शनिवार, 29 अगस्त 2026

श्री चिंताला वेंकटरमना स्वामी मंदिर, ताड़ीपत्री-आंध्रा प्रदेश

 

"श्री चिंताला वेंकटरमना स्वामी मंदिर, ताड़ीपत्री-आंध्रा प्रदेश "










राम लिंगेश्वर मंदिर से महज एक किमी॰ दूर तड़ीपत्री कस्बे के बीच 16वीं शताब्दी मे बना  भगवान विष्णु को समर्पित बुग्गा रामलिंगेश्वर मंदिर भी अपनी कलात्मक नक्काशी और विजयनगर साम्राज्य की शैली मे बना ये मंदिर आकर्षण का केंद्र था। 5 एकड़ मे फैले इस मंदिर का निर्माण भी विजयनगर साम्राज्य के पेम्मासानी नायकों द्वारा कराया गया था। यह मंदिर भी इसी क्षेत्र मे बहुतायत मे पाये जाने वाले काले ग्रेनाइट पत्थरों से बना है। इस मंदिर का नाम चिंताला इसलिए पड़ा क्योंकि तेलगु भाषा मे चिंताला का अर्थ है इमली का पेड़, यहाँ एक विशाल इमली के पेड़ के नीचे भगवान विष्णु की मूर्ति प्रकट हुई थी। चिंताला ऊंची ऊंची दीवारों से घिरे, आयताकार चबूतरे पर बने विशाल मंदिर के सभा मंडप, गर्भ गृह जिसमे भगवान विष्णु की काले ग्रेनाइट पाषाण की भव्य प्रतिमा दर्शनीय है। मंदिर के पीछे ही काले ग्रेनाइट से बने गरुड मंडप जो कि  रथ के आकार का बनाया गया है जो ठीक हम्पी के विट्ठल मंदिर की तर्ज़ पर बनाया गया है। मुख्य मंदिर के चारों ओर पत्थरों के स्तंभों से एक बरामदा बनाया गया था। मुख्य मंदिर और इस बरामदे के मध्य एक बड़ा और खुला परिक्रमा पथ या रास्ता था जो मंदिर प्रांगण के चारों ओर था।  भारतीय पुरातत्व सर्वे विभाग द्वारा राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों के रूप मे वर्गीकृत किए जाने वाले मंदिर मे से एक है।    

मंदिर के बाहर बने घास के मैदान के बीच मे एक 4-5 फुट ऊंचे पत्थर के चबूतरे पर लगभग 20-22 फुट लंबी/ऊंची और 2-2.5 फुट चौड़ी पत्थरों दो लम्बवत शिलाओं/स्तंभों  के ऊपर लगभग 6-7 फुट की क्षैतिज या आड़ी शिला रक्खी है इस पूरी आकृति को तुलाभारम कहा जाता है जहां पर भक्त और श्रद्धालु मंदिर मे अपने या परिवार के सदस्यों के बजन के बराबर अन्न, वस्त्र आदि दान देते रहे होगे।    

मंदिर के छह मंज़िला ऊंचे  गौपुरम या प्रवेश द्वार के आगे एक विशाल खुला मैदान है बीच मे बने रास्ते के दोनों ओर हरी घास के मैदानों ने मंदिर के आकर्षण मे चार चाँद लगा दिये हैं। ऐसा प्रतीत होता है नगर के सारे नगरवासी शाम के समय अपने इस भव्य और आकर्षित मंदिर की ओर चले आते हैं। हम लोग भी शाम के समय जब मंदिर मे पहुंचे तो चारों ओर बच्चे, महिलाओं और पुरुषों की भारी जमावड़ा था। बूढ़े और वरिष्ठ जन जहां तहां अपने अपने समूहों मे गुफ्तगू करते नज़र आये। इस तरह के अलग अलग समूह  हुए जहां तहां बैठे थे। मंदिर  का मुख्य  सभा मंडप काले ग्रेनाइट के सुदर  40 नक्काशीदार स्तंभों पर बना है। प्रत्येक स्तंभों पर बारीक नक्काशी से अप्सराओं, नृत्यांगनाओं, द्वारपालों की मूर्तियों को उकेरा गया था। इन जीवंत प्रतिमाओं की वास्तु बेजोड़ और अद्व्तिय है।  इन 40 नक्काशीदार खंभों पर बने सभा मंडप के दोनों ओर लंबाई मे बनी दलानों मे जगह जगह लोगों के समूह यहाँ वहाँ बैठे चर्चा करते नज़र आए। कुछ बुजुर्ग महिलाएं मंडप मे एक ओर समूह मे बैठी तेलगु भाषा मे भगवत कीर्तन और भजन गाती दिखलाई दी। इस सभा मंडप एवं मंदिर की दीवारों पर रामायण, महाभारत और भागवत पुराण के कथा प्रशगों को जगह जगह उकेरा गया है।  वहीं कुछ महिलाएं मंदिर मे चावल की खिचड़ी का  प्रसाद वितरित कर रहीं थी। हम लोगों ने भी इस चावल की खिचड़ी के इस  प्रसाद को ग्रहण किया जो गरम और स्वादिष्ट था। मंदिर मे बैठे कुछ वरिष्ठ जनों को अपना परिचय देकर संवाद करने का प्रयास किया लेकिन भाषा की समस्या के कारण बातचीत उतनी सहज नहीं रही लेकिन भावनाओं का आदान प्रदान भाषा के मुक़ाबले सरल और मिठास लिए था।  

