शनिवार, 19 सितंबर 2026

"पुणे, महाराष्ट्र मे गणपति उत्सव की धूम"

 

"पुणे, महाराष्ट्र  मे गणपति उत्सव की धूम"





















इन दिनों पूरे देश मे गणपति उत्सव अपनी चरम सीमा पर हैं। महाराष्ट्र के पुणे शहर तो  गणपति उत्सव के रंग मे पूरी तरह डूबा हैं। श्री गणपति उत्सव मे पुराने पुणे मे जगह जगह जहां श्री विघ्न्हर्ता गणेश की एक से बढ़ कर एक झाँकियाँ तो दिखाई देती है जिनके दर्शन के लिए लाखों भक्त  दर्शन की अभिलाषा लिए अपनी बारी की प्रतीक्षा करते दिखाई दिये। स्वाभाविक रूप से इसके पश्चात पेट पूजा के लिए विभिन्न व्यंजनों की भी दुकाने देर रात तक अपने स्वाद और की छंटा चारों ओर विखेरती दिखाई देती हैं। कहीं रस्सी पर झूलते करतब दिखाने वाले कलाकार एक मेले के स्वरूप का दर्शन करा रहे थे।

पूना के दस प्रसिद्ध गणपति पंडालों मे से शुरुआत शनिवार वाड़ा के कसबा गणपति, जिन्हे पूना शहर के सबसे पुराने और पहले स्थान पर रक्खा जाता है  से हुई। पंडाल के प्रवेश द्वार पर विभिन्न ताजी हरी वेलों और सफ़ेद फूलों  से द्वार को सजाया गया था। दूर तक दर्शनार्थियों की लंबी लाइने दिखलाई दे रही थी जो लोगों के भगवान श्री गणाध्यक्ष के प्रति गहरी आस्था, सम्मान और समर्पण के भावों को दर्शा रही थी। बड़े बड़े झूमरों से पंडाल को आकर्षित ढंग से सजाया गया था। चाँदी के सिंहासन पर विराजे सुंदर और भव्य श्री गणेश की प्रतिमा को लोग पूरे मनोयोग से भक्तिभाव से ओत प्रोत हो गणपति बाप्पा  मोरया के जयकारे लगा रहे थे।  पास मे ही एक अन्य पंडाल को भगवा रंग की बेलबूटे से दक्षिण भारतीय पाषाण स्तंभों की नक्काशी से सजाया गया था। केले के पेड़ों को प्रवेश द्वार के दोनों ओर रखने से पंडाल की सुंदरता और निखर आयी थी। कमल के आकार की पंखुड़ियों पर विद्धुत प्रकाश से सजाकर श्री जी की प्रतिमा के चारों ओर एक सुंदर आभा मण्डल, एक आलौकिक दृश्य उत्पन्न कर रहा था। इस पंडाल के प्रबंधन ने पेन, पेंसिल और कॉपी को चढ़ावे के रूप मे प्रोत्साहित करने का संदेश दिया था इसलिए लोग इन वस्तुओं को ही चढ़ा रहे थे जिसे बाद मे वंचित और असहाय बच्चों मे वितरित कर दिया जाएगा। ये एक अनूठी पहल थी जिसकी प्रशंसा की जानी चाहिए। एक अन्य पंडाल की झांकी मे  आकर्षक श्वेतांबर रंग मे रंगी भव्य गणेश प्रतिमा सजाई गयी थी जिसके आगे क्षीरसागर मे शेषनाग की कुंडलियों पर योगनिद्रा मे विश्राम करते भगवान विष्णु को दर्शाया गया था जिन की नाभि से कमल और उस पर विराजमान ब्रह्मा जी तथा  देवी लक्ष्मी को एक बड़े और ऊंचे मंच पर  सुदर ढंग से प्रस्तुत किया गया था।

