रविवार, 26 अप्रैल 2026

निःशुल्क शीतल जल सेवा- पंजाबी परिषद समिति, रेल्वे स्टेशन ग्वालियर

 

निःशुल्क शीतल जल सेवा- पंजाबी परिषद समिति, रेल्वे स्टेशन ग्वालियर







वर्ष 1994 के 18 अप्रैल मे  पाँच  युवा अपने नागपुर यात्रा के लिए जब ग्वालियर से रेल द्वारा निकले तब उत्तर भारत की गरमियाँ शुरू हो चुकी थी। गर्मी के इस मौसम मे इन युवाओं को नागपुर यात्रा तक  ठंडे पानी की उपलब्धता से वंचित होना पड़ा। पूरी यात्रा के दौरान उन्हे हर जतन के बावजूद  ठंडा पानी नसीब नहीं हुआ। गर्मियों की शुरुआत मे जब ये हाल था तो प्रचंड गर्मियों के दिनों मे ठंडे  पानी की उपलब्धता के आभाव की कल्पना ने इन युवाओं को झकझोर दिया। इन पांचों  पंजाबी युवाओं के दिलों मे उनके माता-पिता और परिवार ने 1947 के भारत विभाजन से उबरी टीस को झेला था लोगो के दुःख दर्द को करीब से देखा और महसूस किया था। फिर क्या था, इन लड़कों के दिल मे ठंडे पानी को साधारण रेल यात्रियों को निःशुल्क सेवा प्रदान करने के दृढ़ संकलप के बीज का रोपड़ शुरू हुआ और नागपुर यात्रा के बापसी पर इन युवाओं ने ग्वालियर आते ही 24 अप्रैल 1994 को  चार मिट्टी के बड़े  घड़े/मटके ग्वालियर के जीआरपी थाने मे आम यात्रियों के सुविधा हेतु  ग्वालियर रेल स्टेशन पर रखवा कर रेल यात्रियों को निःशुल्क शीतल जल सेवा की शुरुआत कर दी।

1994 मे  जिन श्री अशोक मारवाह, श्री राम लुभाया, श्री जगजीत चावला, सत्य प्रकाश मेहरा, पी के आनंद के इस समर्पित सेवा भाव से ओतप्रोत युवाओं के संयुक्त प्रयास से ग्वालियर पंजाबी परिषद समिति शुरू हुई निःशुल्क ठंडे पानी की जल सेवा आज 70 से भी ज्यादा तापमान रोधी टंकियों जिनमे साफ शुद्ध वर्फ का ठंडा पानी संग्रह कर रेल्वे स्टेशन पर आने-जाने  वाली  50 जोड़ी रेल गाड़ियों के यात्रियों को निःशुल्क जल सेवा प्रदान करते हुए  आज एक वट वृक्ष का रूप ले चुकी है। पंजाबी परिषद समिति बैसे तो ट्रेन के हर क्लास सहित सभी वर्गों को निःशुल्क सेवा प्रदान करती है परंतु समिति  का ज़ोर ट्रेन के सामान्य, अनारक्षित बोगियों मे यात्रा कर रहे यात्रियों को प्राथमिकता से ठंडा जल प्रदाय करने पर है, जिन तक शीतल जल की पहुँच सामान्यतः समय और परिस्थिति के कारण संभव नहीं हो पाती। कभी कभी तो ट्रेन मे इतनी भीड़ होती है कि सामान्य श्रेणी के यात्रियों को अपनी सीट से हिलना तक मुश्किल हो जाता है तब तपती गर्मी मे ट्रेन से उतरकर पानी की तलाश मुश्किल ही नहीं असंभव है और यदि यात्री महिला या बच्चे हो तो यह कार्य बड़ा दुरूह, जटिल और कठिन हो जाता है। जब ऐसे यात्रियों की ठंडे पानी तक पहुँच, उनकी खिड़की के सामने हो जाती है तो गर्मी की लपट मे ठंडा  पानी  सहजता से प्राप्त हो जाए तो क्या कहना।   ट्रेन के आगे और पीछे की ओर लगे सामान्य अनारक्षित डिब्बों के सामने ठंडे पानी की टंकियों को रक्खा जाता है। इन ठंडे पानी की ट्रॉलियों पर ट्रेन के आते है अपना समय दान दे रहे अनेकों सेवक, जग और कीप (फ़नेल)/कुप्पी  से यात्रियों की खाली बोतलों को ठंडे जल से भर देते हैं। बमुश्किल 1 या दो मिनिट के ट्रेन के ठहराव के दौरान ही सैकड़ों सेवक अपने अपने जग की सहायता से जल की पूर्ति प्रायः सामान्य श्रेणी और स्लीपर क्लास के यात्रियों को कर ही  देते है। यात्रियों के चेहरे पर ठंडे पानी पीने के बाद उभरे संतुष्टि के भावों को स्पष्ट रूप से देखा और पढ़ा जा सकता है। छोटे छोटे बच्चों, महिलाओं और बृद्ध जनो के साथ सभी यात्रियों को प्लेटफार्म पर दौड़ भाग के बिना उनकी ही सीट पर  खिड़की से ही जब ठंडा जल निःशुल्क उपलब्ध हो जाय तो दौड़ कर ट्रेन पकड़ने के तनाव पूर्ण क्षणों से मुक्ति मिल जाती है। छोटे-छोटे बच्चों और महिलाओं को ठंडे जल से मिली तृप्ति के आत्म संतुष्टि के भावों को महसूस किया जा सकता है। दिव्यांग जनों के लिए आरक्षित डिब्बे मे भी यही अनुभव महसूस किया जा सकता है।