मंदिर मे भगवान चिंतला वेंकटरमना स्वामी के दर्शनार्थ हम लोग गर्भ गृह की ओर बढ़े। एक छोटे से द्वार से होकर हम लोगों ने मंदिर के गर्भ गृह मे प्रवेश किया। मंदिर के गर्भ गृह मे भगवान विष्णु की 10 फुट ऊंची खड़ी प्रतिमा के दर्शन कर मै कृत-कृत हो गया। सुंदर नक्काशी दार प्रतिमा पर शंख, चक्र, गदा और शेषनाग की सैया बहुत ही सुंदरता से स्पष्ट ढंग से दृष्टिगोचर हो रहा था। गर्भ गृह की छत्त अष्टकोणीय  सुंदर नक्काशीदार पुष्प की कारीगरी देखते ही बनती है। गर्भ गृह मे स्थित प्रदक्षिणा पथ की परिक्र्मा कर हम लोग एक बार फिर मंदिर के प्रांगढ़ मे स्थित पीछे बने गरुढ़ मंडप अर्थात रथ के आकार के मंडप के दर्शन के लिए आ गए। यह रथ पत्थरों से बना था लेकिन रथ के पहिये, मंच उसके स्तम्भ और शिखर ऐसे प्रतीत हो रहा था जैसे यदि रथ को आगे की ओर धकेला जाय तो शायद  कुछ ही पलों मे आगे  चल पड़ेगा। यहाँ भी मैंने कुछ बुर्का धारी महिलाओं को मंदिर के अंदर प्रांगण मे और मंदिर के बाहर हरी घास के मैदानों मे बैठे देखा।  

मंदिर की एक पूर्ण परिक्रमा पूर्ण कर पुनः एक बार तड़ीपत्री मे इन दोनों मंदिर के दर्शन की पुनः लालसा लिए हम अपनी अगली यात्रा के लिए मंदिर प्रांगढ़ से आगे बढ़ लिए।  

 

विजय सहगल        

 

रविवार, 23 अगस्त 2026

"अग्रवाल पैकर्स एंड मूवर्स-ऊंची दुकान फीके पकवान" , "चंद गत्ते के डिब्बों के लिये ग्राहक को FIR की धमकी"

"अग्रवाल पैकर्स एंड मूवर्स-ऊंची दुकान फीके पकवान"
"चंद गत्ते के डिब्बों के लिये ग्राहक को FIR की धमकी"

 







13 जून 2025 को जब मेरे छोटे बेटे ने हैदराबाद से बेंगुलुरु मूव किया तो घरेलू सामान को शिफ्ट करने के लिये अग्रवाल पैकर्स एंड मूवर्स का नाम स्वतः ही मस्तिष्क मे था क्योंकि इस कंपनी की सेवाएँ मै पहले भी चार-पाँच बार ले चुका था। अनुभव ठीक था, सेवा की उत्तम गुणवत्ता अच्छी थी यध्यपि किराया भाड़ा अन्य ट्रांसपोर्ट कंपनियों से सर्वाधिक था। लेकिन सामान की सुरक्षा को प्राथमिकता ने हमे इस महंगी कंपनी की सेवाए लेना उचित प्रतीत हुआ। इस तरह 16 जून 2025 को अग्रवाल पैकर्स एंड मूवर्स कंपनी ने मामूली क्षति के साथ सामान को बेंगुलुरु स्थित के आर पुरम क्षेत्र मे अनलोड करा दिया।

जैसे ही जुलाई माह 2026 के आखिरी दिनों मे मुझे मालूम हुआ कि मेरे बड़े बेटे की पदस्थपना भी गुड़गाँव से बेंगलुरु हो गया, तो मै खुश था कि चलो दोनों बच्चे एक ही शहर मे साथ साथ रहेंगे तो एक दूसरे का सहारा भी रहेगा और मुझे भी बच्चों के पास एक ही समय मे साथ रहने का सुख प्राप्त होगा अन्यथा बच्चों के पास अलग अलग शहरों मे जाने-आने मे होने वाले व्यय और समय के अपव्यय से छुटकारा तो मिलेगा ही समय का सही सदुपयोग भी हो सकेगा। सौभाग्य से बड़े बेटे को भी घर के॰आर॰ पुरम की उसी सोसाइटी के सामने मिल गया जिसमे छोटा बेटा रहता था। यूं भी लोग बेंगलुरु के मौसम की भूरि-भूरि प्रशंसा करते नहीं अघाते और जो बहुत कुछ हद तक सच भी था। इससे पहले मै, 2023 मे बेंगुलुरु के सरजापुर के पास स्थित थिंडलू गाँव के प्रवास का सुखद अनुभव लिये था। थिंडलू गाँव के समृद्ध ग्रामीण जीवन, वहाँ के निश्छल ग्रामीण जनों, सांस्कृति के बारे मे मैंने कई अनुभव भी समय समय पर अपने ब्लॉग मे आप सबसे सांझा किए थे, जिसकी सुंदर, सुखद और स्वर्णिम यादों मे प्रायः आज भी मै, खो जाता हूँ।

