रविवार, 3 मई 2026

चुनाव 2026-शाबाश!! भालो करा, प॰ बंगा

 

"चुनाव 2026-शाबाश!! भालो करा, प॰ बंगा"







पश्चिमी बंगाल राज्य की बांग्लादेश से 2217 किमी लंबी सीमा लगी होने के कारण,    स्वतन्त्रता के बाद से पश्चिमी बंगाल राज्य के चुनाव सदैव से ही बंगलादेशी घुसपैठ, राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे विषय पर एक संवेदनशील मुद्दा रहा है। 1977 से 2011 तक लगभग 34 साल के मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट सरकार और 2011 से 2026 तक पिछले 15 वर्षों से तृणमूल कॉंग्रेस की सरकारों पर अवैध बंगलादेशी घुसपैठियों को आश्रय देकर चुनाव धांधली के आरोप लगते रहे हैं। इन दलों पर समय समय पर ये भी आरोप लगे हैं कि एक संगठित अपराध व्यवस्था स्थापित कर लोगों को मताधिकार से वंचित कर सरकार के हर स्तर पर कट मनी, कमीशन  के माध्यम से भय और भ्रष्टाचार स्थापित कर चुनावों को जीता नहीं अपितु लूटा गया है। ये पहली बार हुआ हैं कि चुनाव आयोग ने अपने अधिकारों और शक्तियों  का उपयोग कर इन संगठित अपराधियों की इस व्यवस्था को ध्वस्त कर निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव कराएं गए है जिसका नतीजा पश्चिमी बंगाल मे अब तक का उच्चतम मतदान प्रतिशत से दिखलाई दे रहा है।                                    

पाँच राज्यों मे हुए 2026 के मतदान का परिणाम कुछ भी हो लेकिन जिस तरह पश्चिमी बंगाल के मतदाताओं ने चुनाव मे देश की स्वतन्त्रता के बाद से, दोनों चरणों मे अब तक हुए  92.47% से अधिक मतदान कर, देश मे अब तक के सर्वाधिक मतदान का  रिकॉर्ड तोड़ दिया, इसके लिये पश्चिमी बंगाल के मतदाता बाकई मे बधाई के पात्र हैं। इस मतदान की एक और खूबी ये रही कि इस मतदान प्रतिशत मे पुरुषों का मत प्रतिशत 91.74 के मुक़ाबले महिलाओं का मत प्रतिशत 93.24% रहा है जो जो पुरुषों की तुलना मेन  1.5 प्रतिशत अधिक रहा, जो  भी एक रिकॉर्ड है। जिस प॰ बंगाल मे कोई भी इलैक्शन, चुनाव पूर्व, चुनाव के दौरान और चुनाव के पश्चात  हिंसा, हत्या और आगजनी के बिना  कभी संभव न हुआ हो उस बंगाल मे चुनाव 2026 का चुनाव छुट-पुट हिंसा को छोड़कर बिना किसी बड़ी हिंसा और हत्या के पश्चिमी बंगाल मे चुनाव संपादित होना एक बहुत बड़ी उपलब्धि मानी जानी चाहिये। बिना भय, पक्षपात और हिंसा के स्वतंत्र  चुनाव संपादित कराने मे केंद्रीय चुनाव आयोग और पश्चिमी बंगाल राज्य चुनाव आयोग की जितनी भी प्रशंसा की जाय कम है। सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत  ने भी एक नागरिक के तौर पर पश्चिमी बंगाल के पहले चरण मे हुए सर्वाधिक चुनाव मतदान के लिए राज्य की  जागरूक जनता   की प्रशंसा और बड़ाई की है। उन्होने कहा कि एक नागरिक के रूप मे हुए इतने अधिक मतदान के लिए उन्हे गर्व महसूस हुआ है। केंद्रीय और राज्य चुनाव आयोग ने पश्चिमी बंगाल के चुनावी हिंसा के इतिहास को देखते हुए, कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए बड़ी संख्या मे केन्द्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती की  भी एक महत्वपूर्ण भूमिका रही है। पश्चिमी बंगाल चुनाव 2026 के पूर्व चुनाव सूची का विशेष गहन पुनिरीक्षण (SIR) के दौरान  लगभग 92 लाख मतदाताओं का नाम काटे जाने से उपजे  संभावित टीएमसी के असंतोष को  देखते हुए केंद्रीय सुरक्षा बलों की अतिरिक्त तैनाती करना और भी आवश्यक हो गया था।

चुनाव 2026  की घोषणा के बाद जिस तरह से चुनाव आयोग ने सक्रिय होकर उन राज्य पुलिस कर्मियों और अधिकारियों के विरुद्ध  सख्त रुख अपनाया और केंद्रीय बलों के साथ राज्य पुलिस की संयुक्त तैनाती कर एक कठोर संदेश राज्य के राजनैतिक दलों के बाहुबलियों, गुंडों और असामाजिक तत्वों को दिया गया कि राज्य मे स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों मे किसी भी गड़बड़ी, हिंसा और अराजकता को सख्ती से निपटा जाएगा। जिसका असर ये हुआ कि एक ओर तो टीएमसी के इन संगठित छुट भैये अपराधियों, गुंडों  और अराजक तत्वों को समय रहते चुनाव पूर्व हिंसा फैलाने से रोका गया वहीं दूसरी ओर  राज्य के मतदाताओं द्वारा  बिना भय, पक्षपात के निडर होकर अब तक के सर्वाधिक मतदान को इस सुखद परिणाम के रूप मे देखा जा सकता है, इसलिए तृणमूल कॉंग्रेस सरकार का  चुनाव आयोग पर ये आरोप लगाना कि केंद्रीय बलों की तैनाती राज्य की जनता को डराने के लिए की गयी हैं,  सच से परे मिथ्या  है। ये कहना अतिसन्योक्ति न होगी कि यदि केंद्रीय सुरक्षा  बलों, राष्ट्रीय जांच एजन्सि सहित अन्य राज्य पुलिस बलों  की तैनाती नहीं की गयी होती तो राज्य के टीएमसी द्वारा पोषित संगठित अपराधियों द्वारा पिछले चुनावों की तरह चुनावी  हिंसा, आगजनी, बमबाजी, हत्या को उसी तरह अंजाम देकर भय के माहौल को बनाया जाता जिससे शांति पसंद मतदाता कदाचित ही मतदान के लिए मतदान केन्द्रों तक निकलते।

