गुरुवार, 30 मार्च 2023

सोने के आलू/आलू का सोना


"सोने के आलू"/"आलू का सोना"!!







अब जबकि थिण्ड्लु गाँव (सरजपुर, बेंगलुरु) का प्रवास समाप्ति की ओर अग्रसर है लेकिन थिण्ड्लु गाँव की यादें सालों साल मस्तिष्क के मानस पटल से ओझल होने वाली नहीं है। एक आदर्श ग्राम की कल्पना पर थिण्ड्लु गाँव हर पैमाने पर खरा उतरा है!! अतः ये कहना अतिशयोक्ति ने होगी कि आदर्श गाँव की खोज, थिण्ड्लु ग्राम मे आकर समाप्त होती है। ग्रामवासियों की जिजीविषा मात्र आर्थिक संपन्नता और विलासिता पूर्ण जीवन जीने के लिए नहीं अपितु पारवारिक और सामाजिक जीवन मे मन की शांति और सुकून का समावेश भी अंतर्निहित है।

आज 27 मार्च 2023 को प्रातः भ्रमण के दौरान मैंने गाँव की पगडंडी से होते हुए जब खेत मे एकत्रित हुए कुछ ग्राम वासियों को देखा तब दोनों हाथों को नमस्कार की मुद्रा मे उठा इन ग्रामीणों को "सुभाष्य गड़ू" (नमस्कार) कहा तो उनके चेहरे पर खिली मुस्कान ने मेरे मन को भी आनंदित कर दिया। ये सभी खेतिहर मजदूर थे जो किसान श्री श्री निवास के खेत से आलू निकालने के लिए आए थे। बैसे एक परिपक्व राजनेता  की आलू से सोना बनाने की विधि से देश का हर व्यक्ति वाकिफ है। लेकिन वास्तव मे एक किसान के खेत मे जब भरपूर फसल हो फिर चाहे फसल गेहूँ की हो, चना या फिर भले ही आलू की ही क्यों ने हो, किसान के लिए सोना ही होती है।  तभी तो 1967 की "उपकार" फिल्म मे श्री महेंद्र कपूर द्वार गाये, कालजयी गीत "मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती" की शब्द रचना  स्व॰ श्री इंदीवर द्वारा की गयी थी।

एक हल धर किसान अपने हल से आलू की दो नालियों के बीच हल से खेत की गहरी जुताई कर रहा था ताकि मेढ के नीचे से  आलू रूपी सोना, जमीन के नीचे से बाहर निकाल सके। हल से चार पाँच नालियों की जुताई हो चुकी थी। अब बारी थी निकले हुए आलू को बोरियों मे इकट्ठा  कर एक स्थान पर एकत्रित करने की। इस हेतु लगभग 20 खेतिहर दिहाड़ी मजदूर खेत के एक सिरे पर बैठ  आलू की खुदाई करने हेतु तत्पर थे। मुझे देखते ही कुछ मजदूरों ने फोटो-फोटो कह कन्नड़ भाषा मे कुछ कहा। सिवाय फोटो के मुझे कुछ समझ न आया पर उनके आशय को समझते देर न लगी। इन मजदूरों की फोटो लेना देख, हल चला रहा कामगार भी अपनी  फोटो लेने हेतु कन्नड भाषा मे चिल्लाया। तब उसकी फोटो लेना तो लाज़मी बनता था।  इस हेतु उसने सिर पर अंगौंच्छे को बांध कर किसी फिल्मी अभिनेता की तरह अभिनय की मुद्रा मे खड़ा हो गया। 

कुछ तस्वीरों के बाद हमरी मुलाक़ात कृषि भूमि के मालिक श्री निवास जी से हुई जो एक पढे लिखे अनुभवी किसान थे। उन्होने बताया कि  प्रत्येक कामगार को 400/- रुपए की मजदूरी का भुगतान किया जाएगा। उन्होने बताया कि बैलों से जुताई कर रहे हल को आमने-सामने की दिशा मे चलाने के बाद, आड़े (बाएँ से दायें तरफ)  मे भी हल को चलाया जायेगा ताकि आलू की खुदाई को  पूरी तरह से किया जा सके। आलू खुदाई की  पूर्व तैयारी मे श्री निवास जी के तेज कदम इस बात के संकेत थे कि इन खेतिहर श्रमिकों द्वारा खेत से निकाले गये आलू को यथा स्थान रखने की तैयारी मे कंही कोई कमी न रह जाए। इस हेतु उन्होने खेत के बाहर लगभग 7-8 X 20-22 फुट का एक समतल स्थल बनाया हुआ था जिसके चारों ओर मेढ बनाकर रोका गया था ताकि आलू मैदान मे चारों ओर न बिखर जाए। इतनी व्यस्तता के चलते भी मैंने उनसे  एक फोटो देने का आग्रह किया, जिसमे वे उस समतल चबूतरे के एक सिरे पर खड़े 20-30 किलो के आलू के ढेर के पास खड़े थे। मैंने उनसे जब खेतों से निकले इन आलुओं को समतल चबूतरे पर न डाल सीधे बोरियों मे भरने के औचित्य पर सवाल किया? तो उन्होने बताया एक-दो दिन आलू को यहीं समतल चबूतरे पर खुला छोड़ने के बाद ही इसे मंडी मे बिक्रय हेतु भेजा जायेगा। श्री श्री निवास की आलू की फसल को 1-2 दिन इस तरह खुले मे रखने की बात का क्या औचित्य था मुझे समझ न आया? कोई कृषि वैज्ञानिक या कृषि स्नातक इस विषय मे शायद  कुछ प्रकाश डाल सकें तो स्वागत है? क्योंकि तीसरे दिन मैंने स्वयं उनके खेत मे उस समतल चबूतरे पर पड़े आलू के पहाड़ की फोटो ले इसकी पुष्टि भी की।  

श्री निवास ने बातचीत मे बताया कि हौसूर (तमिलनाडू) की मंडी मे 50 किग्रा॰ की बोरी के उसे 600/- रुपए मिलेंगे अर्थात 1200/- रुपए कुंटल के हिसाब से आलू की फसल की कीमत उसे प्राप्त होगी। फिलहाल बाज़ार मे इस तरह के उच्च गुणवत्ता वाले  आलू का खुदरा मूल्य 20 रुपए प्रति किलो है। बात चीत के दौरान मुझे इस बात के बारे मे जानकर और भी आश्चर्य हुआ कि वह आलू के बीज को पंजाब के जालंधर से मंगाते हैं।    