यध्यपि मै हाल ही मे 21 जुलाई 2026 को सड़क मार्ग से बेंगलुरु पहुंचा था पर बड़े बेटे के घरेलू सामान को गुड़गाँव से बेंगलुरु शिफ्ट कराने 11-12 अगस्त 2026 को पुनः गुड़गाँव पहुँच गया। निश्चित  ही जब एक बार फिर से सामान शिफ्ट कराने की बात आयी तो अग्रवाल पैकर्स एंड मूवर्स कंपनी का नाम आना स्वाभाविक था। सामान की सुरक्षा और सकुशलता ने पुनः एक बार रु॰92000 का मेंहगा  भाड़ा स्वीकार कर 14 अगस्त 2026 को गुड़गाँव को नमस्कार कर अग्रवाल पैकर्स एंड मूवर्स कंपनी के ट्रक से बेंगलुरु के लिए रवानगी डाली। सामान लोडिंग की आपाधापी मे ट्रक रवाना होने के बाद जब दरबाजे के पीछे रखे, छह फुट चौड़े  कालीन पर नज़र पड़ी  तो माथा ठनका, ये तो भला हो उस ट्रक ड्राईवर शिव का जो घर से 20-30 किमी॰ ही निकला था उसको फोन कर जैसे तैसे कालीन को पुनः ट्रक मे चढ़ाया। अग्रवाल पैकर्स एंड मूवर्स कंपनी का ट्रक 18 अगस्त 2026 को सकुशल बेंगलुरु पहुँच गया। इनके कर्मचारियों ने यहाँ भी सामान को अच्छी तरह अनलोड कर घर मे रखवा दिया। लेकिन  आज 18 अगस्त 2026 को सामान अनलोडिंग के दौरान अग्रवाल पैकर्स एंड मूवर्स कंपनी के उस दुष्ट, कपटी और अमानवीय सुपरवाइज़र संतोष के कटु, निंदनीय अनुभव और दुर्व्यवहार को सांझा करूंगा जिसे  हमलोगो ने  पिछले साल 16 जून 2025 को भी महसूस किया था जब मेरे छोटे बेटे का सामान हैदराबाद से बेंगलुरु के समय किया था और जिसकी शिकायत भी तब हम लोगो ने अग्रवाल पैकर्स एंड मूवर्स कंपनी के उच्च अधिकारियों को की थी।

18 अगस्त 2026 को सामान को ट्रक से उतार कर कुछ सामान को अनपैक कर उसके बारदाने को कंपनी के कर्मचारी तुरंत बापस ले जाते है जैसे टीवी को रखने का विशेष स्टील बॉक्स, किचिन के काँच के बर्तनों को रखने के उपयोग  की विशेष प्लास्टिक ट्रे, फ्रिज, डायनिंग टेबल के शीशे को पैक करने की विशेष शीट आदि। जो बापस लेना स्वाभाविक होता है क्योंकि इनका बारंबार उपयोग जो होता है और जिनकी लागत भी ज्यादा रहती होगी। इन सबके साथ किताबे, पर्दे, कपड़े, जूते-चप्पल, अन्य सजाबटी सामान जिनको कागज के गत्तों के कार्टून मे पैक किया जाता है और जिनको तुरंत अनपैक कर लगाना/रखना  संभव नहीं हो पता है और ऐसे ही 10-15 गत्ते के कार्टून खाली न कर पाने या एक-डेढ़ रुपए किलों के इन गत्ते के कार्टून के बाद मे ले जाने के आग्रह को नकारते हुए अग्रवाल पैकर्स एंड मूवर्स कंपनी के इस बेशर्म, निर्लज्ज सुपरवाइजर संतोष ने हमारे बेटे व वरिष्ठ नागरिक पत्नी की एफ़आईआर पुलिस मे करवाने की धमकी दी और  परिवार से दुर्व्यवहार किया। आप स्थिति की सहज ही कल्पना की जा सकती है कि 92000 भाड़ा देने के बावजूद कंपनी का दो कौड़ी का सुपर वाइजर संतोष कुमार,  2-4 सौ रुपए के गत्ते के लिए पुलिस मे एफ़आईआर की धमकी देता है? क्या अग्रवाल पैकर्स एंड मूवर्स कंपनी जो अपने ग्राहकों की संतुष्टि और उत्तम ग्राहक सेवा का दम भरती है का सुपरवाइजर इस तरह का अमानवीय व्यवहार करे? यूं भी गत्ते के कार्टून, उपयोग के बाद अनुपयुक्त हो जाते हैं और जिन्हे कबाड़े मे बेच दिया जाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि ये कर्मचारी गत्तों को कबाड़ी को बेचने और चंद पैसों की लालच मे ग्राहकों से गत्ते के कार्टून जबर्दस्ती खाली करा कर निजी लाभ कमाने की लालच मे, ग्राहकों के लिए समस्या उत्पन्न करते है और गत्ते के कार्टून न मिलने पर ग्राहकों से दुर्व्यवहार करते हैं। अग्रवाल पैकर्स एंड मूवर्स कंपनी  के इस सुपर वाइजर संतोष का व्यवहार हू-ब-हू बैसा ही था जैसा पिछले वर्ष 2025 मे इसने हमारे छोटे बेटे का सामान हैदराबाद से बेंगलुरु भेजने के दौरान किया था और जिसकी शिकायत कंपनी के उच्चा अधिकारियों से की थी। यदि कंपनी ने इस गैरजिम्मेदार सुपर वाइजर के विरुद्ध पिछले वर्ष 2025 मे चलताऊ कार्यवाही से अलग, कठोर कार्यवाही की होती तो इस संतोष की ग्राहकों से दुबारा ऐसा व्यवहार करने की हिम्मत न पड़ती? बेंगलुरु जैसे आईटी शहर मे हर दिन अनेकों इंजीनियर और विशेषज्ञ प्रति दिन स्थानांतरित होकर आते व जाते होंगे इस लालची और असभ्य सुपर वाइजर संतोष ने अग्रवाल पैकर्स एंड मूवर्स कंपनी के अनेकों ग्राहकों के साथ निश्चित ही  ऐसा दुर्व्यवहार करने का आदि रहा  होगा, जिसकी जांच कंपनी को करवानी चाहिए? यहाँ यह  लिखना उचित प्रतीत नहीं लगता लेकिन सूचना के लिए आवश्यक हो गया है कि  अग्रवाल पैकर्स एंड मूवर्स कंपनी के भाड़े रुपए 92000/-के अतिरिक्त, हमारे बेटे ने  लोडिंग-अन लोडिंग करने वाले मजदूरों और कर्मियों को मानवीयता के आधार पर रुपए 3000/- रुपए टिप्स के रूप मे दिये लेकिन कंपनी के इस ढीठ, धृष्ट और गुस्ताख़ कर्मचारी, संतोष ने मूवर और पैकर्स जैसे व्यवसाय मे ग्राहक की संतुष्टि के लक्ष्य के विपरीत  कोई सद्व्यवहार नहीं दिखाया जो घोर निंदनीय और आपत्ति जनक है।         

