"चीन का विस्तार वाद"
ईसा पूर्व 6वी शताब्दी मे भगवान बुद्ध की
शिक्षाओं का प्रसार एवं विस्तार भारत से पूरे भारतीय उपमहादवीप सहित जम्बू
महाद्वीप के जापान, वियतनाम,
थाई लैंड, भूटान,
तिब्बत, म्यान्मार,
सिंगापूर, लाओस,
दक्षिण कोरिया, श्री लंका सहित चीन मे
भी हुआ। भगवान बुद्ध की शिक्षाओं को इन देशों के जन नेताओं सहित सामान्य जनों ने पूर्ण समर्पण,
निष्ठा और विश्वास के साथ स्वीकार किया और उनके बताए पथ पर निरंतर आज भी अग्रसर है
सिवाय चीन देश के अपवाद के। चीन देश के बहुतायत जनसंख्या एक ओर जहां भगवान बुद्ध
के बताये मार्ग दुःख, दुःख निवारण,
अहिंसा के माध्यम से सम्यक द्रष्टि,
संकल्प, वाणी और कर्म के माध्यम
आगे बढ़ने का संकलप लेते है पर न जाने क्यों और कैसे चीन के जननायक,
लोकनायक और सरकारें इन शिक्षाओं के विपरीत
आचरण कर बुद्ध धर्म के विस्तार के विपरीत येन केन प्रकारेण भू विस्तार कर रही है। चीन को छोड़ कर दुनियाँ के लगभग सारे
देशों के राष्ट्र प्रमुख अहिंसा, शांति,
सद्भाव और सहअस्तितिव की राह पर चल दुनियाँ मे शांति स्थापित करने मे प्रयासरत
है पर बौद्ध अनुयाई बाहुल चीनी नेताओं ने अपने देश
की आमजनता के विचारों, भावनाओं स्वभाव
के विपरीत अपने कुत्सित भू विस्तार नीति के तहत अपने 23 से ज्यादा पड़ौसियों की
भूमि हड़पी है जिनमे तुर्किस्तान, मंगोलया,
मकाऊ, ताइवान,
होंगकोंग, भारत,
पाकिस्तान सहित नेपाल है। आश्चर्य तो इस बात
का है इस चीनी देश की सीमाएं सिर्फ 14 देशों से लगती है पर सीमा विवाद 23 देशों से
है। पर तिब्बत के मामले मे तो "चोरी
और सीना जोरी" की कुटिल नीति के तहत "शेर और मेमने" की कहानी की
तर्ज़ पर पूरा का पूरा तिब्बत देश ही हड़प कर तिब्बत के राष्ट्र प्रमुख श्री दलाई
लामा सहित लाखों तिब्बतियों को शरणार्थियों की तरह दुनियाँ के अनेक देशों मे रहने
को मजबूर कर दिया है। इसी क्रम मे अब होंग्कोंग देश का नंबर है। कैसे चीनी राष्ट्र
प्रमुख शी चिंफिन के नेतृत्व मे कोरोना-कोविड 19 नामक महामारी का सृजन जैव रसायनिक
हथियार के रूप मे कर सारी दुनियाँ को संकट मे डालने का पाप किया है। दुनियाँ मे
पाँच लाख लोगो की असमय मृत्यु जो वास्तव मे मृत्यु न होकर दिन दहाड़े हत्या है और
इन पाँच लाख लोगो की जघन्य हत्या से बहे
खून से शी चिंन फिन्ग जैसे नरपिशाच
के हाथ और मुँह रंगे है। लाशों के ढेर पर अट्टहास कर खुश होने बाले इस भूविस्तार
वादी, कलुषित,
भू विस्तारक माफिया के पाप का घड़ा अब भर चुका है। भारत सहित दुनियाँ के सारे देश
भी आज एकजुट हो चीन की इस विस्तार वादी नीति के नाश के लिये उसी तरह आमदा जैसे
भगवान श्री कृष्ण ने श्रीमद्भगवत गीता के निम्न श्लोकों मे उद्धरत किया है:-
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम्।।4.7।। |