यदि अन्य शहरों मे आवास के लिए जीवन की आपा-धापी, भागम-भाग और गला-काट प्रतियोगिता की शर्त पर कुछ आर्थिक तरक्की मिले भी तो इस ग्रामीण जीवन मे प्रदूषण रहित जीवन के साथ आवश्यक अनुकूल जलवायु, खुशनुमा मौसम और संतुष्ट ग्राम वासियों के पुरुषार्थ देखने का, ये थिण्ड्लु गाँव, एक आदर्श उदाहरण हो सकता है। थिण्ड्लु गाँव से मै विजय सहगल किसी नई कहानी के साथ  फिर मिलेंगे। "सुभाष्य गड़ू" (ಶುಭಾಶಯಗಳು)

विजय सहगल       

 


शनिवार, 25 मार्च 2023

बाबा हरभजन सिंह मंदिर-सिक्किम

 

"बाबा हरभजन सिंह मंदिर-सिक्किम"







13 नवम्बर 2022 को सिक्किम के जुलूक गाँव से प्रातः आठ बजे प्रस्थान हो चुका था। रात मे पूरे क्षेत्र मे थोड़ी से बर्फ पड़ चुकी थी। पूरे साल सर्दी वाले इस क्षेत्र मे थोड़ी और सर्दी  बढ़ा दी थी। नरम बर्फ के कारण कहीं कहीं गाड़ी के टायर फिसलने से थोड़ी चिंता जरूर हो रही थी कि यात्रा मे आगे ज्यादा व्यवधान न हो। पर ईश्वर की कृपा रही आगे कोई बहुत ज्यादा समस्या नहीं आयी।

दूर पहाड़ी  पर चटक रंग-बिरंगी  चमकती कुछ इमारतों दिखाई दी जो बाबा हरभजन सिंह के मंदिर की इमारतें थी। यूं तो देश मे अनेक देवी, देवताओं के मंदिर है पर देश मे ये एक मात्र मंदिर है  जो किसी सैनिक के नाम से नाथुला दर्रे के पास भारत चीन की सीमा के नजदीक बना है। जहां पर न केवल सैनिक बल्कि  दूर दूर से लोग अपने इस इस बहादुर सैनिक के दर्शन हेतु आते है। ऐसी मान्यता है कि बाबा हरभजन सिंह अपनी शहादत के बाद भी अपनी नौकरी कर रहे है।  इन सर्दीली हवाओं के बीच आज हमारी यात्रा का लक्ष्य भी  भारत चीन सीमा के नजदीक स्थित बाबा हरभजन सिंह जी के मंदिर के दर्शन करना था। बाबा हरभजन सिंह की कहानी बड़ी अद्भुद और आश्चर्य करने वाली है। 30 अगस्त 1946 गुज़राबाला (आज के पाकिस्तान) मे जन्मे बाबा हरभजन सिंह फरवरी 1966 मे भारतीय सेना की पंजाब रेजिमेंट मे सिपाही के रूप मे भर्ती हुए थे। 1968 मे अपनी पूर्वी  सिक्किम पदस्थपना के दौरान एक दिन सेना के कुछ घोड़ों के काफिले के साथ सेना की एक पोस्ट पर जा रहे थे। अचानक पैर फिसलने पर वे नीचे बह रहे एक नाले मे गिर गये। उनका शव पानी की तेज धाराओं से घटना स्थल से 02 किमी॰ जा पहुंचा। लगातार पाँच दिन की कोशिश के बाद जब उनका कोई पता न चला तो उनको लापता घोषित कर दिया गया। तभी एक आश्चर्य चकित अद्भुद घटना घटी। उनके एक साथी को सपने मे बाबा हरभजन सिंह ने अपनी मृत्यु का घटना क्रम बता अपने मृत शरीर के स्थान की जानकारी दी और अपनी समाधि बनाने की ईक्षा व्यक्त की!! पहले तो सेना के अधिकारियों को सपने के इस घटना क्रम पर विश्वास नहीं हुआ पर जब  कुछ सैनिक उस स्थान पर पहुंचे तो देख हैरान थे कि सपने वाले स्थान पर ही सिपाही हरभजन सिंह का पार्थिव शरीर पड़ा मिला। इसके चलते ही सैनिक अधिकारियों ने उनके मृत शरीर की अन्त्येष्टि कर उस स्थान पर समाधि का निर्माण किया जो आज बाबा हरभजन सिंह के मंदिर के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि मृत्यु के बाद भी बाबा हरभजन सिंह पूरी मुस्तैदी के साथ अपनी ड्यूटि करते है और चीनी सैनिकों की गतिविधियों पर अपनी पैनी नज़र रखते है और समय समय पर अपनी यूनिट को सतर्क भी करते है। इन्ही सब गतिविधियों के कारण लोगो और सैनिकों की आस्था और विश्वास बाबा हरभजन सिंह के प्रति और भी प्रगाढ़ एवं मजबूत हो गया। सेना द्वारा भी अन्य सैनिकों की तरह हरभजन सिंह को वेतन, छुट्टी, वेतन वृद्धि सहित अन्य सैनिक सुविधाएं उनकी शहादत के बावजूद भी प्रदान की जाती रहीं लेकिन अब वे सेवानिवृत्त हो चुके है।  एक शहीद  सैनिक के प्रति श्रद्धा और सम्मान का अपने आप मे एक इकलौता उदाहरण है जब सेना द्वारा अपने इस बहादुर शहीद सैनिक को  लगातार वेतन भत्ते और अन्य सुविधाओं के साथ मरणोपरांत कैप्टन की उपाधि से भी सुशोभित किया।      

भारत चीन सीमा पर काली चमकदार डम्मर की पक्की सड़कों को देखना मन को सुकून और सुरक्षा का अहसास देने वाला था। एक ऊंची छोटी पहाड़ी पर बाबा हर भजन सिंह की छोटी से बंकर  को आज भी जस के तस अक्षुण्ण रक्खा गया है जिस पर  छोटी छोटी 20-25 सीढ़ियों से होकर पहुंचा जा सकता है। बमुश्किल 8x6 फुट की बंकर  मे एक तरफ उन की  चारपाई पर साफ सुथरी करीने से लगी शैया सजी थी उसके विपरीत दीवार पर उनकी प्रेस की हुई वर्दी व नीचे रैक मे पॉलिश किए हुए चमकदार शूज रक्खे थे। ऐसा बताया गया कि हर रोज उनकी वर्दी पर प्रेस और जूतों पर पॉलिश कर चारपाई की विच्छावन को एक सा रक्खा जाता है जो दूसरे दिन कुछ गुढ़ी-मूढ़ी अवस्था मे सिलवट लिए मिलती है। ऐसी मान्यता है कि बाबा हरभजन सिंह आज भी सीमा की निगरानी के बाद विश्राम के लिए अपनी बैरक मे अब भी  आते है। बैरक के नीचे ही उनका मंदिर बनाया गया है ऐसी किवदंती है कि मंदिर मे  पानी की बोतल अर्पित करने के बदले मिली बोतल के पानी को सच्ची श्रद्धा और विश्वास के साथ 21 दिन बाद उस जल के सेवन से कई तरह की बीमारियाँ दूर हो जाती है। इस पुराने मंदिर से निकलने वाला हर वाहन यहाँ रुक कर बाबा को अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करता है।

