गुरुवार, 30 जून 2022

एस॰पी॰ आई॰ इंटर कॉलेज-झाँसी

 

"एस॰पी॰ आई॰ इंटर कॉलेज-झाँसी"







21 जून यूं तो तमाम बजहों से एक अत्यंत महत्वपूर्ण दिन होता है, जिसमे साल का सबसे बड़ा दिन और अभी हाल ही के कुछ वर्षों मे ये दिन देश सहित दुनियाँ मे योग दिवस के लिए भी जाना जाता है। लेकिन इन सब के साथ 21 जून 2022  का दिन एक विशेष कारण से भी मेरे लिए महत्वपूर्ण था। प्रातः लगभग 6.30 बजे जब लक्ष्मी बाई एवं मैथली शरण गुप्त  पार्क मे लोगो को योग दिवस और प्रातः घुम्मकड़ी के साथ जब मैंने सफाई कर्मी मुकेश को अपनी ड्यूटि पर सफाई करते देखा तो उसकी प्रशंसा  मे उसकी पीठ थपथपाएं बिना न रह सका। जिस तनमयता और तल्लीनता से वह अपने कार्य मे मगन था वह उसके कर्तव्य पारायण योग पुरुष होने का श्रेष्ठ उदाहरण था।  हम पढे-लिखे श्रेष्ठी वर्ग द्वारा फैलाएँ कचरे को जब  एक कमजोर वर्ग का अशिक्षित व्यक्ति, साफ करें तो क्या हमारी शिक्षा और संस्कार पर सवाल नहीं उठने चाहिये?

मुकेश से मिलने के बाद जैसे ही हम चंद कदम आगे बढ़े ही थे कि एस॰पी॰आई॰ कॉलेज (सरस्वती पाठशाला इंडस्ट्रियल इंटर कॉलेज, झाँसी) के शताब्दी द्वार को सामने देख मेरे कदम सहसा ही ठिठक गये और मै अपने आपको कॉलेज प्रांगण मे प्रवेश करने से न रोक सका। मुझे आज भी जिज्ञासा है कि "सरस्वती पाठ शाला" मे "इंडस्ट्रियल" शब्द जोड़ने का क्या प्रयोजन रहा होगा।  अन्य कोई दिन होता तो शायद कॉलेज के दरवाजे ग्रीष्म अवकाश के चलते खुले न होते पर चूंकि आज योग दिवस था, तो कॉलेज के शिक्षक गण एवं अन्य स्टाफ कॉलेज मे उपस्थित  थे। मै एक अजनबी व्यक्ति की तरह कॉलेज के प्रांगण मे स्थित हर स्थान को बड़े कौतूहल और उत्सुकता पूर्वक देख रहा था! मोबाइल पर कुछ फोटो और तसवीर भी ले रहा था। अचानक एक अपरिचित और अनजान व्यक्ति को इस तरह कॉलेज मे देख संदेह की दृष्टि से घूर रहे  एक सज्जन  जो शायद कॉलेज के शिक्षक थे, ने मेरा परिचय जानना चाहा जो स्वाभाविक था। मैंने उनको नम्रता पूर्वक बताया कि 1973 मे मै भी इस शिक्षण संस्थान का छात्र था और अपने पुराने विस्मृत दिनों की यादों को पुनः स्मरण कर उत्साह और उमंग से लबरेज़ हूँ। कॉलेज को देख  पुराने दिनों, मित्रों और शिक्षकों और उन से जुड़ी घटनाओं को स्मरण कर उत्साहित हूँ!! इतना सुन वे सज्जन भी सहज हो हमसे पुराने दिनों की चर्चा करने लगे।

ध्वज स्थल से खड़े हो सामने के खुले मैदान  पर प्रार्थना के लिए एकत्रित छात्र समूहों, जिनमे मै भी एक सहभागी छात्र के रूप मे लाइन मे खड़े हों कर कॉलेज की प्रार्थना मे शामिल होता था। उन दिनों होने वाली प्रार्थना-:

 वह शक्ति हमे दो दया निधे, कर्तव्य मार्ग पर डट जाबे।                                     पर सेवा पर उपकार मे हम, जीवन सफल बना जाबे........

आज भी मुझे कंठस्थ है। ध्वज स्थल पर अन्य शिक्षकों और अध्यापक गणों के साथ कॉलेज के दबंग प्रधानाचार्य श्री आर॰के॰ अग्रवाल भी मंचासीन रहते थे। जिनके हाथ मे एक बेंत होता था जिसके भय के आगे कॉलेज के बड़े से बड़े तीसमार खाँ, रंगबाज़ स्टूडेंट भी भय खाते थे। जिसका सबसे बड़ा कारण जो छात्रों के बीच सर्वविदित था कि, "प्राचार्य जी एक अच्छे क्रिकेट खिलाड़ी भी है! उनके हाथ मे चाहे क्रिकेट बाल हो या डंडा उनका निशाना लच्छ  पर अचूक होता था"।   

झाँसी के एक छोटे विध्यालय, "राजकीय आदर्श विध्यालय" मे लगातार आठ  वर्ष कक्षा 1 से 8 तक टाट पट्टी पर बैठने के बाद कॉलेज मे कुर्सी मेज पर बैठने के रोमांच  ने ही बालक से किशोर होने के बदलाव का अहसास मुझे करा दिया था। ये अन्य बदलावों के साथ एक मुख्य बदलाव था। उन दिनों पानी की बोतल ले जाने का रिवाज़ नहीं था, विध्यालय के स्कूल बैग मे रखी पुस्तकों के बीच मोरपंख और विध्या की पत्तियाँ हर विध्यार्थी का आवश्यक अंग थी  और लंच बॉक्स भी बैग मे आवश्यक रूप से सँजो कर रक्खा जाता। डिब्बों मे  रक्खे  परांठा और अचार  की खुशबू सहपाठियों के साथ कौओं और चील को भी प्रिय लगती थी। भोजन का कुछ हिस्सा चीलों के लिए आरक्षित था, जिसे हवा मे उछाल कर फेंकते और चील छपट्टा मार कर उसे हवा मे ही दबोच लेती। पर ये सब  कॉलेज मे तिरोहित हो चुका था। हाथ मे कुछ कॉपी-किताब आ गयी थी। जिस विध्यालय मे पूरे आठ साल विध्यालय प्रांगण से बाहर जाने की सोच भी नहीं सकते थे, कॉलेज मे आते ही कॉलेज के बाहर जाने की हवा लग चुकी थी। लक्ष्मी पार्क, इलाइट सिनेमा तक घूमना साधारण बात हो चुकी थी।