।।4.7।। हे भरतवंशी अर्जुन! जब-जब धर्मकी हानि और अधर्मकी वृद्धि होती है,
तब-तब ही मैं अपने-आपको साकाररूपसे
प्रकट करता हूँ।
|
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।4.8।। |
।।4.8।। साधुओं-(भक्तों-) की रक्षा करनेके लिये, पापकर्म करनेवालोंका विनाश करनेके लिये और
धर्मकी भलीभाँति स्थापना करनेके लिये मैं युग-युगमें प्रकट हुआ करता हूँ।
|
गलवान मे देश के लिये बलिदान हुए बहादुर
सैनिकों पर आज सारा देश गर्व कर रहा है। प्रांत भाषा,
क्षेत्र के परे आज हर देशवासी इन वीरों के बलिदान से वैसे ही दुःखी और शोकग्रस्त
है जैसे उसके ही परिवार का कोई वीर सपूत देश की रक्षा हेतु अपने प्राणों की आहुती
दे कर शहीद हुआ हो। भारत भूमि के सर्वोच्च प्रमुख राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री,
रक्षा मंत्री तीनों सेनाओं के प्रमुख के साथ तीनों सेनाओं के प्रमुख एवं देश और
प्रांत के गणमान्य नायकों और नागरिकों ने भी सेना के इन बलिदानी जवानों को अपने
श्रद्धा सुमन अर्पित किये। कर्नल संतोष जो
कि गलवान घाटी के कम्मांडिंग ऑफिसर थे सैनिकों की अगुआई करते अपने मातृभूमि की रक्षा
करते अपने प्राणों की बाजी लगा दी। कटिहार का जवान कुन्दन हो या रीवा का युवा
सिपाही दीपक, कांकेर छत्तीसगढ़ का
जांबाज गणेश हो या पंजाब का गुरुतेज और गुरुविंदर सहित सभी 20 सैनिकों ने अपने
अदम्य साहस और बहदुरी से दुश्मन सेना के 43 सैनिकों को मार देश की रक्षा करते हुए
अपने प्राणों की आहुति दे अमर हो गए। देश के इन बहादुर बहादुर सपूतों को नमन करने
इनके प्रांत और क्षेत्र की सीमाओं से परे देश के हर नागरिकों ने अपनी नाम आँखों से
इन्हे याद किया, देश के करोड़ों नागरिकों
ने गल्वान के इन वीर जवानों की शहादत की
अमरता और उनके जयकारों की हुंकार ने आसमान गुंजायमान कर दिया कदाचित ईश्वर भी अपनी
नम आँखों से इन बहादुर सपूतों को अपने देव लोक मे असमय आगमन के लिये वाध्य हुएँ
हों।
दूसरी तरफ हा शोक!! चीन देश का दुर्भाग्य
देखिये कि 140 करोड़ की आबादी बाला दुनियाँ का
सबसे बड़े देश की आम जनता तो दूर अपनी भू विस्तार वादी रुग्ण मानसिकता से
ग्रसित राष्ट्र प्रमुख शी जिन पिंग ने भी अपने देश के लिये मार मिटे 43 सैनिकों की
शहादत और बलिदान को द्रश्य या प्रिंट मीडिया मे श्रद्धांजलि तो दूर दुःख और अफसोस
के दो शब्द भी नहीं कहे। शायद ही कोई विडियो तो छोड़िए कोई फोटो भी इन मृत चीनी
सैनिकों की चीनी टीवी या अखबारों मे दिखाई गई हो। 140 करोड़ की आबादी बाला चीन देश
भगवान बुद्ध के धर्म, उपदेश,
शिक्षाओं के विस्तार को स्वीकार करता है पर उनके जन नायकों को अहिंसा,
शांति सद्भाव जैसी बौद्ध धर्म की शिक्षाओं के प्रचार,
प्रसार, विस्तार के विपरीत भू
