"लड्डू"
लड्डू का नाम सुनते ही क्या बूढ़े क्या जवान
और क्या बच्चे सभी के मुँह मे पानी आ जाता है। बचपन मे शादी समारोह के पहले प्रायः
एक उतना तो नहीं पर उससे थोड़ा कम महत्वपूर्ण धूम धाम बाला कार्यक्रम होता था जिसे
सगाई या लगन लिखना कहा जाता था। उसमे होने बाले रीति रिवाज से बचपन मे हम और हमारे
जैसे बच्चों को कोई विशेष वास्ता नहीं रहता था पर उस सगाई समारोह के दौरान वितरित
होने बाले ठंडे या गरम पेय पदार्थ पर बच्चों की नज़र लगी रहती थी। इस रस्म के एक और
आकर्षण की बजह से हम बच्चे इस कार्यक्रम
मे शामिल होते थे क्योंकि इस सगाई समारोह के अंत मे सभी आगंतुकों को कागज के रंगीन
लिफाफों मे चार चार लड्डूओं का पैकिट
धन्यवाद ज्ञापित करने की रस्म के रूप मे वितरित किया जाता था। लड्डूओं के वितरण की ज़िम्मेदारी
प्रायः काइयाँ और सयाने किस्म के व्यक्तियों को दी जाती थी जो समाज और समाज के
दीगर मेहमानों को जानते परखते थे और अपने काइयाँपन के चलते कोशिश करते कि लड्डू स्यानपन
से दे। ऐसे समारोह मे यदि हम या हम जैसे अन्य बच्चे अपने पिताजी,
भाई साहब या चाचा, ताऊ,
के साथ होते तो लड्डू का लिफाफा आसानी से मिल जाता था और खुदा ने खासता अकेले शामिल
होते तो वे सयाणे अकेले छोटे बच्चों को लड्डू का लिफाफा न देकर टरका देते थे। तब
हम जैसे बच्चे ऐसे काइयाँ किस्म के लोगों को फिल्मी खलनायक की नज़र से देखते थे।
ऐसी ही एक घटना से रु-ब-रु हुए हमारे बचपन
के एक करीबी मित्र ने एक किस्सा मुझे
सुनाया जिसे आप सब के बीच सांझा करना चाहता हूँ। हमारे मित्र अपने माता-पिता की दो
बहिनों के इकलौते पुत्र थे। पिता जी सरकारी सेवा मे होने के कारण प्रायः बाहर रहते
और शादी विवाह या सगाई समारोह मे परिवार के प्रतिनिधि के नाते उनको ही जाना पड़ता
था उस समय उनकी उम्र 10-12 साल रही होगी। एक बार अपने परिवार के प्रतिनिधि के नाते सगाई समारोह मे उनका जाना हुआ। बाकायदा
उनके परिवार का समारोह मे शामिल होने का आमंत्रण था। पिता सरकारी सेवा के कारण
अपनी ड्यूटि पर गये थे। सगाई समारोह के पश्चात लड्डू वितरण के दौरान ऐसे ही काइयाँ
किस्म के स्याने से उनका पाला पड़ा और उस काइयाँ व्यक्ति ने उन्हे नज़र अंदाज़ कर
अन्य मेहमानों के बीच लड्डू का वितरण कर दिया। सभी बड़े और उनके साथ के बच्चे तो
लड्डू के लिफाफे के साथ कार्यक्रम से लड्डू लेकर निकले पर वे बगैर लड्डू के कार्यक्रम से बाहर हो गये।
बच्चे थे, संकोच बस खुद लड्डू न
मांग सके। ये सोच कर कि शायद मेहमानों की भीड़ भाड़ मे लड्डू बांटने बाला उन्हे
लड्डू देना भूल गया होगा, कुछ समय बाद
पंडाल मे पुनः आकर उन्होने एक बार फिर लड्डू लेने के प्रयास के चलते आगंतुकों की
लाइन मे पीछे पीछे चल अपनी बारी की प्रतीक्षा करते आगे बढे,
