शनिवार, 24 नवंबर 2018
भोजनालय
सोमवार, 19 नवंबर 2018
मेकाहारा
रविवार, 18 नवंबर 2018
शांतिकुंज हरिद्वार
मित्र अनिल समधिया
वैसे तो हमारे मित्र अनेक है परन्तू अनिल जैसे मित्र की बात कुछ और है। अनिल तुम्हें शायद याद होगा हमारी मित्रता की शुरुआत 1973-74 मे हुई थी जब हम लोग 8वी पास कर सरस्वती पाठशाला इंटर कॉलेज मे दाखिल हुए थे। हम लोगो का घर भी नज़दीक था। हमारे माता-पिता एक दूसरे से परिचित तो थे किन्तू पारवारिक प्रगाढ़ता हम लोगो की मित्रता के बाद ही हुई। परन्तू मित्रता की नीव एक अजीव किस्से से हुई इसे हम दोनों के अलावा हमारे बड़े भाई साहब श्री शरद सहगल के अलावा शायद कोई नहीं जनता। उन दिनो झाँसी मे एक सर्कस लगा हुआ था। अनिल के पिताजी नगर पालिका मे हुआ करते थे। तुमने हमे उस सर्कस का एक पास दिया था जो दो लोगो के लिये था। हमारी ईक्षा सर्कस देखने की थी हमने भाई साहब से जिद कर साथ चलने के लिये मनाया। अनिल की राइटिंग का कोई जबाब नहीं था उससे अच्छी राइटिंग हमने अपने जानने बालो मे आजतक नहीं देखी। हुआ यू था तुमने एक सफ़ेद कार्ड पर हू-व-हू पास की नकल कर अपने हाथ से लिख कर हमे दी थी। ये स्पष्ट था कि वह छपा हुआ पास नहीं था वह हाथ से लिखी हुई पास कि नकल थी। परन्तू हमे न जाने क्यों दूर दूर तक उसके बारे मे कोई शंका नहीं थी। जब हमने वो पास सर्कस के मैनेजर को दिया तो वह दक्षिण भारतीय शक्स तो गुस्से से लाल पीला होने लगा और धमकी देने लगा की ये फर्जी पास है। जब भाई साहब ने देखा तो सारा माजरा समझते देर नहीं लगी। वह प्रथम द्रष्ट्या पास की हाथ से लिखी नकल थी। ख़ैर उन्होने स्थिति को सम्हाला एवं टिकिट खरीद कर सर्कस को देखा। अगले दिन हमने अनिल को उस घटना के बारे मे शिकायत की तो तुमने आश्चर्य मिश्रित भावनाओ से बताया की अरे तुम उस पास को सचमुच असली समझे थे वह तो हमने यू ही मज़ाक मे तुम्हें लिख कर दे दिया था वो तो देखने मे ही अलग दिख रहा था तुम उस पास को ले कर सर्कस भी चले गये? मैंने जब कहा "हाँ हमे भी वह मज़ाक लगा था पर वो पास तुम्हने हमे दिया था हमे उस पास पर नहीं तुम पर विश्वास था"। हम तो उस विश्वाश को लेकर सर्कस मे गए थे । तमाम अफसोस के पश्चात उस घटना के वाद हम दोनों की मित्रता की एक नई शुरूआत हुई। तुम्ह्ने उस घटना के बाद हमारी मित्रता मे ताउम्र अब तक विश्वास मे रत्ती भर कमी नहीं आने दी। दिन व दिन एक दूसरे के परिवारों मे हम दोनो एक परिवार के सदस्य के रूप जाने जाने लगे। धीरे धीरे हम लोग विध्यालय से महाविध्यलय पहुंचे हमरी मित्रता भी समय की गति के साथ आगे बढ़ती रही। एक विशेष बात जो हम दोनों के बीच रही की दोनों