ग पर प्रातः पैदल भ्रमण के दौरान दूर से एक दुपहिया वाहन जिसके उपर एक छप्पर नुमा आकृति  को देख मैंने इस प्रत्याशा से अपने मोबाइल को तुरंत चालू कर विडियो बनाना शुरू कर दिया कि शायद कुछ नया देखने को मिले? दूर से देखने पर मुझे लग रहा था कि स्थानीय स्टार अनेकों व्यक्तियों द्वारा जुगाड़ कर नयी नयी खोजे देखने को मिल जाती है शायद ये भी उनमे से होगी? नजदीक आने पर  मेरी आशा के अनुरूप 45-50 वर्षीय एक युवक को पल्सर बाइक पर प्लास्टिक की बरसाती से बाइक के आगे से पीछे तक लोहे के पतले पाइप के सहारे बनाये गये  शेड को देख उसे रुकने का संकेत दिया। मैंने देखा बजाज पल्सर की इस बाइक को इस तरह संशोधित किया गया था कि बरसात, तेज धूप और लपट के दौरान बाइक चालक को मौसम के अनुरूप ढाल कर इसके प्रकोप को कम या बचाया  जा सके।

बाइक के रुकते ही मैंने वाहन चला रहे नौजवान से उसका परिचय पूंछा और बाइक मे किए गये आवश्यक संशोधन के बारे मे विस्तार से अपनी जिज्ञासा प्रकट की। बाइक चला रहे नौजवान ने अपना नाम एलेक्जेंडर रोड्रिग बताया। आर्मी से सेवानिवृत्त पिता की संतान एलेक्जेंडर के मन मे कुछ अलग करने की इच्छा बचपन से थी यध्यपि उनकी शैक्षिक योग्यता की पृष्ठभूमि यांत्रिक इंजीन्यरिंग की नहीं रही फिर भी उनके मन मे दिव्यांग और ज़ोमेटो कंपनी के खाध्यन्न वितरण करने वाले कर्मचारियों के लिए एक ऐसी बाइक बनाने की तमन्ना है जो उन्हे सर्दी, गर्मी, बरसात मे वस्तुओं को लोगो के घर वितरण करने मे आने वाली कठिनाइयों से छुटकारा दिलाएँ। इस हेतु एलेक्जेंडर ने  मोटरसाइकल मे वरसात से बचाव हेतु एक पतले स्टील रौड से बाइक की सीट के पीछे से बाइक के  हैंडल से लगभग 2 फुट आगे तक एक ऐसे फ्रेम लगाया और उसके उपर प्लास्टिक की बरसाती को इस तरह बेल्टों से कसा ताकि भारी वारिस के दौरान भी बाइक चालक वरसात से न भीगे। चालक के पीछे भी सीट पर इतनी जगह छोड़ी ताकि एक व्यक्ति या ज़ोमेटो चालक का बॉक्स अच्छी तरह फिट किया जा सके।

उन्होने बाइक के हैंडल मे पारदर्शी प्लास्टिक के टुकड़े को फ्रेम की सहायता से इस तरह लगाया कि बरसात मे पानी की बौछार और गर्मी मे गरम हवा की लपटों से बचाव किया जा सके। उन्होने स्टील के शेड के उपर रस्सी की जाली को इस तरह कसा है कि लगभग 20 से 25 किलो बजन का सामान उसमे ठीक ऐसे बांध सके जैसे कारों मे कैरियर मे सामान को रक्खा जाता है। एलेक्जेंडर ने बाइक के बायीं तरफ लगभग 10-12 लीटर का एक छोटा जरीकेन भी लगा रक्खा था ताकि दूर-दराज़ के क्षेत्रों की यात्रा मे पेट्रोल का रिजर्व स्टॉक रक्खा जा सके। ज़ोमेटो कंपनी के डिलीवरी स्टाफ और दिव्यांग जनों के लिए सहायक बाइक के निर्माण जैसे नेक और पवित्र काम मे शोध करने और  उस पर धन व्यय करने पर एलेक्जेंडर की प्रशंसा करे बिना न रह सका।

खुले विचारों, प्रगतिशील सोच और सिगरेट के शौकीन  एलेक्जेंडर ने बातचीत मे बताया कि उनकी एक इच्छा हिमालय पर्वत की श्रंखला से लगे क्षेत्रों की अपनी इस बाइक से यात्रा करने की भी है जिसमे वे अपने पपी को ले जाना चाहते है जिसे उन्होने लावारिस अवस्था मे तब पाला था जब वह छह दिन की आयु मे बुरी तरह घायल सड़क के किनारे पड़ा मिला था। हिमालय क्षेत्र की यात्रा भी बिना पूर्वनियोजित कार्यक्रम या सुविधाओं के साथ बिना होटल आदि मे रुके सिर्फ अपने टेंट मे अपनी मर्जी के करना चाहते है। एलेक्जेंडर के मन मे मानवोचित भावनाएं कूट कूट कर भरी है इसलिए उनके मन मे समाज के दबे कुचले वर्ग के प्रति काफी प्यार और सम्मान है जिसकी बानगी हमने उनसे बातचीत के दौरान हर कदम पर देखी और महसूस की!!           

उन्होने बताया कि वे अपने फार्म हाउस मे भी खुद के बनाये टेंट मे ही रुकते है जिसमे दैनंदिनी कार्यों की सारी आवश्यक वस्तुएँ उपलब्ध है। उन्हे दुःख और अफसोस है कि जब इस संबंध मे उन्होने क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी से आवश्यक अनुमतियों हेतु संपर्क किया तो निराशा हाथ लगी। उनका मानना था दुपहिया वाहनों के उपर बरसाती लगाने की अनुमति नहीं ली गयी?  तब एलेक्जेंडर  का ये तर्क था कि क्या सड़क पर पैदल चलने वालों को भी छतरी लगाने की अनुमति आरटीओ से अनुमति लेनी होगी? एलेक्जेंडर इस शोध कार्य के साथ एक यू ट्यूब क्राइम चैनल के लिए भी कार्य करते है।

आज कल की चमक धमक से दूर एलेक्जेंडर द्वारा  शांति पूर्वक अपने शोध कार्य मे लगे हुए  है। मैंने उनके कार्यों और इच्छित मनोरथों को प्राप्त करने की ईश्वर से प्रार्थना करने और उनको अपने प्रिय पपी के साथ  हिमालय पर्वत की श्रंखला के भ्रमण हेतु मंगल कामनायेँ  व्यक्त  करते हुए विदा ली।

विजय सहगल