शनिवार, 1 अगस्त 2026

चढ़ावे की चोरी मे छाती पीटते कालनेमि

 

"चढ़ावे की चोरी  मे छाती पीटते कालनेमि"






इन दिनों राम मंदिर मे चढ़ावा की चोरी करने पर स्यापा और छाती पीटने वाले झूठे, छद्म और नक़ली भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी है। आज दिनांक 31 जुलाई 2026 को तो निर्दलीय सांसद पप्पू यादव सहित समाजवादी पार्टी, कॉंग्रेस के सांसदों ने संसद मे चढ़ावा चोरी की नाटक, नौटंकी की आड़ मे जिस तरह से सनातन धर्म, भगवा और साधु संतों उपहास, अनादर और अपमान किया उसकी जितनी निंदा की जाय कम हैं। साधु संतों की इस  मार पिटाई  के इस ड्रामे के माध्यम से सनातन धर्म को बदनाम करने के इस दुष्कर्म, कुकर्म और अधर्म मे कॉंग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। इस नाटक-नौटंकी मे पप्पू यादव ने कालनेमि की तरह भगवा वस्त्र धारण कर माथे मे तिलक त्रिपुंड और माला पहनी थी और राहुल गांधी इस छद्म साधु के सामने नतमस्तक हो खलनायक की तरह  चढ़ावा चढ़ाते उस मायावी असुर का समर्थन करते नज़र आए। बेशक चढ़ावा चोरी के पापकर्म मे मंदिर मे नियुक्त कर्मचारि शामिल थे और जिनको गिरिफ़्तार कर समुचित कानूनी कार्यवाही की जा रही है। ऐसा तो हो नहीं सकता कि चढ़ावा चोरी के इन अपराधियों को बर्बर, वहशी और पाशविक कानून की तरह फांसी पर लटका दिया जाय या अंग भंग कर दिया जाय।  हमारे देश का सक्षम कानून  इस मामले मे अपना कार्य करेगा। कॉंग्रेस और समाजवादी पार्टी के सांसदों ने चढ़ावा चोरी पर बड़े बड़े पोस्टर हाथों मे लिये दहाड़-दहाड़ कर घड़ियाली आँसू बहाये और मसख़रों की तरह संसद भवन के बाहर नाटक नौटंकी की और हिंदुओं को बदनाम करने का कुत्सित प्रयास किया। राहुल गांधी ने जिस निर्लज्जता से इस घिनौने खेल मे सहभागिता की वो नेता प्रतिपक्ष की प्रतिष्ठा, गौरव और सम्मान के सर्वथा विपरीत था। विदित हो ये वही समाजवादी दल है जिसने मुस्लिम तुष्टि करण के लिये बाबरी मस्जिद विध्वंस के समय रामभक्तों पर गोली चलवाई थी!! कॉंग्रेस भी समाजवादियों  के स्वर मे स्वर मिलाते हुए इन्ही कूट धर्मनिरपेक्ष वादी कालनेमियों के साथ खड़ी  नज़र आयी,  जिन्होने हमेशा हिंदुओं के आराध्य भगवान श्रीराम को काल्पनिक बतलाया और भगवान राम के अस्तित्व को नकारने का कुप्रयास किया। जिन लोगों ने राम मंदिर के निर्माण मे फूटी कौड़ी भी नहीं दी आज वे  राहुल गांधी, अकीलेश यादव  और उनके दलों सहित इंडि गठबंधन के सभी दलों ने राम मंदिर के चढ़ावे की चोरी पर ऐसी हायतौबा, शोर शराबा और हुड़दंग किया मानो कोई बहुत बड़ी धनराशि इन दलों ने राम मदिर के निर्माण मे दान स्वरूप चढ़ावे मे दी हो। चढ़ावा चोरी को अपनी धार्मिक  आस्था मे आहत से जोड़ने वाले इन अखिलेश यादव और राहुल गांधी तथा उनके दल के नेतृत्वकारी नेताओं का दो मुंहापन देखिये कि जिस राममन्दिर के दर्शनार्थ  देश विदेश से करोड़ो श्रद्धालु अयोध्या पहुँच रहे हों वहाँ इन दोनों छद्म राम भक्तों को आज तक अयोध्या मे रामलला के दर्शनों का समय नहीं मिला।