लेकिन उस सयाणे और काइयाँ का तो स्वभाव ही ऐसा था अतः उसने हमारे मित्र को फिर
लड्डू के लिफाफे से वंचित कर दिया। लड्डू का लिफाफा न मिलने की बचपन की वो घटना और
उस काइयाँ और सयाणे व्यक्ति की शक्ल लगभग पचास साल बाद भी हमारे उन प्रोफेसर मित्र
के ज़हन मे आज भी ताजा थी।
दरअसल इस तरह लड्डू की घटना इस साल के
शुरुआत मे मेरे साथ भी घटी जिसने हमारे उक्त प्रोफेसर मित्र के साथ घटी घटना को
पुनः एक बार ताज़ा कर दिया। मै पिछले कई महीनों से नोएडा मे झोपड़-पट्टी मे रह रहे
मजदूरों के बच्चों को पढ़ा रहा था। उन 24-25 बच्चों से
इस स्नेह और लगाव के कारण हमने उन्हे समाज की मुख्य धारा मे
जोड़ने हेतु अपनी आवासीय सोसाइटी के एक पदाधिकारी से निवेदन कर इन बच्चों को देश के
गणतन्त्र दिवस 26 जनवरी के कार्यक्रम मे शामिल कराने हेतु निवेदन किया। उन सज्जन
पुरुष ने इस हेतु अपनी सहर्ष स्वीकृति प्रदान कर दी साथ ही समोसे और लड्डू के लिये
भी उन्होने उन बच्चों को स्वल्पाहार हेतु भी आमंत्रित किया। मै भी खुश था कि ये
वंचित वर्ग के देश के भावी नागरिक भी समाज के गणमान्य नागरिकों और उनके सम्पन्न बच्चों
के साथ कुछ घंटे ही सही पर गणतन्त्र दिवस
मे शरीक होकर अपनी ज़िंदगी मे एक सुखद और यादगार पल का अनुभव करेंगे।
हमारी सोसाइटी के नजदीक ही उन मासूम बच्चों
का आश्रय स्थल रूपी झोपड़ पट्टियाँ एक छोटे से मैदान मे बनी हुई थी। वादे के मुतविक
बच्चे गणतन्त्र दिवस के दिन नियत समय
प्रातः नौ बजे के पूर्व ही नहा धोकर उपलब्ध सर्वोत्तम कपड़ो मे सुसज्जित हो तैयार
थे। जब हम उन सबको कार्यक्रम मे शामिल कराने हेतु लेने पहुंचा तो उन सभी के उत्साह को देख मै भी काफी प्रसन्न
था। कुछ बच्चे मोजे के उपर चप्पल, कुछ खाली चप्पल
मे और कुछ अपनी फटी या उधड़ी पैंट या कमीज मे पाँच पाँच रुपए मे बाज़ार से तिरंगा लेकर
कार्यक्रम मे शामिल हुए पर उनके उत्साह मे अन्य सम्पन्न बच्चों के समान लेश मात्र
भी कहीं कोई कमी न थी।
एक दिन पूर्व मैंने सभी बच्चों को सख्त
हिदायत दी थी कि उनका व्यवहार विशेषतः खाने पीने मे अति सावधानी पूर्ण होना चाहिये
ताकि सोसाइटी के दूसरे बच्चे या रहवासियों को उनके आचरण और व्यवहार पर हंसने या कुछ
कहने का कोई मौका न मिले। सारे बच्चे बेशक वंचित व शोषित वर्ग से थे पर लगभग 9-10 महीनों
से पढ़ाई की हमारी पाठशाला मे शामिल होने पर मैं उनके इस स्वाभिमान को जाग्रत करने
मे सफल रहा था कि कभी भी कोई खाने पीने की वस्तु वितरित करने मे भूंखे भेड़िये की
तरह भैरा या ललचा कर उसके लिये न दौड़े,
आपस मे छीना झपट्टी या लड़ाई न करे, चाहे वस्तु मिले या न मिले। तब से बच्चों की
पाठशाला मे प्रायः दान, दया भाव वश लोग कुछ खाने पीने की वस्तु फल या मिठाई लेकर