पंजाबी परिषद समिति के अध्यक्ष श्री अशोक मारवाह का यात्रियों को निःशुल्क सेवा प्रदाय हेतु  सेवा, समर्पण और निष्ठा तो देखते ही बनती है। 69 साल की उम्र मे भी मारवाह जी द्वारा पूरे प्लेटफार्म पर ट्रॉलियों मे ठंडे जल की सुचारु व्यवस्था कराना, सेवकों को हर ट्रॉली पर नियुक्त करना, बीच बीच मे सेवा प्रदान करने वाले लोगो को आराम करने और बैठने के लिए कुर्सी की व्यवस्था करना और सेवादारों को गाहे बगाहे स्वल्पाहार और शीतल शर्बत, छांछ उपलब्ध कराना और व्यक्तिगत संपर्क रखना उनके स्वभाव मे है। पंजाबी परिषद ग्वालियर प्रति वर्ष अप्रैल से अगस्त तक इस सेवा को रेल्वे स्टेशन ग्वालियर पर उपलब्ध कराती है। उनके इस कार्य की भूरि भूरि प्रशंसा अनेक व्यक्तियों, संस्थाओं और वर्गों ने समय समय पर की है। इस बात से ज्यादा सुखद संजोग क्या होगा कि पंजाबी परिषद ग्वालियर के इस सामाजिक कार्य की प्रशंसा स्वयं प्रधानमंत्री  श्री नरेंद्र मोदी ने अपने मन की बात के कार्यक्रम मे की है। श्री मारवाह जी ने बताया उनकी यी संस्था समाज के वंचित और आर्थिक रूप से कमजोर  वर्ग की बेटियों की शादियों तथा  स्वास्थ्य शिविर का आयोजन भी समय समय पर करती है। इस वृहद सेवा संकल्प मे श्री मरवाह जी को श्री आत्म प्रकाश  मोंगिया जी (समिति कोषाध्यक्ष), श्री गंभीर जी के आत्मीय सहयोग का उल्लेख करना आवश्यक है जो रेल प्रशासन से समिति के समन्वय, सामंजस्य तालमेल बैठाते है। इस सेवभावी कार्यक्रम मे समय दान देने वाले कार्यकर्ताओं और सेवकों को रेल प्रशासन स्टेशन पर निःशुल्क वाहन पार्किंग और प्लेटफार्म पर बिना प्लेटफार्म टिकिट के सेवा भाव करने के दौरान स्टेशन पर आधिकारिक रूप से रुकने हेतु  पहचान पत्र देती है।  

    