अखिलेश यादव और राहुल गांधी एवं उनकी पार्टीयों सहित इंडि गठबंधन के सभी समर्थक दलों ने सदा मुस्लिम तुष्टीकरण के सामने सनातन धर्म पर दोयाम दर्जे का रुख रक्खा हैं, आज यही लोग चीख पुकार, हल्ला गुल्ला और चीख चीख कर कह रहे कि चढ़ावा चोरी के कारण उनकी आस्था विश्वास पर चोट पहुंची है! चढ़ावा चोरी पर उनकी भावनाएं आहत हुई हैं!! जब इन्होने भगवान के चढ़ावे को नहीं छोड़ा तो ये किसको छोड़ेंगे? इन विपक्षी दलों मे अपने आप को राम भक्त जतलाने की ऐसी होड़  लगी है जैसे उनसे बड़ा कोई दूसरा रामभक्त इस दुनियाँ मे पहले कभी हुआ ही नहीं!! आइये भगवान राम के मंदिर के चढ़ावा चोरी पर इनकी आस्था, निष्ठा, विश्वास, कितना आहत हुआ पर विचार करें? क्या कभी इन दलों या नेताओं ने मुगल आक्रांता औरंगज़ेब या बाबर के सेनापति मीर बाक़ी द्वारा राम जन्मभूमि को ध्वस्त करने पर कभी अपनी राय या टिप्पड़ी जग जाहिर की? रमजन्मभूमि निर्माण के लिये पाँच सौ साल के संघर्ष मे कभी राम मंदिर के पक्ष मे खड़े हुए?? औरंगजेब जैसे क्रूर शासक की निंदा के बोल भी कभी राहुल गांधी या अखिलेश के मुंह से निकले? चढ़ावा चोरी मे जिन बगुला भक्तों की आस्था आहत हुई, उनकी आस्था तब कहाँ चली गई थी जब पुरातत्व विभाग के तर्कों को स्वीकारते हुए  सुप्रीम कोर्ट ने भी माना कि राम मंदिर का विध्वंस कर ही बाबरी मस्जिद का निर्माण हुआ? तब उनकी आस्था और स्वाभिमान,  क्या मर गया था? और यकायक चढ़ावा चोरी पर मरी हुई आस्था राजनैतिक हित लाभ के लिए पुनः जाग गयी? तब किस मुँह से वे राम मंदिर के चढ़ावा चोरी पर सवाल कर अपनी आस्था के आहत की बात कर रहे हैं? घड़ी घड़ी अपनी आस्था को जिंदा करने और मारने वाले ये लोग, दरअसल मरी हुई जिंदा लाशे हैं जो अपने अपने वोट बैंक की खातिर सत्ता मे बने रहने के लिये राष्ट्रसम्मान का सौदा करते हैं।  इनके ये घड़ियाली आँसू अब देश के लोग समझत रहे  हैं। ये दोहरी सोच और चरित्र के लोग सिर्फ हिंदुओं और उनके आराध्य भगवान  को बदनाम करने की कुत्सित और अधम प्रयास कर रहे हैं।

राम मंदिर मे चढ़ावा चोरी का मामला विशुद्ध रूप से पैसे हड़पने, धनराशि के गबन करने और  रुपयों की धोखाधड़ी का मामला है, जैसा बैंकों, वित्तीय संस्थानों, केंद्र सरकार और राज्य  सरकार के विभागों मे कार्यरत कुछ  बेईमान, कपटी, कुटिल धोखेबाज अधिकारी और कर्मचारी करते हैं। भ्रष्ट व्यक्ति की मानसिकता मुख्य रूप से लालच, नैतिक पतन और  व्यवस्था की खामियों का मिश्रण होता है फिर वह चाहे केंद्र या राज्य सरकार, निजी या वित्तीय संस्थानों या मंदिर मस्जिद जैसे संस्थानों मे कार्यरत स्टाफ  हो।  हमे ऐसे लोगों की सराहना नहीं करना चाहिए  जिन्होने अनीति पूर्वक संपत्ति कमाई या सफलता पाई"। इसी लालची मानसिकता और भ्रष्टाचार का मनोविज्ञान के दर्शन राज्य सरकारों के नगर निगमों, रेविन्यू, आबकारी, राजिस्ट्रार, परिवहन, बिजली और खनन जैसे अन्य  विभागों, राजनैतिक दलों, वित्तीय संस्थानों  मे कार्यरत कुछ बेईमान और चोर कर्मचारियों और अधिकारियों मे भी  देखने को मिलता  है।  पैसे का  लेनदेन, रिश्वत, चोरी  और भ्रष्टाचार समान रूप से सारे देश मे हर जगह व्याप्त है।  विपक्षी दलों ने चढ़ावा चोरी को हमारी धार्मिक भावनाओं, संवेदनाओं से जोड़ कर हमारे धर्म और का उपहास उड़ाया है। धर्म से ज्यादा राष्ट्र हित सर्वोपरि मानने वाली कॉंग्रेस  के कार्यकाल मे क्या बोफोर्स जैसे रक्षा घोटाले नहीं हुए? क्या आज देश का कोई राजनैतिक दल और नेता  इस बात का दम भर सकता है कि उसकी पार्टी या उसने स्वयं आर्थिक कदाचार और भ्रष्टाचार नहीं किया? स्वतन्त्रता के बाद से अब तक देश मे  सैकड़ों हजारों भ्रष्टाचार के मामले हुए, जिसमे हर दल के नेता कहीं न कहीं  और कभी ने कभी शामिल न रहें हों? तब हमारी चोरी छोटी और राम मंदिर के चढ़ावे की चोरी बड़ी कैसे कही जा सकती है? ये तो अच्छा हुआ भारतीय संविधान मे आर्थिक कदाचार और भ्रष्टाचार से निपटने के कानून बने हैं फिर चाहे आर्थिक भ्रष्टाचार मंदिर मे चढ़ावे की चोरी से जुड़ा हो या बैंक मे घोटाले या अन्य विभागों मे भ्रष्टाचार से जुड़ा हों। लेकिन वक्फ बोर्ड मे लाखों करोड़ो के घोटाले मे कभी काँग्रेस या समाजवादी या इंडि गठबंधन के अन्य दलों ने कभी अपनी जबान खोली? कभी नहीं! क्योंकि ये ऐसा कर अपने वोट बैंक को खोने का साहस कभी नहीं कर सकते? सनातन धर्म को बदनाम करने के लिये पप्पू यादव, राहुल गांधी या अखिलेश यादव द्वारा नाटक नौटंकी कर  हिंदुओं की आस्था और विश्वास को आहत करने वाले ऐसे स्वार्थी और छद्म धर्मनिरपेक्ष राजनैतिक दलों के कालनेमियों  को अब बाज आना चाहिये?