अब बारी थी पूना के एक और प्रसिद्ध गणेश पंडाल दगड़ू सेठ हलवाई के गणपति की। दगड़ू सेठ हलवाई मंदिर को हरे मोरपंख को दर्शाती लाइट एवं  नीली और  लाल रंग की पृष्ठभूमि को  आकर्षक विद्धुत प्रकाश से सजाया गया था। नजदीक ही वृन्दावन  के सफ़ेद संगमरमर से बने प्रेम मंदिर की थीम पर पंडाल को बनाया और सजाया गया था। प्रवेश द्वार के उपर सफ़ेद रंग के गाय और उसके दूध पीते बछड़े को दर्शाया गया था जो हमारी भारतीय परंपरा के एक आवश्यक हिस्सा हैं। दगड़ू सेठ हलवाई के पंडाल मे विराजे चतुर्भुज श्री गणेश स्वर्ण आभामण्डल से सुशोभित थे। एक हाथ मे स्वर्ण त्रिशूल और दूसरे मे स्वर्ण फरसा (परशु) तीसरा हाथ  ध्यान मुद्रा और चौथे मे स्वर्ण लड्डू था। गले मे अनेक स्वर्ण हार और मालाएँ, कानों  मे स्वर्ण कुंडल, सिर पर स्वर्ण मुकुट और सूड़ पर हीरे और स्वर्ण से बने आभूषण से सुशोभित थे। ऐसा भव्य और दिव्य अलौकिक दुर्लभ दर्शन अत्यंत भावुक कर देने वाले थे। इस झांकी के पीछे ही दगड़ू सेठ की धर्मपत्नी श्रीमती लक्ष्मीबाई दगड़ू सेठ द्वारा निर्मित चाँदी के दरवाजों और स्तंभों पर चाँदी के पत्रों से सुसज्जित एक छोटा लेकिन अत्यंत आकर्षक श्री दत्त भगवान मंदिर के दर्शन भी महत्वपूर्ण और कृतार्थ करने वाले थे। जगह जगह रंग मंच पर छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन से जुड़े प्रसंगों पर आधारित नाटकों एवं मराठी लोक नृत्यों को अभिनीत किया जा रहा था। निकट ही दिल्ली के इंडिया गेट की तर्ज पर बनी एक झांकी को  हू-ब-हू इंडिया गेट की छवि का  मूर्त रूप दिया गया था राष्ट्रियता और देश प्रेम को दिखलाती इस झांकी मे इंडिया गेट के मध्य मे बिराजे गजानन की भव्य प्रतिमा एवं दोनों ओर भारतीय सैनिकों की प्रतिमाओं ने "भारत माता की जय!!" के नारे को राष्ट्र भक्ति से ओत प्रोत माहौल बना दिया था। अब तक कानों मे श्री गणपति की आरती के स्वर "सुखकर्ता दुखहर्ता वार्ता विघ्नाची, नूर्वी पूर्वी प्रेम कृपा जयाची........ जय देव!, जय देव!! जय मंगल मूर्ति............ भी कई जगह सुनाई देने लगे थे जो कि भगवान गौरीसुत की आरती का आगाज था।     

एक दूसरे पंडाल को पीले लाल रंग एवं सुंदर फूलों की माला से वंदनवार लगा कर पुरी मे भगवान जगन्नाथ के रथ का आकार दिया गया था, जिसमे विराजे श्री विनायक के दर्शन हेतु लोग पंक्तिवध होकर श्री लंबोदर के दर्शनार्थ रथ पर चढ़ रहे थे। चारों तरफ गजानन भगवान के जयकारों की गूंज या एकदंत भगवान के भजनों की गूंज सुनाई दे रही थी। अष्टलक्ष्मी महल नामक पंडाल मारुति मण्डल द्वारा सजाया गया था जो काफी कुछ कसबा गणेश पंडाल की तर्ज पर लाइट के झूमरों से सुसज्जित था। श्री तांबडी जोगेश्वरी गणेशोत्सव मण्डल की थीम शनिवार वाड़ा के मुख्य प्रवेश द्वार की तर्ज पर थी। इसी तरह गुरुजी तालीम मण्डल द्वारा जगन्नाथ पुरी के मंदिर और उसके शिखर पर लगे अष्टधातू के गोल  नीलचक्र की तरह  बनाया गया था। मंडप मे श्री सिद्धविनायक की  एक विशाल काय प्रतिमा सिंहासन आरूढ़ थी। विजय क्रिकेट क्लब द्वारा विराजित वक्रतुंड की पीछे पंढरपुर स्थित बिट्ठल भगवान की प्रतिमा थी। पास मे ही भगवान प्रथमेश्वर की खड़ी प्रतिमा थी जो एक पैर पर खड़े थे।  इस तरह लगभग सौ से अधिक छोटे बड़े पंडालों मे देवाधिदेव भगवान श्री गणेश को सिर नवा कर हमारी यात्रा का समापन भोपला घारगे बंधुओं द्वारा संचालित पुरणपोंली घर पर हुई जहां पर विभिन्न मधुर स्वादों वाली दाल पुरणपोंली और मावा पुरणपोंली के साथ मावा मोदक का सेवन किया जिन पर शुद्ध घी डाल कर परोसा गया था। यध्यपि पेट पुरणपोंली और मोदक से  पूरी तरह भर गया था लेकिन नीरा बिक्री केंद्र पर अमुरुद के स्वाद वाला सोडा शर्बत और कुछ आगे ही ताजे जामुन के पल्प से बने अनूठे स्वाद वाले पेय को पीने से अपने आप को नहीं रोक पाया। यहाँ यह लिखना अतिसन्योक्ति न होगी कि महाराष्ट्र पुलिस की, कानून व्यवस्था को लागू करने एवं  सुचारु ढंग से शांति बनाये रखने मे अहम भूमिका थी।  इस तरह पूना के श्री गणपति उत्सव के नयनभिराम दर्शन पूजा और स्वादपूर्ण पेट पूजा के साथ इस यात्रा को विराम दिया।   

विजय सहगल           

     