ये बात बिलकुल सही है कि मई-जून की इस आग बरसते मौसम मे अलग अलग समय मे सिर्फ समर्पित और सेवभावी लोग ही ईश्वरीय प्रेरणा, प्रोत्साहन, सेवा और समर्पण इस कार्य को कर सकते है अन्यथा समाज मे बहुतायत  छद्म और झूठे नकाब ओढ़े और पहने लोग कदाचित ही ऐसी निस्वार्थ सेवा के लिए समय दे पाते। ऐसा नहीं है कि पंजाबी परिषद के इस कार्यक्रम मे सिर्फ पंजाबी भाषी लोग ही है समिति के इस जन सेवा के कार्यक्रम मे ग्वालियर की हर समाज, वर्ग और संस्था के समर्पित सेवा भावी लोग स्व॰ प्रेरणा और समर्पित भाव से अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। सेना से सेवानिवृत्त लोग, विभिन्न राज्य और केंद्रीय कार्यालयों के सेवानिवृत्त अधिकारी, कर्मचारी, अधिवक्ता व्यापारी और विध्यार्थी  पानी पिलाने की इस मुहिम मे शामिल हैं। बड़ी संख्या मे महिलाएं, गृहणियाँ भी अपने घर के कामों मे और समाज सेवा के बीच संतुलन बना कर सेवा के इस परोपकार मे शामिल है।  मुझे भी इस संस्था से जुडने का सौभाग्य 10 अप्रैल को मिला, यध्यपि मुझे भी इस संस्था से जुड़े बमुश्किल 10-12 दिन ही हुए है लेकिन इन सेवभावी लोगो कि अनासक्त भाव से सेवा निस्वार्थ सेवा ने मुझे स्व्प्रेरित किया एवं भगवान श्री कृष्ण के श्रीमद्भगवत मे उस श्लोक और संदेश  को पुष्ट किया है जिसमे वे कहते हैं:-

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।। अध्याय 2 श्लोक 47।। अर्थात   कर्तव्य-कर्म करनेमें ही तेरा अधिकार है, फलोंमें कभी नहीं। अतः तू कर्मफलका हेतु भी मत बन और तेरी अकर्मण्यतामें भी आसक्ति न हो।
 

लगातार 32  वर्षों से रेल यात्रियों को रेल्वे स्टेशन पर गर्मियों की मौसम मे निःशुल्क शीतल जल सेवा प्रदान करने वाली संस्था को प्रोत्साहित करें। आइये यदि आप ग्वालियर मे हैं तो पंजाबी परिषद समिति के नेक कार्य मे अपना समय और सहयोग दे यदि आप रेल यात्रा के दौरान कभी ग्वालियर से गुजरे तो संस्था के प्रमुख श्री अशोक मरवाह और उनकी टीम को व्यक्तिगत तौर पर मिलकर प्रोत्साहित जरूर करें।

विजय सहगल   

रविवार, 12 अप्रैल 2026

"तत्तापनी (हिमाचल प्रदेश)"

"तत्तापनी (हिमाचल प्रदेश)"