हाँ मंदिर के चढ़ावे मे चोरी हुई है!! जो अन्य आर्थिक घोटालों, पैसे के गबन और धोखाधड़ी, बेईमानी की तरह ही सिर्फ और सिर्फ आर्थिक कदाचार है और मौजदा कानून इस चढ़ावा चोरी से  निपटने मे समर्थ, सक्षम और सुयोग्य  है, जैसे अन्य घोटालों और चोरी से निपटा जाता है। राममन्दिर चढ़ावे की चोरी मे अनेक गिरफ्तारियाँ हुई है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर एसआईटी का गठन किया है जो आने वाले समय मे चढ़ावे मे हुई चोरी पर और कठोर कानूनी कार्यवाही का रास्ता सुनिश्चित करेगा ताकि भविष्य मे ऐसे किसी अपराध करने की कोई कल्पना भी न कर सके।

विजय सहगल   

                      

शनिवार, 25 जुलाई 2026

पीएम आवास पर राहुल गांधी का धरना-प्रदर्शन मे "मेरी मर्जी"

 

पीएम आवास पर राहुल गांधी का धरना-प्रदर्शन मे "मेरी मर्जी"












जिस  इंडि गठबंधन के महत्वपूर्ण घटक कॉंग्रेस सहित अन्य दल अपने बलबूते अब तक सरकार के विरुद्ध देश मे, कोई बड़ा जन आंदोलन नहीं चला सके, वे देश के लिए एक अज्ञात, अपरिचित और अजनबी कॉकरोच जनता पार्टी के आवाहन पर कल 21 जुलाई 2026 को उनके आंदोलन के समर्थन मे शामिल हुए। राहुल गांधी ने तो अपने को अलग दिखलाने की चाह मे सारे नियम कानून और शिष्टाचार को ताक पर रख कर अराजकता की स्थिति उत्पन्न कर प्रधानमंत्री आवास के सामने धरना प्रदर्शन शुरू कर दिया, जहां सामान्य तो क्या असाधारण स्थितियों या परिस्थितियों मे भी इस तरह के प्रदर्शन की किसी को अनुमति नहीं है। अपने पद और प्रतिष्ठा का दुर्पयोग और अनधिकृत राजनैतिक हित लाभ के लिए प्रधानमंत्री की सुरक्षा को खतरे मे डाला।  प्रधानमंत्री आवास देश का एक अति संवेदनशील, सुरक्षित और महत्वपूर्ण स्थान है जो देश की प्रतिष्ठा, प्रभाव और प्रताप से जुड़ा है, जो देश की एक सौ चालीस करोड़ जनता का प्रतिनिधित्व करने का केंद्र है, भले ही प्रधानमंत्री किसी भी राजनैतिक दल का रहा हो। प्रधान मंत्री का आवास कोई धरना प्रदर्शन की जगह नहीं है जहां आप सभी लोगो को सार्वजनिक तौर  धरना-प्रदर्शन मे शामिल होने का आवाहन करें?  देश को पहले ही इस बड़ी सुरक्षा चूक की कीमत दो-दो  प्रधानमंत्रियों के  बलिदान  दे कर चुकनी पड़ी है। राहुल गांधी तो इससे भलीभाँति परिचित हैं।   प्रधानमंत्री आवास की  सुरक्षा को संकट मे डालने के, राहुल गांधी के  धरना प्रदर्शन के इस अपरिपक्व, अनैतिक और अदूरदर्शी निर्णय की जितनी भी निंदा और भर्त्सना की जाय कम है।