सोमवार, 14 सितंबर 2026

"खराब ऋण खातों (NPA) की तरह गैर निष्पादनकारी नागरिक की अवधारणा"

 

"खराब ऋण खातों (NPA) की तरह गैर निष्पादनकारी नागरिक  की अवधारणा"






एक विश्व प्रसिद्ध अँग्रेजी लोकोक्ति या कहावत है कि "Justice delayed, Justice deny" अर्थात देर से मिला न्याय, न्याय न मिलने के बराबर है। उक्त न्यायिक सिद्धान्त भारतीय न्याय व्यवस्था पर सटीक बैठता है। जहां ऐसे अपराधी, गुंडों और असामजिक तत्व जिन पर अनेकों और कहीं कहीं तो सैकड़ों आपराधिक मुकदमों के बावजूद, जिन्हे जेल की सलाखों के पीछे होना चाहिये था, वे भारतीय कानून व्यवस्था की खामियों का फायदा उठाकर वे मजे से स्वतन्त्रता पूर्वक घूम रहे  हैं। जहां एक ओर बाहुवली, धनाढ्य अपराधी  कानून को अपनी अंगुलियों पर नचाकर, मनमाफिक लाभ प्राप्त कर लेते हैं, वहीं वंचित और गरीब वर्ग   को, कानून अपनी अंगुलियों पर नचाते हुए "तारीख पर तारीख" देते हुए अपनी एड़ियाँ घिसवाने को मजबूर हो जाता है। चोरी, लूटमार और मारपीट जैसे छोटे-मोटे अपराध तो छोड़िए हत्या, बलात्कार जैसे घिनौने और गंभीर अपराध करने वाले अपराधी भी कानून के छिद्रान्वेषण का फायदा उठाकर खुले आम घूमते नज़र आते हैं। पिछले दिनों कुछ वर्ग विशेष के लोगों मे एक नयी प्रवृत्ति भी देखने को मिली जहां नबालिग भी हत्या, लूट और बलात्कार जैसे अमानवीय अपराधों मे लिप्त पाये गए ताकि अवयस्क कानून का फायदा लेकर जेल जाने और कठोर सजा पाने से बच जाएँ? ऐसे मामलों मे उन नाबालिग बच्चों के संरक्षक और परिवार के लोगों का, अवयस्क को प्रोत्साहन और संलिप्तता पर कानून के विध्यार्थियों और समाज शास्त्रियों  को शोध करने की महति आवश्यकता है। ऐसे लोग जानते हैं कि अवयस्क के लिए बने कानून के कारण अन्तोत्गत्वा न तो उन्हे कठोर कारावास और न ही फांसी की सजा मिलेगी, कम से कम जीवित तो बच जाएंगे और  शीघ्र ही छूट जो जाएंगे? कमोवेश ऐसी ही सोच और मानसिकता क्रूर, निर्दयी, नराधम, बर्बर और आदतन अपराधी की होती है कि कितने भी बड़े अपराध, दुष्कर्म और दुराचार पर उसे, लचर भारतीय कानून व्यवस्था के चलते कदाचित ही सजा मिले या मिल भी गयी तो निचली अदालत से जिला न्यायलय, उच्च और उच्चतम न्यायालय की सीढ़ियाँ चढ़ने मे लगना वाला अंतहीन समय कानून के डर से, अपराधी को  निर्भय बना देता है!! संभवतः  उसके  जीवन काल बीतने के बाद भी अदालत का अर्दली  "हाजिर हो!!" की आवाज लगता  रहे? खुदा न खास्ता यदि सजा हो भी गयी तो, सजायाफ्ता लोगों की तरह  "पैरोल" या "फरलों"  और जमानत जैसे कानून शायद ही उन्हे जेल की  दीवारों के अंदर रख सकने मे समर्थ हों?

 