जहां एक ओर राज्य मे हुए सर्वोच्च मत प्रतिशत देखने को मिला वही टीवी मीडिया पर आम मतदाताओं के विरोधाभाषी ब्यान चिंतित, हैरान और परेशान करने वाले है। विभिन्न टीवी चैनलों पर जहां मुस्लिम बाहुल विधान सभा क्षेत्रों मे महिला सुरक्षा, बेरोजगारी और टीएमसी के  भ्रष्टाचार कट मनी जैसे विषयों के बावजूद  खुल कर ममता के प्रति समर्थन व्यक्त किया इसके विपरीत अन्य विधान सभा क्षेत्रों मे हिन्दू  मतदाताओं ने महिला सुरक्षा, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार जैसे विषयों पर चर्चा तो की लेकिन खुल कर किसी भी राजनैतिक दल के पक्ष मे समर्थन व्यक्त नहीं किया। इन मतदाताओं के चेहरे पर टीएमसी के बदलाब या भाजपा के समर्थन का सुनते ही एक अदृश्य भय देखने को मिल जाता जिसको उनके चेहरों पर उभरे भावों को देख कर स्पष्ट रूप से देखा और पढ़ा जा सकता था। इसका एक बड़ा कारण टीएमसी के मुस्लिम नेताओं औग गुंडों द्वारा सिर्फ हिन्दू समुदाय और उनकी महिलाओं के साथ अभद्रता, दुर्व्यवहार और धमकी देकर वोट देने से रोकने की घटनाएँ देखने को मिली ऐसी अधिकतर घटनाएँ 24 परगना जिले के फालता क्षेत्र मे दिखाई पड़ी जहां से टीएमसी के विधायक जहांगीर द्वारा डराने, धमकाने की घटनाएँ सुनाई दी।  पूरे देश मे सड़क, रेल और हवाई  परिवहन जैसी आधारभूत संरचना, निर्बल और कमजोर वर्ग की महिलाओं और किसानों की हितैषी योजनाओं को नज़रअंदाज़ कर सिर्फ एक दल विशेष का समर्थन और दूसरे दल के प्रति लगभग ज़ीरो सहमति, सहनशक्ति और सहिष्णुता रखने वाले ऐसे मतदाताओं के मनोविज्ञान  पर विश्वविध्यालय के शोधर्थियों, विध्यार्थियों  और समाज विज्ञानियों को शोध करना चाहिये।

जहां एक ओर केंद्रीय चुनाव आयोग और प॰ बंगाल राज्य चुनाव आयोग और उसकी संबन्धित एजेंसियाँ, केंद्रीय और राज्य  सुरक्षा बल और संबन्धित विभाग  राज्य मे सफल चुनाव सम्पन्न कराने के लिए बधाई का पात्र है। पश्चिमी बंगाल के चुनाव 2026 का नतीजा कुछ भी हो लेकिन एक बात तो निश्चित हैं कि पश्चिमी बंगाल के मतदाताओं ने जिस निडरता से अब तक का सर्वाधिक मतदान कर सारे देश की जनता को एक स्पष्ट संदेश तो दिया ही है कि लोकतन्त्र के प्रति सच्चा समर्थन और समर्पण निडर होकर मतदान से ही संभव किया जा सकता है।           

विजय सहगल

रविवार, 26 अप्रैल 2026

निःशुल्क शीतल जल सेवा- पंजाबी परिषद समिति, रेल्वे स्टेशन ग्वालियर

 

निःशुल्क शीतल जल सेवा- पंजाबी परिषद समिति, रेल्वे स्टेशन ग्वालियर







वर्ष 1994 के 18 अप्रैल मे  पाँच  युवा अपने नागपुर यात्रा के लिए जब ग्वालियर से रेल द्वारा निकले तब उत्तर भारत की गरमियाँ शुरू हो चुकी थी। गर्मी के इस मौसम मे इन युवाओं को नागपुर यात्रा तक  ठंडे पानी की उपलब्धता से वंचित होना पड़ा। पूरी यात्रा के दौरान उन्हे हर जतन के बावजूद  ठंडा पानी नसीब नहीं हुआ। गर्मियों की शुरुआत मे जब ये हाल था तो प्रचंड गर्मियों के दिनों मे ठंडे  पानी की उपलब्धता के आभाव की कल्पना ने इन युवाओं को झकझोर दिया। इन पांचों  पंजाबी युवाओं के दिलों मे उनके माता-पिता और परिवार ने 1947 के भारत विभाजन से उबरी टीस को झेला था लोगो के दुःख दर्द को करीब से देखा और महसूस किया था। फिर क्या था, इन लड़कों के दिल मे ठंडे पानी को साधारण रेल यात्रियों को निःशुल्क सेवा प्रदान करने के दृढ़ संकलप के बीज का रोपड़ शुरू हुआ और नागपुर यात्रा के बापसी पर इन युवाओं ने ग्वालियर आते ही 24 अप्रैल 1994 को  चार मिट्टी के बड़े  घड़े/मटके ग्वालियर के जीआरपी थाने मे आम यात्रियों के सुविधा हेतु  ग्वालियर रेल स्टेशन पर रखवा कर रेल यात्रियों को निःशुल्क शीतल जल सेवा की शुरुआत कर दी।

1994 मे  जिन श्री अशोक मारवाह, श्री राम लुभाया, श्री जगजीत चावला, सत्य प्रकाश मेहरा, पी के आनंद के इस समर्पित सेवा भाव से ओतप्रोत युवाओं के संयुक्त प्रयास से ग्वालियर पंजाबी परिषद समिति शुरू हुई निःशुल्क ठंडे पानी की जल सेवा आज 70 से भी ज्यादा तापमान रोधी टंकियों जिनमे साफ शुद्ध वर्फ का ठंडा पानी संग्रह कर रेल्वे स्टेशन पर आने-जाने  वाली  50 जोड़ी रेल गाड़ियों के यात्रियों को निःशुल्क जल सेवा प्रदान करते हुए  आज एक वट वृक्ष का रूप ले चुकी है। पंजाबी परिषद समिति बैसे तो ट्रेन के हर क्लास सहित सभी वर्गों को निःशुल्क सेवा प्रदान करती है परंतु समिति  का ज़ोर ट्रेन के सामान्य, अनारक्षित बोगियों मे यात्रा कर रहे यात्रियों को प्राथमिकता से ठंडा जल प्रदाय करने पर है, जिन तक शीतल जल की पहुँच सामान्यतः समय और परिस्थिति के कारण संभव नहीं हो पाती। कभी कभी तो ट्रेन मे इतनी भीड़ होती है कि सामान्य श्रेणी के यात्रियों को अपनी सीट से हिलना तक मुश्किल हो जाता है तब तपती गर्मी मे ट्रेन से उतरकर पानी की तलाश मुश्किल ही नहीं असंभव है और यदि यात्री महिला या बच्चे हो तो यह कार्य बड़ा दुरूह, जटिल और कठिन हो जाता है। जब ऐसे यात्रियों की ठंडे पानी तक पहुँच, उनकी खिड़की के सामने हो जाती है तो गर्मी की लपट मे ठंडा  पानी  सहजता से प्राप्त हो जाए तो क्या कहना।   ट्रेन के आगे और पीछे की ओर लगे सामान्य अनारक्षित डिब्बों के सामने ठंडे पानी की टंकियों को रक्खा जाता है। इन ठंडे पानी की ट्रॉलियों पर ट्रेन के आते है अपना समय दान दे रहे अनेकों सेवक, जग और कीप (फ़नेल)/कुप्पी  से यात्रियों की खाली बोतलों को ठंडे जल से भर देते हैं। बमुश्किल 1 या दो मिनिट के ट्रेन के ठहराव के दौरान ही सैकड़ों सेवक अपने अपने जग की सहायता से जल की पूर्ति प्रायः सामान्य श्रेणी और स्लीपर क्लास के यात्रियों को कर ही  देते है। यात्रियों के चेहरे पर ठंडे पानी पीने के बाद उभरे संतुष्टि के भावों को स्पष्ट रूप से देखा और पढ़ा जा सकता है। छोटे छोटे बच्चों, महिलाओं और बृद्ध जनो के साथ सभी यात्रियों को प्लेटफार्म पर दौड़ भाग के बिना उनकी ही सीट पर  खिड़की से ही जब ठंडा जल निःशुल्क उपलब्ध हो जाय तो दौड़ कर ट्रेन पकड़ने के तनाव पूर्ण क्षणों से मुक्ति मिल जाती है। छोटे-छोटे बच्चों और महिलाओं को ठंडे जल से मिली तृप्ति के आत्म संतुष्टि के भावों को महसूस किया जा सकता है। दिव्यांग जनों के लिए आरक्षित डिब्बे मे भी यही अनुभव महसूस किया जा सकता है।