आते तो सारे बच्चे आगंतुक को नमस्ते कर अपनी जगह बैठे रहते और कक्षा के एक दो बड़े
बच्चे सारे समान को लेकर एक-एक कर सबसे छोटे बच्चों से शुरू कर बड़े बच्चों को और
अंत मे खुद लेते थे। कभी कभी ऐसा भी मौका
आया कि वितरण करने बाले बच्चों को अंत मे वितरित होने बाली फल या मिठाई कम पड़ जाने पर स्वयं ही उससे वंचित रह गये पर कोई शिकवा शिकायत उन्हे न थी। उस
दिन भी सोसाइटी के गणतन्त्र दिवस के कार्यक्रम मे उन बच्चों ने अपने आचरण और
व्यवहार मे एक जिम्मेदार बच्चों की तरह का अहसास कराया।
जब सारे बच्चे उस दिन सोसाइटी मे कार्यक्रम
मे पहुंचे तो मैंने उन्हे पीछे की दो लाइनों मे बैठा दिया ताकि वे एक साथ बैठ सके
और मै भी उनके व्यवहार पर निगाह रख सकू। कार्यक्रम मे लगभग सौ-सवा सौ छोटे बड़े लोग
रहे होंगे। कार्यक्रम अपनी ही गति से आगे बढ़ रहा था। सोसाइटी के छोटे छोटे बच्चे
यहाँ वहाँ खेल खाने की स्टाल पर भी दीख रहे थे जहां पीछे टेबल पर समोसे का वितरण
हो रहा था। कुछ देर तक तो हमारे साथ आये बच्चो को हमने कुर्सी पर ही बैठ इंतज़ार करने को कहा। पर बच्चों का
बचपना उन्हे समोसे लेने को प्रेरित कर रहा था और हमारा अनुशासन उन्हे अपनी कुर्सी
पर मन मारकर बैठने को मजबूर कर रहा था। कुछ देर बाद मैंने ही इन बच्चों मे से दो
बड़े बच्चे राकेश और इमरान को साथ ले समोसे बाली टेबल से स्वयं समोसे की एक एक
प्लेट दोनों बड़े बच्चों के माध्यम से बच्चों के बीच वितरित करवाई। सारे बच्चे अपनी
ही कुर्सी पर अनुशासन के साथ बैठे रहे। जब सारे बच्चों को समोसे मिल गये तब उन
दोनों बच्चों सहित मैंने भी समोसे का सेवन किया।
तभी मैंने देखा एक महिला सामने बाली
कुर्सियों पर बैठे लोगो को डिब्बे मे रखे लड्डू का वितरण कर रही थी। एक डिब्बा
समाप्त होने के बाद उसने दूसरे डिब्बे से वहाँ बैठे सोसाइटी के बड़े और बच्चो की ओर
डिब्बे को आगे बढाया। लोगो ने उस डिब्बे
से एक एक कर स्वयं लड्डू लिये इस तरह उक्त महिला आगे बढ़ दूसरों को लड्डू वितरण के
लिये आगे बढ़ती रही। यूं भी गणतन्त्र दिवस मे कार्यक्रम के साथ बच्चों का दूसरा
मुख्य आकर्षण प्रायः फल मिठाई या लड्डू ही
होते है जिसका अनुभव मैंने स्वयं बचपन मे अपने स्कूल के गणतन्त्र और
स्वतन्त्रता दिवस के समय देखा और अनुभव
किया था। हम बच्चे भौतिक रूप से तो कार्यक्रमों मे होते थे पर मानसिक रूप से
कार्यक्रम की समाप्ती के इंतज़ार मे लड्डू के सपनों मे खोये रहते थे,
यहाँ भी अपनी अपनी झोपड़ियों से आए ये छोटे मासूम बच्चे शायद बचपन की मेरी सोच की
तरह लड्डू के सपनों की उड़ान भर रहे थे। हमारी
कक्षा के सारे बच्चे बड़ी आतुर दृष्टि से महिला की ओर देख रहे थे कि दूसरी तरफ
लड्डू के वितरण के बाद अब लड्डू का वितरण का क्रम उनके तरफ आने बाला था। मै उन बच्चों की उत्सुक निगाहों मे