भारतीय कानून व्यवस्था की इसी धीमी गति, लचर और दुर्बल व्यवस्था के चलते ही, साधारण नागरिकों का विश्वास कानून से उठ गया है या कम हो गया है। लोग त्वरित न्याय की चाहत मे कानून को अपने हाथ मे लेने से नहीं हिचकते हैं और अपराधी को त्वरित सजा के चक्कर मे स्वयं या समूहिक रूप से भीड़ तंत्र या मोब लिचिंग का हिस्सा बन स्वयं अपराध कर रहे है जो एक गंभीर चिंता का विषय है? यही कारण है कि जब देश के किसी हिस्से मे कहीं, कोई गंभीर हत्या या बलात्कार की घटना घटती है और जब संबन्धित प्रदेश की पुलिस उस अपराधी का एंकाउंटर कर अपराधी को मुठभेड़ मे मार गिराती है तो लोग वाहवाही कर पुलिस की कार्यवाही  के समर्थन मे खुल कर आ जाते हैं। इस तरह की मुठभेड़, समान्यतः  देश के सभी प्रेदेशों मे और विशेषतः उत्तर प्रदेश मे देखने को मिल रही  है और लोगों का समर्थन और स्वीकृति भी उन राज्य सरकारों को मिली  है। उत्तर प्रदेश मे तो हत्या, बलात्कार और बाल अपराधियों के विरुद्ध  पुलिस की ऐसी त्वरित कार्यवाही से बहुत हद तक कानून व्यवस्था की स्थिति मे काफी सुधार देखने को मिल रहा है। इसी कड़ी मे एक नया शब्द इन दिनों अपराध की दुनियाँ मे सुनाई दे रहा है, "हाल्फ एंकाउंटर"। ऐसी घटनाओं मे अपराध की दुनियाँ मे बढ़ रहे अपराधी के पैरों मे गोली मारकर हमेशा के लिए अपंग कर दिया जाता जो अपराध की दुनियाँ मे दुस्साहस दिखाने वाले इन नव अपराधियों को नियंत्रित करने और चेतावनी देने का पुलिस द्वारा स्पष्ट संकेत है। अपने वोट बैंक और राजनैतिक हित लाभ के लिए विरोधी दल वेशक योगी सरकार की निंदा करें, मानवाधिकार के हिमायती उत्तर प्रदेश पुलिस को कोसें या आलोचना करें या संविधान के पंडित नैतिकता की दुहाई दें, लेकिन ये स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश के आम जन, कानून प्रिय नागरिक, उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा अपनी आत्मरक्षा मे, इन मुठभेड़ की कार्यवाही से, न केवल संतुष्ट है अपितु प्रसन्नता से पुलिस के समर्थन मे खड़े हो रहे  है। हों भी क्यों न जब अपराधियों के पक्ष मे खड़े होने वाले पक्षकार, अपराधियों के मानवाधिकार की चिंता मे दुबले होकर पुलिस कार्यवाही पर सवाल उठा रहे हैं, वे क्यों भूल जाते हैं कि हत्या, बलात्कार और बाल यौन अपराध से पीढ़ित लोगों, परिवारों के भी तो मानवाधिकार हैं? जो अपराधी अपने कुकृत्यों का  कानून जानते हुए भी लोगों के विरुद्ध अपराध कर, कानून को ठैँगा दिखा सकता है तो पुलिस को भी क्यों, ये अधिकार नहीं होना चाहिये कि कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए अपराधियों  को ठैँगा दिखाये और उन्हे पुलिस का  सामर्थ्य और अपराधियों को उनकी  वास्तविक हैसियत याद दिलाये?    

बैंकों  के खराब और गैरनिष्पादन कारी ऋण संपदाओं या खातों की तर्ज़ पर देश के गैर निष्पादनकारी नागरिक के विचार की अवधारणा को यहाँ प्रतिपादित करने का विचार प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे है।                     

बैंक की लगभग 39 साल की सेवा के दौरान बैंक की कार्य प्रणाली मे बड़े भारी बदलाव देखे, विशेषतः ऋण खातों मे। संक्षेप मे ऋणी द्वारा जिन ऋण खातों मे सालों साल से ब्याज तो क्या मूलधन की राशि का एक रुपया भी  नहीं जमा किया जाता है, उन पर भी हर माह या तिमाही मे ब्याज लगाया जाता था और उस ब्याज की राशि को ब्रांच के प्रॉफ़िट मे शामिल कर एक अवास्तविक लाभ की  स्थिति पेश की जाती थी। लेकिन 1992 मे अन्तर्राष्ट्रिय बैंकिंग व्यवस्था के अनुरूप नरसिंहम समिति की सिफ़ारिशों को लागू किया गया। जिसके अनुसार  ऐसे ऋण खाते, जिनमे 3 मासिक किश्त या कम से कम,  ब्याज  की बसूली ऋणी से नहीं होती है, तो ऐसे ऋण खातों पर ब्याज नहीं लगाया जाता लेकिन इन ब्याज को अलग से लिखा जाता है और ऋणी के विरुद्ध बसूली हेतु कानूनी कार्यवाही शुरू कर दी जाती है। अनेकों वर्गिकरण के बाद कालांतर मे जब ऋणी से ऋण की बसूली मे बैंक असमर्थ हो जाता है तो ऐसे ऋण खातों को राइट ऑफ (समाप्त) कर दिया जाता है। ताकि बैंक की बैलेन्स शीट स्वच्छ और स्वस्थ बनी रहे। क्यो न बैंक के गैर निष्पादन कारी अकाउंट (NPA) की तरह देश के ऐसे अपराधी, असामाजिक तत्वों, गुंडे, बदमाश नागरिकों को "गैर निष्पादन कारी नागरिक" (एनपीसी) घोषित किया जाना चाहिये जो देश और सभ्य समाज के सामान्य मानवी के जीवन मे अपने आपराधिक कुकृत्यों से अशांति, दुःख, पीढ़ा  और क्लेश उत्पन्न करते हों?