पंजाबी परिषद समिति के अध्यक्ष श्री अशोक मारवाह का यात्रियों को निःशुल्क सेवा प्रदाय हेतु  सेवा, समर्पण और निष्ठा तो देखते ही बनती है। 69 साल की उम्र मे भी मारवाह जी द्वारा पूरे प्लेटफार्म पर ट्रॉलियों मे ठंडे जल की सुचारु व्यवस्था कराना, सेवकों को हर ट्रॉली पर नियुक्त करना, बीच बीच मे सेवा प्रदान करने वाले लोगो को आराम करने और बैठने के लिए कुर्सी की व्यवस्था करना और सेवादारों को गाहे बगाहे स्वल्पाहार और शीतल शर्बत, छांछ उपलब्ध कराना और व्यक्तिगत संपर्क रखना उनके स्वभाव मे है। पंजाबी परिषद ग्वालियर प्रति वर्ष अप्रैल से अगस्त तक इस सेवा को रेल्वे स्टेशन ग्वालियर पर उपलब्ध कराती है। उनके इस कार्य की भूरि भूरि प्रशंसा अनेक व्यक्तियों, संस्थाओं और वर्गों ने समय समय पर की है। इस बात से ज्यादा सुखद संजोग क्या होगा कि पंजाबी परिषद ग्वालियर के इस सामाजिक कार्य की प्रशंसा स्वयं प्रधानमंत्री  श्री नरेंद्र मोदी ने अपने मन की बात के कार्यक्रम मे की है। श्री मारवाह जी ने बताया उनकी यी संस्था समाज के वंचित और आर्थिक रूप से कमजोर  वर्ग की बेटियों की शादियों तथा  स्वास्थ्य शिविर का आयोजन भी समय समय पर करती है। इस वृहद सेवा संकल्प मे श्री मरवाह जी को श्री आत्म प्रकाश  मोंगिया जी (समिति कोषाध्यक्ष), श्री गंभीर जी के आत्मीय सहयोग का उल्लेख करना आवश्यक है जो रेल प्रशासन से समिति के समन्वय, सामंजस्य तालमेल बैठाते है। इस सेवभावी कार्यक्रम मे समय दान देने वाले कार्यकर्ताओं और सेवकों को रेल प्रशासन स्टेशन पर निःशुल्क वाहन पार्किंग और प्लेटफार्म पर बिना प्लेटफार्म टिकिट के सेवा भाव करने के दौरान स्टेशन पर आधिकारिक रूप से रुकने हेतु  पहचान पत्र देती है।  

    

ये बात बिलकुल सही है कि मई-जून की इस आग बरसते मौसम मे अलग अलग समय मे सिर्फ समर्पित और सेवभावी लोग ही ईश्वरीय प्रेरणा, प्रोत्साहन, सेवा और समर्पण इस कार्य को कर सकते है अन्यथा समाज मे बहुतायत  छद्म और झूठे नकाब ओढ़े और पहने लोग कदाचित ही ऐसी निस्वार्थ सेवा के लिए समय दे पाते। ऐसा नहीं है कि पंजाबी परिषद के इस कार्यक्रम मे सिर्फ पंजाबी भाषी लोग ही है समिति के इस जन सेवा के कार्यक्रम मे ग्वालियर की हर समाज, वर्ग और संस्था के समर्पित सेवा भावी लोग स्व॰ प्रेरणा और समर्पित भाव से अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। सेना से सेवानिवृत्त लोग, विभिन्न राज्य और केंद्रीय कार्यालयों के सेवानिवृत्त अधिकारी, कर्मचारी, अधिवक्ता व्यापारी और विध्यार्थी  पानी पिलाने की इस मुहिम मे शामिल हैं। बड़ी संख्या मे महिलाएं, गृहणियाँ भी अपने घर के कामों मे और समाज सेवा के बीच संतुलन बना कर सेवा के इस परोपकार मे शामिल है।  मुझे भी इस संस्था से जुडने का सौभाग्य 10 अप्रैल को मिला, यध्यपि मुझे भी इस संस्था से जुड़े बमुश्किल 10-12 दिन ही हुए है लेकिन इन सेवभावी लोगो कि अनासक्त भाव से सेवा निस्वार्थ सेवा ने मुझे स्व्प्रेरित किया एवं भगवान श्री कृष्ण के श्रीमद्भगवत मे उस श्लोक और संदेश  को पुष्ट किया है जिसमे वे कहते हैं:-

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।। अध्याय 2 श्लोक 47।। अर्थात   कर्तव्य-कर्म करनेमें ही तेरा अधिकार है, फलोंमें कभी नहीं। अतः तू कर्मफलका हेतु भी मत बन और तेरी अकर्मण्यतामें भी आसक्ति न हो।
 

लगातार 32  वर्षों से रेल यात्रियों को रेल्वे स्टेशन पर गर्मियों की मौसम मे निःशुल्क शीतल जल सेवा प्रदान करने वाली संस्था को प्रोत्साहित करें। आइये यदि आप ग्वालियर मे हैं तो पंजाबी परिषद समिति के नेक कार्य मे अपना समय और सहयोग दे यदि आप रेल यात्रा के दौरान कभी ग्वालियर से गुजरे तो संस्था के प्रमुख श्री अशोक मरवाह और उनकी टीम को व्यक्तिगत तौर पर मिलकर प्रोत्साहित जरूर करें।

विजय सहगल   

रविवार, 12 अप्रैल 2026

"तत्तापनी (हिमाचल प्रदेश)"