हर रविवार और अन्य धार्मिक त्योहारों पर बाबा हरभजन सिंह के इस मंदिर पर लंगर का आयोजन किया जाता है। सौभाग्य से आज भी जब हम यहाँ से निकले तो प्रातः से ही आयोजन की तैयारी हो रही थीं। सेना की गाड़ियों के काफला सड़क के एक ओर खड़ा था जिसमे लंगर का राशन और रसद रक्खा हुआ था। टेंट लगाए जा चुके थे। कुछ सैनिक हमारे सहित, हर आने जाने वाले वाहनों को चाय, टोस्ट, बिस्कुट तथा मैगी को प्रसाद के रूप मे बड़े सम्मान और आदर के साथ वितरित कर रहे थे। हम धनभागी थे कि गुरु के इस लंगर मे सहभागी होने का हमे सौभाग्य प्राप्त हुआ।

यात्रियों, श्रद्धालुओं और पर्यटकों की सुविधा के लिये 11 नवम्बर 1981 को   इस पुराने मंदिर के स्थान से 9 किमी॰ आगे नथुला दर्रे की ओर  बाबा हरभजन सिंह के  एक नए मंदिर का निर्माण कराया गया है क्योंकि यहाँ तक आने के लिये पर्यटकों को पर्मिट की आवश्यकता होती है।        

जब आज के समय हमारे सुरक्षा कर्मी कितनी विपरीत और कठिन परिस्थितियों मे देश की सुरक्षा के जज्बे के साथ अपने कर्तव्य मे रत है तब सोंचे कि आज सी 55 वर्ष पूर्व बाबा हरभजन सिंह अपने सैन्य साथियों के साथ कितनी असुविधाओं और संसाधनों के बिना भी देशभक्ति के जज्बे के साथ कैसे देश की सीमाओं की रक्षा करते होंगे। बाबा हरभजन सिंह जी के इस मंदिर के बारे मे मैंने पढ़ा था जब मै दस वीं का छात्र था। आज इस मंदिर के दर्शन बचपन मे पली अभिलाषा के पूर्ण होने का संकल्प था। मै बाबा हरभजन सिंह जी को अपने श्रद्धा सुमन अर्पित कर उनकी बहदुरी और देशभक्ति को नमन करता हूँ।

विजय सहगल    

 

बुधवार, 22 मार्च 2023

उगादिया सुभाष्यागड़ु

 

"उगादिया  सुभाष्यागड़ु" ("ಯುಗಾದಿಯ ಶುಭಾಶಯಗಳು")












यूं तो प्रति वर्ष की भांति इस वर्ष भी चैत्र नवरात्रि, गुड़ि पड़वा, नवसंवत्सर, चेटी चांद और उगादि पर्व मनाया गया पर आज चैत्र शुक्ल प्रतिपदा विक्रम संवत 2080 तदानुसार 22 मार्च 2023 को कर्नाटक के गाँव "ठिन्द्लु" मे  मनाये जाने वाले उगादि पर्व मेरे लिये विशेष था। आज का पारंपरिक प्रातः भ्रमण स्थगित था जिसके बदले गाँव की गलियों मे सुबह सुबह उगादि त्योहार के अवसर पर हर घर मे चल रही तैयारियाँ को देखने-परखने का विशेष दिन था। छोटे से गाँव की गलियों मे एक अजनबी को पहचानना कठिन नहीं था, अतः समस्या ये थी कि एक बाहरी व्यक्ति के नाते ग्रामीण वासियों से अपने आप को कैसे जोड़ा जाये? ताकि एक अजनबी होने की पहचान का ठप्पा सहज और सरल किया जा सके। इस हेतु सूचना तकनीकि ने मेरी सहायता की। गूगल अनुवाद के माध्यम से मैंने "उगादि की शुभकामनायें" का कन्नड अनुवाद ("ಯುಗಾದಿಯ ಶುಭಾಶಯಗಳು"), "उगादिया  सुभाष्यागड़ु" को याद कर लिया। अब क्या था घर के सामने उगादि के तैयारी मे खड़े बच्चे, बड़े, बच्चियों और महिलाओं को जब  "उगादिया  सुभाष्यागड़ु" बोला तो मै उनके लिये एक अजनबी नहीं था। कुछ लोगो ने प्रत्युत्तर मे "सुभाष्या" किसी ने "थैंक यू" और किसी ने "सेम टू यू" कह मुस्करा कर अभिवादन किया। कुछ छोटे छोटे बच्चे जब  "उगादिया  सुभाष्यागड़ु"  कह मुस्करा कर खड़े रह जाते तो उनके पिता बच्चे को "थैंक यू अंकल" कहने को प्रेरित करते। आप विश्वास मानिए एक छोटे से कन्नड वाक्य "उगादिया  सुभाष्यागड़ु"  के कारण मै बड़ी आसानी से उनके साथ घुल मिल गया।

