"इन्सपैक्शनी-किस्से"
बैंक से दीगर लोगो के सूचनार्थ लिख दे कि बैंक का
एक निरीक्षण विभाग होता है जिसके निरीक्षक बैंक की हर शाखा का निरीक्षण साल मे एक
बार बिना किसी पूर्व सूचना के छापेमारी स्टाइल मे करते है, जो औसतन 4-5 दिन चलता है।
बैंक के ये इंस्पेक्टर बिना वर्दी के होते है पर बाकी आचार विचार कमोवेश पुलिस की
ही तरह होता है (हल्के फुल्के मज़ाक मे लिख रहा हूँ)। इस लिखे को बहुत गंभीरता से न
लिया जाये क्योंकि ये एक सामान्य प्रिक्रिया है।
किसी भी बैंक का निरीक्षण विभाग बैंक की शाखाओं और
उसके स्टाफ के बीच उसी तरह अलोकप्रिय है जैसे फिल्मों मे खलनायक या टीवी पर रवीश
कुमार की तरह सरकार के किसी भी काम मे मीन मेख निकालना या फिल्मों मे दिखाई जाने
बाली बम्बईया पुलिस जो ऐन आठवे फेरे के पूर्व खलनायक को साथ ले, हीरो-हीरोइन की
शादी के कार्यक्रम मे हवाई फायर धाँय- धाँय-
धाँय कर कुछ इस अंदाज मे रोकती हैं, ठहरो!!......... "ये शादी नहीं हो सकती"।
ठीक इसी तरह शाखा का प्रत्येक मैनेजर निरीक्षण विभाग से आये निरीक्षक को बिन बुलाये मेहमान की तरह व्यवहार
कर अपने मन मे यही विचार रखते हुए कहता है, ठहरो!!.........."ये लोन नहीं हो
सकता........" धाँय- धाँय- धाँय।
निरीक्षण विभाग मे रहने के दौरान कई बार बड़े ही रोचक और दिलचस्व किस्से सुनने को
मिल जाते थे जो बड़े मजेदार और हास्यास्पद रहते। ऐसे किस्से प्रायः
कार्यालयों मे सुने और सुनाये जाते रहे है। कुछ किस्से आप लोगो के साथ सांझा कर रहा हूँ।
एक बार एक शाखा की
निरीक्षण रिपोर्ट आई जिसमे एक व्यक्तिगत ऋण खाते की त्रुटियों का उल्लेख
निरीक्षक कार्यालय के निरीक्षक ने किया था। व्यक्तिगत ऋण खाते की एक शर्त ये भी थी
कि ऋणी द्वारा साथी कर्मचारी की व्यक्तिगत गारंटी दिलवाई जाएगी। उक्त ऋण खाते मे
चूंकि पति पत्नी दोनों राज्य सरकार की सेवा मे ही कार्यरत थे लेकिन विभाग भिन्न
होने के कारण निरीक्षक ने त्रुटि निकलते हुए लिखा "जिस साथी कर्मचारी की गारंटी ली गई
है वो ऋणी की पत्नी है?" ब्रांच
मैनेजर ने त्रुटि का निराकरण करते हुए बहुत ही सुंदर जबाब लिखा "साथी
कर्मचारी की गारंटी ले ली गई है जो ऋणी की जीवन साथी नहीं है।"
एक और प्रसंग मेरे संज्ञान मे आया। प्रादेशिक
कार्यालय इन्सपैक्शन की फ़ाइल बंद करने मे प्रायः शाखाओं के ढुलमुल रवैये से बड़ा
परेशान रहता है। अनेकों शाखाओं मे 8-10 अनुस्मारकों के बाद भी निरीक्षण की फाइले
5-6 महीने तक पेंडिंग पड़ी रहती। पर इस मिजाज के विपरीत एक शाखा के प्रबन्धक इस मामले मे बड़े ही
अनुशासित और बैंकिंग कार्यों को करने मे समय के पाबंद थे। इन्सपैक्शन के समाप्त होते ही तुरंत फ़ाइल मे उल्लेखित त्रुटियों को दूर करने
मे जुट गये। शाखा की निरीक्षण की फ़ाइल को बंद करने के अनुमत समय 90 दिन होता था जिसमे अभी कुछ समय शेष था। पर प्रादेशिक कार्यालय के
निरीक्षण विभाग ने अन्य शाखाओं के रुख की तरह ही अति उताबलेपन दिखाते हुए इन शाखा
प्रबन्धक महोदय को भी तीसरे अनुस्मारक पत्र के माध्यम से फ़ाइल को शीघ्र बंद कराने