देश के हर छोटे बड़े कस्बों और शहरों मे ऐसे अनेक उदाहरण देखने को मिल जाएंगे जब चोरी, सेंधमारी, उठाईगिरी मारपीट करने वाला एक अदना अपराधी पुलिस और कानून को धत्ता बताकर कालांतर मे बड़े बड़े अपराध करने वाला गुंडा, दादा और अपराधियों का सरगना बन गया। राजनैतिक संरक्षण के बाद तो ऐसे अपराधी ठेकेदारी, चौथ बसूली, कट मनी के साथ खनन और भू माफिया, शराब माफिया  के रास्ते पर चल संगठित अपराध तंत्र गठन करने मे कामयाब हो गए और दुर्भाग्य देखिये कि इन अपराधियों ने राजनैतिक वर्चस्व हांसिल कर समाज मे एक भय और डर का माहौल उत्पन्न किया। दाऊद इब्राहिम, अतीक, मुख्तार, विनय दुबे आदि अनेक नाम गूगल सर्च मे तलाशे जा सकते हैं। बैंक के खराब ऋण खातों को क्रमशः सब स्टैंडर्ड, डाउट फुल अर्थात संदिग्ध संपत्तियाँ  और लॉस एससेट्स अर्थात डूबंत खातों मे वर्गीकृत कर तत्पश्चात राइट ऑफ अर्थात समाप्त कर कानूनी कार्यवाही के लिए, बसूली विभाग के सुपुर्द कर देती है। इसी तर्ज़ पर क्यों न कस्बे स्तर से शुरू कर शहर और जिला स्तर पर ऐसे अपराधियों की लिस्ट बनाई जाय और उनके द्वारा किए गए अपराधों को श्रेणियों मे विभक्त कर अपराधियों का वर्गीकरण हत्या, बलात्कार, बाल यौन अपराधियों को क्रूरता की  निम्नतम श्रेणी मे रख उनकी समाप्ति को कानूनी अमलीजामा पहनाया जाय एवं उनकी सम्पत्तियों पर बुलडोजर चलकर नष्ट कर उनकी आर्थिक रीढ़ को तोड़ा जाय। सभी दलों को आपसी विचार विमर्श कर कोई ऐसा सर्वमान्य हल निकालना चाहिये ताकि अपराध और अपराधियों को नियंत्रित किया जा सके।  क्योंकि ऐसे अपराधी न केवल  मानवता के नाम पर कलंक हैं और पृथ्वी पर बोझ है अपितु सामाजिक समरसता,  शांति और सौहार्द्य के लिए गंभीर खतरा हैं, जिनकी समाप्ति कानून व्यवस्था को बनाए रखने और कानून  के प्रभावशाली  क्रियान्वयन के लिए आवश्यक है।  ताकि शांतिपूर्ण नागरिक अपना जीवन यापन  सुख, शांति और  समृद्धि  के साथ कर सके।  

विजय सहगल

शनिवार, 5 सितंबर 2026

मुचकुंड - धौलपुर

 

"मुचकुंड - धौलपुर"













ग्वालियर से दिल्ली जाते आते समय धौलपुर से सैकड़ो बार  निकलना हुआ पर भ्रमण करना नहीं हो पाया। लेकिन 11 अगस्त को गुड़गाँव की यात्रा के दौरान मैंने धौलपुर भ्रमण का कार्यक्रम बना ही लिया। धौलपुर, राजस्थान का एक मध्यम श्रेणी का एतिहासिक शहर है जो श्रीनगर-कन्याकुमारी के बीच राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 44 पर, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बीच मे, चंबल नदी के दक्षिण किनारे पर वसा है। धौलपुर मे इस पर्यटन और धार्मिक स्थल मुचकुंड के अलावा, चंबल नदी के बीहड़ों से घिरा शेरगढ़ फोर्ट, शाही बावड़ी, चंबल सफारी, गुरुद्वारा शेर शिकार साहिब, निहार टावर या घंटाघर, वन बिहार सेंचुरी और  धौलपुर पैलेस और लाइब्ररी की इमारत भी देखने लायक है। मुख्य पर्यटन स्थल घूमने के लिए 2-3 घंटे का समय मान कर मैंने धौलपुर नगर की सीमा  के शुरू होते ही अपनी कार को राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 44 को छोड़ कर बायीं ओर मुचकुंड की ओर मोड़ दिया। राज मार्ग से मुश्किल से 2-3 किमी की दूर पर मुचकुंड तक कुछ अच्छा कुछ, कच्चा मार्ग तय कर मै मुचकुंड पहुँच गया। जब तक कुंड के सामने नहीं पहुँच गये, तब तक  बाहर से मुचकुंड की दिव्यता और भव्यता का आभास नहीं हुआ। लेकिन जब प्रवेश द्वार के अंदर प्रवेश किया तो विशाल जल राशि से परिपूर्ण मुचकुंड का वैभव और गौरव देखते ही बनता था।