यूं तो गाँव के घरों मे हर रोज रंगोली डालने/बनाने की परंपरा है। पर आज तो कन्नड नव वर्ष उगादि का विशेष अवसर था। आज तो हर घर मे लोगो को उगादि का उत्साह देखने को मिला। समान्यतः गाँव मे आने जाने वाले स्कूल वाहन उगादि अवकाश के कारण बंद थे। ग्रामीण वासी साइकल, स्कूटी पर आम, नीम और केले के पत्ते लाते-लेजाते दिखे। कुछ  घरों  के बाहर पानी से धुलाई कर, घर की महिलाओं और बच्चियों द्वारा  रंगोली बनाई जा चुकी थी और कुछ घरों मे इसे बनाने की तैयारी चल रही थी। प्रायः गाँव के हर घर मे बंधी गायों को स्नान करा कर माथे से लेकर पूंछ तक जगह जगह हल्दी और रोली से तिलक किया जा रहा था। गाय के पैरों मे भी इसी तरह हल्दी कुमकुम का चन्दन लगाया गया था जो सनातन धर्म मे गाय मे 33 करोड़ देवताओं के वास की हमारी मान्यता को दृढ़ करता है। मैंने कुछ घरों मे बनी रंगोली को अपने मोबाइल मे कैद किया और रंगोली बनाने बाली बच्चियों और महिलाओं की मुक्त कंठ से प्रशंसा की। कुछ घरों मे ज्योमिति से शानदार रंगोली बनाई गयी थी तो कहीं रंगोली मे सिद्धहस्त महिलाओं ने फ्री हैंड से चावल के आटे से अपनी कल्पना से तुरंत लाइन और वृत्त/अर्धवृत्त से सुंदर रंगोली बनायी। कुछ घरों मे रंगोली के बीच रंग बिरंगे फूलों को केंद्र मे स्थापित कर रंगोली की सुंदर मे चार चाँद लगा दिये थे। कुछ रंगोलियों मे बच्चे "हैप्पी उगादि" लिखना न भूले!! रंग बिरंगी बेलों, फूलों और पत्तियों के बेल बूटे देखते ही बनते थे।  हर घर मे आम के पत्तों से बनाए बंदन वार से सजाया गया था। बच्चों को गुड़ के पकवान के साथ नीम की पत्तियों को देने की प्रथा है जो इस बात का प्रतीक था कि जीवन मे आने कड़ुवे मीठे क्षणों को सहजता से लेने और जीने का संदेश हो।

एक ग्राम वासी श्री सुरेश तो मुझे अपने घर ले गये और उगादि के अवसर पर बनाई जाने वाली मीठी रोटी जिसे हमारे यहाँ "पूरंपूरी" कहा जाता है खिलाई। स्वादिष्ट कॉफी पिलाने के बाद अपने खेत से लाई लगभग एक-डेढ़  किलो बीन्स बिदाई स्वरूप दी। इस मेहमानबाजी की एक खास   सबसे बड़ी बात ये थी कि श्री सुरेश हिन्दी और अँग्रेजी से पूरी तरह अनिभिज्ञ थे और मै सिवाय "उगादिया  सुभाष्यागड़ु" के अलावा कन्नड मे ज़ीरो था। लेकिन शायद प्राचीन काल मे चेहरे के हाव भाव, आँखों से  बोलने और हाथ के इशारे ही दो अजनबी सभ्यताओं सांस्कृतियों और भाषा के व्यक्तियों के बीच कहने, जानने समझने के माध्यम रहे होंगे। ये मेरे जीवन का एक अजीब रोमांचित अनुभव था जिसे शब्दों मे ब्याँ करना कठिन है।          

शाम के समय एक चल समारोह सारे गाँव मे निकाला गया। गाँव के ही एक प्रबुद्ध निवासी श्री  श्रीनिवास जी से मुलाक़ात हुई। उन्होने बताया कि हमारे परिवार द्वारा हर वर्ष उगादि पर हमारे पूर्वजों द्वारा बनाए भगवान आंजनेय के मंदिर से एक रथ यात्रा गाँव मे निकाली जाती है। इस परंपरा को दो सौ साल से भी ज्यादा का समय हो चुका है। सात घोड़ो के रथ पर भगवान आंजनेय की प्रतिमा को फूलों के सजे सिंहासन पर विराजित कर  नगर भ्रमण के लिए ले जया जा रहा था। रथ के आगे एक ट्रैक्टर मे कर्नाटक शास्त्रीय संगीत के प्रवीण और पारंगत संगीतज्ञ नाद स्वरम और मृदंगम बजा रहे थे। एक अलौकिक और दिव्य वातावरण मे मंगल ध्वनि के बीच भगवान आंजनेय की रथ यात्रा जिस घर के सामने से निकलती घर की महिलाएं और पुरुष एक थाली मे पुष्प, नारियल, केले और अन्य वस्तुओं से भगवान को अर्पित कर भगवान की आराधना करते। रथ मे सवार पुरोहित थाली मे उपस्थित फल, फूलों को भगवान को अर्पित कर गरुढ़ घंटी से ध्वनि कर उनकी आरती उतार ईश्वर का प्रसाद आशीर्वाद के रूप मे घर के स्वामी को वापस कर देता। कुछ दूर तक मै भी इस चल समारोह मे अपनी सहभागिता कर इस प्राचीन रथ यात्रा की परंपरा  का गवाह बन अपने को धन्य भागी माना।

दक्षिण भारत के एक छोटे से गाँव ठिन्द्लु मे उगादि पर्व पर शामिल होना मेरे लिये एक तीर्थ यात्रा से कम न थी। अपने सभी पाठकों को पुनः एक बार उगादि की शुभकामनायें अर्थात "उगादिया  सुभाष्यागड़ु"।

विजय सहगल       

शुक्रवार, 17 मार्च 2023

बेंगुलुरु का ग्रामीण पर्यटन

 

"सरजापुर, थिन्ड्लु ग्रामीण पर्यटन"












1 मार्च 2023 से सरजापुर, बेंगलुरु क्षेत्र के ग्रामीण पर्यटन ने पिछले लगभग 15 दिन मे मेरा मन मोह लिया। यह कोई धार्मिक, इतिहासिक, प्राकृतिक या कोई चुनौती पूर्ण पर्यटन स्थल नहीं था फिर भी क्षेत्र के मौसम, लोगो के मिजाज और क्षेत्र की समृद्धि देखते ही बनती थी लेकिन क्षेत्र मे उत्तम कानून व्यवस्था की स्थिति ने सोने मे सुहागे का काम किया। बेंगलुरु के बाहरी क्षेत्र और ग्रामीण परिवेश से घिरे इस क्षेत्र मे भी बेंगलुरु के विकास की बयार बहने लगी है। बड़ी संख्या मे अवसीय इमारतों ने  इस क्षेत्र मे विकास की गाथा लिखनी शुरू कर दी है।

अपने ठहरने के स्थान से भ्रमण हेतु मैंने हर दिन एक नये रास्ते का अनुसरण किया। कभी सड़क से कभी कच्चे रास्ते से तो कभी पगडंडी और कभी खेतों की मेड़ से होते हुए गुजरने  का अहसास किसी आज़ाद पंछी की तरह आसमान मे  उड़ने से कम न था। सुबह की सर्द हवाओं मे एक पतली जैकिट या स्वेटर का साथ लगातार उत्तर भारत की गुलाबी सर्दियों का अहसास कराता रहा। वाहनों की गहमा गहमी से दूर महानगर के शोर और प्रदूषण से मुक्त कच्ची पगडंडी पर जब सुबह के छह बजे  विविध भारती पर भक्ति संगीत और संगीत सरिता  के बाद "भूले-बिसरे गीतों" और "हम है राही प्यार के"  नगमों को सुनते हुए मीलों, सुनसान रास्तों पर चलने के साथ का  सुखद अहसास हो तो  शब्दों मे ब्याँ करना मुश्किल हो जाता है। एक स्वप्निल आदर्श गाँव की परिकल्पना के साथ जीने का स्वर्गिक आनंद अविस्मरणीय रहा।

