शुक्रवार, 24 जुलाई 2020

नीलगिरी पर्वतीय रेल-ऊटी


"नीलगिरी पर्वतीय रेल-ऊटी"











नीलगिरी पर्वतीय रेल जिसको संयुक्त राष्ट्र संगठन द्वारा विश्व धरोहर का दर्जा दिया गया है से यात्रा करना एक अलग ही रोमांचकारी अनुभव था। ये पर्वतीय रेल बैसे तो "मेत्तुपलायम" से दक्षिण के पर्वतीय शहर "ऊटी" को जोड़ती है जिसकी दूरी लगभग 50 किमी है। पर चूंकि उक्त साढ़े चार घंटे की यात्रा के लिये समय और परिस्थिति दोनों ही अनुकूल न थी क्योंकि हमारी इस यात्रा मे रिहाइश इन दोनों शहरों के मध्य मे  "वेलिंग्टन" (कुन्नूर) शहर मे थी जो दूरी के मामले मे भी लगभग मध्य मे था अर्थात वेलिंग्टन से ऊटी लगभग 25 किमी था। अतः इस 25 किमी रेल यात्रा का आनंद हमने वेलिंग्टन से ऊटी जाने आने मे करने का निश्चय किया। किसी भी पर्वतीय रेल से ये मेरी पहली रेल यात्रा थी। ऊटी भ्रमण के बारे मे अपने अनुभव फिर किसी ब्लॉग मे लिखूंगा फिलहाल तो सिर्फ नीलगिरी पर्वतीय रेल यात्रा के अनुभव सांझा करूंगा।

22 फरवरी 2019 को वेलिंग्टन से उद्गम मंडलम जाने के निश्चय के साथ मै अपनी पत्नी और बड़े भाई-भाभी के साथ घर  से कार द्वारा वेलिंग्टन स्टेशन के लिये निकले। गूगल मैप के अनुसार स्टेशन नजदीक ही 2-2.5 किमी दिखला रहा था। पहाड़ी क्षेत्रों मे गूगल महश्य कभी कभी धोखा दे जाते है चलते चलते जब सड़क अचानक दो भागों मे बंट जाये एक रास्ता सीधा और दूसरा कुछ दूर समानान्तर हो ढलान लिये हुए नीचे अंतर्ध्यान हो जाये तो भ्रांति उत्पन्न होना स्वाभाविक था, ऐसा ही हम लोगो के साथ हुआ। मैप पर स्टेशन बमुश्किल आधे से भी कम किमी की दूरी पर दिखा रहा था पर गलत रास्ते की बजह से हमे स्टेशन ढूँढे से भी नहीं मिल रहा था। इन्ही गफलतों मे 10-15 मिनिट लग गये तब कहीं एक सड़क से घाटी मे उतर कर जैसे तैसे वेलिंग्टन स्टेशन पहुंचे। लंबे लंबे चीड़ के सघन पेड़ो को तले सुंदर मनोरम दिखने बाला रेल्वे स्टेशन वेलिंग्टन अपनी पुरातन वैभवता को समेटे शांत सुरम्य वातावरण मे स्थित दिखाई दिया। बहुत छोटा साफ सुथरा समान्यतः रेल स्टेशन की छवि के एकदम विपरीत वेलिंग्टन स्टेशन बगैर किसी कोलाहल के, प्लेटफ़ोर्म भी बिना किसी एक यात्री  के देखना अपने आप मे एक सुखद एवं आश्चर्य अनूभूति देने बाला था। स्टेशन पर नज़र आती थी सिर्फ और सिर्फ पक्षियों के कलरव की ध्वनि और ठंडी हवाओं के झोंकों से पेड़ों के पत्तों की आपस मे टकराने से उत्पन्न फुसफुसाहट सुनसान के सहचर की सी निशब्द आहट।