प्राकृतिक और धार्मिक दृष्टि से मुचकुंड के बारे मे एक दिलचस्व पौराणिक कथा है, जिसके कारण भगवान श्री कृष्ण को युद्ध भूमि से युद्ध छोड़ कर भागना पड़ा और इस तरह भगवान श्री कृष्ण का नाम "रणछोड़" पड़ा।  किवदंती है कि भगवान श्री राम की 24वीं पीढ़ी के वंशज राजा मुचकुंड ने हजारों वर्ष पूर्व इस स्थान पर साधू-संतों की रक्षार्थ अपनी सेवाएँ दी थी। थक जाने पर वे पास की पहाड़ी पर स्थित एक गुफा मे सो गए। तब देवताओं ने उन्हे वरदान दिया कि जो भी राजा की  नींद मे विघ्न डालेगा, वो तत्काल ही भस्म हो जाएगा। कालांतर मे भगवान शिव से अजेय और किसी भी अस्त्र-शस्त्र से न मारे जाने का आशीर्वाद और वरदान प्राप्त, राजा काल यवन (काली यवन), श्री कृष्ण अपनी पूर्व नियोजित रणनीति के तहत एक युद्ध से भाग कर इस गुफा मे पहुंचे। काली यवन, श्री कृष्ण को कायर समझ उनके पीछे पीछे इस गुफा मे पहुंचा। कृष्ण ने अपना पीताम्बर (पीला वस्त्र) राजा मुचकुंड को ऊपर डाल कर गुफा के अंधेरे मे छुप गए। काल यवन ने राजा मुचकुंड को श्री कृष्ण समझ अहंकार से राजा को लात मारी। जैसे ही राजा मुचकुंड की नींद मे विघ्न पड़ा, राजा मुचकुंड को देवताओं से मिले वरदान ने उनकी आँखों की  क्रोधाग्नि ने  काली यवन को भस्म कर दिया। इस तरह श्री कृष्ण ने म्लेछ राजा काली यवन का अंत बिना अस्त्र शस्त्र के करवाया और स्वयं युद्ध से पलायन करने के कारण "रणछोड़"  कहलाए। इस प्रकार यह यज कुंड एक प्रमुख तीर्थ मुचकुंड कहलाया। भगवान श्री कृष्ण से जुड़े पौराणिक प्रसंग के कारण इस कुंड का बहुत ज्यादा महत्व है। ऐसा कहा जाता है कि इस कुंड मे स्नान करने से 68 कुंडों के स्नान का फल प्राप्त होता है। इस मुचकुंड को तीरथों का भांजा भी कहते हैं।

प्रवेश द्वार से पूर्व लाल पत्थर की सपाट ऊंची दीवार पर बने खूबसूरत अर्धगोलकर झरोखे ने मन मोह लिया। साधारण से बने दोमंजिला लाल पत्थरों के भवन जिसमे कोई भी खिड़की या दरवाजे नहीं दिखे तो लगा कि ये इस स्थल का बाहरी भाग होगा और अंदर कुंड के घाट पर पहुँचने पर मेरा अनुमान सच निकला क्योंकि ये राजशाही के काल के बने मंदिरों के भवन थे जिन्हे घाट की ओर के मुख्य प्रवेश द्वारों पर शानदार वास्तु, सुंदर नक्काशी से बनाया गया था। इस कुंड की एक विशेषता है कि इस के चारों ओर 108 प्राचीन मंदिरों की श्रंखला से बनाया गया है। सभी मंदिर अति प्राचीन और राजस्थानी वास्तु कला से परिपूर्ण  राजशाही का अनुभव करा रहे थे। प्रवेश द्वार के समीप ही भगवान शिव, भगवान कृष्ण और भगवान जगन्नाथ के मंदिर भी प्राचीन मंदिर और उसके पूर्व बने विशाल आँगन तथा उस के बीच मे बने तुलसी चौबारे हमारी सनातन परंपरा के गवाह थे जहां एक स्वाबलम्बी और आदर्श परिवार की कल्पना को साकार रूप दिया गया था। हर मंदिर मे प्रातः आरती और प्रसाद का भोग भगवान को समर्पित कर, नित्य कर्म के बाद पुरोहित विधिविधान मे उपयोग लाये वर्तनों की साफ सफाई करते नज़र आए। हर मंदिर का वास्तु राजमहलों की तरह था। मंदिर की हर देहरी पर अर्धवलयाकार कोणों, उनपर उकेरी सुंदर आयताकार, वर्ग और गोलर्धों की सुंदर ज्योमिति चित्रों, से उकेरा गया था। हर मंदिर की देहरी नक्काशी दार पत्थरों के  स्तम्भ पर टिकी थी। मंदिर के बाहर बने लंबे-चौड़े पक्के लाल पत्थरों के घाट के कुछ दूरी पर पानी के 6-8 वोटों मे बड़े बड़े बिजली के लैम्प और तेज रोशनी के मास्क रक्खे तो जो शायद रात्रि के समय घाटों को प्रकाशित करने या लाइट एवं ध्वनि कार्यक्रमों मे उपयोग मे लाई जाती होंगे। प्रवेश द्वार के दाहिनी तरफ दो मंज़िला एक सुंदर भवन दिखलाई दिया जिसमे बनी अर्धगोलाकार दल्लानों को  बारीक नक्काशीदार पत्थरों की जाली से सजाया गया था। तालाब के बीच बने एक छोटे से टापू पर सफ़ेद बगुले और काली बतखों को आराम से धूप मे बैठे देखना सुकून दायक दृश्य था।    मुच कुंड के चारों ओर राजस्थानी लाल पत्थर से बने पक्के घाटों की छटा देखते ही बनती है। जब शांत कुंड के जल मे घाटों की परछाई दिखाई देती है तो कुंड की सुंदरता मे चार चाँद लग जाते हैं। मुच कुंड के समीप ही ऐतिहासिक गुरद्वारा शेरशिकार साहिब है यहाँ गुरु हरगोविंद सिंह जी ने एक खूखार शेर का शिकार कर ग्रामीणों को कष्टों से  मुक्ति दिलाई थी।    