"तत्तापनी (हिमाचल प्रदेश)"









6 जून 2022 को अपने हिमाचल प्रवास के दौरान तत्तापानी जाने का सुयोग बना। जहां एक ओर शिमला मे भीड़-भाड़, ट्राफिक जाम, पार्किंग की समस्या से दो चार होना पड़ा वही शिमला से लगभग 50 किमी॰ दूर सतलज नदी के किनारे पर बसा तत्तापानी एक शांत, प्राकृतिक रुप से मनोहारी सुंदर और साफ सुथरा था। यह छोटा सा गाँव हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले मे स्थित है एवं अपने पारंपरिक धार्मिक, पौराणिक महत्व के  अतिरिक्त इन दिनों साहसिक खेलों के लिये प्रसिद्ध पर्यटन स्थल के रूप मे भी प्रसिद्ध होता जा रहा है। तत्तापानी की एक विशेषता है जो इसके नाम के अनुरूप ही है। तत्ता का अर्थ है गर्म और पानी का अर्थ है जल अर्थात गरम पानी का चश्मा या कुंड। सतलज नदी के तट पर ऐसे अनेकों कुंड हैं जहां से पूरे साल गंधक युक्त गरम पानी के झरने बहते रहते हैं। ऐसी प्रथा हैं कि इन कुंडों मे चर्म रोगी के स्नान करने से बड़ा फायदा मिलता है। बैसे तो मई जून मे भी पहाड़ो पर सर्दी होती है लेकिन दिन मे आग बरसाती गर्मी ने दिल्ली, आगरा की गर्मी की याद दिला दी लेकिन हवा मे उपस्थित नमी उत्तर मध्य भारत की लू लपट के विपरीत थी। पेड़ की छाया या छप्पर के नीचे अच्छा महसूस हो रहा था।   तत्तापानी मे सतलज नदी के पश्चिमी तट पर पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मकर संक्रांति पर एक विशाल मेला लगता हैं जहां पर हिमाचल प्रदेश के दूर दूर से आए श्रद्धालु स्नान के लिये यहाँ आते हैं। स्नान के बाद अन्न, वस्त्र आदि दान कर्म करने की प्रथा के अनुसार यहाँ तुलादान करने की परंपरा है। इसलिए जगह जगह बड़े बड़े तुला (तराजू) देखने को मिलते हैं जहां पर तीर्थ पुरोहित पूरे साल ही इस तरह के संस्कार श्रद्धालुओं के लिए कराते रहते हैं। तराजू के एक ओर दान दाता को बैठा कर दूसरी ओर अन्न/वस्त्र या ऐसी वस्तु को समान मात्रा मे रख जाता है जिसके दान देने की प्रतिबद्धता, कौल या वचन जजमान ने लिया था। ऐसा  मानना है कि यहाँ स्नान करने से ग्रह दोष शांत होते हैं और श्रद्धालुओं को सुख समृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति होती है तथा  कुम्भ स्नान का फल प्राप्त होता है।      

एक अन्य मान्यता के अनुसार सप्त ऋषियों मे से एक ऋषि जमदग्नि की तपोभूमि भी हैं। सतलज नदी के गंधक युक्त औयषधीय गुणों के कुंड और झील के  कारण जलक्रीड़ा युक्त गतिविधियां पर्यटकों को आकर्षित करती हैं। मनोरम पहाड़ियों की तलहटी मे बहती सतलज की धाराओं मे मोटर वोट, जेट स्की, रिवर राफ्टिंग और हॉट एयर बलून जैसी गतिविधियों का आयोजन पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए किया जाता है।  हवा मे उपस्थित शत प्रतिशत नमी के कारण नदी मे अठखेलियों के पश्चात हम लोग भोजन के लिए नदी के तट पर बने होटल हॉट स्प्रिंग की ओर बढ़ लिए। तेज धूप और नदी से दूर चल रही गरम हवाओं के बीच ठंडी एसी की हवाओं मे बड़ा सुकून और  ठंडक प्रदान की। शाकाहारी भोजन की उपलब्धता सुनिश्चित करने के कारण इस बतानुकूलित वातावरण मे मे खाना खाने का उल्लास अलग ही था। हिमाचल के इस भ्रमण मे जगह जगह एसी की आवश्यकता को देखते हुए मुझे मई-जून की इन गर्मियों मे पहाड़ों और यूपी, राजस्थान दिल्ली और मध्य प्रदेश के लपट भरे मैदानों मे कोई बहुत ज्यादा अंतर नहीं दिखाई पड़ा।

भोजन पश्चात नदी के तट से दूर भगवान लक्ष्मी नारायण और नरसिंह मंदिर के दर्शन किए। जहां नरसिंह भगवान का मंदिर अपने हिमाचल के पारंपरिक मंदिरों की तरह लकड़ी से बना था और जिसमे भगवान नरसिंह की प्रतिमा विराजित थी और भगवान लक्ष्मी नारायण मंदिर मे तीन देव ब्रहमा विष्णु महेश अपनी अपनी अर्धांगनियों देवी सरस्वती, देवी लक्ष्मी और देवी पार्वती के साथ विराजित थे साथ ही प्रवेश हाल के एक सिरे पर श्री हनुमान की प्रतिमा भी थी।  इन साफ सुथरे मंदिरों के प्रार्थना कक्ष मे बैठना बड़ा सुखदायक अनुभव था।

इस तरह एक अनुछुए स्थल तत्तापनी का भ्रमण एक यादगार यात्रा बन गया जो हमेशा तुला दान की तराजू की स्मृति मन मस्तिष्क पर अंकित कर गया।

 

विजय सहगल       

  

 

 


रविवार, 5 अप्रैल 2026

"श्री हनुमान गढ़ी-अयोध्या"

 

"श्री हनुमान गढ़ी-अयोध्या"








बचपन मे जब मै अपने चाचा के यहाँ गर्मियों की छुट्टी मे जाता था तब वहाँ पहली बार मैंने गढ़ी का नाम सुना था। दरअसल हमारे एक परिचित को "गढ़ी बाले" कह कर संबोधित किया जाता था। एक प्रभावशाली व्यक्तित्व जिनका मकान काफी बड़ा और भव्य था। तब से मेरे मन मस्तिष्क मे गढ़ी के छवि से तात्पर्य, बड़े और गणमान्य व्यक्ति के घर की  हो गई थी। समय के साथ इस छवि को बचपन मे अयोध्या स्थित हनुमान गढ़ी ने और भी पक्का किया।  2 नवम्बर 2025 को अपने अयोध्या प्रवास के दौरान राम जन्मभूमि के दर्शन पश्चात जन्मभूमि से से लगी हनुमान गढ़ी के दर्शन भी करने थे। गढ़ी का अर्थ है एक छोटा किला जो प्रायः राजमहलों या राजप्रासादों के पूर्व ऊंचाई पर बनी एक सुरक्षा चौकी के रूप मे बनाए जाते थे और जहां पर एक छोटी से फौज की टुकड़ी पहरा देती थी। एक किवदंती के अनुसारा लंका विजय के पश्चात अयोध्या बापसी पर श्री हनुमान जी को 76 सीढ़ियों युक्त यह गढ़ी  स्थान रहने के लिए दिया गया था जो कालांतर मे हनुमान गढ़ी कही जाने लगी। यह स्थान हनुमान जी से जुड़ी धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं के कारण सनातनियों के लिए अत्यंत सम्मानीय और महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। हनुमान गढ़ी दशरथ महल और कनक भवन के  प्रवेश द्वार के ही नजदीक है जहां भगवान श्री राम का निवास था।   पौराणिक मान्यताओं के अनुसार राम भक्त हनुमान यहाँ बनी एक गुफा मे रहते और पहरा देते हुए भगवान की सेवा  के लिए तत्पर रहा करते थे।