परिवार की जो सवसे नजदीकी रिश्ते थे जैसे -मामा, बुआ, बहिन-बहिनोई, भतीजे-भतीजी, भांजे-भांजी, भाई, मौसी एक दूसरे के इन नजदीकी रिशतेदारों को जानते ही नहीं थे बल्कि उन सभी के यहाँ हम लोगो का आना जाना आज भी वादस्तूर जारी है। हमे अब भी याद है प्रदीप भाईसहब ने हमे ओरग्निक कैमिस्ट्रि की Tution दी थी और तबके बाद से हम लोगो का लगभग प्रायः एक दूसरे के घर आना जारी रहा, घर मे अम्मा पिताजी से हमे पुत्रवत स्नेह हमेशा मिला।। चान्स की बात थी की हम दोनों की सर्विस भी लखनऊ मे पोस्टिंग के साथ हुई। लखनऊ मे ही स्व. राजेन्द्र अग्निहोत्री परिवार से मुलाक़ात हुई एक और परिवार हमारे परिवार मे घर के सदस्यों की तरह शामिल हो गया । यहाँ तक की हम लोग एक दूसरे के ससुराल के सदस्यों से गहरे से जुड़े रहे। अनिल तुम्ह्ने हमेशा एक सच्चे दोस्त की तरह हमारा हर मुश्किल की घड़ी मे साथ दिया और संकट के समय समाधान होने तक साथ खड़े रहे। तुम्हें याद है लखनऊ मे जब एक बार खाने मे कुछ रोटियाँ कम पड़ी थी, पटैरिया जी दस तंदूरी रोटी लाने होटल गये थे और उसने दस तंदूरी मुर्गे पैक कर दिये थे जब उसे 450/- रुपये मांगे तब कही बताया की रोटियाँ चाहिए। इस तरह की अनेक घटनाए हमारे जेहन मे आज भी ताजा है। श्रीमद भगवत गीता मे मित्र की मध्यस्थ शब्द के रूप मे बहुत सुंदर व्यख्या की है "दोनों पक्षों का हित चाहने वाला" उक्त शब्द को तुमने बहिन नीलम के रिश्ता कराते समय चिरथार्थ किया। हम जब भी तुम्हारे घर जाते और घर पर उस समय कोई रिश्तेदार या मित्र होता तो पिताजी हमारा परिचय अपने उन रिशतेदारों या परिवार मित्रों के समक्ष अनिल के क्लोज़ मित्र के रूप मे कराते तो हमे फ़क्र का एहसास होता। रायपुर से जगन्नाथ पुरी तक की शानदार, यादगार यात्रा मारुति 800 से करने का व्रतांत सिद्धार्थ, साक्षी, सौम्या और जया को आज भी याद होगा। अक्सर हम उस यात्रा को याद कर लेते है। हम सभी तुम्हारे शीघ्रा स्वस्थ होने की कामना करते है ताकि हम लोगो ने जो वादा सेवानिव्रती के पश्चात वद्रीनाथ, केदारनाथ यात्रा के लिये किया था उसे पूरा कर सके।
तुम्हारा मित्र।
आपातकाल के 43 बर्ष
विजय सहगल
हमारी अमरनाथ यात्रा 2018
श्री अमरनाथ यात्रा का विचार अप्रैल 2018 मे
सेवानिव्रति पश्चात हमने हमारे मित्र श्री यशवीर सिंह के साथ सांझा किया, जिसे उन्होने सहर्ष स्वीकार करने पर हमलोगो ने
अमरनाथ यात्रा की तैयारी मई मे ही शुरू कर दी। मेडिकल सर्टिफिकेट पर्मिट, टिकिट, होटल आदि की बुकिंग के साथ 29 जून को नई दिल्ली से श्रीनगर की यात्रा शुरू हुई।
दोनों परिवारों के मन मे एक उत्साह व उमंग था। ग्वालियर की तेज गर्मी से छुटकारा मिला और श्रीनगर मे