लगभग एक किमी॰ लंबी परधि वाले इस कुंड को पैदल ही घूमने की प्रबल इच्छा तो थी लेकिन कुछ सूर्य प्रकाश से निकलती ऊष्मा और समयाभाव के कारण यह इच्छा पूर्ण न हो सकी। लेकिन सूर्योदय के पूर्व यदि इस कुंड की परिक्रमा लगाई जाय तो निश्चित ही अद्भुत अनुभव प्राप्त होगा यही अभिलाषा मन मे लिए हम अगले पढ़ाव की ओर बढ़ लिए। अपने सीमित समय मे मुच कुंड के बाद हम राज पैलेस गये चूंकि इस इमारत या महल को अब हैरिटेज होटल मे बदल दिया गया है इसलिए सामान्य लोगों के लिए इस को देख पाना निषेध था। हम उसके और आगे घंटाघर को देखने गये जो एक साधारण इमारत थी लेकिन कभी इसका अपना वैभव चरम पर रहा होगा। कुछ और आगे ही एक सुंदर लेकिन छोटा महल नुमा भवन जो वर्तमान मे पुस्तकालय है, देखी कुछ चित्रों और फोटोग्राफी के बाद बापस राज मार्ग क्रमांक  44 पर आकर गुड़गाँव की ओर प्रस्थान कर गये।

विजय सहगल             

शनिवार, 29 अगस्त 2026

श्री चिंताला वेंकटरमना स्वामी मंदिर, ताड़ीपत्री-आंध्रा प्रदेश

 

"श्री चिंताला वेंकटरमना स्वामी मंदिर, ताड़ीपत्री-आंध्रा प्रदेश "










राम लिंगेश्वर मंदिर से महज एक किमी॰ दूर तड़ीपत्री कस्बे के बीच 16वीं शताब्दी मे बना  भगवान विष्णु को समर्पित बुग्गा रामलिंगेश्वर मंदिर भी अपनी कलात्मक नक्काशी और विजयनगर साम्राज्य की शैली मे बना ये मंदिर आकर्षण का केंद्र था। 5 एकड़ मे फैले इस मंदिर का निर्माण भी विजयनगर साम्राज्य के पेम्मासानी नायकों द्वारा कराया गया था। यह मंदिर भी इसी क्षेत्र मे बहुतायत मे पाये जाने वाले काले ग्रेनाइट पत्थरों से बना है। इस मंदिर का नाम चिंताला इसलिए पड़ा क्योंकि तेलगु भाषा मे चिंताला का अर्थ है इमली का पेड़, यहाँ एक विशाल इमली के पेड़ के नीचे भगवान विष्णु की मूर्ति प्रकट हुई थी। चिंताला ऊंची ऊंची दीवारों से घिरे, आयताकार चबूतरे पर बने विशाल मंदिर के सभा मंडप, गर्भ गृह जिसमे भगवान विष्णु की काले ग्रेनाइट पाषाण की भव्य प्रतिमा दर्शनीय है। मंदिर के पीछे ही काले ग्रेनाइट से बने गरुड मंडप जो कि  रथ के आकार का बनाया गया है जो ठीक हम्पी के विट्ठल मंदिर की तर्ज़ पर बनाया गया है। मुख्य मंदिर के चारों ओर पत्थरों के स्तंभों से एक बरामदा बनाया गया था। मुख्य मंदिर और इस बरामदे के मध्य एक बड़ा और खुला परिक्रमा पथ या रास्ता था जो मंदिर प्रांगण के चारों ओर था।  भारतीय पुरातत्व सर्वे विभाग द्वारा राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों के रूप मे वर्गीकृत किए जाने वाले मंदिर मे से एक है।    