यही नहीं नेता प्रतिपक्ष के प्रति आदर और सम्मान का भाव प्रकट करते हुए सरकार ने अपने एक केंद्रीय मंत्रिमंडल के कैबिनेट मंत्री जितेंद्र सिंह को विपक्ष के नेता राहुल गांधी से बात करने और  इस संवेदनशील स्थल से धरना समाप्त करने के लिए भेजा। केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह से बातचीत मे राहुल गांधी ने छात्र आंदोलन और नीट (राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा) पर संसद मे चर्चा कराने की एक मात्र मांग की। मंत्री जितेंद्र सिंह ने केंद्रीय नेतृत्व से बातचीत कर इस संबंध मे सरकार की सहमति प्रदान कर दी। जब इस निर्णय से राहुल गांधी को अवगत कराया तो उन्होने अपनी बात से पलटते हुए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग जोड़ दी। जब राहुल गांधी से उनके अपनी बात से पलटने की याद दिलाई गयी तो उनका जबाव था कि "मेरी मर्जी"! मैंने पहले संसद मे चर्चा की मांग की थी अब शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग भी जोड़ दी।   कॉंग्रेस के एक सांसद और नेता प्रतिपक्ष जैसे जिम्मेदार व्यक्ति से ऐसे गैरजिम्मेदार व्यवहार की अपेक्षा कदापि नहीं की जा सकती। यही नहीं मंत्री महोदय और गृह मंत्रालय के सचिव ने जब राहुल गांधी का ध्यान प्रधानमंत्री आवास जैसे संवेदनशील स्थल पर धरना-प्रदर्शन के निषेध की याद दिलाई तो उन्होने बड़ी ही हठधर्मिता से वहीं पर धरना देने की "मेरी मर्जी" से अवगत कराया। राहुल गांधी के प्रधानमंत्री आवास के  इस धरना  प्रदर्शन पर साथ देने समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव सहित बड़ी संख्या मे उनके कार्यकर्ता भी थे। जब कॉंग्रेस और समाजवादी सहित अन्य राजनैतिक दलों ने पीएम आवास पर आंदोलन समाप्त करने के सरकार के अनुरोध की  अवेहलना की, तो बाध्य होकर, आंदोलन समाप्त कराने के लिए पुलिस बल को बुलाना पड़ा। समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव ने राजनैतिक शिष्टाचार दिखाते हुए पुलिस के आग्रह को स्वीकारते हुए अपनी गिरफ्तारी दे दी, पर राहुल गांधी ने अखिलेश यादव का अनुरोध ठुकराते हुए, धरना स्थल पर डटे रहकर धरना स्थल पर लेटने-लोटने का निर्णय लिया, ताकि ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हों कि पुलिस बलों को राहुल गांधी को बलपूर्वक घटना स्थल से हटाने के लिए बाध्य होना पड़े। अपने इस मकसद मे वे बहुत हद तक कामयाब भी हुए। राहुल गांधी का अनुसरण उनकी सांसद बहिन प्रियंका गांधी ने भी किया। पुलिस बल को असहज स्थिति का सामना करते हुए नेता प्रतिपक्ष के सम्मान का ध्यान रखते हुए  न्यूनतम बल का प्रयोग किया और उनको उठा कर बस मे जबर्दस्ती बैठा कर गिरफ्तार करना पड़ा। एक छुटभैये राजनैतिक कार्यकर्ता द्वारा लोगों की निगाह मे आने, गिरफ्तारी के पूर्व हाथ पैर पटक कर नाटक नौटंकी करना तो उचित प्रतीत लगता है पर कॉंग्रेस के एक वरिष्ठ सांसद और नेता प्रतिपक्ष का ऐसा आचरण सामान्य शिष्टाचार और नैतिक मर्यादाओं के सर्वथा विपरीत था। जिसने नेता प्रतिपक्ष जिसे गरिमा पूर्ण पद की प्रतिष्ठा को धूमिल ही किया। 

भारतीय राजनीति का खोखलापन इस आंदोलन मे स्पष्ट दिखलाई दिया। कॉंग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कॉंग्रेस, डीएमके, शिवसेना, आप और एनसीपी जैसी स्थापित पार्टियां भी मोदी सरकार के विरुद्ध पिछले बारह साल मे कोई बड़ा जन आंदोलन खड़ा नहीं कर सकी, वहीं कॉकरोच जनता पार्टी जैसी नवजात पार्टी ने अपने अस्तित्व के बाद सभी विरोधी दलों को अपना पिछलग्गू बना दिया। अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए इंडि गठबंधन के धुरंधर नेतागण  भी कॉकरोच जनता पार्टी के प्रमुख अभिजीत दीपके जैसे अनजान, अपरिचित और अज्ञात  नेता के दरबार मे हाज़िरी लगाने को मजबूर हुए!    ऐसा प्रतीत होता है कि राहुल गांधी एक के बाद एक मिली असफलताओं के कारण हीन  भावना से ग्रसित होकर एक अनाम, गुमनाम और बेनाम  कॉकरोच जनता पार्टी जैसे दल के मंच पर जाकर आंदोलन, धरना प्रदर्शन की सफलता  का श्रेय कॉकरोच पार्टी को न देकर इस आंदोलन का श्रेय स्वयं लेने के लोभ से वंचित नहीं रहना चाहते थे, इसलिए उन्होने जंतर मंतर के जगह प्रधाममंत्री आवास पर धरना देने के स्वार्थ पूर्ण निर्णय लेकर न केवल पीएम आवास की सुरक्षा को संकट मे डाला अपितु अपनी  अधम राजनैतिक स्वार्थपरता, अवसरवादिता और खुदगरजी का परिचय दिया जो निंदनीय है।

ऐसा नहीं था कि एनईईटी  पेपर लीक की घटना कोई पहली अनोखी घटना थी। कॉंग्रेस शासित राजस्थान मे अशोक गहलोत सरकार के कार्यकाल मे 17 पेपर लीक की घटनाएँ हुई जिनमे सब इंस्पेक्टर परीक्षा, जेईएन परीक्षा 2021, आरईईटी परीक्षा, कांस्टेबल भर्ती परीक्षा प्रमुख हैं। कॉंग्रेस शासित हिमाचल प्रदेश मे भी जेओए-आईटी परीक्षा 2022, पुलिस कांस्टेबल भर्ती परीक्षा 2022, सीपीएमटी परीक्षा 2006 के पेपर भी लीक हुए थे। तेलेंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडू राज्यों मे भी पेपर लीक की घटनाएँ देखने को मिली। उत्तर प्रदेश मे मुलायम सिंह की सपा सरकार के कार्यकाल मे भी  एक जाति विशेष के लोगों की बहुतायत मे पुलिस भर्ती की अनियमितताएँ हुई। लेकिन इन सरकारों ने भी अपने स्तर पर कड़ी कानूनी कार्यवाही कर अपराधियों के विरुद्ध कार्यवाही की गयी। एनईईटी परीक्षा लीक कांड  के भी 13 अपराधियों को गिरफ्तार कर सरकार ने कड़ी कार्यवाही की है। लीक परीक्षा को निरस्त कर दुबारा परीक्षा कराई गयी ताकि परीक्षार्थियों को न्याय मिल सके और ऐसा हुआ भी। हजारों सफल परीक्षार्थियों ने अपनी इस दुबारा हुई एनईईटी परीक्षा का जश्न मनाया। योग्य अभ्यर्थियों का चयन दुबारा से की गयी परीक्षा मे किया गया। कल प्रधानमंत्री ने भी दुबारा,  मंगलवार 21 जुलाई 2026 को  एनडीए संसदीय दल की बैठक मे पुनः अपनी इस प्रतिबद्धता को  दोहराया कि नीट पेपर लीक के दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा और उनके विरुद्ध मिसाल कायम करने वाली सख्त कार्यवाही की जाएगी। छात्रों का भविष्य प्रभावित न हो इसीलिए नीट को दुबारा कराया गया।