वर्षात की ठंडी फुहारो के साथ एक सुखद यात्रा की शुरुआत
हुई। ऐसा मानना है की अमरनाथ यात्रा के पूर्व श्रीनगर मे शंकराचार्य मंदिर के दर्शन आवश्यक है, अतः हम लोगो ने वर्षात मे मंदिर की कठिन सीढ़ियों चढ़ते हुए मंदिर मे दर्शन किए। डलझील, चश्मे शाही और परीमहल देखने के पश्चात 30 जून को
हमलोगे ने श्रीनगर से लगभग
90 किलोमीटर दूर पहलगाम की
ओर प्रस्थान किया । प्रात: 6 बजे 20-25 किमी. चलने के बाद भी रास्ते मे जब एक भी सुरक्षा बल का जवान नहीं मिला तो मन
मे कुछ अनिष्ट की आशंका हुई और हमने ड्राईवर से कहा की टीवी समाचरों मे तो हर कदम
पर कहा जा रहा था की सुरक्षा के कड़े इंतजाम है पर यहाँ तो एक भी सुरक्षा बल का
जवान या अन्य वाहन आदि आते या जाते नहीं दिख रहे है? शायद आप गलत रास्ते पर है? उसका मोबाइल पर जो गूगल मेप सेट था उसको लगभग
मैंने छीन कर देखा
तो बह सोनमर्ग पर सेट था। तब गुस्सा आना लाज़मी था । ड्राईवर ने बताया कि टूर
ऑपरेटर ने आपलोगो को सोनमार्ग के रास्ते अमरनाथ जाने के लिया बताया। पर हमे तो पहलगाम होकर जाना था। पुनः पहलगाम के लिये रास्ते पूंछते हुए हम लोग बापस श्रीनगर होते हुए पहलगाम
के रास्ते पर आये। एकवारगी हमे पिछले साल गुजरात की बस पर हुए आतंकवादी हमले की
याद कर सिहर गए जो रास्ते भटकने की बजह से हमले का शिकार हुई थी। भगवान शिव की
कृपा थी की हम लोग सही रास्ते पर आ गये। श्रीनगर से पहलगाम के रास्ते मे सुरक्षा
के प्रबंध बहुत ही कड़े थे। हाइवे पर हर 40-50 मीटर पर CRPF के जवान
राइफल्स से सुसज्जित थे। तेज वर्षात मे भी अपनी ड्यूटि मे मुस्तैद हर यात्री को
सुरक्षा का अहसास दिला रहे थे। लगभग 40 किमी. के बाद हमे मेन हाइवे छोड़ अनंतनाग की ओर बढ़ना था
जो कि आतंकबाद प्रभावित जिला है। उस रास्ते मे भी CRPF के जवान हर 20-30 मीटर की दूरी पर पहरा दे रहे थे।
हमे वास्तव मे लगा की हम श्रीअमरनाथ जी की तीर्थयात्रा तो कर ही रहे थे पर ये यात्रा फौज के जवानों की कर्मठता, उनकी बहदुरी और उनके त्याग की कहानी वयां कर रही
थी। जवानो के प्रति सम्मान से हमारा सर नतमस्तक था। एक ओर जहाँ सेना और CRPF के जवानों की सुरक्षा के बिना यात्रा वर्तमान मे संभव नहीं हो
सकती थी वही दूसरी ओर हमे जवानों के साथ अपने आप पर भी फ़क्र था कि हम उस अहसास को भी मजबूत कर
रहे थे कि कन्याकुमारी से कश्मीर हमारा है। अमरनाथ यात्रा वास्तव मे
तीर्थयात्रा के साथ देशयात्रा है जो ये अहसास कराती है की कश्मीर भारत का अभिन्न
अंग है । हम लोग 30 जून 2018 को प्रत: 10 बजे पहलगाम पहुंचे। मौसम की ख़राबी एवं