आज एकादशी अर्थात देव उठानी ग्यारस की सुबह होने के कारण बाज़ार की भीड़ भरी गलियों से होते हुए जब मै हनुमान गढ़ी की ओर बढ़ा तो बाजार के रास्ते के बीच बनी रेलिंग मे  श्रद्धालुओं की  दूर तक लंबी लाइन और उसके बाद हनुमान गढ़ी की सीढ़ियों पर दर्शनार्थियों की भीड़ जमा थी। इस जनसमूह को देख मै कुछ चौंक गया। भरी दोपहरी मे तेज धूप के बीच लोग श्री हनुमान गढ़ी पर बने हनुमान मंदिर के दर्शन हेतु लालायित हो आगे बढ़ रहे थे।  चूंकि राम जन्मभूमि स्थान का बड़ा गहन और सघन भ्रमण के पश्चात कुछ विश्राम की प्रबल इच्छा के चलते हनुमान गढ़ी के दर्शन सायंकाल करने के निश्चय के साथ होटल चलने का निश्चय किया। निर्णय ठीक ही रहा, शाम के लगभग छह बजे जब हम सपत्नीक हनुमान गढ़ी पर पहुंचे तो भीड़ सुबह के मुक़ाबले, अपेक्षाकृत कुछ कम थी। पुलिस की सुरक्षा व्यवस्था चाक चौबन्द थी। गढ़ी के नीचे पादुकाओं के रखने की कहीं कोई व्यवस्था नहीं थी, जैसी कि रामजन्मभूमि मे थी।   फूल या प्रसाद वालों के यहाँ ही पादुकाओं को रखा जा रहा था। भीड़ भी कुछ खास नहीं थी सीधे सीढ़ियों पर चढ़ते हुए हम मंदिर प्रांगण मे जा पहुंचे। पिछले दिनों राम मंदिर के उदघाटन के अवसर पर अनेकों बार हनुमान  गढ़ी के दर्शन टीवी पर कर चुके थे, इसलिए कुछ नयापन नहीं लगा, लेकिन बचपन मे 1972 मे अयोध्या मे किये हनुमान गढ़ी के दर्शन की कुछ धुंधली यादें शेष थी तब या क्षेत्र कुछ साधू संतों की उपस्थिती मे वीरान सा दिखाई देता था। बंदरों की फौज आज की तरह उन दिनों भी थी। होती भी क्यों न हनुमान जी का गढ़ जो था। काले सफ़ेद संगमरमर के वर्गाकार पत्थरों से बने फर्श के परिक्रमा पथ के मध्य बना लगभग ढाई-तीन फुट ऊंचे वर्गाकार चबूतरे पर निर्मित  हनुमान मंदिर रंग बिरंगी बारहदरी के अर्ध बलायकर दरबाजों से घिरा था। बाहर बरामदे से गर्भगृह मे बिराजित, श्री हनुमान जी की भव्य और मध्याकार प्रतिमा बहुत ही नयनभिराम थी। प्रतिमा के मुख मण्डल  के चारों ओर एक ओजस्वी और तेजस्वी जीवंत ऊर्जा का अनुभव हो रहा था। मंदिर के गर्भगृह के विपरीत दिशा मे पीछे से भगवान श्री हनुमान को  प्रणाम कर  परिक्रमा पथ के दूसरी ओर बना  गलियारा कुछ खाली था जहां  कुछ मिनिट बैठ कर राम भक्त हनुमान को स्मरण करते हनुमान जी की महिमा का पुनरावलोकन हनुमान चालीसा की इन पंक्तियों के स्मरण कर किया, "जय हनुमान ज्ञान गुन सागर,  जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥" "रामदूत अतुलित बल धामा, अंजनिपुत्र पवनसुत नामा॥" हनुमान जी के बल, बुद्धि, सामर्थ्य और  ऐश्वर्य को स्मरण करते हुए हम लोग मंदिर से बापसी हेतु प्रस्थान किया। यध्यपि एक अन्य रास्ता भी था पर पादुकाओं के चलते हम उसी रास्ते से बापस हुए जहां से प्रवेश किया था।

बापसी मे एक महिला पुलिस कर्मी को मैंने लगातार मोबाइल पर व्हाट्सप्प/यू ट्यूब/विडियो चलाते  देखा। मंदिर के प्रवेश के समय भी यह महिला पुलिस कर्मी मोबाइल देखने मे मशगूल थी। मुझ से रहा न गया मैंने उस महिला पुलिस को कहा, माफ करें आप सुरक्षा व्यवस्था जैसे जिम्मेदार पद पर होते हुए भी, आपका लगातार मोबाइल देखना उचित नहीं। आपको इस से बचना चाहिए!! यध्यपि उस महिला पुलिस कर्मी की प्रतिक्रिया ठंडी ही थी शायद ही उसने इस ओर ध्यान दिया हो?  

कुछ अन्य शेष सीढ़ियाँ उतरकर अब हम पुनः हनुमान गढ़ी के नीचे बाज़ार मे बापस आ खड़े हुए। दोपहर के मुक़ाबले शाम होने के कारण बाज़ारों मे श्रद्धालुओं की रौनक पुनः लौट आयी थी। रात के बिजली के प्रकाश मे रमजन्मभूमि सहित अन्य धार्मिक स्थलों पर एक अद्भुद छठा दिखलाई पद रही थी जो दिन के उजाले से अलग हट के थी।

एक बार पुनः हनुमान जी का स्मरण करते हुए हम लोग अयोध्या मे दशरथ महल और कनक भवन की ओर बढ़ लिए।

पवनसुत हनुमान की जय!!              