बेंगलुरु जैसे विश्व प्रसिद्ध शहर मे एक अदने से सुपर वाइजर संतोष का लगातार अग्रवाल पैकर्स एंड मूवर्स कंपनी के  ग्राहकों के साथ ऐसा दुर्व्यवहार करना विश्व प्रसिद्ध अग्रवाल पैकर्स एंड मूवर्स कंपनी के गुड गवर्नेंस पर बहुत बढ़ा सवालिया निशान है?? ग्राहकों को अग्रवाल पैकर्स एंड मूवर्स कंपनी के ग्राहकों को इनकी महंगी सेवा, इस कहावत को चरितार्थ करती है कि "ऊंची दुकान फीके पकवान!!"।  कंपनी को इस अमानवीय व्यक्ति के विरुद्ध सख्त और कठोर कार्यवाही करना चाहिए और अपनी छवि को बनाए रखने के लिए कृत कार्यवावाही से लोगों को अवगत करना चाहिए।         

विजय सहगल    

                   


रविवार, 16 अगस्त 2026

रामलिंगेश्वर मंदिर, ताड़ीपत्री-आंध्रा प्रदेश

 

"रामलिंगेश्वर मंदिर, ताड़ीपत्री-आंध्रा प्रदेश"










लेपाक्षि मंदिर से बापसी के समय 14 जून 2025 को हमारा, आंध्रप्रदेश के अनंतपुर जिले के एक छोटे लेकिन धार्मिक दृष्टि से विश्व प्रसिद्ध, एतिहासिक मंदिरों की नगरी तड़ीपत्री जाना हुआ। 1490 और 1509 ई॰ मे विजयनगर साम्राज्य के राजा पेम्मासानी रामलिंगा नायडू प्रथम द्वारा बनवाये गए इस मंदिर की वास्तु शैली विजयनगर, चालुक्य और चोल शासकों की तरह है।  इस छोटे से कस्बे मे अतिप्राचीन, पेन्नार नदी के दक्षिण तट पर स्थित भगवान शिव को समर्पित बुग्गा रामलिंगेश्वर स्वामी मंदिर एवं भगवान विष्णु को समर्पित श्री चिंताला वेंकटरमण स्वामी मंदिर के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। तड़ीपत्री शहर के प्रवेश द्वार पर कस्बे के बाहर रामलिंगेश्वर स्वामी मंदिर के दर्शन पहले करने का निश्चय किया क्योंकि ये ही पहले हमारे मार्ग पर पड़ता था। दूर से ही मंदिर के गोपुरम के दर्शन हो रहे थे मंदिर के बाहर काफी बड़ा प्रवेश मार्ग जिसके दोनों ओर कार पार्किंग की समुचित व्यवस्था थी। कार को पार्किंग मे रख, हम लोग मंदिर की ओर बढ़े ही थे, तो मंदिर का लकड़ी का बना मध्यम आकार का रथ मार्ग के एक तरफ रखा हुआ था जो किसी पर्व या त्योहार मे  इस्तेमाल किया जाता रहा होगा। आगे सड़क पर ही ऑइल पेंट से सुंदर बड़ी गोल रंगोली पूरी सड़क को घेरती हुई बनाई गयी थी जो दक्षिण भारत के घरों, मंदिरों और धार्मिक स्थानों मे प्रायः देखने को मिल जाती है।

मंदिर के विशाल प्रवेश द्वार के बाहर और अंदर की वास्तु निर्माण मे काफी अंतर था। बाहर की तरफ से सहारा देती बड़े बड़े खंडों/बोल्डर की दीवार बनाई गयी थी जो  शायद पुरातत्व विभाग ने प्रवेश द्वार की ऊंची दीवारों को सहारा देने के लिए बनाई थी क्योंकि अंदर की तरफ प्रवेश द्वार की ऊंची ऊंची दीवारों पर कलात्मक देवी देवताओं की मूर्तियाँ के अतिरिक्त नृत्य करती अप्सराओं, गंधर्व, नाग, किन्नर और द्वारपालों की विभिन्न भाव भंगिमाओं की नक्काशीदार मूर्तिया, स्तम्भ, छोटे छोटे गुंबद, घंटे आदि बनाए गए थे। ऊंची देहरी लांघ कर जब मंदिर प्रांगण मे पहुंचे तो सामने ही भगवान शिव-पार्वती का सुंदर और विशाल मंदिर दिखलाई पड़ा। बारह द्वारों के विशाल सभा मंडप मे बारह काले ग्रेनाइट के सुंदर स्तंभों पर भी गहरी बारीक नक्काशी से गरजते सिंहों की मूर्तियों को उकेरा गया था। सभा मंडप तक चढ़ने के लिए तीनों दिशाओं मे सीढ़ियाँ बनाई गयी थे जबकि चौथी दिशा मे मंदिर के गर्भ गृह मे भगवान शिव की मूर्ति विराजमान थी। मूर्ति का श्रृंगार स्वर्ण आभूषणों के साथ सुंदर ताजे फूलों से किया गया था। मंदिर के पुजारी ने हमारे परिवार से शुभ संकल्प कराते हुए कुल, गोत्र और पूर्वजों का स्मरण कराते हुए शिवाभिषेक कराया। कुछ समय सभा मंडप के एकतरफ ध्यान लगा कर बैठना, अपूर्व आनंद और शांति प्रदान करने का अनुभव था। काले ग्रेनाइट के वर्गाकार पत्थरों से बने फर्श पर इन्ही पत्थरों से बने मंदिर के कुछ आगे मंदिर के प्रवेश द्वार के विपरीत दिशा मे भी वैसा ही एक भव्य नक्काशीदार प्रवेश द्वार बना था, बस दोनों दीवारों के बीच की क्षैतिज/आड़ी  छत्त नहीं थी। द्वार की दीवारों पर वही गंधर्भ, किन्नर और अप्सराओं की नृत्य करती मूर्तियाँ अत्यंत सुंदर और नयनभिराम थी। पूरे   मंदिर प्रांगण की प्रदक्षिणा के दौरान लेपाक्षि मंदिर की तरह ही एक बुर्काधारी महिला का हाथ मे दूर्वा और फूल लिए देखना आश्चर्य और अचरज का अनुभव था। मेरे लिए उस मुस्लिम महिला की सनातन धर्म मे निष्ठा और नियत समझना कठिन था?