आज कॉलेज मे नव निर्माण का काफी बदलाव मैंने उस दिन नोट किया। प्रार्थना स्थल के चारों ओर नये-नये क्लास रूम बन गये थे पर बयोलॉजी, भौतिक विज्ञान एवं रसायनिक विज्ञान की प्रयोग शालाएँ एवं उससे लगी पीने के पानी की टंकी  अपने यथा स्थान पर ही थी। पुस्तकालय का हाल बैसा ही दिखा पर ये आज भी चालू था कि नहीं कह नहीं सकता। स्कूल के ऊपरी हिस्से मे भी खपरैल के क्लास रूम को पक्के सीमेंटेड कमरों मे परिवर्तित कर दिया गया था। जिस खेल कक्ष से हम लोग हॉकियां या क्रिकेट के सामान ले कर कॉलेज के पीछे के मैदान मे खेलते थे वह कार्यालय के बगल मे आ चुका था। उन दिनों के खेल अध्यापक श्री शिकोरिया जी की याद आना स्वाभाविक थी जिनकी सीटी, डर और भय से अच्छे भले चलते छात्र के पग को डगमगा देती थी। प्राचार्य अग्रवाल साहब के बाद जिस अध्यापक से छात्र डरते थे उनमे शिकोरिया साहब एक थे।

अलग अलग विषयों के यूं तो अलग अलग अध्यापक थे पर विज्ञान विषय का छात्र होने के नाते विज्ञान के अध्यापक अजीत टंडन, जीव विज्ञान के श्री एस॰एस॰ आब्दि, श्री यूएस गुप्ता, श्री राजपूत, भौतिक विज्ञान मे श्री भागवत और श्री राम सहगल तथा रसायन विज्ञान के श्री बी॰ आर॰ गुप्ता के चेहरे याद आना स्वाभाविक था। इन शिक्षक गणों का पढ़ाए जाने का ढंग और स्टाइल भी अलग अलग था। आब्दि साहब अपने बोलने और पहनावे के विशेष लहजे के लिए प्रसिद्ध थे। टंडन साहब अपने छात्रों से दोस्तना व्यवहार के लिए जाने जाते थे वही श्री राम शरण सहगल शांत और सौम्य व्यवहार के लिये प्रसिद्ध थे। श्री बी॰आर॰  गुप्ता जी के रसायन विज्ञान के नोट्स हू-ब-हू वही थे जो उन्होने चार वर्ष पूर्व हमारे बड़े भाई शरद सहगल को लिखाये थे। अतः मैंने भाई साहब की पुरानी कॉपी को ही अपनी नोट्स बुक की तरह ही इस्तेमाल कर लिया था। कॉलेज मे गणित के अध्यापक श्री संतोष शिवानी और अजीत टंडन की दोस्ती सुविख्यात थी। श्री त्रिभुवन नाथ त्रिवेदी, बाला प्रसाद चतुर्वेदी, हरगोविंद कंचन यद्यपि हमे पढ़ाते नहीं थे पर छात्रों के बीच प्रसिद्ध थे। शालीन और सौम्य स्वभाव के अँग्रेजी अध्यापक श्री जगत दुबे एक प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी थे। उन दिनों प्राचार्य श्री आरके अग्रवाल के कक्ष मे निरुद्देश्य किसी भी छात्र की हिम्मत नहीं होती थी वही श्री राम रतन कंचन वरिष्ठतम अध्यापक का सभी छात्र और अध्यापक आदर सम्मान करते थे। अधीनस्थ स्टाफ मे श्री भुजबल और भोला सभी छात्र और अध्यापकों के बीच लोकप्रिय थे।  कार्यालय के बगल मे ही उन दिनों लाई चने रूपी पौष्टिक आहार की बाल्टी का वितरण कक्षा बार होता था। जिस  पर कभी क्लास के छात्रों को कम-ज्यादा बटवारे के कारण छीना झपट्टी और हल्की फुल्की झूमा झटकी भी हो जाती थी। 

जहां एक ओर क्लास रूम्स मे बदलाव स्पष्ट दिखाई देता था किन्तु कार्यालय भवन, प्राचार्य कक्ष आज भी जस के तस था। जहां पर वर्तमान प्राचार्य श्री डा॰ मनोज मिश्रा जी से उस दिन मुलाक़ात और बात चीत हुई। मेरा  परिचय जान, बीते हुए दिनों की चर्चा को सांझा कर हम दोनों की ही राय उत्साह और प्रसन्नता देने वाली थी। योग दिवस पर वितरित हुए फल का वितरण मुझे भी किया गया।          

भौतिक और जीव विज्ञान प्रयोग शाला के बीच स्थित लेक्चर थिएटर को देख उन दिनों विज्ञान परिषद के गठन हेतु छात्र सभा को संबोधित करने के क्षण आज पुनः याद हो आए। उन दिनों मै ग्यहरवी का छात्र था। जीवन मे पहली बार लगभग सौ सवासौ छात्रों के सम्बोधन के समय  लड़खड़ाते पैरों को किसी तरह नियंत्रित कर हिम्मत और आत्मविश्वास तथा डॉ हरगोविंद खुराना के उदाहरण के चलते सम्बोधन ठीक ठाक रहा था और विज्ञान परिषद के उप सचिव पद पर निर्विरोध निर्वाचित हुआ था। उन दिनों की झूठी, खोखली, दिशा हीन  और छद्म छात्र राजनीति का "राग दरबारी" आगे स्नातक कॉलेज तक प्रत्येक वर्ष यूं ही देखता और भोगता रहा जो कहीं भी आज की राजनीति से अलग न थी।