विजय सहगल

शुक्रवार, 27 मार्च 2026

श्री राम नवमी पर विशेष, "राम की अयोध्या, अयोध्या के राम"

 

श्री राम नवमी पर विशेष "अयोध्या के राम, राम की अयोध्या"









2 नवंबर 2025 को मुझे मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की जन्म स्थान अयोध्या जाने का परम सौभाग्य प्राप्त हुआ। भारत भूमि की सनातन संस्कृति के आराध्य भगवान श्री राम के प्रति यहाँ के करोड़ो करोड़ लोगों की, वे  आस्था, सम्मान श्रद्धा के केंद्र हैं। ऐसी परम पावन राम जन्म भूमि अयोध्या  के दर्शन का सुयोग मुझे दूसरी बार प्राप्त हुआ। इसके पूर्व शायद 1972 मे मै अपने ताऊ-ताई और बुआ के साथ गया था। तब की वीरान और सुनसान अयोध्या और आज की अयोध्या मे जमीन आसमान का अंतर स्पष्ट दिखलाई पड़ता है। उन दिनों बिड़ला धर्मशाला मे रुका था जो राम जन्मभूमि के ठीक सामने आज भी स्थित है। संजोग देखिये धर्मशाला के सामने रुकने के बावजूद राम जन्मभूमि के दर्शन का आनंद, सुख सौभाग्य मुझे अभी ही प्राप्त हुआ। भगवान राम को यूं ही मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं कहा जाता है, आज दुनियाँ के तमाम धर्मों, संप्रदाय या वंशों मे ऐसा दृष्टांत देखने को नहीं मिलता जब एक पुत्र के रूप मे भगवान श्री राम ने पिता की आज्ञानुसार राज्य को त्याग कर वनवास जाना स्वीकार किया और विडंबना देखिये जिस माता कैकई ने अपने पुत्र भरत के लिए राज्य सिंहासन  की मांग की थी उसने भी राम की पादुकाओं को सिंहासन पर रख, स्वयं वनवासी के रूप मे रहते हुए एक सेवक के रूप मे राम काज किया!! अन्यथा दुनियाँ के सारे मजहब, धर्म पंथ और संप्रदाय मे सत्ता के सिंहासन के लिए हिंसा, युद्ध झगड़े हुए जिसमे मानव हत्या, षड्यंत्र और संहार हुए है।      

1 नवंबर को देवठानी ग्यारश होने के कारण परिक्रमा लगाने बालों की बड़ी भारी  भीड़ के कारण अयोध्या मे पहुँचने के बावजूद वहाँ के केंद्र रमजन्मभूमि पहुँचना कठिन हो गया। रात के 11 भी बज चुके थे अतः रात्रि विश्राम के बाद 2 नवंबर की सुबह ही राम जन्मभूमि जाना हुआ। एक विशाल प्रवेश द्वार से होकर जब श्री राम जन्मभूमि की ओर बढ़े तो हजारों लोगो के कदम भी उसी ओर बढ़ रहे थे। पूरे विशाल परिसर मे लाखों  लोगों  की तरह ही राम जन्मभूमि के प्रथम बार  दर्शनों की जिज्ञासा, आतुरता, कौतूहल और उत्सुकता मेरे हृदय मे भी हिलोरे मार रही थी। जल्दी से जल्दी न केवल राम लला के दर्शन की अभिलाषा अपितु पूरे जन्मभूमि परिसर देखने की उत्कंठा सब कुछ शीघ्र अति शीघ्र करना चाहती थी। परिसर मे दर्शन, बहुमूल्य समान की सुरक्षा एवं पादुकाओं के रखने के स्थान आदि व्यवस्था समझने के पश्चात मेरी राय थी कि इतनी सुचारु व्यवस्था, इतना सुविधा जनक तंत्र और इतनी सुरक्षित प्रणाली मैंने पहले कभी नहीं देखी!! मंदिर परिसर के बाहरी क्षेत्र मे बने एक विशाल हाल मे बनी लगभग 50 एकल खिड़की बनी हैं। यहाँ पर हर खिड़की पर मोबाइल, मूल्यवान वस्तुएँ एवं चरण पादुकाएं रखने की  सुविधा प्रदान की जाती हैं। एक खिड़की के  दोनों ओर 7-7 खंड के लॉकर कैबिनेट एक सिरे से दूसरे सिरे तक रक्खे गए हैं। एक खंड मे लगभग 20 लॉकर हैं इस तरह एक खिड़की से 280 लगभग लॉकर संचालित होते हैं। अप अपना सारा मूल्यवान सामान, मोबाइल एक प्लास्टिक की टोकरी मे रखते हैं एवं सारे जूते चप्पल एक प्लास्टिक की बोरी मे रख कर खिड़की मे बैठे कर्मचारी को दे दीजिये। वह आपके सामने ही किसी भी खाली लॉकर मे मूल्यवान वस्तुओं और मोबाइल को रख कर उसमे ताला लगा कर चाबी आपको दे देगा, जिसमे आपके खिड़की संख्या और लॉकर संख्या अंकित होगी। जूते चप्पल भी उस लॉकर के कुंडे मे लटका दिये जाएंगे। बापसी के समय हाल मे दूसरे तरफ बनी उसी नंबर की खिड़की से आपके वस्तुओं को आपको सुपुर्द कर दिया जाएगा। कहने का तात्पर्य वस्तुओं की प्राप्ति और सुपुर्दगी की खिड़कियाँ अलग अलग है। जिससे व्यवस्था सुचारु रूप से संचालित होती है। ये सारी सुविधाएं निशुल्क हैं।

विशाल परिसर मे जगह जगह पीने के पानी एवं टॉइलेट  की व्यवस्था है। अब जब आप मंदिर परिसर के बाहरी क्षेत्र से मंदिर के दर्शन हेतु प्रवेश करते हैं तो 8-10 स्टील के पाइप से बनी लाइनों से अंदर प्रवेश करते हैं। प्रथम साधारण सुरक्षा जांच से गुजर कर जब आप मंदिर के प्रवेश द्वार के पूर्व सघन सुरक्षा जांच क्षेत्र मे पहुँचते है जहां  आपकी ठोस और गहन जांच होती हैं। किसी भी तरह के आग्नेय अस्त्र/शस्त्र बीड़ी, मोबाइल, सिगरेट, पान मसाला आदि ले जाना सख्त निषेध है। इस जांच परिसर के बाहर आते ही कुछ कदम की दूरी पर मुख्य मंदिर का विशाल चबूतरा बना है। चबूतरे के दायें व बाएँ दो दो लाइने एवं मध्य मे चार लाइनों के माध्यम से बनी 30-32  सीढ़ियाँ चढ़ कर आप मुख्य मंदिर मे प्रवेश करते हैं। मुझे बताया गया था कि आप सबसे दाहिने की सीढ़ियाँ चढ़ कर ही जायें क्योंकि ये पहली वाली लाइन रामलला भगवान के सबसे निकट, ठीक सामने से होकर जाती हैं बाकी की लाइने भी एक के पीछे एक छह लाइन मे लग कर लोग दर्शन करते हैं। असक्त और वृद्ध जनों के लिए व्हील चेयर की व्यवस्था है जो लिफ्ट के माध्यम से मंदिर के गर्भ गृह तक जा सकती हैं। मुख्य मंदिर मे पाँच कक्ष है जिनहे क्रमशः नृत्य, रंग शाला, सभा कक्ष, प्रार्थना और कीर्तन मंडप कहते है तत्पश्चात गर्भ गृह मे भगवान राम लला बालरूप मे  विराजमान हैं। नागर शैली मे गुलाबी  राजस्थानी बलुआ पत्थर से बने इस परिसर मे काफी दूर से ही ऊंचे चबूतरे पर विराजित रामलला के सहज, सरल दर्शन हो जाते हैं। हर मंडप मे बने स्तंभों पर देवी देवताओं की छोटी बड़ी मूर्तियों को उत्कीर्ण किया गया है। बारीक नक्काशी की बेल बूटे मूर्तिकारों के श्रम और कलात्मकता को दर्शाते हर ओर दिखलाई देते हैं। आज के आधुनिक समय मे बिना लोहे के निर्मित इस तीन मंज़िला भवन की भव्यता और दिव्यता देखते ही बनती हैं। मुख्य मंदिर की आधार चबूतरे की लंबाई 380 फुट चौड़ाई 250 फुट और ऊंचाई 161 फुट हैं। मंदिर मे 392 खंबे और 44 दरबाजे हैं जिसमे 42 दरबाजे स्वर्ण जड़ित हैं। पूरे  मंदिर का निर्माण बिना किसी राज्याश्रय के देश के पाँच लाख गाँव से एकत्रित आम जनों के दान और भेंट से एकत्रित तीन हजार करोड़ रुपए से किया जा रहा है।