एक प्रदक्षिणा पूर्ण कर हम लोग मंदिर के गोपुरम को ऊपर से नीचे और बार-बार निहारते हुए पुनः भगवन शिव की ओर अपना शीश झुकाते हुए पड़ीपत्री के दूसरे मंदिर की ओर प्रस्थान कर गए जो वहीं पास मे स्थित था।  

विजय सहगल

 

शनिवार, 8 अगस्त 2026

पेनुकोंडा फोर्ट-अनंतपुर, आंध्रप्रदेश

 

"पेनुकोंडा फोर्ट-अनंतपुर, आंध्रप्रदेश"













हाँ यही नाम था, पेनुकोंडा फोर्ट। थोड़ा कठिन नाम था पर गूगल ने अपनी जोरदार सिफ़ारिश मे इसे एक ऐतिहासिक, प्राकृतिक रूप से समृद्ध और शानदार सड़क निर्माण के कारण बाइकरों के लिए चुनौती पूर्ण सवारी का स्वर्णिम स्थान बताया था। यह किला अनंतपुर शहर से 70 किमी॰ और बेंगुलुरु से लगभग 150 किमी॰, शानदार राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 44 पर स्थित है। छोटे से घनी आबादी बाला कस्बा पेनुकोंडा पहले आंध्र प्रदेश के सत्यासाईं जिले मे था लेकिन जिलों के विभाजन के बाद अब अनंतपुर जिले मे स्थित है। तेलगु भाषा मे पेनु का अर्थ है बड़ी और कोंडा का अर्थ है पहाड़ या पहाड़ी जिससे इस कस्बे का नाम पेनुकोंडा पड़ा। शुरू मे इसका नाम लेना या याद रखना  कठिन था पर भ्रमण के पश्चात ये एक चित-परिचित नाम और स्थान बन गया। सन 1565 मे हम्पी राज्य के पतन के बाद विजयनगर साम्राज्य  की दूसरी राजधानी के रूप मे पेनुकोंडा का निर्माण राजा वीर विरूपन उद्य्यार ने कराया था। इस पेनुकोंडा के उजड़े हुए किले की सड़क, कस्बे के धरातल से लगभग 6 किमी॰ और पहाड़ी की ऊंचाई लगभग 2500 फुट थी। पहले  मुझे भ्रम और भ्रांति थी कि पेनुकोंडा फोर्ट कस्बा कर्नाटक मे है पर शानदार डाम्मर सड़क के निर्माण और रेसिंग बाईकरों के पसंदीदा स्वर्ग देख मुझे थोड़ा भ्रम और भ्रांति हुई क्योंकि  सड़क की शानदार आधारभूत संरचना देख सहसा विश्वास नहीं हुआ क्योंकि कर्नाटक राज्य की राजधानी बेंगलुरु शहर की सड़कों की जो हालात और दुर्दशा  देखे वो बद से बदतर हैं। बेंगलुरु शहर की आधारभूत संरचना विशेषतः सड़कें  किसी निम्नतम पिछड़े अविकसित शहर या कस्बे जैसी वाहियात और बेकार है। मेरा मिथ्याभास गलत निकला, जब मुझे पता चला कि ये कस्बा आंध्रा प्रदेश मे है।

खैर! 15 जून 2025 को  पेनुकोंडा कस्बे के प्रवेश करते ही जो सड़क पेनुकोंडा फोर्ट को जाती है की तरफ, जब हम लोगों ने कार को मोड़ा तो पीछे से करीब 20-30 बाइकर ढों....., भौ-भौ...... कर फर्राटे भरते हुए आगे निकले। ये लोग शायद बेंगलुरु से आ रहे थे। सप्ताहांत सूचना प्रौध्योगिकी के नौकर पेशा लोग, शानदार राष्ट्रीय राजमार्गों के कारण सामान्यतः  शनिवार, रविवार की छुट्टियों मे बड़ी संख्या मे पेनुकोंडा या अन्य ऐसी ही जगहों पर प्रायः घूमने, भ्रमण करने निकलते हैं।  हम लोगों ने अपनी कार को एक तरफ लगाते हुए, बाईकारों के निकलने को प्राथमिकता देते हुए कार को सावधानी पूर्वक चलाने का जतन किया। यध्यपि सड़क शानदार, पक्की और काफी चौड़ी थी, वाहनों के आने और  जाने के रास्ते सफ़ेद रंग से स्पष्टतः अंकित थे परंतु ये रास्ता पहाड़ी रस्तों से कुछ अलग था क्योंकि इस 6 किमी॰ तक की चढ़ाई मे लगभग 14 हेयर पिन मोड़ (कर्व) थे। जो वाहन चालकों विशेषतः बाइकर चालकों को रोमांच, थ्रिल और जोश पैदा करते थे। प्रायः इसी रहस्य और रोमांच का आनंद उठाने नौजवान युवा पेनुकोंडा जैसे स्थान पर बाइक को दौड़ाने आते हैं।