सरजापुर से होसकोट और हौसूर रोड के बीच वसे इन गाँवों  मे ग्रामवासियों की समृद्धि की कहानी कदम कदम पर देखने को मिली। गाँव के लगभग हर घर  मे 3-4 उत्तम नस्ल की काली सफ़ेद गायें देखने को मिल जाएंगी। उत्तर भारत मे जहां आये दिन "अमूल्य दूध" की बढ़ी कीमतों से नागरिक भले ही दुःखी रहते हों पर यहाँ दूध उत्पादन और उसकी  उपलब्धता का अंदाज़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि "नंदनी मिल्क समिति" का पैकेट दूध 45 रुपए लीटर मे उपलब्ध है। यदि आप प्रातः भ्रमण के साथ निजी दूध डेयरी से दूध लाने मे सक्षम है तो दूध का रेट 35-37 प्रति लीटर मे  भी सुलभ है। हर गाँव मे दूध संग्रह केंद्र ग्राम वासियों की आर्थिक समृद्धि मे मील का एक पत्थर साबित हो रहे है। 7 मार्च 2023 को होलिका दहन के दिन गाँव मे लकड़ी और सूखे चारे की व्यवस्था तो हो गयी पर गाँव के घरों से गाय के गोबर के उपले अर्थात कंडे  मिलना दूभर हो गया क्योंकि सभी ग्राम वासी गाय के गोबर को अपने खेतों मे जहां तहाँ एकत्रित कर कम्पोस्ट खाद के रूप मे उपयोग करते नज़र आये।  फिर क्या था परंपरा तो निभानी थी, सड़क किनारे पड़े गाय के सूखे गोबर को एक थैली मे भर कर होलिका दहन के लिए गाय के गोबर के उपलों/कंडों  की औपचारिकता पूरी की जिसे पड़ौस की एक महिला ने अपनी सिद्धहस्त रंगोली से और भी सुंदर बना दिया।

गाँव के बाहरी क्षेत्रों मे जहां तहाँ लंबे चौड़े गड्ढे खोद कर वारिस के पानी की झीलों के निर्माण के कारण न केवल प्रवासी पक्षियो का डेरा है बल्कि खेतों की सिंचाई हेतु नलकूप के माध्यम से पानी, सहजता से उपलब्ध है। गाँव के हर घर जल के अंतर्गत पानी के नल का कनैक्शन भी उपलब्ध कराया गया है। यध्यपि कर्नाटक मे किसी भी दल की सरकार की ईमानदारी पर हमेशा सवालिया निशान रहे है पर ग्रामीण क्षेत्रों मे पीने के स्वच्छ "आर॰ओ॰" पानी को  महज 5/- रुपए मे 25 लीटर पानी का जार उपलब्ध कराने की व्यवस्था की  जितनी भी प्रशंसा की जाये कम होगी। निश्चित ही इस "स्वच्छ जल योजना" से ग्रामीणों को अनगिनित जल जनित बीमारियों से बचने मे महत्वपूर्ण योगदान है।  जिसका सफल संचालन  मैंने थिण्ड्लु, एमसी हल्ली, कुन्दन हल्ली और सरजापुर  गाँव मे देखा। यूं तो परंपरागत धान, ज्वार की खेती के अतिरिक्त सब्जी की खेती की पैदावार को तो सारे देश मे जगह जगह देखा जा सकता है, आम, चीकू, अमरूद, नारियल की बागवानी को यहाँ देखने को मिली  जो  यहाँ के किसानों की उन्नतशील खेती और प्रगतिशील सोच को दर्शाता  है। पर फूलों की खेती और सिल्क के कीड़ों को पालन इस क्षेत्र के किसानों के पुरुषार्थ को बाकी से अलग रखता है। सड़क किनारे इमली के पेड़ों की बहुतायत देखने को मिली तो जरूर पर पेड़ों पर लदी पकी इमिलियों को देखने से लगता नहीं था कि इस कृषि उपज को लोग अपनी अतिरिक्त आय के लिए उपयोग मे लाते,  अन्यथा सड़क किनारे पैरों तले या वाहनों से रौंदी जा रही इमली के फलों की ये दशा देखने को न मिलती। खेत, खलिहानों और बगानों मे आवश्यक रूप से  ड्रिप इरीगेशन (बूंद बूंद सिचाई) का उपयोग भी यहाँ के किसानों की  आधुनिक वैज्ञानिक सोच को समान रूप से दर्शाता दिखा।

गाँव के प्रायः हर घर मे दो-तीन उच्च श्रेणी के निजी, टैक्सी या स्कूल वाहन बेंगुलुरु की यातायात व्यवस्था के सुचारु संचालन मे  अतिरिक्त रोजगार उपलब्ध कराने मे महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे है। गाँव मे शायद ही कोई घर  बेरोजगारी की समस्या से ग्रस्त नज़र आया हो।          

5 मार्च 2023 को  प्रातः भ्रमण मे केरल के एक सूचना तकनीकि इंजीनियर श्री गिरीश से भेंट हुई जो रविवार को साठ हज़ार रुपए की वार्षिक लीज़ पर ली गयी कृषि योग्य भूमि पर फूलों की खेती करवाते नज़र आये। उन्होने बताया पीले और सफ़ेद गुलबहार फूल साप्ताह मे  एक दिन 7-8 मजदूरों को लगा कर यहाँ से नजदीक हौसूर फूल मंडी मे एक सौ रुपए प्रति किलो  तक की दर से बिक जाते है। एक आईटी इंजीनियर द्वारा फूलों की खेती करते देख अच्छा लगा। इसी तरह श्री मंजु नाथ जो कॉमर्स के स्नातक है और पूरे साल गुलाब के फूलों की खेती मे रत है को भी देख अच्छा लगा। मंडी मे गुलबहार के फूलों के मुक़ाबले फूलों के राजा  गुलाब के फूलों के आधे रेट अर्थात 50/- कि॰ मे बिक्री की जान थोड़ा अफसोस हुआ। घरों और फूलों के  इन खेतों  को, पौध उपलब्ध कराने की नर्सरियाँ  भी जहां तहाँ देखने को मिली जहां पर गुलाब के पौधों की कलम और अन्य विभिन्न फूलों की पौध को बिक्री के लिए उपलब्ध कराया जा रहा था। झीलों के किनारे भ्रमण के दौरान प्रवसी पक्षियों और कुछ नितांत जंगली रस्तों मे जंगली खरगोश और साँपों को देखना रोमांचकारी अनुभव था। सरीसृप समूह के इन रेप्टाइलस  प्राणियों की उपस्थिती शायद झील किनारे बने  मुर्गी पालन केन्द्रों के कारण संभव रही होगी।