बैसे तो इंटर का पाठ्यक्रम दो वर्ष मे पूर्ण हो जाना चाहिये था पर दुर्भाग्य से भौतिक विज्ञान के विषय के पाठ्यक्रम मे उस साल आमूल चूल परिवर्तन के कारण इंटर मे एक साल असफलता का मुंह देखना पड़ा। मुझे अच्छी तरह याद है उस साल मात्र दो छात्र मधु सूदन सूद और वैदेही शरण सरावगी विज्ञान विषय मे ही सफल हुए थे। उस असफलता के सबक ने मुझे "सफलता के प्रयास पूरे मन से न करने" का संदेश ता उम्र देते रहे।

इन कुछ खट्टे मीठे अनुभवों का संदेश मन मे लिए, एस॰पी॰आई॰ इंटर कॉलेज मे विताए अपने पुराने विस्मृत दिनों को एक बार पुनः स्मरण  करते हुए मैंने वर्तमान प्राचार्य श्री मनोज मिश्रा, विनोद चतुर्वेदी  और उनके अन्य सहयोगियों का अभिवादन करते हुए अपने गंतव्य की ओर प्रस्थान किया।

विजय सहगल

 

शनिवार, 25 जून 2022

"चैल (चायल), हिमाचल प्रदेश"-2

          "चैल (चायल), हिमाचल प्रदेश"-2







एक जून 2022 को शाम के लगभग चार बजे हम अपने होटल ओक वूड मे पहुंचे। बैसे तो पूरा चैल गाँव ही निस्तब्ध शांति मे सराबोर हो सुख और चैन का अनुभव करा रहा था। होटल के सामने भी घने वृक्षों के बीच पशु पक्षियों की आवाज वातावरण की नीरवता को कभी कभी भंग करती नज़र आ रही थी, शांति और शून्यता इतनी थी कि होटल के रूम से 50-60 फुट नीचे सड़क पर बात कर रहे लोगो की आवाज स्पष्टता के साथ सुनी जा सकती थी। कुछ देर विश्राम के बाद हमने होटल से लगभग 2 किमी॰ दूर स्थित चैल पैलेस घूमने का कार्यक्रम बनाया। मैदानी क्षेत्रों के पूर्व राजे-महाराजों के विपरीत पहाड़ों के राजाओं की रियायसते, पैलेस और महल छोटे पर भव्य और शांत वातावरण मे सुकून और शांति का अनुभव प्रदान करते प्रतीत होते है। चैल पैलेस को भी यहाँ के राजा भूपेन्दर सिंह द्वारा 1893 मे बनवाया गया था जो पटियाला घराने से संबन्धित थे। यहाँ के रियासतों, महलों  के हालात का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इन महलों के एक हिस्से मे अधिकतर को हैरिटेज़ होटल मे परिवर्तित किया जा चुका है,  इसके बावजूद रखरखाव के लिये पर्यटकों से चैल पैलेस के अवलोकन हेतु 100 रुपए प्रवेश शुल्क बसूल किया जा रहा था। 

दो मंज़िला चैल पैलेस या विरासती होटल  मे 10-12 विलासिता पूर्ण कमरों के अलावा सभी खुले गलियारे और बरामदे को आम पर्यटकों के लिये खोला गया है। पूर्व महाराजाओं के कुछ विदेशी उपहारों, पेंटिंग्स, धातु की प्रतिमाओं, पियानो, झूमरों, पुराने फ़र्निचर शोकेश आदि को सँजो कर रक्खा गया था। गलियारों मे बिछे कालीन और पुराने आईने पैलेस की सुंदरता मे इजाफ़ा कर रहे थे। होटल की ऊपरी मंजिल पर सराहन स्थित देवी के मंदिर का मॉडल भव्य और आकर्षक था। कुछ बेशकीमती पेंटिंग्स के सामने बैठ अपनी फोटो खिंचवाने का लोभ संभरण मै न कर सका।   महल मे ही स्थित रेस्टुरेंट मे भी राजाओं की भव्यता और विलसता के दर्शन हो रहे थे। अर्थव्यवस्था को  प्रोत्साहन और बढ़ावा देने और विरासत कालीन होटल के सुचारु संचालन के लिये  हम सभी ने अपनी सहभागिता सुनिश्चित करने हेतु हिमाचल पर्यटन  विकास निगम द्वारा संचालित उक्त जलपान गृह के व्यंजनों का रसास्वादन भी हमने परिवार सहित लिया। अल्पाहार स्वादिष्ट और प्रिय था। जलपान मे प्रयुक्त कटलरी और अन्य उपयुक्त पात्र भी सुंदर और आकर्षक थे जिनमे जलपान करना एक अलग ही आनंद देने वाला अनुभव  था। हाँ बार (मदिरालय) के बारे मे ज्यादा वर्णन उचित प्रतीत नहीं होता अतः सिर्फ फोटो देख कर ही काम चलाएं।

बापसी मे बमुश्किल 30-40 दुकानों का छोटा सा बाज़ार देखा जिसमे अधिकतर खाने, नाश्ते से संबन्धित दुकाने थी। अधिकतर दुकानों मे आवश्यकता की हर चीज एक ही दुकान पर बेचने का रिबाज़ है। सब्जी, भाजी, किराना, वर्तन, कपड़े आपको एक ही जगह उपलब्ध हो जाएंगे। बाजार मे घूमना भी अलग रोमांचकारी अनुभव था।