के निर्देश दिये ताकि एकाध शाखा की
निरीक्षण फ़ाइल तो अनुमत समय 90 दिन के अंदर बंद हो जाये अन्यथा 99% शाखाये अपनी
वार्षिक निरीक्षण रिपोर्ट अनुमत समय 90 दिन के बाद ही फ़ाइल बंद करा पाती थी। शाखा
प्रबन्धक जिनकी कार्य प्रणाली अनुशासनात्मक थी, को जब तीसरा अनुस्मारक मिला तो उन्होने कार्य मे
और तेजी लाते हुए शेष त्रुटियों को
प्राथमिकता के आधार पर दूर कर वार्षिक निरीक्षण रिपोर्ट की फ़ाइल बंद करने की अनुसंशा करने का फ़ाइनल पत्र
भी प्रादेशिक कार्यालय को भेज दिया और अंततः निरीक्षण की फ़ाइल बंद भी हो गई। लेकिन
कहानी मे असली मोड़ तब आया जब उन अनुशासित शाखा के शाखा प्रबन्धक ने प्रादेशिक कार्यालय के निरीक्षण
विभाग के उस अधिकारी से यूं ही निरीक्षण फ़ाइल पर चर्चा के बहाने
पूंछा कि आपने तीसरा अनुस्मारक
फ़ाइल के बंद करने हेतु भेजा था पर पूर्व के दो रिमाइंडर तो हमे मिले ही नहीं? तब निरीक्षण विभाग के उन
अधिकारी ने बड़े राज की बात बताई। बड़े भोले पन से वे बोले मै शाखाओं के प्रबन्धकों
द्वारा निरीक्षण के कार्य को गंभीरता से न लेने के कारण मै काफी खिन्न और परेशान
रहता हूँ इसलिये मै दो अनुस्मारक न भेज सीधा तीसरा अनुस्मारक ही भेजता हूँ ताकि
शाखाएँ तीसरा रिमाइंडर देख कुछ तो महत्व
निरीक्षण के कार्य को दे!!
एक और किस्सा मै आप लोगो के साथ सांझा कर रहा हूँ।
प्रादेशिक निरीक्षण कार्यालय के एक चतुर किस्म के काइयाँ निरीक्षक ने एक शाखा के
निरीक्षण के समय एक ऋण खाते मे कुछ त्रुटियाँ निकाली। दरअसल एक ऋण खाते के मुख्य
ऋणी का देहांत हो गया था। ऋणी की मृत्यु होना कोई ऐसी बात नहीं थी जो निरक्षक या
शाखा प्रबन्धक या किसी के भी वश मे हों? बैंक के नियमानुसार मुख्य ऋणी की मृत्यु की दशा मे
एक डॉकयुमेंट मृतक के कानूनी बारिसों से लेना होता है ताकि ऋण की अदायगी की
ज़िम्मेदारी मृतक के कानूनी बारिसों से की जाये। निरीक्षक ने न जाने क्यों और कैसे
मृत्यु को त्रुटि मान लिया और निरीक्षक ने
अपनी रिपोर्ट मे उक्त ऋण खाते की त्रुटियों की रिपोर्ट मे त्रुटि नंबर एक मे लिखा
"ऋणी की मृत्यु हो चुकी है। दूसरी त्रुटि संख्या के समक्ष रिपोर्ट मे लिखा कि "मृतक ऋणी के बारिसों से ऋण
अदायगी के वचन का डॉकयुमेंट नहीं लिया गया है"। अन्य खातों की त्रुटियों
की रिपोर्ट के साथ पूरी रिपोर्ट शाखा प्रबन्धक को ऋण खातों
की त्रुटियों को दूर करने हेतु सुपुर्द कर दी गई। शाखा प्रबन्धक ने जब उक्त ऋणी के
मृत्यु की त्रुटि को देखा तो उन्हेने भी कुछ मज़ाक के लहजे मे शरारत पूर्ण जबाब
लिखा। उक्त मृतक ऋण खाते की त्रुटि को दूर करते हुए जबाबी पत्र
प्रादेशिक कार्यालय मे भेजा जो बड़ा ही
रोचक और मजेदार था। पत्र मे त्रुटि नंबर एक जिसमे लिखा था "ऋणी की मृत्यु हो
चुकी है" के जबाब मे लिखा "ऋणी की मृत्यु के संबंध मे भगवान से पत्राचार
किया गया है। ऋणी के पुनर्जन्म होने पर
आपके कार्यालय को सूचित किया जायेगा!! त्रुटि संख्या दो " मृतक ऋणी के
बारिसों से ऋण अदा करने के दस्तावेज़ ले लिये है"।
एक अन्य किस्सा जो प्रायः मै निरीक्षण कार्यालय पे सुनाया