हाँ नित्य लगभग दो घंटे के भ्रमण के बाद ऊर्जा ग्रहण करना तो बनता था, जिसे नागराज और राजप्पा जैसे ताजे हरे नारियल के बिक्रेताओं ने पूरा किया, जिसकी कीमत मात्र 30 या 35 रुपए के भुगतान कर प्राप्त किया। एक ओर कोरोना काल मे जहां डिजिटल भुगतान पर राजनैतिक दलों के बीच वाद-प्रतिवाद होते दिखे थे लेकिन इस पूरे क्षेत्र मे नारियल जैसे छोटी कीमत के उत्पाद सहित हर छोटे बड़े हॉकर, दुकानदार के पास पेटीएम, यूपीआई, भीम जैसे डिजिटल भुगतान प्लेटफोरम की सुविधा को देख कर "डिजिटल इंडिया" के बढ़ते कदम का अहसास भी आनंद दायक था, न खुल्ले पैसे का झंझट न नगद रखने का सिरदर्द।    

यूं तो स्वच्छ भारत अभियान से लोगो मे कुछ जागरूकता आयी है पर भारत के अधिकतर ग्रामीण क्षेत्रों की तरह यहाँ भी गंदगी, कचरा और कूड़ा जहां तहाँ देखने को मिले। खाली प्लॉट, सड़क के किनारे गाँव के छोरों पर एक समान रूप से अनुपयोगी प्लास्टिक, खाली डिब्बे, बोतलों का कचरा को  देखा जा सकता था। सरजापुर के इन ग्रामीण क्षेत्रों मे महंगे घरों, विलासता पूर्ण वाहनों से यहाँ की आर्थिक समृद्धि और विकास का अनुमान लगाना कठिन न था, पर यहाँ के रहवासियों की आर्थिक समृद्धि को सड़क किनारे पड़े कचरे के बीच खाली बीयर और उच्च श्रेणी की व्हिस्की की बोतलों, विदेशी ब्रांड की सिगरेट के खाली पैकेट से भी देखा जा सकता है। काश सूचना तकनीकि के इस क्षेत्र मे मेघालय के मौलिन्नोंग-गाँव (https://sahgalvk.blogspot.com/2023/01/blog-post_21.html) की परिकल्पना साकार हो पाती।   

5 मार्च 2023 को एमसी हल्ली ग्राम मे भ्रमण के दौरान कहीं से दक्षिण भारतीय संगीत वाद्ययंत्र की मधुर तान सुनाई दी। उसी दिशा मे कदम बढ़ाने पर लगा शायद कर्नाटक संगीत का कोई औडियो या वीडियो बज रहा होगा। पर नजदीक पहुँचने पर देख सुखद आश्चर्य हुआ जब   दक्षिण भारतीय परिवेश मे कर्नाटक शैली के चार पारंगत संगीतज्ञ, संगीत वाद्ययंत्र बजाते नज़र आये, जो गली मे स्थित मंदिर के  किसी धार्मिक आयोजन मे  पारंपरिक मंगल ध्वनि के लिए आये थे। बड़ी तल्लीनता और तन्मयता से लगभग 20-25 मिनिट तक कर्नाटक संगीत के श्रवण ने मन को मोह लिया। इस संगीत मंडली का नेतृत्व श्री सुरेश बाबू कर रहे थे जिन्होने बताया कि वे धार्मिक, सामाजिक शादी विवाह आदि के आयोजनों मे आमंत्रित किए जाने पर अपने संगीत की प्रस्तुति शुल्क सहित देते है। आप भी इस छोटे से  वीडियो के  दर्शन-श्रवण का आनंद लीजिये और हाँ घर मे मंगल कारज की अवश्यकता पड़ने पर आप दिये गए नंबरों पर इनसे संपर्क कर सकते है। इस तरह देश के सबसे बड़े सूचना तकनीकि केंद्र बेंगलुरु के एक छोर पर स्थित सरजापुर के ग्रामीण पर्यटन की यात्रा एक सुखद यात्रा थी।  

विजय सहगल     

गुरुवार, 9 मार्च 2023

"नवरत्नों को एक पत्र मेरा भी"

"नवरत्नों को एक पत्र मेरा भी"






बचपन मे बच्चों के परीक्षा के परिणाम के समय एक टिपिकल मानवीय मनोविज्ञान के दर्शन होते थे। कुछ माता-पिता अपने बच्चे के परीक्षा परणाम से इस इसलिये परेशान नहीं रहते थे कि उनका बच्चा फेल क्यों हो गया? उन्हे दुःख और क्लेश इस बात से रहता था कि पड़ौसी का बच्चा पास क्यों हो गया!! उन्हे तब चैन पड़ता यदि पड़ौसी का बेटा भी फ़ेल हो गया होता!! इसके लिए वे अनगिनत कुतर्क दे अपने बच्चे को पड़ौसी के बच्चे से श्रेष्ठ बताने मे कोई कसर बाकी न छोड़ते थे। ठीक कुछ इसी तरह दिनांक 05 मार्च को देश के देश के  नौ विपक्षी दलों के प्रमुखों ने प्रधानमंत्री को एक चिट्ठी लिखी। उन्हे शिकायत थी कि विपक्षी दलों के नेताओं को सीबीआई/ईडी परेशान कर गिरफ्तार कर रही है। उन्हे इस बात से ज्यादा शिकायत नहीं  थी कि सरकार भ्रष्टाचार के  आरोपों मे उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया सहित उनकी पार्टी के  अनेक मंत्रियों को केंद्रीय जांच एजेन्सि की सहायता से जेलों मे डाला रही  है, उनका  उलाहना इस बात से ज्यादा था कि प्रधानमंत्री अपने दलों  के पूर्व कोंग्रेसी हेमंत बिस्वा सरमा, पूर्व शिव सेना के नारायण राणे, पूर्व तृणमूल काँग्रेस के शुभेन्दु अधिकारी, मुकुल रॉय जो अब भाजपा मे हैं पर कोई कार्यवाही नहीं कर रही है या कार्यवाही धीमी गति से हो रही है?