6 जून 2022 को अपने हिमाचल प्रवास के दौरान तत्तापानी जाने का सुयोग बना। जहां एक ओर शिमला मे भीड़-भाड़, ट्राफिक जाम, पार्किंग की समस्या से दो चार होना पड़ा वही शिमला से लगभग 50 किमी॰ दूर सतलज नदी के किनारे पर बसा तत्तापानी एक शांत, प्राकृतिक रुप से मनोहारी सुंदर और साफ सुथरा था। यह छोटा सा गाँव हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले मे स्थित है एवं अपने पारंपरिक धार्मिक, पौराणिक महत्व के  अतिरिक्त इन दिनों साहसिक खेलों के लिये प्रसिद्ध पर्यटन स्थल के रूप मे भी प्रसिद्ध होता जा रहा है। तत्तापानी की एक विशेषता है जो इसके नाम के अनुरूप ही है। तत्ता का अर्थ है गर्म और पानी का अर्थ है जल अर्थात गरम पानी का चश्मा या कुंड। सतलज नदी के तट पर ऐसे अनेकों कुंड हैं जहां से पूरे साल गंधक युक्त गरम पानी के झरने बहते रहते हैं। ऐसी प्रथा हैं कि इन कुंडों मे चर्म रोगी के स्नान करने से बड़ा फायदा मिलता है। बैसे तो मई जून मे भी पहाड़ो पर सर्दी होती है लेकिन दिन मे आग बरसाती गर्मी ने दिल्ली, आगरा की गर्मी की याद दिला दी लेकिन हवा मे उपस्थित नमी उत्तर मध्य भारत की लू लपट के विपरीत थी। पेड़ की छाया या छप्पर के नीचे अच्छा महसूस हो रहा था।   तत्तापानी मे सतलज नदी के पश्चिमी तट पर पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मकर संक्रांति पर एक विशाल मेला लगता हैं जहां पर हिमाचल प्रदेश के दूर दूर से आए श्रद्धालु स्नान के लिये यहाँ आते हैं। स्नान के बाद अन्न, वस्त्र आदि दान कर्म करने की प्रथा के अनुसार यहाँ तुलादान करने की परंपरा है। इसलिए जगह जगह बड़े बड़े तुला (तराजू) देखने को मिलते हैं जहां पर तीर्थ पुरोहित पूरे साल ही इस तरह के संस्कार श्रद्धालुओं के लिए कराते रहते हैं। तराजू के एक ओर दान दाता को बैठा कर दूसरी ओर अन्न/वस्त्र या ऐसी वस्तु को समान मात्रा मे रख जाता है जिसके दान देने की प्रतिबद्धता, कौल या वचन जजमान ने लिया था। ऐसा  मानना है कि यहाँ स्नान करने से ग्रह दोष शांत होते हैं और श्रद्धालुओं को सुख समृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति होती है तथा  कुम्भ स्नान का फल प्राप्त होता है।      

एक अन्य मान्यता के अनुसार सप्त ऋषियों मे से एक ऋषि जमदग्नि की तपोभूमि भी हैं। सतलज नदी के गंधक युक्त औयषधीय गुणों के कुंड और झील के  कारण जलक्रीड़ा युक्त गतिविधियां पर्यटकों को आकर्षित करती हैं। मनोरम पहाड़ियों की तलहटी मे बहती सतलज की धाराओं मे मोटर वोट, जेट स्की, रिवर राफ्टिंग और हॉट एयर बलून जैसी गतिविधियों का आयोजन पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए किया जाता है।  हवा मे उपस्थित शत प्रतिशत नमी के कारण नदी मे अठखेलियों के पश्चात हम लोग भोजन के लिए नदी के तट पर बने होटल हॉट स्प्रिंग की ओर बढ़ लिए। तेज धूप और नदी से दूर चल रही गरम हवाओं के बीच ठंडी एसी की हवाओं मे बड़ा सुकून और  ठंडक प्रदान की। शाकाहारी भोजन की उपलब्धता सुनिश्चित करने के कारण इस बतानुकूलित वातावरण मे मे खाना खाने का उल्लास अलग ही था। हिमाचल के इस भ्रमण मे जगह जगह एसी की आवश्यकता को देखते हुए मुझे मई-जून की इन गर्मियों मे पहाड़ों और यूपी, राजस्थान दिल्ली और मध्य प्रदेश के लपट भरे मैदानों मे कोई बहुत ज्यादा अंतर नहीं दिखाई पड़ा।

भोजन पश्चात नदी के तट से दूर भगवान लक्ष्मी नारायण और नरसिंह मंदिर के दर्शन किए। जहां नरसिंह भगवान का मंदिर अपने हिमाचल के पारंपरिक मंदिरों की तरह लकड़ी से बना था और जिसमे भगवान नरसिंह की प्रतिमा विराजित थी और भगवान लक्ष्मी नारायण मंदिर मे तीन देव ब्रहमा विष्णु महेश अपनी अपनी अर्धांगनियों देवी सरस्वती, देवी लक्ष्मी और देवी पार्वती के साथ विराजित थे साथ ही प्रवेश हाल के एक सिरे पर श्री हनुमान की प्रतिमा भी थी।  इन साफ सुथरे मंदिरों के प्रार्थना कक्ष मे बैठना बड़ा सुखदायक अनुभव था।