इसीलिए आवश्यकता इस बात की है कि सरकार सहित विपक्षी दलों को मिल बैठकर पेपर लीक की इस गंभीर समस्या पर संसद मे सार्थक चर्चा कर सर्वमान्य हल निकालना चाहिए और किसी कड़े नए कानून बनाने की पहल करना चाहिए  ताकि असामाजिक और अराजक तत्व देश के युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ न कर सकें।

विजय सहगल                               

              

रविवार, 19 जुलाई 2026

पेन की दुकान, वाराणसी

 

"पेन की दुकान, वाराणसी"










24 अक्टूबर 2025 को वाराणसी के बाज़ारों और गलियों मे निरुद्देश्य  भटकने, घूमने का एक अलग ही मजा है। पहले बचपन मे अपनी बुआ और ताऊ के साथ वर्षों पहले शायद 1971-72 मे बनारस जाना हुआ था। 7-8 दिन का प्रवास था। गोदौलिया मे सत्यनारायण धर्मशाला मे रुके थे, इस दौरान धर्मशाला से दशाश्वमेध घाट मे सुबह स्नान और विश्वनाथ मंदिर दर्शन लगभग नित्य का क्रम था। इन तीनों जगह को जोड़ने और मोड़ने वाली  गलियों और मुहल्लों मे भटकने और घूमने से रास्ते लगभग याद हो गये थे। एक बार फिर से आज पुरानी घुम्मकड़ी और यायावरी की यादें ताजा हो आयी। भटकाव और घूमने फिरने के बावजूद एक प्राचीन सत्यनारायण मंदिर तो दिखा  लेकिन फिर भी  वो धर्मशाला और उसमे स्थित भगवान विष्णु की भव्य प्रतिमा का मंदिर  नहीं मिला। बाजार मे एक ठेले पर ड्रैगन फ्रूट के सुंदर गुलाबी रंग मे सजे फलों और एक फुटपाथ पर बांस की तीलियों और खपच्चियों से बने सूप, डलियाँ और दौल्ले को देख उनकी फोटो के लोभ से मै न बच सका। दशाश्वमेध घाट से बापसी के दौरान पेन को॰ नाम की एक पेन की दुकान ने भी मेरा ध्यानकर्षण किया जहाँ मै ठिठक कर  रुके बिना नहीं रह सका। दुकान का बाहरी आवरण और रूप और साज सज्जा बड़ी आकर्षित तो थी ही परंतु आज के कम्प्युटर युग मे स्याही-पेन, निब जैसी वस्तुओं की दुकान को देखना किसी आश्चर्य और अचरज के समान था क्योंकि आज के कम्प्युट्रीकरण ने लिखने-लिखाने के इन माध्यमों को चलन और प्रचलन से बाहर कर दिया है।

हमे याद है कि हमारे स्कूल के समय मे कलाम, दवात हमारे पढ़ाई-लिखाई का एक अहम हिस्सा हुआ करती थी। स्याही से कॉपी पर लिखना तो कम होता पर स्याही से हाथ और स्कूल ड्रेस की रंगाई पुताई ज्यादा होती थी। काँच की छोटी शीशी कहीं किसी साथी के पैर का निशाना बन लुड़कती-पटकती चारों खाने चित्त हो जाती और दवात, स्याही से अपनी यात्रा के निशान चारों तरफ छोड़ जाती। स्कूल जाते या घर आते मे कभी दवात की स्याही जेब या स्कूल बस्ते  मे ही खाली हो जाती और अंतरंग अंगों और स्कूल किताबों/कॉपी को सराबोर कर जाती। किसी साथी की शर्ट पर पीछे  स्याही छिड़कर शैतानी करना बच्चों का प्रिय शगल था। बैसे तो प्रचलन मे नीली स्याही ही ज्यादा चलन मे थी पर काली और लाल स्याही का चलन भी था। कभी कभी प्रधानाचार्य या अन्य अध्यापकों द्वारा हरी स्याही का भी उपयोग किया जाता जो आभिजात्य वर्ग की पहचान होता था। साधारण स्याही तो एक टिक्की (दवाइयों की गोली की तरह) को पानी मे घोलकर बन जाती थी लेकिन कैमलिन कंपनी  नाम की स्याही आम प्रचलन मे थी पर उच्च श्रेणी की स्याहियों मे चेल्पार्क जेट ब्लैक, पार्कर क्विंक भी चलन मे थी जो बड़े शहरों मे ही बड़ी दुकानों मे मिलती थी।