लगभग छः किमी॰ के इस रेसिंग ट्रैक के अंतिम सिरे पर जो कि एक सपाट रोड पर बना हैं घुम्मकड़ लोग अपने वाहनों को सड़क के दोनों किनारों पर खड़ा कर देते हैं और आगे के कच्चे मार्ग के दोनों ओर बनी पहाड़ी पर विजयनगर साम्राज्य के बीते  इतिहास को खंडहर होती इमारतों, महलों और किलों की दीवारों मे खोजने का जतन करते हैं। हम लोगों ने भी अपनी कार को सड़क के कच्चे रास्ते के एक ओर लगा कर पेनुकोंडा के ऐतिहासिक  महलों और मंदिरों को देखने का निश्चय किया। एक कम ऊंची पहाड़ी पर जिसका रास्ता पत्थरों की लंबी-लंबी सीढ़ियों से बनाया गया था और पहाड़ी के शिखर पर पत्थरों, शिलाओं और कलात्मक स्तम्भों पर बना एक ऊंचा आकर्षक महल जो मंदिर प्रतीत होता था जाने का निश्चय किया। ज्यादा रखरखाब न होने के कारण, सीढ़ियों के दोनों और पत्थरीली जमीन मे  जगह जगह जंगली घास उग रही थी। सामने पत्थर से बने मुख्य द्वार के ऊपर ध्वस्त हुई, विखंडित और उजड़ी तीन मंज़िला महल की आकृति दिखाई पड़ रही थी, दोनों मंजिलों के चारों ओर चौकोर स्तम्भों की शानदार दक्षिण भारतीय नक्काशी नज़र आ रही थी। भवन मे प्रवेश करते ही एक विशाल आयताकार  गर्भगृह था जिसकी ऊपरी छत्त आसमान की ओर खुली थी जिससे भरपूर प्रकाश पूरे परिसर मे फैला हुआ था। इस आयताकार छिद्र के उपर ही एक आयताकार सीधा सपाट पत्थर रक्खा था जो शायद इस भवन के छिद्र या खुले भाग को ढकने के लिए इस्तेमाल किया जाता होगा। इस आयताकार भवन के चारों ओर चार दिशाओं मे लंबे बरामदे बने हैं, जिनकी छत्त, नीचे  आयताकार, बीच मे नक्काशी की गयी वर्गाकार और सबसे ऊपर गोल नक्काशीदार स्तम्भों पर टिकी थी। रख रखाब के अभाव मे पूरा महल ऊबड़-खाबड़ और उजाड़ नज़र आ रहा था। फर्श के मोटे-मोटे पत्थर यहाँ वहाँ उखड़े पड़े थे। इसी  भवन के कुछ स्थानों पर भगवान बजरंगवली हनुमान, माँ धनलक्ष्मी की प्रतिमा के दोनों ओर सूंढ उठाए हाथी, नृत्य करती नृत्यांगना एवं द्वार पर बने गंधर्व की प्रतिमा भी यथोचित स्थान की बाँट जोहती नज़र आयी। शासन को चाहिए इस अद्भुत वास्तु धरोहर का समुचित रखरखाव शीघ्र-अतिशीघ्र करें।

इस मंदिर महल से नीचे उतरकर जब हम आगे बड़े तो जगह जगह किले मे स्थित महलों के अवशेष देखने को मिले जो आज भी सुंदर और लोगों का ध्यानकर्षण कर रहे थे। पानी की बावड़ी के मध्य बनी टापू के समान एक चारद्वारी आकर्षण का केंद्र थी। अपने यौवनकाल मे निश्चित ही लोगो का ध्यानाकर्षित कर विजयनगर साम्राज्य की समृद्ध विरासत को दर्शा रही होगी। इसी बावड़ी के पास बने हाथी और घोड़ों के अस्तबल के खंडहर विजयनगर राज्य के गौरव और वैभवशीलता की कहानी कह रहे थे। बापसी मे रास्ते के दूसरी ओर बनी पहाड़ी के शिखर पर बने भवनों के अवशेष दिखाई दे रहे थे जहां साधारणतः लोगों का पहुँचना संभव नहीं था।  यही नहीं इस पहाड़ी पर जहां एक ओर विजय नगर के राजाओं ने अपने शिल्प और वास्तु से समृद्ध किया वहीं प्रकृति ने भी अपना भरपूर स्नेह से  पहाड़ी को समृद्ध किया। रास्ते मे जहां तहां प्राकृतिक रूप से पत्थरों का एक के ऊपर एक रक्खे रहना, विभिन्न आकार प्रकार के पाषाणों का एक क्रम मे दिखना और भी मन को आश्चर्य चकित कर देता है। 

बापसी मे एक बार फिर से सड़क पर बने 14 हेयर बैंड कर्व से होकर रोमांचित यात्रा करने के आनंद का लाभ लेते हुए हम अपनी अगली यात्रा के लिए पेनुकोंडा फोर्ट से प्रस्थान कर गए। 

विजय सहगल                                    

शनिवार, 1 अगस्त 2026

चढ़ावे की चोरी मे छाती पीटते कालनेमि

 

"चढ़ावे की चोरी  मे छाती पीटते कालनेमि"