लगभग एक शताब्दी पूर्व निर्मित अंग्रेजों के जमाने का शांत लेकिन सुंदर वास्तु समेटे हम लोगो ने वेलिंग्टन स्टेशन मे प्रवेश किया तो मुख्य कार्यालय मे स्टेशन मास्टर जी से गाड़ी की पोजिशन और यात्रा करने के टिकिट आदि के बारे मे पूंछतांछ की। कार पार्किंग के लिये भी हमने उनसे जानकारी चाही? सौभाग्य से स्टेशन मास्टर जी भी बड़े  सहृदय मिलनसार राजस्थान के उत्तर भारतीय थे। मीना जी (नाम भूल रहा) उपनाम के सज्जन ने बताया की रेल आगमन के पश्चात उपलब्ध सीटों के आधार पर ही सामान्य श्रेणी के टिकिट का वितरण किया जायेगा क्योंकि पर्वतीय रेल होने के कारण असीमित संख्या मे टिकिट का वितरण ट्रेन पर बढ़ने बाले यात्रियों के बजन के कारण  नहीं होता ताकि रेल विना किसी रुकावट के अपने गंतव्य तक पहुँच सके। कार पार्किंग आदि कोई सुविधा स्टेशन पर उपलब्ध न थी। स्टेशन के बाहर भी मैदानी स्टेशन की तरह  कोई बहुत बड़ा स्थान उपलब्ध न था। स्टेशन मास्टर से सलाह मशविरे के बाद वंही एक जगह हम लोगो ने कार पार्क कर दी।  कुछ समय बाद सामने से छोटी सी खिलौने की तरह दीख रही पाँच डिब्बों की ट्रेन स्टेशन की ओर बढ़ती दिखाई दी। और चंद मिनटों पर पर्वतीय रेल स्टेशन वेलिंग्टन पर आकार रुकी।  स्टेशन मास्टर ने ट्रेन मे उपस्थित टिकिट चैकर स्टाफ से पूंछ कर बताया कि सेकंड क्लास की टिकिट उपलब्ध न हो सकेंगी! लेकिन प्रथम श्रेणी का डिब्बा पूर्णतय: खाली था। जब प्रथम श्रेणी और द्व्तिय श्रेणी के टिकिट के रेट के बारे मे पूंछा तो उन्होने प्रथम श्रेणी रु॰180/- एवं द्व्तिय श्रेणी का किराया शायद रु.13/- बताया। अब तो हम लोगो को लगा कि यात्रा संभव न हो पाएगी? दोनों श्रेणी के डिब्बों की बनावट आदि मे लेश मात्र का भी कोई अंतर न था सिवाय डिब्बे के बाहर लिखे प्रथम श्रेणी अर्थात फ़र्स्ट क्लास। निर्णय तुरंत ही लेना था। एक बारगी सोचा दोपहर बाली गाड़ी से चलेंगे।  अन्य मैदानी स्टेशन होता तो इतना समय भी सोचने विचारने का न मिलता पर छोटा स्टेशन होने एवं स्टेशन मास्टर, बुकिंग क्लर्क, लाइन मैन, टिकिट चैकिंग और बाबू  आदि रेल्वे के समस्त उत्तरदायित्व एक ही व्यक्ति के पास होने के कारण कुछ सेकंड इस हेतु मिल गये। मैंने भी उस कहावत "नाश सो सवा सत्यानाश" का स्मरण कर निर्णय लिया कि कौन सा रोज रोज ऊटी आना है? स्टेशन मास्टर को 720/- रूपये देकर  चार प्रथम श्रेणी के टिकिट लिये और ट्रेन की ओर भागे। छः सीट बाला डिब्बा पूरा खाली था हम लोग ट्रेन की ओर बढ़े और लपक कर डिब्बे मे चढ़ गये।