जब पाँचवी कक्षा मे था पहली बार बांस की कलम की जगह फाउंटेन इंक पेन का इस्तेमाल किया था। एक अलग है रौब और रुतबे के साथ पेन को  स्कूल बस्ते मे रख कर अकड़ कर चलते थे मानों कोई बहुत बड़ी बंदूक हाथ लग गयी हो। पहली पहली बार इंक पेन हाथ लगा था। उसके सभी पार्ट्स यथा, निब, निब को सपोर्ट और स्याही की निर्बाध आपूर्ति करने वाला प्लास्टिक का फीड, निब और फीड को एक एक खोखले  के ऊपर मे फँसाने वाला हिस्सा जिसके निचले हिस्से को स्याही की ट्यूब के साथ चूड़ी से कसने वाला हिस्सा,  स्याही की टंकी या ट्यूब, ढक्कन और हुक जिसकी सहायता से पेन को शर्ट की जेब मे पेन को लगाते हैं। प्रायः स्याही की टंकी और निब के हिस्से से स्याही लीक कर जाती जिससे हाथों के साथ शर्ट की जेब भी खराब हो जाती। निब के पॉइंट से लिखते लिखते कभी कभी निब का आकार-प्रकार बिगड़ जाता जिसे ऊपर नीचे कर कभी पेन चल जाता और कभी उसके सिरे का एक हिस्सा टूट कर निब बेकार हो जाता। निब भी अनेक ब्रांड के बाजार मे मिल जाते। फाउंटेन पेन के साथ स्याही की निब वाली कलम भी चलन मे थी जिसे स्याही दवात मे डुबो डुबो कर लिखा जाता था। उन दिनों ओम स्पेशल पेन का चलन झाँसी मे होता था, हमारे एक परिचित प्रदीप कंचन ने भी अपने घर पेन की फ़ैक्टरि लगाई हुई थी।  अनेक रंगों और आकार प्रकार के पेन मिलते थे। कागज के डिब्बों मे दस की संख्या मे रंग-बिरंगे पेन के डिब्बे आकर्षण का केंद्र होते थे। जब कभी फाउंटेन इंक पेन नहीं चलते तो हाथ से स्याही को छिड़क छिड़क कर चलाने का प्रयास करते। परीक्षाओं मे एक-दो अतिरिक्त पेन आकस्मिक उपयोग के लिए रक्खे जाते कहीं किसी पेन ने धोखा दे दिया तो परीक्षा मे उत्तर लिखने कहीं कोई चूक या कमी न हो जाय।

पेन को॰ दुकान मे पेन की अनगिनित रंग-रूप की श्रेणियाँ देख कर मुझसे दुकान मे प्रवेश करने से रहा न गया। सामने काउंटर पर दुकान के मालिक एक नौजवान से जिसने अपना परिचय निशांत साहू नाम से कराया। उन्होने बतलाया कि ये दुकान उनके दादा स्व॰ तारा प्रसाद साहू ने 1946 मे शुरू की थी, वे तीसरी पीढ़ी हैं जो अपने पैतृक व्यवसाय को आगे बढ़ा रहे हैं। मैंने अपना मन्तव्य/उद्देश्य  निशांत को बतलाते हुए कहा कि मै  आपकी दुकान की तरफ इसलिए आकर्षित हुआ क्योंकि आपकी दुकान ने अस्सी-नब्बे दशक की यादें ताज़ा कर दी और दूसरे मेरी जिज्ञासा थी कि  आज के कम्प्युटर युग मे  महज लेखनी, पेन स्याही के व्यापार  विनिमय से जीवन यापन कैसे संभव, सहज और सुलभ हो रहा होगा? निशांत ने बतलाया कि आज भी पुराने स्याही पेन के पारखी, प्रशंसक और क़द्रदान इस संस्कारधानी बनारस मे हैं। उनकी दुकान पर दस-पंद्रह रुपए से दो  लाख रुपए तक का मोंटब्लंक कंपनी का पेन हैं जो नक्काशीदार कारीगरी का नायाब नमूना है जो पूर्णत: अखरोट की लकड़ी से बना है। इस पेन को वे दुकान के एक छोटे लॉकर मे सुरक्षित बंद कर रखते हैं। आज ये शहर की इकलौती दुकान हैं जहां देश विदेश के फाउंटेन पेन, स्याही और अन्य संबन्धित सामाग्री मिलती हैं। कुछ चमत्कारिक और अजूबे पेन का संग्रह भी इनकी दुकान मे प्रदर्शित है।  पूर्व ब्रिटिश प्राइमिनिस्टर विसटन चर्चिल सहित अनेक  नाम चीन हस्तियाँ हमारी इस दुकान पर आ चुकी हैं। आज भी पुराने पेन की मांग हैं जिन्हे खरीदने लोग यहाँ आते हैं। इंडिया टूड़े के राजदीप सरदेसाई ने इनकी दुकान के बारे मे एक छोटी डॉकयुमेंट्री भी प्रसारित की है। विभिन्न प्रकार के पेनों के साथ विभिन्न प्रकार की स्याही की आकर्षक दवात भी उनकी दुकान मे देखने को मिली जो एक अद्भुत अनुभव था।

अगली बार जब आप वाराणसी जाय तो  बाबा विश्वनाथ के दर्शन कर वाराणसी के अन्य प्रसिद्ध स्थलों के साथ पेन को॰ पेन की दुकान का भी अवश्य भ्रमण करें।

 

विजय सहगल                       

शनिवार, 11 जुलाई 2026

बिच्छू का मंत्र न जाने साँप के बिल मे हाथ डाले

 

"बिच्छू का मंत्र न जाने साँप के बिल मे हाथ डाले"!!