500 वर्षों के लंबे संघर्ष कानूनी दांव पेंचों के बाद बने इस भव्य मंदिर पर प्रत्येक भारतवासी को गर्व है। दर्शनों के बाद उत्तरी दिशा के दरवाजे से हम लोग बाहरी बरामदे मे निकले जहां निर्माण का शेष कार्य काफी तेजी से चल रहा था। बाहरी दरबाजे के निकासी द्वार पर प्रत्येक भक्तजन को इलाइचि दाने का सील बंद सफ़ेद कागज के लिफाफे मे प्रसाद के रूप मे प्रदान किया जा रहा था। बापसी के समय एक हरे घास के मैदान पर एक सुंदर गिलहरी की प्रतिमा भगवान राम और गिलहरी के प्रसंग के प्रतीक की कहानी कह रहा था। बापसी मे अमानती समान गृह से वस्तुओं को लेने के पूर्व शानदार प्रतीक्षालय मे कुछ विश्राम और प्रसाधन सुविधाओं के उपभोग पश्चात पुनः मंदिर परिसर की भव्यता को निहारते हुए भगवान श्री राम का स्मरण करते हुए  अगले लक्ष्य की ओर बढ़ लिए। भगवान श्री राम की नवमी पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनायें।

जय श्री राम!!

विजय सहगल  

 

                           

शुक्रवार, 20 मार्च 2026

अनियोजित गंगा -संगम स्नान, पटना

 

"अनियोजित गंगा स्नान, पटना"












कभी कभी निरुद्देश्य घूमते हुए जब ये भी न पता चले की अगले  कदम पर कहाँ जाना है और फिर एक नया कदम, बगैर पूर्वनियोजित घूमते हुए 2-3 घंटे हो जाएँ तो एक अच्छी ख़ासी कहानी बन जाती है। 9 मार्च 2026 को ऐसा ही कुछ हुआ जब मै अपने पटना प्रवास पर सुबह 6.30 बजे प्रातः पैदल-पैदल भ्रमण पर निकला। रोज एक ही जगह एक पार्क मे जाने वाले बोरिंग रूटीन से हट कर मन मे आया चलो गंगा घाट की तरफ चलते हैं। कदम बढ़ते जा रहे थे रास्ता गूगल दिखा रहा था। चूंकि कार या मोटरसाइकल का रास्ता तीव्र गति से चलने के कारण  आसानी से समझ आ जाता है पर पैदल रास्ता दिखाने मे गूगल, कभी दायें-कभी बाएँ कभी विपरीत दिशा बताने के कारण उलझन हो रही थी। कुछ ऐसी ही उलझन आज भी थी। पता नहीं किन पतली, छोटी गलियों से होकर जब मुख्य सड़क पर आया और आस-पास के दुकानों पर लगी बोर्ड पर नज़र डाली तो पता लगा कि मै खजांची रोड पर हूँ।  मै पहली बार पटना मे इन अंजान रास्ते पर अकेले जा रहा था। एक दो जगह कुछ भ्रमित होने पर लोगो से मार्ग दर्शन  लिया और इस तरह खोजते खोजते दरभंगा हाउस पहुँच गया जहां से काली घाट के  रास्ते से मै परिचित था। घाट पर सुबह लोग चहल-कदमी करते और घूमते नज़र आए। मै भी खुश था कि चलो आज बंधे-बंधाये रास्ते को छोड़ एक नई जगह पर तो आए।

लोगो के प्रातः भ्रमण के बीच, घाट पर साफ सफाई का काम भी चल रहा था। घाट अच्छे थे, घूमना अच्छा लग रहा था।  हमारी सनातन संस्कृति मे पावन गंगा का बड़ा महत्वपूर्ण स्थान है। गंगा को प्रणाम कर,  मन मे आया कि चलो गंगा जल की कुछ बूंदों से आचमन कर अमृतपान किया जाय। मानवीय तृष्णा ने, घाट से कुछ दूर बह रही पवित्र गंगा का किनारा काफी अस्वच्छ बना दिया था, आगे शायद कुछ स्वच्छता मिले, ऐसा विचार कर आगे बढ़ते-बढ़ते विश्वविध्यालय घाट, कृष्णा घाट होते हुए जब गांधी घाट पर पहुंच गया। लेकिन आगे भी स्वच्छता के स्तर कोई सकारात्मक परिणाम न पा कर आचमन का विचार त्याग कर पूरे शरीर पर गंगा जल छिड़क कर ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥ मंत्र का जाप कर पवित्र होने की सोची। इसी आशय से घाट की सीढ़ियाँ उतर कर कुछ दूर बह रही गंगा नदी की ओर बढ़ा। तभी वहाँ खड़ी नाव के मल्लाह ने गंगा पार जाने की आवाज लगा लोगों को आमंत्रित किया। इरादा तो मात्र घाट पार प्रातः भ्रमण का था, गंगा किनारे आचमन और पवित्रीकरणम का विचार भी हमारी संस्कृति के कारण वरवश आना ही था पर गंगा पार जाने का कहीं कोई दूर दूर तक जाने का  इरादा न था, क्योंकि सुबह विविध भारती सुनने के शौक के कारण, सिवाय मोबाइल के, जेब मे फूटी कौड़ी भी नहीं थी।  जिज्ञाशा वश मल्लाह से पूंछा कितने पैसे लोगे?  तब उसने बताया रुपए 50/- दोनों तरफ अर्थात जाने और आने के। फिर पूंछा क्या यूपीआई से पेमेंट लेते हो? उसने सिर हिलाते हुए कहा हाँ! फिर क्या था, मै भी लपक कर नाव मे पहली सवारी के रूप मे चढ़ गया।  