विस्तार से प्रयोजन है। ये चीन देश के नागरिकों का दुर्भाग्य है कि ज़िंदगी भर के लिये स्वघोषित राष्ट्रपति शी जिन
पिंग के लिये उनके लिये गल्वान मे मारे गये 43 चीनी सैनिकों का बलिदान चीनी बाज़ार
मे बिकने बाली भोजन रूपी चिमगादड़ों,
मेढकों, छिपकली,
साँप, कुत्ते का मांस की तरह था जो शी चिन पिंग जैसे भू विस्तार वादी नेता के
उदर पूर्ति के भेंट चढ़ गये। जिस देश और उसकी आम रियाया अपने सैनिकों का बीरोचित
कृत् का सम्मान भी न कर सके उस देश की दुर्गति अवश्यसंभावी है और उसका विनाश भी सुनिश्चित
है।
दुनियाँ मे मात्र एक माँ ही ऐसी होती है जो
अपनी संतानों को अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करती है। चीन देश के उन 43 माँओं का
दुर्भाग्य देखिये देश के लिये मारे गये उनके लालों पर भी वे करूँ क्रंदन,
पीढ़ा रुदन न कर सकी उनका वज्राघात से भी बड़े इस दुःख और विलाप को चीनी सेनाओं द्वारा उन माताओं
के घरों के बाहर खींची लोहे की दीवारों के अंदर ही घौंट कर मार दिया। 140 करोड़ की आबादी बाला ये
कैसा देश है जहां देश की जनता अपने बंधु-बांधभों के बीरोचित विछोह के दुःखों का प्रकटीकरण भी सार्वजनिक रूप से न कर
सके?
चीन की भू विस्तारवाद
की नीति के विपरीत हम भारत के लोग "वसुधैवकुटुम्बकम" की नीतियों मे
आस्था और विश्वास करने बाले लोग है। चीनी शासकों के पिंजड़े मे कैद देश की 140 करोड़
जनता, फिर भले ही वो पिंजड़ा सोने का ही क्यों न हो, अपनी
आज़ादी से वंचित इन तानाशाही पूर्ण शासकों के अधीन घुट घुट कर जीने को मजबूर है। इस
अमानवीय तानाशाह पूर्ण व्यवस्था से लाख
गुना बेहतर है तमाम कमियों के बाबजूद दुनियाँ के अधिकांश देशों मे व्याप्त
लोकतंत्रित व्यवस्था, जिसमे समाहित है देश के प्रत्येक
नागरिक को अपनी भाषा, रहन सहन, खानपान
और अपनी आस्थाओं और विश्वास के अनुपालन एवं सबसे बढ़ कर अपने विचारों के अभिव्यक्ति
की आज़ादी। सार्वजनिक रूप से अभिव्यक्ति की आज़ादी एवं अनेकों नागरिक अधिकारों से
वंचित चीन देश के नागरिकों को हम अपनी इन
सद्भावनाओं और कामनाओं को ही प्रेषित कर सकते है, जिन
मानवीय भावों को देश के महान कवि
"श्री शिव मंगल सिंह सुमन" ने बहुत ही सुंदर शब्दों मे अपनी निम्न
पंक्तियों मे व्यक्त किया है:-
"हम
पंछी उन्मुक्त गगन के
पिंजरबद्ध न गा पाएँगे,
कनक-तीलियों से टकराकर
पुलकित पंख टूट जाऍंगे।
पिंजरबद्ध न गा पाएँगे,
कनक-तीलियों से टकराकर
पुलकित पंख टूट जाऍंगे।
नीड़
न दो, चाहे टहनी का
आश्रय छिन्न-भिन्न कर डालो,
लेकिन पंख दिए हैं, तो
आकुल उड़ान में विघ्न न डालो।" (रचियता- श्री शिव मंगल सिंह, सुमन)
आश्रय छिन्न-भिन्न कर डालो,
लेकिन पंख दिए हैं, तो
आकुल उड़ान में विघ्न न डालो।" (रचियता- श्री शिव मंगल सिंह, सुमन)
विजय सहगल



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