इस तरह एक अनुछुए स्थल तत्तापनी का भ्रमण एक यादगार यात्रा बन गया जो हमेशा तुला दान की तराजू की स्मृति मन मस्तिष्क पर अंकित कर गया।

 

विजय सहगल       

  

 

 


रविवार, 5 अप्रैल 2026

"श्री हनुमान गढ़ी-अयोध्या"

 

"श्री हनुमान गढ़ी-अयोध्या"








बचपन मे जब मै अपने चाचा के यहाँ गर्मियों की छुट्टी मे जाता था तब वहाँ पहली बार मैंने गढ़ी का नाम सुना था। दरअसल हमारे एक परिचित को "गढ़ी बाले" कह कर संबोधित किया जाता था। एक प्रभावशाली व्यक्तित्व जिनका मकान काफी बड़ा और भव्य था। तब से मेरे मन मस्तिष्क मे गढ़ी के छवि से तात्पर्य, बड़े और गणमान्य व्यक्ति के घर की  हो गई थी। समय के साथ इस छवि को बचपन मे अयोध्या स्थित हनुमान गढ़ी ने और भी पक्का किया।  2 नवम्बर 2025 को अपने अयोध्या प्रवास के दौरान राम जन्मभूमि के दर्शन पश्चात जन्मभूमि से से लगी हनुमान गढ़ी के दर्शन भी करने थे। गढ़ी का अर्थ है एक छोटा किला जो प्रायः राजमहलों या राजप्रासादों के पूर्व ऊंचाई पर बनी एक सुरक्षा चौकी के रूप मे बनाए जाते थे और जहां पर एक छोटी से फौज की टुकड़ी पहरा देती थी। एक किवदंती के अनुसारा लंका विजय के पश्चात अयोध्या बापसी पर श्री हनुमान जी को 76 सीढ़ियों युक्त यह गढ़ी  स्थान रहने के लिए दिया गया था जो कालांतर मे हनुमान गढ़ी कही जाने लगी। यह स्थान हनुमान जी से जुड़ी धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं के कारण सनातनियों के लिए अत्यंत सम्मानीय और महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। हनुमान गढ़ी दशरथ महल और कनक भवन के  प्रवेश द्वार के ही नजदीक है जहां भगवान श्री राम का निवास था।   पौराणिक मान्यताओं के अनुसार राम भक्त हनुमान यहाँ बनी एक गुफा मे रहते और पहरा देते हुए भगवान की सेवा  के लिए तत्पर रहा करते थे।