करता था। हुआ यूं एक इंस्पेक्टर को दोनों हाथ
मे न जाने क्या समस्या हो गई कि शर्ट बनियान
या कोट पहनते वक्त जैसे ही हाथ को हल्के से पीछे करते तो हाथों मे भयंकर दर्द होता।
चिकित्सको से सलाह ली लेकिन कोई फायदा न हुआ। बड़े विशेषज्ञ डॉक्टर को भी दिखाया, एक्स-रे, एमआरआई, ब्लड आदि जो भी टेस्ट थे कराये
पर कोई लाभ न हुआ। थक हार कर हड्डियों के विशेषज्ञ को भी दिखाया कोई लाभ न मिला। एक
दिन ऑफिस के बाहर सड़क के किनारे एक नीम हाकिम को टेंट लगाकर जड़ी बूटी से रोगो का इलाज
करने बाले को देखा। लाउडस्पीकर से शर्तियाँ, गारंटेड इलाज का संदेश टेप रिकॉर्डर पर बज रहा था।
कपड़े के बोर्ड पर भी शर्तियाँ इलाज को मोटे मोटे अक्षरों मे लिखा गया
था। फायदा न होने पर पैसे बापस की भी शर्त थी। इंस्पेक्टर ने सोचा "मरता क्या
न करता" क्यों ने इसी से भी "हाथ" के इलाज की बात की जाए। वे उस नीम
हकीम के पास पहुँच गए। पच्चीस तरह की जड़ी बूटियाँ, लाल हरे पीले सहित अनेक रंगों की फर्श पर पड़ी थी। सादे
लिवास मे सिर पर पगड़ी बांधे एक नीम हकीम आदिवासी टेंट के अंदर फर्श पर चादर बिछाये
बैठा था। फीस भी ज्यादा न थी, सौ रुपए मे गारंटी के साथ इलाज की बात तय हो गई। इंस्पेक्टर महोदय
ने अपनी पीढ़ा बताई कि कपड़े पहनते समय हाथों को थोड़ा भी पीछे मोड़ने पर तीखा दर्द होता
है। उस नीम हकीम ने बिषय को आगे बढ़ाते हुए पूंछा हाथ को पीछे मोड़के पॉकेट से कंघा निकालने
मे दिक्कत होती होगी। मैंने तुरंत कहा "हाँ भाई हाँ"। उसने फिर पूंछा पेंट
की पिछली पॉकेट से पर्स आदि निकालने पर अत्यधिक वेदना होती होगी। मैंने खुशी, उत्सुकता और कौतूहल पूर्वक
कहा "हाँ भाई हाँ"। मै मन ही मन खुश था कि बीमारी का मर्ज पकड़ मे आ गया।
मै सोचने लगा पिछले दो-तीन साल के मर्ज का इलाज अब तो निश्चित ही ठीक हो जायेगा। मैंने
जिज्ञासा वश उस नीम हकीम से तुरंत पूंछा हकीम साहब बीमारी का मर्ज तो मिल गया न। उसने
ठंडी आह भरते हुए पूंछा- क्या आप "आर॰ आई॰" (रीजनल इंसपेकटोरेट) मे है? अब चौकने की बारी इंस्पेक्टर
साहब की थी। बोले तुझे कैसे पता? हकीम बोला "आर॰ आई॰" बाले शाखाओं मे जब निरीक्षण करने
जाते है तो उनका हाथ कभी पीछे पॉकेट मे जाता ही नहीं। पूरे निरक्षण कार्य मे जेब से
एक धेला भी खर्च नहीं होता होगा? जब हाथ पीछे पॉकेट मे जायेगा
ही नहीं तो पर्स भी नहीं निकलता। अर्थात इंस्पेक्टर महोदय की पांचों अंगुलियाँ घी मे
और सिर कढ़ाई मे रहता है यानि की चका-चक। हकीम बोला इस का एक ही शर्तियाँ इलाज़ है "जिस
दिन तुम्हारा ट्रान्सफर "आर॰ आई॰" से दूसरे किसी विभाग या शाखा मे हो जायेगा तो ये बीमारी उसी दिन तुरंत खत्म हो जाएगी। "आर॰
आई॰" मे रहते ये बीमारी खत्म न होने बाली। हकीम ने मक्कारी भरी हंसी छोड़ते हुए
फीस के सौ रुपए अपने पर्स मे रख लिए।
कभी कभी इस तरह के रोचक किस्से निरीक्षण कार्यालय
के उबाऊ, थकाऊ और नीरस कार्य के दैनंदिनी कार्य मे कुछ हास्य रस घोल कर
कुछ आनंदित क्षणों का निर्माण कर जाते है।
विजय सहगल


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