आम आदमी पार्टी जब से दिल्ली की  सत्ता मे आयी है, उनके मंत्री लगातार भ्रष्टाचार के आरोप मे गिरिफ़्तार हुए है जिसमे  सत्येन्द्र जैन का नाम सर्वोपरि है और जो पिछले जून 2022 से जेल मे बंद है और जेल मे पाँच सितारा गैर कानूनी सुविधाओं जैसे मालिश, भोजन आराम आदि के लिए कुख्यात रहे है इन अनधिकृत सुविधाओं के  वीडियो से सभी वाकिफ है। इन सबके बावजूद  दिल्ली के मुख्य मंत्री अरविन्द केजरीवाल बड़ी निर्लज्जता से जिनकी तारीफ मे कसीदे पढ़ते हुए नहीं थकते।

इन नौ दलों के नेताओं ने एक स्वर मे दिल्ली सरकार के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया की एक स्वर मे प्रशंसा करते हुए उनकी गिरफ्तारी को निराधार, राजनैतिक साज़िश और झूठा बताया। वे ये कहना नहीं भूले कि "मनीष सिसोदिया को दिल्ली की स्कूली शिक्षा को बदलने के लिये    विश्व स्तर पर जाना जाता है"!! अरे किसान भी खेत मे बीज बोने के बाद फसल उगने का इंतज़ार करता है और कालांतर मे ही फसल के बारे मे भविष्यवाणी करता है पर ये महारथी मनीष सिसोदिया के शिक्षा मंत्रित्व काल का बमुश्किल 5-7 वर्ष के कार्यकाल को इस तरह परिभाषित कर रहे है मानों दिल्ली के स्कूलों से निकले छात्र, स्कूली शिक्षा के बाद अपने बल-बुद्धि और कौशल के बूते  देश दुनियाँ के आर्थिक, वैज्ञानिक, शैक्षिक और चिकित्सकीय  क्षितिज   पर एक छत्र राज्य कर रहे हों? इन विपक्षी दलों ने भी मानो अपने बच्चों, नाती-पोतों  को दिल्ली के इन सरकारी स्कूलों मे दाखिला करा दिया है? ऐसा लगता है मानो विदेशों सहित देश के केंद्रीय विध्यालय, सैनिक स्कूलों, नवोदय विध्यालय सहित स्थापित पब्लिक स्कूलों के छात्र भी दिल्ली के इन सरकारी स्कूलों मे दाखिले के लिये लालायित हो प्रवेश के लिये लाइन लगा कर खड़े हों?

हम इन विपक्षी दलों की ये बात मान भी लें कि मनीष सिसोदिया ने दिल्ली के स्कूलों की दशा और दिशा बदल दी है, तो क्या माननीय सिसोदिया को उनके इस सद्कार्यों  से बेईमानी, भ्रष्टाचार करने का वैधानिक लाइसेन्स प्राप्त हो गया? यदि मनीष सिसोदिया ने शिक्षा के क्षेत्र मे एक बेहतरीन कार्य किया तो एक मंत्री के नाते उनकी ये नैतिक ज़िम्मेदारी थी कि वे जनता के कल्याण के लिये अच्छे कार्य करते! लेकिन आबकारी नीति मे घोटाला कर उन्होने जो पापार्जन कर धनार्जन किया, तब कानून की भी ये नैतिक ज़िम्मेदारी है कि सिसोदिया के कुत्सित और भ्रष्ट कार्यों के लिये उन्हे जेल भेंजे!! प्राथमिक न्यायालय से लेकर देश के सर्वोच्च न्यायालय का कदम कदम पर दरवाजा खटखटाने के बाद भी जब माननीय सिसोदिया को कहीं से कोई कानूनी राहत नहीं मिली तब  अंततः न्यायालय को   उन्हे भ्रष्टाचार के आरोप मे जेल भेजने के लिये बाध्य होना पड़ा। तब एक स्वतंत्र न्यायतंत्र पर प्रश्न खड़ा करना कहाँ की समझदारी है? ऐसा प्रतीत होता है कि आम आदमी के प्रमुख और दिल्ली के मुख्यमंत्री अनिल केजरीवाल लगातार मनीष सिसोदिया की गिरफ्तारी पर देश की न्याय प्रणाली के विरुद्ध और मनीष सिसोदिया के पक्ष मे तर्क-वितर्क और कुतर्क दे अनर्गल आरोप लगा कर या तो अपनी हद दर्जे की  मूढ़ता और अज्ञानता दिखा रहे है या वे देश की जनता को मूर्ख समझ रहे है? अपने आप को योग्य, बुद्धिमान समझने मे कोई आपत्ति नहीं पर दूसरों को मूर्ख और अज्ञानी समझना हद दर्जे की मूर्खता ही है!!

पश्चिमी बंगाल की मुखमंत्री सुश्री ममता बैनर्जी के मंत्री पार्थ चैटर्जी और उनकी महिला मित्र अर्पिता मुखर्जी को देश की जनता अभी भूली नहीं है जिनके घर से  अगस्त 2022 मे 50 करोड़ रूपये  से ज्यादा की भ्रष्टाचार से कमाई नगदी उनके घर से बरामद हुई थी। पश्चिमी बंगाल मे पिछले विधान सभा चुनाव 2021 मे विपक्षी दलों के विरुद्ध आगजनी, हिंसा, लूट, हत्या और बलात्कार की घटनाओं को ममता जी बेशक भूल गई हों पर देश की जनता को आज भी वो सब अच्छी तरह से याद है। किस मुंह से वे कह सकती है कि उनकी पार्टी के लोगो को झूठे आरोपों के आधार पर सीबीआई/ईडी  कार्यवाही कर रही है। महाराष्ट्र सरकार मे एनसीपी पार्टी के कैबिनेट मंत्री नवाब मलिक की दाऊद इब्राहिम जुड़े मामले मे ईडी द्वारा धन शोधन के मामले मे गिरफ्तारी, इसी दल के गृह मंत्री अनिल देशमुख की भ्रष्टाचार पर गिरफ्तारी सर्विदित है। यदि ये गिरफ्तारियाँ अकारण और गैर कानूनी होती तो कैसे न्यायालय इनको उचित ठहरा कर एक-एक साल तक हिरासत मे रखने की अनुमति देता। शिव सेना के बड़बोले, अशिष्ट और असभ्य  नेता संजय राऊत को कौन नहीं जनता? जिनको पात्रा चॉल जमीन घोटाले मे 1 अगस्त 2022 को  हिरासत मे लिया गया था। यदि श्रीमान राऊत निर्दोष थे तो कैसे देश का न्याय तंत्र एक निरपराधी को महीनों जेल मे रख सकता था? इस श्रंखला मे तेलंगाना के मुख्य मंत्री और भारतीय राष्ट्रीय समिति प्रमुख चन्द्र शेखर राव की बेटी के॰ कविता से दिल्ली आबकारी घोटाले मे भी निकट भविष्य मे पूंछ तांछ संभव है। एक साधारण नागरिक के सुप्रीम या हाई कोर्ट तो दूर प्राथमिक न्यायालय से निषेधाज्ञा प्राप्त करना आसमान से तारे तोड़ने के बराबर हो, इसके विपरीत  इन  राजनैतिक रसूख  और आर्थिक रूप से सुदृढ़ राष्ट्रीय स्तर के प्रभावशाली व्यक्तियों जिनके लिये कदम कदम पर देश के सर्वोच्च न्यायालय से निर्देश प्राप्त करना बाएँ हाथ का खेल हो कैसे केंद्रीय जांच एजेंसियां ऐसे व्यक्तियों को गिरफ्तार कर जेल भेजने जैसे मनमानी पूर्ण कृत्य कैसे कर सकती है?