दिन भर दौड़ धूप, ड्राइविंग की थकावट के बाद गहरी नींद मे रात मे अच्छी नींद का आनंद  लिया। अच्छी ख़ासी सर्दी के कारण रज़ाई, कंबल पहली बार इस्तेमाल किये। चैल के बगैर पंखे और एसी के मौसम ने तबीयत खुश कर दी। दूसरे दिन माँ काली का प्राचीन मंदिर जो क्षेत्र के निवासियों मे बड़ा महत्व और मान्यता रखता है। चैल से लगभग 4-5 किमी॰ दूर ऊंची पहाड़ी पर स्थित सफ़ेद रंग का किले नुमा भव्य मंदिर, जहां से पूरे चैल और दूर दराज़ के क्षेत्रों का  से 360 डिग्री का शानदार नज़ारा दिखाई देता है। हाँ जमीनी स्तर पर बने सफ़ेद किले नुमा ऊंचे कंगूरों के कारण दर्शनार्थी पहाड़ी के चारों ओर बने प्रकृतिक दृश्यों के दर्शन से पूर्णत: वंचित रह जाता है!! शायद, इस वास्तु दोष को मंदिर  प्रबंधन ने निर्माण के समय महसूस नहीं किया। लेकिन मंदिर के मुख्य प्रांगण रूपी छत्त पर सीढ़ियों से चढ़ कर पहाड़ी के चारों ओर दूर दूर तक हरे वृक्षों से आच्छादित पहाड़ियों  के सुंदर ईश्वरीय परिदृश्य को देख कर मन को सुकून देने वाले दृश्य को देखा जा सकता है।  दूर दूर तक हरे भरे वृक्ष आँखों को सकून और सुख देने वाले प्रतीत होते है। मंदिर मे माँ काली के अतरिक्त हनुमान जी, एवं भगवान शिव का भी मंदिर है। प्रातः इन  सभी देवी देवताओं के दर्शन से दिन की शुरुआत हमारी अगली मंजिल कुफ़्री भ्रमण के लिये ऊर्जा का  संचार करने वाली थी।                

              

विजय सहगल 

 

 

गुरुवार, 23 जून 2022

होटल एम्बियन्स-झाँसी की सर्विस????

 

"होटल एम्बियन्स-झाँसी की सर्विस????"





आज दिनांक 23 जून 2022 को कुछ दुर्भाग्य ही था कि होटल एम्बियन्स झाँसी मे प्रातः 7.30 बजे होटल छोड़ने के लिए जब काउंटर पर होटल के मैनेजर रोहित से निवेदन किया कि सामान रूम से बाहर निकालने मे सहायता के लिये किसी स्टाफ को भेज दे? तो मैनेजर रोहित से जवाब की ऐसी अपेक्षा नहीं थी? बोला स्टाफ 10 बजे आयेगा!! अचानक से किसी होटल के मैनेजर का इस तरह गैर जिम्मेदारा ब्यान से मै हतप्रभ था!! मैंने कहा यदि कोई अतिथि अभी आपके होटल मे रुकने के लिये आयेगा तो क्या उसे आप दस बजे तक प्रतीक्षा करने के लिये कहेंगे? क्या गेस्ट अपना सामान स्वयं लेकर रूम मे जायेगा? और इसी तरह हमे भी क्या चेक आउट करने के लिये दस बजे तक रुकना पड़ेगा?

बदतमीजी और निर्लज्जता की हद देखिये, उसका कहना था, सामान हम उठाके थोड़ी न ले जाएंगे? अब तो धृष्टता  की पराकाष्ठा थी! मुझे उसकी बेहयायी का अहसास कराने के लिये बाध्य होना पड़ा! मैंने कहा कि सामान उठाने के लिये मै आपको नहीं कह रहा हूँ? आपको कोई स्टाफ सर्विस के लिये रखना चाहिये और गेस्ट से इस तरह बेरुखी और अशिष्टता पूर्ण व्यवहार करने पर तुम्हें शर्म आना चाहिये? उस मैनेजर रोहित का दुस्साहस देखिये इतनी सब बात होने के बावजूद भी उसे अपने दुष्ट व्यवहार के लिये कोई पछतावा नहीं था अपितु अपने व्यवहार को न्यायोचित ठहराते हुए उसने निर्लज्जता पूर्ण लहजे मे कहा कि मैंने सर्विस स्टाफ को 10.00 बजे आने का कहके कौन से बदतमीजी की? मुझे कतई उम्मीद नहीं थी कि "अतिथि देवो भवः" जैसे सेवभावि होटल संस्थान मे इस तरह के निंदनीय लम्पट व्यक्ति कैसे रिसिप्शन काउंटर पर बैठ सकता है?

जब मैंने उस ढीठ मैनेजर से होटल मालिक का मोबाइल नंबर मांगा तो उसने उनका नंबर उसके पास होने से इंकार कर दिया। मैंने उस हठी व्यक्ति से ऐसे किसी भी व्यक्ति का नंबर देने को कहा जिससे उसके  (मैनेजर रोहित के) लापरवाह और दुष्ट  व्यवहार की शिकायत की जा सके? तब उसने अपने वरिष्ठ श्री जावेद का जो नंबर दिया (7317017171)॰ मेरे द्वारा उस नंबर पर जब संपर्क की कोशिश की गयी तो उक्त मोबाइल,  मैनेजर रोहित के पास ही पड़ा था जिस पर मेरे द्वारा डायल नंबर की रिंग बज रही थी। मैंने उस दुराग्रही मैनेजर को चेताया भी कि तुम्हें सोश्ल मीडिया की ताकत का अहसास नहीं? मै आपके व्यवहार के अनुभव को सोश्ल मीडिया पर सांझा करूंगा? लेकिन उस ने बड़े ही रूखे ढंग से कुछ भी कर लेने का अहंकारी उत्तर दिया!! आप उस क्षण, परिस्थिति उलझन  की कल्पना सहज ही कर सकते है जब ऐसी परिस्थितियों से रु-ब-रु होना पड़े!!