लड्डू के मिलने की खुशी को साफ देख सकता था क्योंकि मै भी बच्चों के पीछे खड़ा ये
सब देख रहा था। पर अचानक ही उस महिला ने पीछे की तीनों लाइन मे बैठे बच्चों को नजर
अंदाज़ कर लड्डू का डिब्बा लेकर बड़ी होशियारी और चतुराई से आगे बढ़ गई। बच्चों सहित
मै भी ये सब देख कर हतप्रभ था। उस महिला के इस व्यवहार पर मै हैरान तो था लेकिन मुझे
लगा चूंकि झोपड़ पट्टी के बच्चे कार्यक्रम के मेहमान तो थे पर वे आमंत्रित किये नही
अपितु मेरे द्वारा करवाये गये थे इसलिए मै
कुछ कह न सका। वह महिला बच्चों के साथ
किये अपने इस व्यवहार की परवाह किये बगैर
आगे की कुर्सियों पर बैठे सोसाइटी के गणमान्य व्यक्तियों और बच्चों को
लड्डू बांटने मे मशगूल हो गई और इस तरह लड्डू के मिलने की आश समाप्त हो चुकी थी।
बच्चों के लड्डू मिलने का सपना उस महिला के चातुर्यपूर्ण कौशल से मिट्टी मे मिल
चुका था। महिला के इस व्यवहार ने मुझे अपराध भावना से ग्रसित कर दिया क्योंकि मेरे
आग्रह पर ही बच्चों को गणतन्त्र दिवस मे शामिल करवाने हेतु आमंत्रित करवाया गया था,
उन बच्चों को इस हालात से रु-ब-रु करवाने के लिए मै ही उत्तरदायी था। बाद मे बच्चों
ने उनके साथ हुए इस व्यवहार पर कक्षा की बातचीत मे महिला के इस व्यवहार का जिक्र
भी किया जिस पर मैंने उन्हे इस घटना को भूल बहादुर बच्चों की तरह आगे बढ़ने और
अच्छा बनने के लिए प्रेरित किया।
मै निश्चित ही नहीं दावे के साथ कह सकता हूँ कि उस महिला को बच्चों
के साथ इस तरह के व्यवहार के कोई निर्देश
या सलाह व्यवस्थापकों द्वारा कदापि दी गई होगी?
मेरा मानना है और मुझे लगता भी है कि उन
निम्न वर्ग के बच्चों को लड्डू का वितरण न करना महिला के मन मे इस वंचित वर्ग के
प्रति दुराग्रह और उसकी तंग सोच उसके स्वभाव का हिस्सा रही होगी। मेरा मत है कि सोसाइटी के धनी-मानी,
सम्पन्न व्यक्ति या बच्चे उस कुलीन और भद्र महिला
को लड्डू के वितरण के लिए कदाचित ही याद रखे पर जैसा हमारे मित्र के साथ
घटित घटना का वो चौथी पाँचवी मे पढ़ने बाला बच्चा जो विज्ञान मे
स्नातक और गणित मे परास्नातक तथा पीएचडी के बाद प्रोफेसर की 35 साल की सेवाकाल के
बाद भी अपने साथ लड्डू के वितरण मे हुए अन्याय को नहीं भूल सका उसी तरह
इन मासूम बच्चों के ज़ेहन मे उक्त महिला की छवि एक चालाक,
स्यानी और अति काइयाँपन महिला की न भूलने बाली छवि के रूप मे ताउम्र रहेगी! अतः सार्वजनिक जगहों पर सामान्यतः
बच्चों के साथ कार्यव्यव्हार करने बाले
व्यक्तियों को बच्चों के साथ व्यवहार मे अतरिक्त सावधानी वरतने की आवश्यकता रखना ही
चाहिये विशेषतः वंचित और निम्न बच्चों के साथ व्यवहार करते समय??
विजय सहगल



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