आज एकादशी अर्थात देव उठानी ग्यारस की सुबह होने के कारण बाज़ार की भीड़ भरी गलियों से होते हुए जब मै हनुमान गढ़ी की ओर बढ़ा तो बाजार के रास्ते के बीच बनी रेलिंग मे  श्रद्धालुओं की  दूर तक लंबी लाइन और उसके बाद हनुमान गढ़ी की सीढ़ियों पर दर्शनार्थियों की भीड़ जमा थी। इस जनसमूह को देख मै कुछ चौंक गया। भरी दोपहरी मे तेज धूप के बीच लोग श्री हनुमान गढ़ी पर बने हनुमान मंदिर के दर्शन हेतु लालायित हो आगे बढ़ रहे थे।  चूंकि राम जन्मभूमि स्थान का बड़ा गहन और सघन भ्रमण के पश्चात कुछ विश्राम की प्रबल इच्छा के चलते हनुमान गढ़ी के दर्शन सायंकाल करने के निश्चय के साथ होटल चलने का निश्चय किया। निर्णय ठीक ही रहा, शाम के लगभग छह बजे जब हम सपत्नीक हनुमान गढ़ी पर पहुंचे तो भीड़ सुबह के मुक़ाबले, अपेक्षाकृत कुछ कम थी। पुलिस की सुरक्षा व्यवस्था चाक चौबन्द थी। गढ़ी के नीचे पादुकाओं के रखने की कहीं कोई व्यवस्था नहीं थी, जैसी कि रामजन्मभूमि मे थी।   फूल या प्रसाद वालों के यहाँ ही पादुकाओं को रखा जा रहा था। भीड़ भी कुछ खास नहीं थी सीधे सीढ़ियों पर चढ़ते हुए हम मंदिर प्रांगण मे जा पहुंचे। पिछले दिनों राम मंदिर के उदघाटन के अवसर पर अनेकों बार हनुमान  गढ़ी के दर्शन टीवी पर कर चुके थे, इसलिए कुछ नयापन नहीं लगा, लेकिन बचपन मे 1972 मे अयोध्या मे किये हनुमान गढ़ी के दर्शन की कुछ धुंधली यादें शेष थी तब या क्षेत्र कुछ साधू संतों की उपस्थिती मे वीरान सा दिखाई देता था। बंदरों की फौज आज की तरह उन दिनों भी थी। होती भी क्यों न हनुमान जी का गढ़ जो था। काले सफ़ेद संगमरमर के वर्गाकार पत्थरों से बने फर्श के परिक्रमा पथ के मध्य बना लगभग ढाई-तीन फुट ऊंचे वर्गाकार चबूतरे पर निर्मित  हनुमान मंदिर रंग बिरंगी बारहदरी के अर्ध बलायकर दरबाजों से घिरा था। बाहर बरामदे से गर्भगृह मे बिराजित, श्री हनुमान जी की भव्य और मध्याकार प्रतिमा बहुत ही नयनभिराम थी। प्रतिमा के मुख मण्डल  के चारों ओर एक ओजस्वी और तेजस्वी जीवंत ऊर्जा का अनुभव हो रहा था। मंदिर के गर्भगृह के विपरीत दिशा मे पीछे से भगवान श्री हनुमान को  प्रणाम कर  परिक्रमा पथ के दूसरी ओर बना  गलियारा कुछ खाली था जहां  कुछ मिनिट बैठ कर राम भक्त हनुमान को स्मरण करते हनुमान जी की महिमा का पुनरावलोकन हनुमान चालीसा की इन पंक्तियों के स्मरण कर किया, "जय हनुमान ज्ञान गुन सागर,  जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥" "रामदूत अतुलित बल धामा, अंजनिपुत्र पवनसुत नामा॥" हनुमान जी के बल, बुद्धि, सामर्थ्य और  ऐश्वर्य को स्मरण करते हुए हम लोग मंदिर से बापसी हेतु प्रस्थान किया। यध्यपि एक अन्य रास्ता भी था पर पादुकाओं के चलते हम उसी रास्ते से बापस हुए जहां से प्रवेश किया था।

बापसी मे एक महिला पुलिस कर्मी को मैंने लगातार मोबाइल पर व्हाट्सप्प/यू ट्यूब/विडियो चलाते  देखा। मंदिर के प्रवेश के समय भी यह महिला पुलिस कर्मी मोबाइल देखने मे मशगूल थी। मुझ से रहा न गया मैंने उस महिला पुलिस को कहा, माफ करें आप सुरक्षा व्यवस्था जैसे जिम्मेदार पद पर होते हुए भी, आपका लगातार मोबाइल देखना उचित नहीं। आपको इस से बचना चाहिए!! यध्यपि उस महिला पुलिस कर्मी की प्रतिक्रिया ठंडी ही थी शायद ही उसने इस ओर ध्यान दिया हो?  

कुछ अन्य शेष सीढ़ियाँ उतरकर अब हम पुनः हनुमान गढ़ी के नीचे बाज़ार मे बापस आ खड़े हुए। दोपहर के मुक़ाबले शाम होने के कारण बाज़ारों मे श्रद्धालुओं की रौनक पुनः लौट आयी थी। रात के बिजली के प्रकाश मे रमजन्मभूमि सहित अन्य धार्मिक स्थलों पर एक अद्भुद छठा दिखलाई पद रही थी जो दिन के उजाले से अलग हट के थी।

एक बार पुनः हनुमान जी का स्मरण करते हुए हम लोग अयोध्या मे दशरथ महल और कनक भवन की ओर बढ़ लिए।

पवनसुत हनुमान की जय!!              

विजय सहगल