दुर्भाग्य देखिये इतनी बहस-मुसाहिब के बीच ही न केवल हाउस कीपिंग स्टाफ, गार्ड और एक अन्य स्टाफ सेवा के लिये आ गये, जिनको सरलता से बुला कर, मैनेजर इस अप्रिय घटना को टाल सकता था!! मेरा ऐसा मानना है कि प्रतिद्वंद्ता से परिपूर्ण होटल जैसे सेवाभावि संस्थानों मे क्या मैनेजर रोहित जैसे दुष्ट, निर्लज्ज, बेहया, कुतर्क-वितर्क करने वाला व्यक्ति संस्थान को आत्मघात की राह पर नहीं ले जा रहा है? मैनेजर के दुर्व्यवहार, क्या होटल प्रबंधन और पर्यटन विभाग के संज्ञान मे है? क्योंकि एक भी व्यक्ति के अधम व्यवहार भी पर्यटकों के मन मे उस शहर की नकारात्मक छवि को निर्मित कर सकता है।  

विजय सहगल

         

शुक्रवार, 17 जून 2022

चैल (चायल), हिमाचल प्रदेश" -1

"चैल (चायल), हिमाचल प्रदेश" -1






मेरी जीवन यात्रा मे, कुछ ऐसे संयोग बने कि मै अपने देश की देवभूमि हिमांचल प्रदेश   की यात्रा से अब तक वंचित रहा। पर दिनांक 1 जून 2022 को कुछ ऐसे सुयोग बने कि इस पवित्र भूमि मे अपने 8-9 दिन के प्रवास पर प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण बहुत ही सुंदर और अद्भुद जगहों के दर्शन का लाभ ले सका। शिमला से शुरू हुई मेरी यात्रा चैल या चाईल, कुफ़री, नार्कण्डा, सराहन, रामपुर बुशहार, रिकाङ्ग्पिओ, कल्पा, चितकुल (छितकुल), मशोबरा, नालदेहरा, तत्तापानी पर समाप्त हुई। यह यात्रा देवभूमि हिमाचल प्रदेश की ज़िंदगी की पहली पर यादगार सुखद यात्रा थी।

31 मई 2022 को प्रातः लगभग 8.30 बजे  जब मुहाली, पंजाब से शिमला की ओर बढ़े तो मन उद्विग्न था क्योंकि पहली बार किसी पहाड़ी क्षेत्र की यात्रा बेटे साक्षी गोपाल और पत्नी रीता के साथ अपनी कार से कर रहा था। ऊंचे और पहाड़ी क्षेत्रों के घुमाव दार सड़कों के बारे मे सुन तो रक्खा था पर इससे पहले कभी पहाड़ों पर स्वयं अपनी कार ड्राइव नहीं की थी। पिंजोर से कुछ आगे तक तो सड़क अच्छी, चौड़ी और चार लाइन की थी। पर आश्चर्य हिमांचल मे जैसे जैसे आगे बढ़ते गए तो एन॰एच॰  5 की सड़क ऐसे ही शिमला तक अच्छी मिलती चली गयी। बैसे सोलन से आगे कसौली भी यात्रा की सूची मे था जो धर्मपुर से 11 किमी वायें एक सकरी सड़क से जुड़ा था, जिसकी ऊंचाई समुद्र ताल से लगभग 1800 मीटर थी। सड़क बस  इतनी चौड़ी थी कि सहजता से आमने सामने से कार गुजर सके। 3-4 किमी ही उपर चढ़ सका था कि जाम की स्थिति बन गयी। जाम बहुत लंबा नहीं था पर दिल्ली के कुछ अनुशासन और उदण्ड युवकों ने सामने से आ रही खाली सड़क मे अपनी गाडियाँ जबर्दस्ती घुसेड़ दी। अब तो स्थिति विकट और गंभीर हो गयी। मेरे ही कार के पीछे लगभग 1 किमी लंबी लाइन का जाम लग गया। मैंने एक थोड़े खुले स्थान से गाड़ी को बापस मोड़ कसौली जाने का कार्यक्रम स्थगित कर दिया क्योंकि मै नहीं चाहता था कि हिमांचल प्रदेश मे यात्रा की शुरुआत अप्रिय अनुभव से हो। अतः हमने हिमाचल मे अपने पहले पढ़ाव चायल (चैल) की ओर बढ़ने  का निर्णय लिया।

यध्यपि शिमला को जाने वाले राष्ट्रीय राज मार्ग 5 के कंडीघट से चैल की दूरी 29 किमी थी। राष्ट्रीय राजमार्ग 5 को छोड़ हम दाहिने तरफ चैल जाने वाली सड़क पर मुड़े जो चौड़ाई के मामले मे कुछ सकरा जरूर था पर सहज था। सर्पाकार रूप मे पहड़ों पर  धीरे धीरे ऊपर उठने वाली सड़क पक्की, ठीक और अच्छी थी। चारों तरफ देवदार और चीड़ के घने वृक्षों के बीच मौसम बदलने के संकेत मिलने आरंभ हो चुके थे। चंडीगढ़ के मैदानी क्षेत्रों की गरम हवाएँ ठंडी हो कर मन को शीतलता का अहसास कराने लगी थी।  अब मुख्य राष्ट्रीय राजमार्ग के मुक़ाबले रास्ते मे मिलने वाले गाड़ियों का आवागमन भी काफी कम हो चुका था। चारों तरफ नीरव शांत वातावरण मे पक्षियों का कलरव स्पष्ट सुना जा सकता था। मैदानी क्षेत्रो के मार्गो के मुक़ाबले पहाड़ों पर सफर कुछ धीमा लगने लगा। एक-एक  किमी का रास्ता तय करने का अहसास होने लगा।  ऐसा प्रतीत होने लगा मानों पहाड़ो के रास्तों की पैमाइश मैदानी क्षेत्रों के मुक़ाबले   कुछ ज्यादा लंबी हो गयी हो। अचानक ही दूर पहाड़ों के बीच सुनहरे गुंबजों और केशरिया झंडों के बीच और एक मंदिर की आकृति दिखाई दी। दूर से ऐसा लगा मानो मंदिर रास्ते के किनारे ही स्थित होगा पर एक सड़क के संधि स्थल पर ज्ञात हुआ कि मंदिर के लिए अपने तय मार्ग से हट कर 2-3 किमी॰ जाना पड़ेगा। अतः हम सभी ने तय किया के चैल पहुँचने के पूर्व इस रमणीय  मंदिर के दर्शन अवश्य किये जाएँ और यू टर्न कर कार की दिशा चैल के विपरीत "बाशा" स्थान के लिये मोड़ दी। रास्ते मे कुछ ग्रामीण महिला पुरुष रास्ते के किनारे बैठे दिखे जो एक फलों के रस की फ़ैक्ट्री मे कार्यरत थे और कुछ क्षणिक विश्राम हेतु फ़ैक्ट्री के बाहर बैठे थे। नजदीक ही एक ऊंची पहाड़ी पर नयनभिराम मंदिर के दर्शन हुए। मंदिर की सुरक्षा मे तैनात हिमांचल प्रदेश पुलिस के सिपाही श्री नन्हें राम जी से भेंट हुई। उन्होने बताया कि कोई दिल्ली के महात्मा जी द्वारा इस मंदिर का निर्माण कराया जा रहा है जो कि अभी भी जारी था। विशेष विवरण मंदिर मे प्राप्त नहीं हुआ।