हिमालयन हेलीकाप्टर सर्विस की कुव्यवस्था की बजह से हम 30 जून से 3 जुलाई 2018 तक हर रोज पहलगाम के हैलिकोंप्टर अड्डे तक जाते और अपनी बारी की प्रतीक्षा
करते और बिना यात्रा के होटल बापस आ जाते। लेकिन 3 जुलाई को अंततः अमरनाथ के पहले पढ़ाव
पर हम प्रात: 9 बजे पहलगाम से पंजतरणी पहुंचे। यहाँ भी भारी बारिश के बीच अमरनाथ तक की लगभग 5-6 किमी. की यात्रा घोड़े से शुरू की। यात्रा मार्ग ऊबड़ खाबड़
पत्थरों और कीचड़ से भरा हुआ था। यहाँ एक बार फिर यात्रा के रास्ते पर पहाड़ों के
ऊपर फौज और सीआरपीएफ़ के जवानों की कड़ी निगरानी देखते ही बनती थी। ग्लेशियरो को पार
करते हुए हम यात्रा मार्ग पर बढ़ रहे थे। यहाँ यात्रा मार्ग काफी शकरा है। घोड़ों, पालकी बालों की बजह से पैदल यात्रियों को इस मौसम
मे काफी कठिनाई और परेशानी हो रही थी। प्रशासन को पैदल यात्रियों
की सुविधाओं का विशेष ख्याल रखना चाहिए। आखिरकार लगभग 2
घंटे की घोड़ा यात्रा के पश्चात हम लोग सारी कठिनाइयों को पार करते हुए पवित्र अमरनाथ गुफा के
दरवाजे पर थे। बर्फानी बाबा अभी भी हम
से 1 किमी. दूर थे। इन हालातों मे हमलोगो ने पालकी की सेवाए ली और अमरनाथ जी की
गुफा की तरफ प्रस्थान किया। जांच आदि के बाद अब हम उस मुकाम से चंद क़दमो की दूरी
पर थे जिसका हमे दो माह से इंतजार था। लंबी लाइन मे हम भोले नाथ जी के दर्शन हेतु
लग गये। आखिर बो पल आ गया जब हम बर्फानी बाबा के सामने थे। अद्भुत दृश्य था लगभग 12-13 फुट
ऊंचा प्राकृतिक, विशाल हिम शिव लिंग बहुत बड़ी गुफा मे विध्यमान थे। पास मे ही अन्य शिव परिवार साक्षात गुफा मे विराजमान था। हर हर
भोले के जयकारों के बीच हमे आगे बढ़ना था ताकि अन्य श्रद्धालूँ दर्शन के लिये आ
सके। दर्शन के पश्चात जब श्रीमती जी ने पूंछा की आपने भोले नाथ से क्या मांगा? तब हमे याद आया की हम तो कुछ भी मांगने से चूक
गये!! हम तो उस द्र्श्य को देखने मे ही लीन रहे!!!! शायद बाबा भोले नाथ हमे कुछ मांगने के लिये दुवारा
बुलाना चाह रहे हो। गुफा परिसर
मे माचिस, आरती, अगरबत्ती आदि जलाने की मनाही थी ताकि गुफा मे होने बाली गर्मी से हिम शिव
लिंग को बचाया जा सके।
बाबाबर्फानी के दर्शन के बाद हम लोग गुफा के नीचे
आ गए। नीचे जगह जगह देश के दूर दराज से आये भंडारो मे से एक मे हमने प्रसाद ग्रहण
किया । हमारी इच्छा थी की एक
रात अमरनाथ मे रुकूँ पर लोगो ने सलाह दी की ऑक्सिजन की कमी एवं मौसम की खराबी और प्रसाधन की अव्यवस्था की बजह से
रुकना उचित नहीं होगा। शायद ठीक ही सलाह थी जैसे ही हम लोग घोड़े से आगे बड़े बरसात
शुरू हो गई थी। जैसे जैसे हम आगे बढ़ते गये बैसे बैसे मौसम