इन दिनों राम मंदिर मे चढ़ावा की चोरी करने पर स्यापा और छाती पीटने वाले झूठे, छद्म और नक़ली भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी है। आज दिनांक 31 जुलाई 2026 को तो निर्दलीय सांसद पप्पू यादव सहित समाजवादी पार्टी, कॉंग्रेस के सांसदों ने संसद मे चढ़ावा चोरी की नाटक, नौटंकी की आड़ मे जिस तरह से सनातन धर्म, भगवा और साधु संतों उपहास, अनादर और अपमान किया उसकी जितनी निंदा की जाय कम हैं। साधु संतों की इस  मार पिटाई  के इस ड्रामे के माध्यम से सनातन धर्म को बदनाम करने के इस दुष्कर्म, कुकर्म और अधर्म मे कॉंग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। इस नाटक-नौटंकी मे पप्पू यादव ने कालनेमि की तरह भगवा वस्त्र धारण कर माथे मे तिलक त्रिपुंड और माला पहनी थी और राहुल गांधी इस छद्म साधु के सामने नतमस्तक हो खलनायक की तरह  चढ़ावा चढ़ाते उस मायावी असुर का समर्थन करते नज़र आए। बेशक चढ़ावा चोरी के पापकर्म मे मंदिर मे नियुक्त कर्मचारि शामिल थे और जिनको गिरिफ़्तार कर समुचित कानूनी कार्यवाही की जा रही है। ऐसा तो हो नहीं सकता कि चढ़ावा चोरी के इन अपराधियों को बर्बर, वहशी और पाशविक कानून की तरह फांसी पर लटका दिया जाय या अंग भंग कर दिया जाय।  हमारे देश का सक्षम कानून  इस मामले मे अपना कार्य करेगा। कॉंग्रेस और समाजवादी पार्टी के सांसदों ने चढ़ावा चोरी पर बड़े बड़े पोस्टर हाथों मे लिये दहाड़-दहाड़ कर घड़ियाली आँसू बहाये और मसख़रों की तरह संसद भवन के बाहर नाटक नौटंकी की और हिंदुओं को बदनाम करने का कुत्सित प्रयास किया। राहुल गांधी ने जिस निर्लज्जता से इस घिनौने खेल मे सहभागिता की वो नेता प्रतिपक्ष की प्रतिष्ठा, गौरव और सम्मान के सर्वथा विपरीत था। विदित हो ये वही समाजवादी दल है जिसने मुस्लिम तुष्टि करण के लिये बाबरी मस्जिद विध्वंस के समय रामभक्तों पर गोली चलवाई थी!! कॉंग्रेस भी समाजवादियों  के स्वर मे स्वर मिलाते हुए इन्ही कूट धर्मनिरपेक्ष वादी कालनेमियों के साथ खड़ी  नज़र आयी,  जिन्होने हमेशा हिंदुओं के आराध्य भगवान श्रीराम को काल्पनिक बतलाया और भगवान राम के अस्तित्व को नकारने का कुप्रयास किया। जिन लोगों ने राम मंदिर के निर्माण मे फूटी कौड़ी भी नहीं दी आज वे  राहुल गांधी, अकीलेश यादव  और उनके दलों सहित इंडि गठबंधन के सभी दलों ने राम मंदिर के चढ़ावे की चोरी पर ऐसी हायतौबा, शोर शराबा और हुड़दंग किया मानो कोई बहुत बड़ी धनराशि इन दलों ने राम मदिर के निर्माण मे दान स्वरूप चढ़ावे मे दी हो। चढ़ावा चोरी को अपनी धार्मिक  आस्था मे आहत से जोड़ने वाले इन अखिलेश यादव और राहुल गांधी तथा उनके दल के नेतृत्वकारी नेताओं का दो मुंहापन देखिये कि जिस राममन्दिर के दर्शनार्थ  देश विदेश से करोड़ो श्रद्धालु अयोध्या पहुँच रहे हों वहाँ इन दोनों छद्म राम भक्तों को आज तक अयोध्या मे रामलला के दर्शनों का समय नहीं मिला।

अखिलेश यादव और राहुल गांधी एवं उनकी पार्टीयों सहित इंडि गठबंधन के सभी समर्थक दलों ने सदा मुस्लिम तुष्टीकरण के सामने सनातन धर्म पर दोयाम दर्जे का रुख रक्खा हैं, आज यही लोग चीख पुकार, हल्ला गुल्ला और चीख चीख कर कह रहे कि चढ़ावा चोरी के कारण उनकी आस्था विश्वास पर चोट पहुंची है! चढ़ावा चोरी पर उनकी भावनाएं आहत हुई हैं!! जब इन्होने भगवान के चढ़ावे को नहीं छोड़ा तो ये किसको छोड़ेंगे? इन विपक्षी दलों मे अपने आप को राम भक्त जतलाने की ऐसी होड़  लगी है जैसे उनसे बड़ा कोई दूसरा रामभक्त इस दुनियाँ मे पहले कभी हुआ ही नहीं!! आइये भगवान राम के मंदिर के चढ़ावा चोरी पर इनकी आस्था, निष्ठा, विश्वास, कितना आहत हुआ पर विचार करें? क्या कभी इन दलों या नेताओं ने मुगल आक्रांता औरंगज़ेब या बाबर के सेनापति मीर बाक़ी द्वारा राम जन्मभूमि को ध्वस्त करने पर कभी अपनी राय या टिप्पड़ी जग जाहिर की? रमजन्मभूमि निर्माण के लिये पाँच सौ साल के संघर्ष मे कभी राम मंदिर के पक्ष मे खड़े हुए?? औरंगजेब जैसे क्रूर शासक की निंदा के बोल भी कभी राहुल गांधी या अखिलेश के मुंह से निकले? चढ़ावा चोरी मे जिन बगुला भक्तों की आस्था आहत हुई, उनकी आस्था तब कहाँ चली गई थी जब पुरातत्व विभाग के तर्कों को स्वीकारते हुए  सुप्रीम कोर्ट ने भी माना कि राम मंदिर का विध्वंस कर ही बाबरी मस्जिद का निर्माण हुआ? तब उनकी आस्था और स्वाभिमान,  क्या मर गया था? और यकायक चढ़ावा चोरी पर मरी हुई आस्था राजनैतिक हित लाभ के लिए पुनः जाग गयी? तब किस मुँह से वे राम मंदिर के चढ़ावा चोरी पर सवाल कर अपनी आस्था के आहत की बात कर रहे हैं? घड़ी घड़ी अपनी आस्था को जिंदा करने और मारने वाले ये लोग, दरअसल मरी हुई जिंदा लाशे हैं जो अपने अपने वोट बैंक की खातिर सत्ता मे बने रहने के लिये राष्ट्रसम्मान का सौदा करते हैं।  इनके ये घड़ियाली आँसू अब देश के लोग समझत रहे  हैं। ये दोहरी सोच और चरित्र के लोग सिर्फ हिंदुओं और उनके आराध्य भगवान  को बदनाम करने की कुत्सित और अधम प्रयास कर रहे हैं।