मंदिर के बाहर बने घास के मैदान के बीच मे एक 4-5 फुट ऊंचे पत्थर के चबूतरे पर लगभग 20-22 फुट लंबी/ऊंची और 2-2.5 फुट चौड़ी पत्थरों दो लम्बवत शिलाओं/स्तंभों  के ऊपर लगभग 6-7 फुट की क्षैतिज या आड़ी शिला रक्खी है इस पूरी आकृति को तुलाभारम कहा जाता है जहां पर भक्त और श्रद्धालु मंदिर मे अपने या परिवार के सदस्यों के बजन के बराबर अन्न, वस्त्र आदि दान देते रहे होगे।    

मंदिर के छह मंज़िला ऊंचे  गौपुरम या प्रवेश द्वार के आगे एक विशाल खुला मैदान है बीच मे बने रास्ते के दोनों ओर हरी घास के मैदानों ने मंदिर के आकर्षण मे चार चाँद लगा दिये हैं। ऐसा प्रतीत होता है नगर के सारे नगरवासी शाम के समय अपने इस भव्य और आकर्षित मंदिर की ओर चले आते हैं। हम लोग भी शाम के समय जब मंदिर मे पहुंचे तो चारों ओर बच्चे, महिलाओं और पुरुषों की भारी जमावड़ा था। बूढ़े और वरिष्ठ जन जहां तहां अपने अपने समूहों मे गुफ्तगू करते नज़र आये। इस तरह के अलग अलग समूह  हुए जहां तहां बैठे थे। मंदिर  का मुख्य  सभा मंडप काले ग्रेनाइट के सुदर  40 नक्काशीदार स्तंभों पर बना है। प्रत्येक स्तंभों पर बारीक नक्काशी से अप्सराओं, नृत्यांगनाओं, द्वारपालों की मूर्तियों को उकेरा गया था। इन जीवंत प्रतिमाओं की वास्तु बेजोड़ और अद्व्तिय है।  इन 40 नक्काशीदार खंभों पर बने सभा मंडप के दोनों ओर लंबाई मे बनी दलानों मे जगह जगह लोगों के समूह यहाँ वहाँ बैठे चर्चा करते नज़र आए। कुछ बुजुर्ग महिलाएं मंडप मे एक ओर समूह मे बैठी तेलगु भाषा मे भगवत कीर्तन और भजन गाती दिखलाई दी। इस सभा मंडप एवं मंदिर की दीवारों पर रामायण, महाभारत और भागवत पुराण के कथा प्रशगों को जगह जगह उकेरा गया है।  वहीं कुछ महिलाएं मंदिर मे चावल की खिचड़ी का  प्रसाद वितरित कर रहीं थी। हम लोगों ने भी इस चावल की खिचड़ी के इस  प्रसाद को ग्रहण किया जो गरम और स्वादिष्ट था। मंदिर मे बैठे कुछ वरिष्ठ जनों को अपना परिचय देकर संवाद करने का प्रयास किया लेकिन भाषा की समस्या के कारण बातचीत उतनी सहज नहीं रही लेकिन भावनाओं का आदान प्रदान भाषा के मुक़ाबले सरल और मिठास लिए था।  

मंदिर मे भगवान चिंतला वेंकटरमना स्वामी के दर्शनार्थ हम लोग गर्भ गृह की ओर बढ़े। एक छोटे से द्वार से होकर हम लोगों ने मंदिर के गर्भ गृह मे प्रवेश किया। मंदिर के गर्भ गृह मे भगवान विष्णु की 10 फुट ऊंची खड़ी प्रतिमा के दर्शन कर मै कृत-कृत हो गया। सुंदर नक्काशी दार प्रतिमा पर शंख, चक्र, गदा और शेषनाग की सैया बहुत ही सुंदरता से स्पष्ट ढंग से दृष्टिगोचर हो रहा था। गर्भ गृह की छत्त अष्टकोणीय  सुंदर नक्काशीदार पुष्प की कारीगरी देखते ही बनती है। गर्भ गृह मे स्थित प्रदक्षिणा पथ की परिक्र्मा कर हम लोग एक बार फिर मंदिर के प्रांगढ़ मे स्थित पीछे बने गरुढ़ मंडप अर्थात रथ के आकार के मंडप के दर्शन के लिए आ गए। यह रथ पत्थरों से बना था लेकिन रथ के पहिये, मंच उसके स्तम्भ और शिखर ऐसे प्रतीत हो रहा था जैसे यदि रथ को आगे की ओर धकेला जाय तो शायद  कुछ ही पलों मे आगे  चल पड़ेगा। यहाँ भी मैंने कुछ बुर्का धारी महिलाओं को मंदिर के अंदर प्रांगण मे और मंदिर के बाहर हरी घास के मैदानों मे बैठे देखा।  

मंदिर की एक पूर्ण परिक्रमा पूर्ण कर पुनः एक बार तड़ीपत्री मे इन दोनों मंदिर के दर्शन की पुनः लालसा लिए हम अपनी अगली यात्रा के लिए मंदिर प्रांगढ़ से आगे बढ़ लिए।  

 

विजय सहगल