घाट पर गंगा पार जाने वालों की कोई बहुत  ज्यादा भीड़ नहीं थी। नाव वाला हर थोड़ी देर बाद "गंगा पार" जाने की आवाज लगाता। मै भी चुप चाप इंतज़ार करता रहा, नाविक की सहायता के लिए मैंने भी कुछ लोगों से गंगा पार चलने का आग्रह किया। अब तक एक-दो सवारी और आ चुकी थीं। फिर 7-8 की संख्या मे एक परिवार भी आ गया। इस तरह गंगा पार जाने की नाव की यात्रा शुरू हो चुकी थी। नदी के बीच पानी काफी गहरा था। मन ही मन माँ गंगा को प्रणाम कर जगत के कल्याण की कामना की और एक नौजवान सहयात्री जो मेरी तरह अकेला ही मेरा सहयात्री था। रूपेश!, हाँ यही नाम बताया था उस युवा ने। हजारी बाग से आया था। होली पर लगे ग्रहण के बाद गंगा  स्नना के उद्देश्य से ही उसका पटना आना हुआ था। गंगा पार पहुँच कर केवट नानजी नाव किनारे लगा कर, सभी यात्रियों को गंगा पार रेतीले मैदान मे उतर दिया। सभी यात्री नहाने के सुविधाजनक स्थान की तलाश मे यहाँ वहाँ हो लिये। यहाँ पानी साफ सुथरा, आचमन के योग्य था पर यहाँ फिर मै असमंजस के दो राहे पर खड़ा था। गंगा स्नान का कोई उद्देश्य तो नहीं था। क्योंकि न तो कपड़े, न तौलिया, न कच्छा बनियान? क्या करें? रूपेश ने अपने लाये बैग को किनारे पर रख नाव के आगे की  तरफ साफ पानी मे स्नान की तैयारी कर स्नान भी शुरू कर दिया। कुछ सूझ नहीं रहा था क्या करें? कहाँ गंगा जल से आचमन फिर अपने शरीर पर गंगा जल से छींटे डालने की सोची, अब तो यहाँ गंगा स्नान का शुभ अवसर सामने था!!   हमने तुरंत ही इन्ही और ऐसी ही  परिस्थितियों मे स्नान करने का निर्णय लिया और किनारे पर ही लोअर, टी शर्ट और बनियान रख कर, प्राप्त हुए गंगा स्नान के ईश्वरीय सुयोग और सुअवसर का लाभ उठाते हुए गंगा की गोद मे बढ़ लिया। पानी ठंडा था, लेकिन एक डुबकी लगते ही ठंड तिरोहित हो गयी। अब तो अनेकों डुबकी लगा, सूर्य को अर्घ देते हुए अपने पूर्वजों को हाथ जोड़ कर उनके लिये शांति और श्रद्धा से नमन करते हुए गंगा का पवित्र जल अर्पित किया। बापस आकर अपने बासे वस्त्रो पर गंगा जल के छींटे डाल पवित्र किया, बनियान से तौलिये का काम लिया और चाय की दुकान के पीछे बने अस्थाई चेंजिंग रूम मे उन्ही बासी कपड़ों को पहन लिया। इसी बीच हजारी बाग के उस युवक रूपेश ने गंगा के पूर्वोत्तर छोर पर रेतीले मैदान के टीले के पीछे बहने वाली गंडक नदी को दिखलाया। गंडक गर्मी के इस शुरुआत के दिनों मे भी अपने तीव्र वेग और विशाल जलराशि के साथ बहते हुए भयावह लग रही थी। 15-20 फुट के ऊंचे टीले के रेतीले किनारे गंडक के तीक्ष्ण वेग से लगातार कट कर नदी मे गिर रहे थे। दृश्य बड़ा डरावना था। रेतीले टीले के  किनारे की थोड़ी भी चूक आपको गंडक मे फिसलने या गिरने से नहीं रोक सकती थी। गंडक नदी के रौद्र रूप का अभी ये हाल है तो बरसात मे इसकी विकरालता, तीव्रता और उग्रता का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। कुछ कदम आगे गंडक और गंगा का संगम स्पष्ट दिखलाई दे रहा था। संगम की धाराओं को प्रणाम कर हम दोनों,  वहाँ से  दिख रही  एक मात्र चाय की गुमटी  की ओर बढ़ लिये।

चाय के टपरे पर शिव पूजन यादव जी से भेंट हुई जो गाय का दूध निकाल रहे थे। गाय देखने मे तो साधारण लग रही थी पर जब स्टील की बाल्टी दूध से पूरी भर गयी, जो 12-13 लीटर से कम न थी, तब गाय की ऊंची नस्ल का अहसास हुआ। शिव पूजन जी की दुकान पर चाय, नमकीन, कोल्ड ड्रिंक पेड़ा आदि रक्खे थे। चाय-नमकीन की इच्छा तो थी पर यहाँ फिर नगदी भुगतान की समस्या आने को थी क्योंकि सिवा यूपीआई भुगतान के  जेब मे तो ठन-ठन गोपाल थी। पर अचानक दुकान पर यूपीआई कोड देख कर तसल्ली हुई। एक बात तो माननी पड़ेगी कि मोदी सरकार द्वारा यूपीआई लागू करने से हम जैसे लोगों ने पर्स रखना ही छोड़ दिया। प्रसंशा करनी होगी क्योंकि हर छोटा बड़ा दुकानदार, व्यापारी अब यूपीआई से भुगतान लेने लगा है। इस नदी के रेतीले किनारे पर पर दूर दूर तक शिवपूजन की दुकान के अतिरिक्त कोई दुकान न थी और इस घोर निर्जन मे यूपीआई की सुविधा!!, कहना अतिशयोक्ति न होगी कि भारत दुनियाँ मे डिजिटल भुगतान के मामले मे नंबर वन है।

यूपीआई भुगतान सुनिश्चित होने पर दम आ गयी, फिर क्या था इस निर्जन टापू पर  रूपेश, नानकी, शिवपूजन, महेश जनार्दन के साथ एक छोटी सी चाय पार्टी हो गयी क्योंकि अब पेमेंट की कोई चिंता जो नहीं थी।

आज का प्रातः भ्रमण भी यादगार हो गया कहाँ गंगा जल के  आचमन मे भी बाधा आ रही थी और कहाँ गंगा स्नान भी हो गया। एक अनियोजित यात्रा सुनियोजित यात्रा मे जो, बदल गयी थी।

विजय सहगल

    

      

 

जब मैंने कौतूहल से यहाँ संगम के बारे मे पूंछा तो रूपेश ने बताया, यहाँ पटना मे गंगा और गंडक नदी का संगम है।