28 जुलाई 2024 की बात है। दाना पानी संस्था के प्रमुख आदरणीय राज चड्ढा जी ने ग्वालियर स्थित शारदा बाल ग्राम मे एक वृहद वृक्षा रोपण का कार्यक्रम रक्खा था। यहाँ मै संक्षिप्त मे वृक्षा रोपण की चर्चा कर इस ब्लॉग के  मूल शीर्ष बिच्छू का मंत्र न जाने........ पर ज्यादा ज़ोर दूंगा।  राज चड्ढा जी ने दो-तीन दिन पहले से शारदा बाल ग्राम की पहाड़ी पर अपने प्रयास और प्रभाव से लगभग 500 गड्ढे कराये थे। पेड़ो और पौधों की व्यवस्था भी रोपने के एक दिन पहले भली भांति कर ली गयी। तय वक्त और दिन पर आश्रम के प्रमुख स्वामी श्री ब्रह्मयोगानन्द जी अगुआई मे आश्रम के प्रबन्धक संजय करकरे एवं आश्रम मे रहने वाले बच्चे-बच्चियों के अलावा बड़ी संख्या मे दाना-पानी संस्था के सदस्य उनके परिवार और बच्चों की शारदा बाल ग्राम मे उपस्थिति ने वृक्षा रोपण कार्यक्रम को अति भव्य और महत्वपूर्ण बना दिया था। हर कार्यक्रम मे अपनी सक्रिय भागीदारी दर्ज़ कराने वाली श्रीमती नीति चड्ढा भी उस कार्यक्रम मे  उपस्थित थी, दुर्भाग्य से वे आज हमारे बीच नहीं हैं, हम उन्हे सादर नमन करते हैं। सभी लोगो मे बड़ा उत्साह था। छोटे छोटे बच्चों बड़े बुजुर्गों और नौजवान किशोरों ने वृक्षारोपण कार्यक्रम का लगभग 500 पेड़ो को रोप कर और उनमे तुरंत ही दूर दराज से पानी लाकर, पेड़ों डाल  कर अत्यंत सफल बनाया। कार्यक्रम के बाद आश्रम के बच्चों सहित सभी उपस्थित समूह के लिए स्वल्पाहार की व्यवस्था थी जिसकी ज़िम्मेदारी मेरे ऊपर थी। 

शारदा बाल ग्राम की एक-डेढ़ किमी॰ क्षेत्र मे फैली पहाड़ी पर  लगभग दो घंटे के इस श्रमसाध्य वृक्षा रोपण के बाद, सभी लोगो को शारदा बालग्राम मे स्थित शिकागो भवन के मुख्य द्वार पर एकत्रित होना था जहाँ छोटे-बड़े लगभग डेढ़ सौ लोगो के स्वल्पाहार के लिए समोसे और फल की व्यवस्था की गई थी। शिकागो भवन जो एक छोटी ऊंची पहाड़ी के मध्य मे बना है और उसके दोनों ओर आने जाने के दो रास्ते अलग अलग बने है।   आश्रम का मुख्य दरवाजा शिकागो भवन से लगभग आधा-पौना किमी॰ अंदर था, मैंने ये सोच कर कि बालग्राम मे पौधों, पानी, स्वल्पाहार आदि कार्यों को सुचारु रूप और त्वरित गति से संपादित करने हेतु अपनी टाटा-नेक्सोन कार की सेवाएँ लेना उचित समझा जिसे कुछ माह पूर्व ही मैंने क्रय किया था। मै टाटा की इस कार को चलाने मे अभी इतना निष्णात, निपुण दक्ष नहीं था। यध्यपि, मेरा इस दौरान दो-तीन बार कार से शिकागो भवन के एक रास्ते से प्रवेश कर दूसरे रास्ते की ढलान पर कार के  हैंड ब्रेक अच्छी तरह लगा कर, एक तरफ रोक कर खड़ा करना हुआ था। कहीं किसी तरह की कोई परेशानी नहीं थी। इसी क्रम मे इस बार भी किसी कार्यवश फिर से कार से आना हुआ और जल्दीबाजी या यूं कहें नासमझी मे मैंने इस बार भी कार को एक तरफ से चढ़ा कर दूसरी तरफ की ढलान पर खड़ा कर दिया और हैंड ब्रेक लगाना भूल गया। जैसे ही मै कार से नीचे उतर कर  कार्यक्रम स्थल की ओर कुछ कदम  बढ़ा पाता, वही कार्यक्रम स्थल पर खड़ी मेरी श्रीमती जी ने कहा कार आगे बढ़ रही है, क्या ब्रेक नहीं लगाया? जब तक मै पीछे मूढ़ कर, कार को रोकने के लिए दौड़ता कार धीरे-धीरे ढलान की ओर बढ़ गयी। गनीमत थी कि रास्ते मे कहीं कोई बच्चा या बड़ा नहीं आया और साथ ही  रास्ते के एक दूसरे किनारे पर नाली बनाने के कारण मिट्टी का ऊंचा ढेर था जिस पर कार आगे बढ़ी। मै तो ये सोच कर सिहर उठा कि अब कार मिट्टी के ढेर को लांघ कर नाली के गड्ढे मे गिरी!! नई कार को इस तरह अपनी आँखों के सामने गड्ढे की ओर बढ़ते, गिरने की सोच कर ही मेरे रोंगटे खड़े हो गए। लेकिन ये क्या!! कार मिट्टी के ढेर पर तो चढ़ी और उसके दोनों अगले  पहिये हवा मे लटक कर झूलने लगे और कार के नीचे की तली मिट्टी के ढेर से रगड़ कर रुक गयी। अगर कुछ कदम कार और बढ़ती तो निश्चित ही आगे गड्ढे मे गिर जाती!! ईश्वर का लाख लाख शुक्र था कि घटना स्थल के पास इतने बच्चों-बड़ों की भीड़ के बावजूद कोई बड़ी अनहोनी, दुर्घटना होने से बच गई और कार को भी कुछ नुकसान नहीं हुआ।