कुछ ही सेकंड मे ट्रेन ने अपनी सीटी बजा चलने का संकेत दिया और गाड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी। मैदानी क्षेत्रों के रेल की तरह आपाधापी न थी पाँच डिब्बे की ट्रेन मे सभी यात्री अनुशासित होकर बैठे थे। जंगलों पहाड़ों को पीछे छोड़ती ट्रेन बढ़ी तो कुछ देर बाद दूर दिखाई देते हरे भरे पेड़ सुंदर नज़ारा लिये दिखाई दिये। कहीं चाय बगानों से और कहीं सड़क किनारों से रेल अपनी मध्यम गति से एक सुंदर और सुमधुर संगीत उत्पन्न कर आगे बढ़ रही थी। कभी सड़क और बहते पहाड़ी झरने के उपर से बने पुल से रेल निकलती तो कहीं रेल खुद ही किसी सड़क के पुल के नीचे से आगे बढ़ जाती। रास्ते मे ऊटी के पहले तीन स्टेशन और पड़े जिनमे अरुवंकाडु स्टेशन भी देखने मे सुंदर और मन भावन था। सड़क किनारे इस रेल यात्रा से वंचित कुछ बस और कार से ऊटी जा रहे पर्यटक निकट से गुजर रही ट्रेन के फोटो और विडियो सेल्फ़ी के साथ  बना रहे थे। दूर पहाड़ो पर बने सुंदर मकान अपने स्वर्गिक वातावरण मे होने पर इठलाते प्रतीत हो रहे थे। ट्रेन मे अधिकतर पर्यटक यात्री  पर्वतीय रेल यात्रा से जुड़े रोमांच का अनुभव लेने ही यात्रा कर रहे थे। स्थानीय सामान्य जनों, विध्यार्थियों, व्यवसाइयों  का इस ट्रेन से  यात्रा न करने का मुख्य कारण ट्रेन का छोटी दूरी मे अधिक समय लेना था  इसके विपरीत  आर्थिक द्रष्टि से कमजोर कुछ स्थानीय निवासियों का  बहुत कम किराया होने के कारण  इस ट्रेन मे यात्रा करना समान्यतः देखा। बमुश्किल 30-35 मिनिट मे ट्रेन केत्ति, लवडेल स्टेशन पर विराम लेते हुए उद्गम मंडलम पहुँच गई। ऊटी स्टेशन के आसपास हरे भरे पेड़ो के बीच पहाड़ियों पर जहां तहां होटल और गेस्ट हाउस नज़र आ रहे थे। स्टेशन पर एक सुंदर मनमोहक कोयले से चालित भाप  का रेल इंजिन स्टेशन की शोभा मे चार चाँद लगा रहा था। लुप्तप्राय भाप इंजिन मे पानी भरने बाला पम्प देख कर बचपन मे इस तरह के पम्प देखने की यादें ताज़ा हो गयी।   उद्गम मंडलम स्टेशन पर ही एक बहुत छोटे से रेल म्यूजियम मे रेल विभाग द्वारा उन्नीसवी शदी मे प्रयुक्त की जा रही वस्तुओं और उपकरणों का प्रदर्शन सुखद लगा। बापसी मे द्व्तिय श्रेणी के टिकिट ट्रेन से उतर कर तुरंत ही बुक करा लिये थे जिसका प्रस्थान समय लगभग एक घंटे बाद ही था अतः कुछ समय ऊटी रेल स्टेशन के बाहर यूँ  ही व्यतीत किया।  रेल कैंटीन मे उत्तर भारतीय  भोजन की उपलब्धता को देखते हुए पेट पूजन किया जो गर्म होने के साथ स्वादिष्ट भी था। एक शताब्दी पूर्व बनी कैंटीन अपने वास्तु की कहानी स्वयं बखान कर रही थी। 

बापसी के लिये प्लेटफार्म पर लगी बेंचों मे क्रम से यात्री अपनी बारी की प्रतीक्षा करते नज़र आये हम लोग भी उनमे शामिल हो ट्रेन के डिब्बों मे बैठ रेल के चलने का  इंतज़ार करने लगे। कुछ देर बाद ही ट्रेन अपनी बापसी यात्रा पर थी।  डिब्बे मे यात्रा के दौरान कुछ  यात्रियों द्वारा ट्रेन का फिल्मांकन और किसी अभिनेता का उस फिल्म के गाने मे शायद "छइयाँ- छइयाँ.... (ठीक से याद नहीं) के अभिनय की चर्चा होने लगी पर मेरा इस पर्वतीय ट्रेन के महत्व को कम कर उस अभिनेता और उसकी  फिल्म के महत्व को बढ़ाने का कोई  इरादा न था अतः मेरा कुछ देर  निंद्रा की शरण मे चले जाने के कारण उक्त  चर्चा पर वहीं विराम लग गया। एक बार फिर वेलिंग्टन के आने के पूर्व ऊटी के प्रकृतिक नज़ारों, पहाड़ों, चाय बगानों, पर्वतीय झीलों का आनंद उठाते हुए हम कब बापस  अपने स्टेशन पहुँच गये पता भी न चला। कार बगैर पार्किंग के अपनी जगह पार्क देख प्रसन्नता हुई। इस तरह इस  नीलगिरी पर्वत रेल यात्रा के हम भी एक सहयात्री बने।      

दक्षिण भारत के मैदानी इलाकों के विपरीत 9-10 दिन के प्रवास पर ऊटी और उसके आसपास  
के वातावरण की जितनी भी प्रशंसा की जाये कम है। घरों और व्यवसायिक प्रतिष्ठानों मे ए॰सी॰ की तो क्या बात करे पंखों का भी न होना  घोर सुखद आश्चर्य करने बाला था। रात के मौसम मे आवश्यक रूप से हल्की पतली रज़ाई के बिना सुखद नींद लेना संभव न था। इस तरह का मौसम उत्तर भारत मे मसूरी, नैनीताल मे भी अनुभव किया जा सकता है। कुन्नूर, वेलिंग्टन ऊटी की रेल यात्रा एक अनुशासित, सुखद और शांत शहर की एक अविस्मरणीय यात्रा थी।

विजय सहगल

            

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