ख़राब और ज्यादा खराब और खराब होता चला गया, वारिस तेज होती गई, तापमान अचानक काफी नीचे आ गया। लगातार भीगते हुए
हम लोग 6 बजे लगभग बापस पंजतरणी पहुंचे। यशवीर जी की पत्नी का सर्दी से बुरा हाल
था। NDRF के लोगो ने तुरंत कंबल से उनको ढका एवं गरम पानी
एवं चाय दी। उन्होने लगभग आधा घंटे अपने टेंट मे
बैठा के रखा। मेडिकल कैंप मे डॉक्टर को दिखाया सबकुछ समान्य था जानकार हम
चिन्तामुक्त हुए। अचानक मौसम मे आई इस खराबी
के कारण हैलिकोंप्टर सेवा स्थगित हो गई अतः हमें रात मे
पंचतरणी बेस कैंप मे टेंट लेकर रुकना पड़ा। वर्षात इतनी तेज थी कि टेंट मे एक एक व्यक्ति को चार मोटे कंबल एवं एक रज़ाई ओड़ने के बबजूद, हम सभी सर्दी की बजह से एक मिनिट भी सो न सके। चूंकि रात
हो चुकी थी कुछ भोजन पानी के लिए मै अपनी पत्नी के साथ एक भंडारे मे कुछ खाने पीने
भारी वर्षात मे वरसाती पहन निकला जबकि हमारे
मित्र टेंट मे ही रुक गए क्योंकि टेंट अस्थाई थे लॉक आदि की कोई व्यवस्था नहीं थी।
जब हम भोजन आदि के बाद बापस आए तो एक गड़बड़ हो गयी कि टेंट का नंबर याद नहीं रक्खा।
बहुत बड़े क्षेत्र मे एक जैसे सैकड़ों टेंट थे। अब तो आयी हुई इस मुसीबत मे भारी वरसात
के बीच मे मैंने ऊंची ऊंची आवाज मे अपने मित्र का नाम लेकर चिल्लाना शुरू किया गनीमत
थी कि मेरी आवाज सुनकर मित्र ने प्रत्युत्तर दिया तो टेंट मे बापस पहुँच कर जान मे
जान आयी। पंचतरणी बेस कैंप मे रात मे लाउडस्पीकर से सूचना
प्रसारित की जा रही थी की यात्रा के मार्ग मे भूस्खलन की बजह से रास्ता बंद कर दिया गया है, दूसरे दिन सुबह ज्ञात हुआ कि उस दिन बाल्टाल मे हुई इस घटना मे 4-5 लोग हताहत हो
गये। यात्रा 4-5 जुलाई 2018 को पंजतरणी के आगे अमरनाथ जी के लिया बंद करदी गई।
हम लोग 4 जुलाई को पंजतरणी से हैलिकोप्टर से बापस पहलगाम आए और अगले
दिन टैक्सी से जम्मू के लिये प्रस्थान किया। रास्ते मे चेनानी
- नाशरी सुरंग जो लगभग 9 किमी. लंबी है हिंदुस्तान के विकास की एक मील का पत्थर है। 10 घंटे
की जम्मू यात्रा मे पूरे मार्ग मे विभिन्न संस्थाओं द्वारा भंडारो के माध्यम से
यात्रियों को तरह तरह के व्यंजन वितरित किए जा रहे थे, उनका सेवा भाव और प्रेम देखते ही बनता था। अंत मे
ये उल्लेख करना आवश्यक है कि अमरनाथ यात्रा आपकी दृढ़निश्चय एवं दृढ़ ईक्षाशक्ति से ही पूरी हो सकती है परंतु सेना/सीआरपीएफ़
के जवानों की बहादुरी उनकी देश के प्रति सच्ची सेवा, लगन एवं पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, लखनऊ, बदायूं और देश के अन्य सैकड़ो धार्मिक भंडारो की
सेवा भावनाओ के विना संभव नहीं हो सकती।
बाबा बर्फानी की जय!!
विजय सहगल,