पत्र पर हस्ताक्षरित बिहार श्रेष्ठ श्री  तेजस्वी यादव की सीबीआई द्वारा उनके पिता श्री के विरुद्ध कार्यवाही न किए जाने की बातों को यदि मान लिया गया होता तो चारा घोटाले मे आज सजायाफ्ता  लालू प्रसाद यादव को एक दो नहीं अनेकों केसों मे न्यायालय से सजा न मिली होती? और वे आज भी तथाकथित राष्ट्र सेवा के विकास रूपी  हवन मे भ्रष्टाचार रूपी आहुतियाँ डाल रहे होते!!, और  रेल्वे मे भर्ती के बदले  जमीन घोटाले मे  अपने और अपने परिवार के नाम जमीन लिखवाने की जांच को ही शुरू नहीं होने देते? जो परिवार आकंठ भ्रष्टाचार के आरोपों मे घिरा है उसे सिर्फ इस बिना पर जांच से मुक्त कर दिया जाय? क्योंकि लालू ने रेल मंत्रालय  को लाभ मे पहुंचाया था और जिसकी चर्चा आईआईएम अहमदाबाद मे की गयी थी। धारा 370 को हटाये जाने से तिलमिलाए श्री फारुख अब्दुल्ला ने कश्मीर को विशेष दर्जे के रहते सारी ज़िंदगी अपने और अपने परिवार की  पांचों अंगुलियाँ को घी मे डुबा कर रक्खा। समाजवादी पार्टी जिसने अपने  पूरे कार्यकाल मे  सदा अपने परिवार और प्रदेश के माफिया, गुंडों और अराजक तत्वों को आश्रय दिया, आज सत्ता के दुर्पयोग का आरोप लगा रहे है?  

 अब तो ऐसा लगता है कि इन नेताओं द्वारा संसद मे एक स्वर से ये कानून बना देना चाहिए कि राजनैतिक नेताओं द्वारा किए गये कदाचार, भ्रष्टाचार और अनाचार के कानून सिर्फ देश की आम जनता के उपर लागू हों, देश के समस्त राजनैतिक नेताओं को इन क़ानून से छूट प्राप्त हो जाना  चाहिए, क्योंकि संसद या विधान सभा की सदस्यता के कारण ये अति महत्वपूर्ण व्यक्ति है। इन नौ राजनैतिक दलों के युद्ध अभिलाषी महारथियों के पत्र से तो ऐसा प्रतीत हो रहा है कि जैसे राजनैतिक दलों के ये नेता आसमान से अवतरित साक्षात ईश्वरीय अवतार है और  इन्हे इनके राजनैतिक क्रिया कलापों  के लिये विशेषाधिकार हांसिल  है।  जिसके एवज मे पारितोषिक के रूप मे भ्रष्टाचार, कदाचार, दुराचार करने की इन्हे स्वतः ही छूट प्राप्त है? इन राजनैतिक मनीषियों  का दर्जा क्या देश के कानून और  संविधान से ऊपर है? क्यों इन्हे सरकार मे रहते हुए किए गये कार्यकलापों के लिये आम जनता से परे  क्या राष्ट्र भक्त और देश भक्त का दर्जा हांसिल होना चाहिये? क्यों इन नेताओं के माता-पिता, भाई, भतीजों, बहिन भांजों,  विशेषतः दामादों को देश के कानून से ऊपर माना जाना चाहिये? क्यों इन्हे देश के आम नागरिकों से  परे भ्रष्टाचार और दुराचार की छूट प्राप्त है? क्योंकि इन्होने  देश के लिए बैसा ही कुछ  योगदान किया है जैसे मनीष सीसोदिया ने दिल्ली मे शिक्षा के लिए किया है? कानून और केंद्रीय/राज्य की  जांच  एजेंसिया तो सिर्फ आम नागरिकों के लिए बनी  है जो देश मे पैदा ही लुटने, पिटने, मिटने और घुट घुट कर मरने के  लिए पैदा हुई है।

इन राजनैतिक नौ रत्नों ने प्रधानमंत्री को संबोधित अपने पत्र के अंत की जो  दो लाइने लिखी वो  काबिले तारीफ है। वे लिखते है कि, "लोकतंत्र में लोगों की इच्छा सर्वोच्च होती है। जनता ने जो जनादेश दिया है, उसका सम्मान करना चाहिए, भले ही वह उस पार्टी के पक्ष में हो, जिसकी विचारधारा आपकी विचारधारा के विपरीत हो"।

इन सभी आर्य श्रेष्ठों ने उनके मिले जनादेश का सम्मान करने का तो प्रधानमंत्री को स्मरण कराया है लेकिन वे भूल गये कि केंद्र मे केंद्रीय सरकार को मिले जनादेश का इन सिद्धहस्त  मनीषियों ने कितना सम्मान किया? जिस तरह कौरवों ने चक्रव्यूह रच कर अभिमन्यु का संहार किया था क्या कुछ बैसे  ही कदम कदम पर रोढ़े अटकाने का काम इन  नौ महारथियों ने सीएए आंदोलन, दिल्ली के शाहीन बाग के आंदोलन, दिल्ली के गाजीपुर बार्डर का किसान आंदोलन, 26 जनवरी पर खालिस्तानी आंदोलन को हवा देकर सरकार को मिले जनादेश के  संहार का पाप नहीं किया?

विजय सहगल