विशाल मंदिर परिसर  जितना बाहर से सुनहरे रंगों से सजे अनेकों गुंबजों और लाल रंग की स्टील चादरों और केसरिया ध्वजों से सुंदर दिखाई दे रहा था उतने ही मन को आनंदित कर देने वाले लोचन-सुखदायक ईश्वरीय प्रितिमाओं एवं अंदर से मंदिर के निर्माण और बनावट थी। लंबे गलियारे जिसमे लाल रंग का फर्श प्रवेश द्वार से अंतिम छोर तक बिछा था और  जिसके ऊपर सुंदर कालीन भी बिछाया गया था। गलियारे के दोनों ओर बड़े बड़े बरामदों मे पीतल धातु से बने भगवान राम दरबार, ब्रह्मा विष्णु महेश, भगवान परशुराम, शिव गणेश परिवार, राधा कृष्ण, माँ दुर्गा, माँ काली और शनि देव के स्वरूप विराजमान थे। देश काल की परिस्थितियों के अनुसार मंदिर को अंदर से उष्मरोधी रखने हेतु लकड़ी के  सुंदर तरीके से बनाया और सजाया गया था। भव्य और अलौकिक ईश्वरीय  प्रितिमाओं के दर्शन कर कुछ समय बैठ ईश्वर आराधन कर हम लोगो ने पुनः चैल की ओर प्रस्थान किया।

सुबह आठ बजे से लगातार कार की ड्राइविंग से उपजी थकावट के चिन्ह परिवार मे  सभी के चेहरे पर साफ झलक रहे थे पर चैल अब भी 7-8 किमी॰ दूर था। चैल की तरह ही  पहाड़ों मे गाँव, कस्बे या शहर प्रायः लंबाई मे सड़क के किनारे ही बसे होते है। गाँव मे प्रवेश करते ही एक जगह गाड़ी बंद हो गयी और बार बार स्टार्ट करने के बावजूद स्टार्ट न हुई तो कुछ खुशी और कुछ गम की मिली जुली प्रितिक्रिया मन मे थी। खुशी ये थी कि हम अपने गंतव्य के आस पास ही थे और डर इस बात का था कि इस छोटे से गाँव मे कार की खराबी कैसे ठीक होगी? पर मैंने कई घुम्मकड़ी और यात्रा ग्रुप मे पढ़ा था कि इंजिन गर्म होने और पहाड़ों पर ओक्सिज़न की कमी के कारण भी इंजिन बंद हो जाता है। घुम्माकड़ियों के अनुभव का लाभ  और ईश्वर के आशीर्वाद से कुछ समय गाड़ी को ठंडा होने के लिये छोड़ने के बाद पूरी यात्रा के दौरान कार ठीक ठाक चलती रही।


विजय सहगल  


शनिवार, 11 जून 2022

गुरद्वारा सिंह शहीदों दां

 

"गुरद्वारा सिंह शहीदों दां"







कभी कभी कोई वस्तु जिसकी आपको अपेक्षा ने हो अचानक से आपको प्राप्त हो जाये तो मिलने वाली खुशी की कल्पना ही की जा सकती है। 30 मई को यूं तो मुझे मुहाली स्थित आई॰ एस॰ बी॰  मे अपने बेटे के उपाधि वितरण कार्यक्रम 2022 मे शामिल होना था। सोहाना स्थित होटल से प्रातः भ्रमण के दौरान जब मै मुख्य मार्ग तक पहुंचा तो मार्ग के दायें सिरे पर एक भव्य और विशाल गुरुद्वारे के दर्शन हुए जिस पर निर्माण कार्य चालू था। प्रवेश द्वार पर बड़ी और ऊंची लोहे के जालों के सहारे निर्माण की संरचना खड़ी की गयी तो जो निर्माण कार्य मे सहायक थी। जिज्ञासा वश जब मैंने गुरद्वारे मे प्रवेश किया तो बड़े बड़े फ़्लेक्स बोर्ड पर एक फोटो पर गरम तबे पर नीचे जलते चूल्हे पर  सिख गुरु जी को बैठे देखा, बगल मे एक महिला को एक छोटे से जल पात्र लिए खड़ा देख मुझे समझते देर ने लगी कि ये  श्री गुरु अर्जुन देव जी के शहीदी दिवस के प्रतीक पर छबील के रूप मे गुलाब जल के वितरण का परिदृश्य है। पर गुरुमुखी भाषा से अनिभिज्ञ होने के कारण इस बोर्ड एवं अन्य बोर्ड पर लिखे संदेश को न समझ सका। अपनी जिज्ञासा को शांत करने हेतु एक बुजुर्ग सेवादार श्री शीतल सिंह जी से मैंने एक अन्य  बोर्ड पर लिखे संदेश और उन पर बने वीर सिख योद्धा के बारे मे जानकारी चाही तो उन्होने  विस्तार से उन वीर बाबा हनुमान सिंह जी के बारे मे बताया जिनकी फोटो कई स्थानों पर अस्त्र-शास्त्रों से सुसज्जित वेशभूषा मे थी।  