जो जैसा हुआ वो यहाँ तक तो फिर भी  ठीक रहा, लेकिन इसके बाद जो हुआ वो इस ब्लॉग के हेडिंग या शीर्षक को चरितार्थ करने वाला भयावह अनुभव था, जिसको याद कर भय से पूरे शरीर मे सिहरन पैदा हो जाती है। हुआ यूं कि कार के अगले पहिये अब भी हवा मे झूलते हुए लटकी थी। मै तो हक्का-बक्का हो किंकर्तव्य विमूढ़ता को प्राप्त,  अपनी सुधि-बुध खो बैठा। दुर्घटना स्थल को देख मेरे  हाथ-पैर फूल  गए कुछ सूझ नहीं रहा था कि क्या करूँ? अचानक वहाँ भीड़ मे उपस्थित एक सज्जन अति उत्साह से आए बोले मैंने बड़े बड़े मंत्रियों की कार चलाई हैं, लाओ मै गाड़ी को बैक कर निकलता हूँ। मै उन सज्जन को नहीं जानता था इस लिए संकट की इस घड़ी मे उनको, अपनी कार की चाबी दे दी। उन्होने अति उत्साह से कार का दरबाजा खोल, ड्राईवर सीट पर बैठ कर कार स्टार्ट की। अब तक मै संयत हो चुका था मैंने उन सज्जन को सौजन्यता वश धन्यवाद देते हुए कहा,  "कि आप बैक गियर मे गाड़ी चलाये हम एक दो लोग बोनट पर आगे से कार को पीछे की तरफ धकेलते है। जैसे ही अगले पहियों को जमीन की थोड़ी सी पकड़ भी  मिलेगी तो  कार पीछे हो जाएगी और धीरे से कार को मिट्टी के ढेर से उतार लेगी।     

हम एक दो लोग कार के आगे खड़े हो बोनट से पीछे की ओर धकेलने लगे लेकिन जब  कार के पहियों को  पीछे  घूमते न देख, आगे की ओर घूमते देखा तो मुझे समझते देर न लगी कि कार मे बैठे सज्जन को नेक्सोन कार चलाने का अनुभव नहीं, क्योंकि नेकसोन कार का पिछला गेयर और छठा गैयर दाहिने साइड मे पीछे एक ही दिशा मे लगते हैं।  फर्क सिर्फ इतना है कि बैक गेयर लगाते समय गेयर बॉक्स के, एक लीवर को साथ साथ ऊंचा उठाना पड़ता है। गनीमत ये रही कार के स्वतः आगे बढ्ने पर तो कोई बड़ी दुर्घटना नहीं हुई पर उन नासमझ  सज्जन ने बैक गेयर के बजाय गाड़ी को छठे गैयर मे आगे गेयर को लगा दिया था, जिसेस कार आगे बढ़ जाती!! पर कार के पहिये आगे घूमने के बावजूद आगे नहीं बढे  क्योंकि उसके दोनों अगले पहिये हवा मे झूल रहे थे।  इस तरह, होने वाली संभावित दुर्घटना केवल इस लिए नहीं घटी क्योंकि कार के पहिये हवा मे झूल रहे थे। यदि उन सज्जन के छटे गेयर मे गाड़ी चलाने मे पहियों को कुछ जमीन का आधार मिल जाता तो गाड़ी आगे तेजी से बढ़ती और मेरे सहित अन्य लोग जो कार के आगे खड़े होकर, पीछे धकेलने का प्रयास कर रहे थे, रौंदते हुए निश्चित ही कार गड्ढे मे गिर जाती और एक और बड़ी अनहोनी दुर्घटना  हो सकती थी? पर कहते हैं जाको राखे साइयां मार सके न कोय!!

ईश्वर का निश्चित ही मेरे ऊपर अपार स्नेह और आशीर्वाद था, मित्रो की शुभकामनायें थी कि पहली दुर्घटना मे जहां कार गड्ढे मे गिरने से बची वहीं दूसरी दुर्घटना मे यदि कार आगे बढ़ जाती तो पहली घटना से बड़ी दुर्घटना हो सकती थी जिसमे आगे खड़े लोगो की  जान को खतरा हो सकता था। फिर मैंने शांत और संयत होकर स्वयं ही गाड़ी को पीछे किया। अनहोनी टल चुकी थी। ईश्वर को पुनः एक बार आभार ज्ञापित कर हम बच्चों की खुशियों मे शामिल होकर उनके सांझीदार बने। कहने का तात्पर्य यह है अतिउत्साह और जोश मे ऐसे किसी कम को न करें जिसकी जानकारी आप हो ही नहीं अर्थात बिच्छू का मंत्र न जाने और साँप की बाँबी मे हाथ डालें!!

विजय सहगल