राम मंदिर मे चढ़ावा चोरी का मामला विशुद्ध रूप से पैसे हड़पने, धनराशि के गबन करने और  रुपयों की धोखाधड़ी का मामला है, जैसा बैंकों, वित्तीय संस्थानों, केंद्र सरकार और राज्य  सरकार के विभागों मे कार्यरत कुछ  बेईमान, कपटी, कुटिल धोखेबाज अधिकारी और कर्मचारी करते हैं। भ्रष्ट व्यक्ति की मानसिकता मुख्य रूप से लालच, नैतिक पतन और  व्यवस्था की खामियों का मिश्रण होता है फिर वह चाहे केंद्र या राज्य सरकार, निजी या वित्तीय संस्थानों या मंदिर मस्जिद जैसे संस्थानों मे कार्यरत स्टाफ  हो।  हमे ऐसे लोगों की सराहना नहीं करना चाहिए  जिन्होने अनीति पूर्वक संपत्ति कमाई या सफलता पाई"। इसी लालची मानसिकता और भ्रष्टाचार का मनोविज्ञान के दर्शन राज्य सरकारों के नगर निगमों, रेविन्यू, आबकारी, राजिस्ट्रार, परिवहन, बिजली और खनन जैसे अन्य  विभागों, राजनैतिक दलों, वित्तीय संस्थानों  मे कार्यरत कुछ बेईमान और चोर कर्मचारियों और अधिकारियों मे भी  देखने को मिलता  है।  पैसे का  लेनदेन, रिश्वत, चोरी  और भ्रष्टाचार समान रूप से सारे देश मे हर जगह व्याप्त है।  विपक्षी दलों ने चढ़ावा चोरी को हमारी धार्मिक भावनाओं, संवेदनाओं से जोड़ कर हमारे धर्म और का उपहास उड़ाया है। धर्म से ज्यादा राष्ट्र हित सर्वोपरि मानने वाली कॉंग्रेस  के कार्यकाल मे क्या बोफोर्स जैसे रक्षा घोटाले नहीं हुए? क्या आज देश का कोई राजनैतिक दल और नेता  इस बात का दम भर सकता है कि उसकी पार्टी या उसने स्वयं आर्थिक कदाचार और भ्रष्टाचार नहीं किया? स्वतन्त्रता के बाद से अब तक देश मे  सैकड़ों हजारों भ्रष्टाचार के मामले हुए, जिसमे हर दल के नेता कहीं न कहीं  और कभी ने कभी शामिल न रहें हों? तब हमारी चोरी छोटी और राम मंदिर के चढ़ावे की चोरी बड़ी कैसे कही जा सकती है? ये तो अच्छा हुआ भारतीय संविधान मे आर्थिक कदाचार और भ्रष्टाचार से निपटने के कानून बने हैं फिर चाहे आर्थिक भ्रष्टाचार मंदिर मे चढ़ावे की चोरी से जुड़ा हो या बैंक मे घोटाले या अन्य विभागों मे भ्रष्टाचार से जुड़ा हों। लेकिन वक्फ बोर्ड मे लाखों करोड़ो के घोटाले मे कभी काँग्रेस या समाजवादी या इंडि गठबंधन के अन्य दलों ने कभी अपनी जबान खोली? कभी नहीं! क्योंकि ये ऐसा कर अपने वोट बैंक को खोने का साहस कभी नहीं कर सकते? सनातन धर्म को बदनाम करने के लिये पप्पू यादव, राहुल गांधी या अखिलेश यादव द्वारा नाटक नौटंकी कर  हिंदुओं की आस्था और विश्वास को आहत करने वाले ऐसे स्वार्थी और छद्म धर्मनिरपेक्ष राजनैतिक दलों के कालनेमियों  को अब बाज आना चाहिये?

हाँ मंदिर के चढ़ावे मे चोरी हुई है!! जो अन्य आर्थिक घोटालों, पैसे के गबन और धोखाधड़ी, बेईमानी की तरह ही सिर्फ और सिर्फ आर्थिक कदाचार है और मौजदा कानून इस चढ़ावा चोरी से  निपटने मे समर्थ, सक्षम और सुयोग्य  है, जैसे अन्य घोटालों और चोरी से निपटा जाता है। राममन्दिर चढ़ावे की चोरी मे अनेक गिरफ्तारियाँ हुई है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर एसआईटी का गठन किया है जो आने वाले समय मे चढ़ावे मे हुई चोरी पर और कठोर कानूनी कार्यवाही का रास्ता सुनिश्चित करेगा ताकि भविष्य मे ऐसे किसी अपराध करने की कोई कल्पना भी न कर सके।

विजय सहगल