18 नवम्बर 1755 को नारंगपुर वाला, पंजाब मे जन्मे बाबा हनुमान सिंह जी को महाराजा रणजीत सिंह जी के निधन के बाद महारानी जींद कौर ने अकाल तख्त साहब, अमृतसर के जत्थेदार  बाबा हनुमान सिंह  जी के पास पत्र भेज कर अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध मे सहायता के लिए निवेदन किया। सन 1845 मे 90 वर्ष की उम्र मे बाबा जी ने अपने सेनानियों के साथ तुरंत ही अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ाई का आवाहन कर युद्ध के लिये मुदकी नामक स्थान के लिये कूच किया और युद्ध मे  लगभग 10 हजार अग्रेजी सैनिको को मौत के घाट उतरकर युद्ध मे विजय प्राप्त की। लेकिन "जय चंद और मीर जाफ़र" की कढ़ी के करम सिंह उर्फ कर्मा अली के विश्वासघात के कारण बापस अंग्रेजों ने बारूदी तोपों और बंदूकों से आक्रमण कर बाबा जी से युद्ध किया जिसमे बाबा जी के पंद्रह हजार से ज्यादा सैनिकों ने बलिदान दिया। स्वयं बाबा हनुमान सिंह ने बारूदी तोपों और बंदूकों से आहात हो घायल अवस्था मे सोहना स्थित इस स्थल पर अपनी सहादत दी। बाबा हनुमान सिंह और उनके साथियों की सहादत की याद मे इस स्थान पर ही बाबा जी का अंतिम संस्कार किया गया और इस गुरद्वारे के नाम "गुरद्वारा सिंह शहीदों" का नामकरण किया गया। 

यध्यपि मै अपनी पत्नी रीता के साथ बिना स्नान ध्यान के ही प्रातः भ्रमण पर निकला था लेकिन गुरद्वारे के पवित्र जल की कुछ बूंदे अपने शरीर पर सिंचन कर पवित्रीकरण मंत्र :-

ॐ अपवित्रः   पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोपि वा। य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स: बाह्याभंतर: शुचि:।। के स्मरण के साथ मन, वचन और कर्म के पवित्र भाव लिये गुरद्वारे मे प्रवेश किया। सरोवर मे प्रवेश के साथ ही सीढ़ियों से चढ़ कर जैसे ही दो मंज़िले सफ़ेद संगमरमर से बने भव्य गुरद्वारे के विशाल परिसर मे प्रवेश किया तो सामने गुरुग्रंथ साहिब के दर्शन से मन अपार आनंद से भर गया। गुरद्वारे के पूरे फर्श पर सुंदर ब्राउन रंग का नक्काशी किए हुए फर्श था जिसके बीच मे एक लाल रंग के गलीचे से एक पथ का निर्माण किया गया था जिस पर होकर श्रद्धालु गुरु ग्रंथ साहिब के सामने मत्था टेक रहे थे। मुख्य मंडप के चारों स्तंभों के उपर स्वर्ण पत्रों पर बहुत ही सुंदर नक्काशी की गयी थी। गुरद्वारे की छत्त पर भी रंगीन सुंदर ज्योमिति आकार मे फूलों की सुंदर चित्रकारी की गयी थी जिसके बीचों-बीच एक सुंदर काँच का झूमर लटकाया गया था जो अपनी सुनहरी रोशनी की छटा चारों ओर विखेर रहा था। गुंबद के ठीक नीचे सिंहासन पर गुलाबी वस्त्रों के बीच गुरुग्रंथ साहिब जी विराजमान थे। सुंदर स्टील की फ्रेम से गुरुग्रंथ साहब के चारों ओर परिक्रमा पथ बनाया गया था  जिसके चारों ओर सुंदर फूलों की सजावट की गयी थी। मैंने भी  सभी दर्शनार्थी श्रद्धालुओं का अनुसरण कर गृरुग्रंथ साहब के सामने नतमस्तक हो अपनी श्रद्धा और सम्मान प्रकट किया। चारों तरफ एक आध्यात्मिक शांति के  वातावरण के बीच जब  हमोनियम और तबले की संगत के मधुर संगीत की स्वर लहरियों के  बीच ग्रंथियों  जी की सुमधुर वाणी मे शबद कीर्तन:-   

"दीन दयाल भरोसे तेरे।
सब परिवार चढ़ाया बेड़े॥
राम जपोजी ऐसे ऐसे
द्रु प्रह्लाद जपयो हर जैसे॥
दीन दयाल भरोसे तेरे.........."

सुना तो मंत्रमुग्ध होकर गुरद्वारे के एक कोने मे बैठ कीर्तन का श्रवण करे बिना न रह सका  और सम्पूर्ण शबद के श्रवण के बाद ही पुनः एक बार गुरु ग्रंथसाहब को प्रणाम कर सीढ़ियों से नीचे वाले हाल मे पहुंचा जहां ऐसा बताया गया कि बाबा हनुमान सिंह का अंतिम संस्कार इसी पवित्र धरा पर किया गया था एवं बाबा जी द्वारा प्रयुक्त अस्त्र-शस्त्र को उनकी याद मे संजो कर रक्खा गया था। बाबा हनुमान सिंह जी को अपने श्रद्धा सुमन अर्पित कर गुरुद्वारे के प्रांगण से बाहर निकलने के पूर्व स्वादिष्ट "कड़ा प्रसाद" को सिर माथे लगा ग्रहण किया मानों इस महत्वपूर्ण, पवित्र और इतिहासिक  स्थान के दर्शन का फल रूपी मधुर प्रसाद पा कर मन कृत्य-कृत्य हो गया हो।   

गुरद्वारे के बाहर निकलते ही पवित्र निशान साहब के दर्शन किये जहां सभी भक्त श्रद्धा और सम्मान पूर्वक निशान साहिब के चबूतरे को निर्मल, स्वच्छ जल एवं दूध से सफाई कर रहे थे। हम पति-पत्नी ने भी अन्य श्रद्धालुओं का अनुसरण कर निशान साहिब को प्रणाम कर नीचे परिक्रमा पथ की सफाई के कार्य मे भागीदारी कर अपना आदर और सम्मान प्रेषित किया।         

इस घटना के बारे मे काफी समय पूर्व सुना था पर मेरे अवचेतन पटल से यह घटना विस्मृत हो चुकी थी पर सहसा 30 मई को प्रातः सोहना के इस पवित्र और महान इतिहासिक स्थान के दर्शन ने मुझे विस्मय से अभिभूत कर आनंद से भिगो दिया। मुझे विश्वास नहीं था कि अचानक यूं ही मै इस स्थान से एक अजनवी की तरह हो कर गुज़रूँगा।               

आज की सुबह इस पवित्र स्थल के दर्शन, जीवन के एक यादगार क्षण और घटना के रूप मे मन मस्तिष्क पर अंकित हो गया।    

 

विजय सहगल

 

बुधवार, 8 जून 2022

गरीबों के लिये "न्याय" का दावा

 

 

गरीबों के लिये "न्याय" का दावा

 




पिछले दिनों 19-20 अप्रैल 2022 को  महा नगर पालिका दिल्ली द्वारा  जहाँगीर पुरी दिल्ली मे अवैध और अनधिकृत अतिक्रमण के विरुद्ध चले अभियान ने पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया। मेरे सहित आप सभी ने टीवी मीडिया पर चले इस अभियान को जीवंत देखा। पूरे अभियान मे सड़कों पर अवैध रूप से बनाई दुकानों, रेहड़ियों, आठ फुट की दुकानों के बाहर 18 फुट की टीन और बाँसों के अवैध निर्माणों को ही गिराया गया था जो 35-40 फुट की सड़क को 18-20  फुट तक की सड़क का आकार दे रहे थे। वाहनों के आवागमन मे अवरोध और प्रतिरोध को लोग अपनी नियति मान झेलने को मजबूर थे। महा नगर पालिका निगम की यह कार्यवाही कोई अवैधानिक नहीं थी। आम आदमी की सुहुलियत और यातायात को सुगम बनाने को ही थी। पर राजनैतिक दलों के अपने स्वार्थ और  वोट बैंक के चलते जिस द्रुत और तेज गति से  से सुप्रीम कोर्ट  मे बाद दायर कर एक अच्छी भली कार्यवाही को राजनैतिक रंग देकर मिनटों मे रोक दिया जिसको देख मै हतप्रभ था और जिसे देख मुझे उस घरेलु कामगर महिला की याद हो आयी, जिसे इस पुरुष प्रधान समाज ने कुछ ही मिनटों मे 25-30 हज़ार महीने की दिहाड़ी से हमेशा के लिए वंचित कर दिया। आश्चर्य इस बात का है कि मेरे द्वारा उक्त कामगार महिला की शिकायत, महिला आयोग और अनुसूचित जाति आयोग को लिखने के बावजूद उस महिला की कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई?        

मैंने दिनांक 20 जनवरी 2022 के अपने ब्लॉग "दान का कंबल" मे अनुसूचित जाति की एक घरेलू कामगार महिला भग्बती की आपबीती घटना का उल्लेख किया था, (https://sahgalvk.blogspot.com/2022/01/blog-post_20.html) कि कैसे एक फ्लेट ओनर की मूढ़ता के कारण उसे चंद मिनटों मे 25-30 हजार रुपए मासिक की मजदूरी से हाथ धोना पड़ा था। कैसे पुरुष सत्ता को चुनौती देना उसे भारी पड़ा और अपने बच्चों के जीवन यापन हेतु मजदूरी  से अचानक ही कुछ क्षणों मे वंचित होना पड़ा। सहसा ही मेरे मन मे उस  महिला जो कि नोएडा स्थित मेरे बेटे-बहू के घर मे पूरी ईमानदारी और मेहनत से पिछले 3-4 साल से  काम कर रही थी, के जीवन मे अचानक आये इस संकट मे सहायता करने का विचार आया। मैंने 20 जनवरी को ही  राष्ट्रीय महिला आयोग दिल्ली और राष्ट्रीय अनुसूचित जाति और जनजाति आयोग को मेल कर उनके संज्ञान  मे इस घटना को ला, उसे न्याय दिलवाने हेतु निवेदन किया था। मुझे लालफ़ीताशाही और रागदरबारी भरे माहौल मे उम्मीद तो नहीं थी पर आशा की एक किरण मन मे कहीं थी कि  शायद महिलाओं और वो भी एक अनुसूचित जाति की महिला को शायद कोई सहायता मिल जाये जिससे उस महिला को न्याय मिले और अचानक से आयी इस विपदा से छुटकारा मिल सके एवं इन बड़े बड़े सरकारी संस्थानों की सार्थकता भी सिद्ध हो जाये। लेकिन दुर्भाग्य से मेरा पूर्वाग्रह सही साबित हुआ।

राष्ट्रीय अनुसूचित जाति जन जाति आयोग ने तो उत्तर देने के भी कष्ट नहीं उठाया और राष्ट्रीय महिला आयोग ने उत्तर देने की औपचारिकता तो निभाई लेकिन प्र्त्योत्तर  मे जो भारी भरकम शिकायत का फार्म भर कर भेज देने का निर्देश दिया जिसको देख कर तो मेरा माथा ही ठनक गया। फॉर्म इतना लंबा और विस्तृत था कि साधारणतः कोई महिला इसे भर ही नहीं सकती थी। फार्म मे चार मुख्य शीर्षक के अंतर्गत शिकायत कर्ता (पीढ़िता से भिन्न), प्रतिवादी (जिसके विरुद्ध शिकायत की जानी है), पीढ़िता एवं शिकायत का विस्तृत विवरण मांगा गया था। इन चारों के उप शीर्ष मे नाम, पता, मोबाइल और मेल एड्रेस्स तो सामान्य थे पर परिवार वाद संख्या, जो कि आवश्यक उल्लेख शीर्ष मे थे भरना कठिन था। फिर डर ये था कि यदि पुलिस मे भी यदि शिकायत दी जाती है और  मै इस कदम को भी आगे बढ़ा भी  दूँ तो क्या वह पीढ़िता  क्या इतनी हिम्मत और समय दे सकेगी कि इस कानूनी पेचीदगियों और संस्थानों के चक्कर लगा सकेगी?

और अंतोतगत्वा ये सच है कि हमारे देश मे  न्याय पाना साधारण और गरीब आदमी के बशकी बात नहीं है ये कानून के दांव पेंच सिर्फ अमीर, सक्षम और राजनैतिक रसूख रखने वालों के लिये ही है। गरीब और निम्न वर्ग के तबके की नियति तो मात्र इस व्यवस्था के दो पाटों के बीच पिसना ही है।  

 

विजय सहगल