रविवार, 19 जुलाई 2026

पेन की दुकान, वाराणसी

 

"पेन की दुकान, वाराणसी"










24 अक्टूबर 2025 को वाराणसी के बाज़ारों और गलियों मे निरुद्देश्य  भटकने, घूमने का एक अलग ही मजा है। पहले बचपन मे अपनी बुआ और ताऊ के साथ वर्षों पहले शायद 1971-72 मे बनारस जाना हुआ था। 7-8 दिन का प्रवास था। गोदौलिया मे सत्यनारायण धर्मशाला मे रुके थे, इस दौरान धर्मशाला से दशाश्वमेध घाट मे सुबह स्नान और विश्वनाथ मंदिर दर्शन लगभग नित्य का क्रम था। इन तीनों जगह को जोड़ने और मोड़ने वाली  गलियों और मुहल्लों मे भटकने और घूमने से रास्ते लगभग याद हो गये थे। एक बार फिर से आज पुरानी घुम्मकड़ी और यायावरी की यादें ताजा हो आयी। भटकाव और घूमने फिरने के बावजूद एक प्राचीन सत्यनारायण मंदिर तो दिखा  लेकिन फिर भी  वो धर्मशाला और उसमे स्थित भगवान विष्णु की भव्य प्रतिमा का मंदिर  नहीं मिला। बाजार मे एक ठेले पर ड्रैगन फ्रूट के सुंदर गुलाबी रंग मे सजे फलों और एक फुटपाथ पर बांस की तीलियों और खपच्चियों से बने सूप, डलियाँ और दौल्ले को देख उनकी फोटो के लोभ से मै न बच सका। दशाश्वमेध घाट से बापसी के दौरान पेन को॰ नाम की एक पेन की दुकान ने भी मेरा ध्यानकर्षण किया जहाँ मै ठिठक कर  रुके बिना नहीं रह सका। दुकान का बाहरी आवरण और रूप और साज सज्जा बड़ी आकर्षित तो थी ही परंतु आज के कम्प्युटर युग मे स्याही-पेन, निब जैसी वस्तुओं की दुकान को देखना किसी आश्चर्य और अचरज के समान था क्योंकि आज के कम्प्युट्रीकरण ने लिखने-लिखाने के इन माध्यमों को चलन और प्रचलन से बाहर कर दिया है।

हमे याद है कि हमारे स्कूल के समय मे कलाम, दवात हमारे पढ़ाई-लिखाई का एक अहम हिस्सा हुआ करती थी। स्याही से कॉपी पर लिखना तो कम होता पर स्याही से हाथ और स्कूल ड्रेस की रंगाई पुताई ज्यादा होती थी। काँच की छोटी शीशी कहीं किसी साथी के पैर का निशाना बन लुड़कती-पटकती चारों खाने चित्त हो जाती और दवात, स्याही से अपनी यात्रा के निशान चारों तरफ छोड़ जाती। स्कूल जाते या घर आते मे कभी दवात की स्याही जेब या स्कूल बस्ते  मे ही खाली हो जाती और अंतरंग अंगों और स्कूल किताबों/कॉपी को सराबोर कर जाती। किसी साथी की शर्ट पर पीछे  स्याही छिड़कर शैतानी करना बच्चों का प्रिय शगल था। बैसे तो प्रचलन मे नीली स्याही ही ज्यादा चलन मे थी पर काली और लाल स्याही का चलन भी था। कभी कभी प्रधानाचार्य या अन्य अध्यापकों द्वारा हरी स्याही का भी उपयोग किया जाता जो आभिजात्य वर्ग की पहचान होता था। साधारण स्याही तो एक टिक्की (दवाइयों की गोली की तरह) को पानी मे घोलकर बन जाती थी लेकिन कैमलिन कंपनी  नाम की स्याही आम प्रचलन मे थी पर उच्च श्रेणी की स्याहियों मे चेल्पार्क जेट ब्लैक, पार्कर क्विंक भी चलन मे थी जो बड़े शहरों मे ही बड़ी दुकानों मे मिलती थी।

जब पाँचवी कक्षा मे था पहली बार बांस की कलम की जगह फाउंटेन इंक पेन का इस्तेमाल किया था। एक अलग है रौब और रुतबे के साथ पेन को  स्कूल बस्ते मे रख कर अकड़ कर चलते थे मानों कोई बहुत बड़ी बंदूक हाथ लग गयी हो। पहली पहली बार इंक पेन हाथ लगा था। उसके सभी पार्ट्स यथा, निब, निब को सपोर्ट और स्याही की निर्बाध आपूर्ति करने वाला प्लास्टिक का फीड, निब और फीड को एक एक खोखले  के ऊपर मे फँसाने वाला हिस्सा जिसके निचले हिस्से को स्याही की ट्यूब के साथ चूड़ी से कसने वाला हिस्सा,  स्याही की टंकी या ट्यूब, ढक्कन और हुक जिसकी सहायता से पेन को शर्ट की जेब मे पेन को लगाते हैं। प्रायः स्याही की टंकी और निब के हिस्से से स्याही लीक कर जाती जिससे हाथों के साथ शर्ट की जेब भी खराब हो जाती। निब के पॉइंट से लिखते लिखते कभी कभी निब का आकार-प्रकार बिगड़ जाता जिसे ऊपर नीचे कर कभी पेन चल जाता और कभी उसके सिरे का एक हिस्सा टूट कर निब बेकार हो जाता। निब भी अनेक ब्रांड के बाजार मे मिल जाते। फाउंटेन पेन के साथ स्याही की निब वाली कलम भी चलन मे थी जिसे स्याही दवात मे डुबो डुबो कर लिखा जाता था। उन दिनों ओम स्पेशल पेन का चलन झाँसी मे होता था, हमारे एक परिचित प्रदीप कंचन ने भी अपने घर पेन की फ़ैक्टरि लगाई हुई थी।  अनेक रंगों और आकार प्रकार के पेन मिलते थे। कागज के डिब्बों मे दस की संख्या मे रंग-बिरंगे पेन के डिब्बे आकर्षण का केंद्र होते थे। जब कभी फाउंटेन इंक पेन नहीं चलते तो हाथ से स्याही को छिड़क छिड़क कर चलाने का प्रयास करते। परीक्षाओं मे एक-दो अतिरिक्त पेन आकस्मिक उपयोग के लिए रक्खे जाते कहीं किसी पेन ने धोखा दे दिया तो परीक्षा मे उत्तर लिखने कहीं कोई चूक या कमी न हो जाय।

पेन को॰ दुकान मे पेन की अनगिनित रंग-रूप की श्रेणियाँ देख कर मुझसे दुकान मे प्रवेश करने से रहा न गया। सामने काउंटर पर दुकान के मालिक एक नौजवान से जिसने अपना परिचय निशांत साहू नाम से कराया। उन्होने बतलाया कि ये दुकान उनके दादा स्व॰ तारा प्रसाद साहू ने 1946 मे शुरू की थी, वे तीसरी पीढ़ी हैं जो अपने पैतृक व्यवसाय को आगे बढ़ा रहे हैं। मैंने अपना मन्तव्य/उद्देश्य  निशांत को बतलाते हुए कहा कि मै  आपकी दुकान की तरफ इसलिए आकर्षित हुआ क्योंकि आपकी दुकान ने अस्सी-नब्बे दशक की यादें ताज़ा कर दी और दूसरे मेरी जिज्ञासा थी कि  आज के कम्प्युटर युग मे  महज लेखनी, पेन स्याही के व्यापार  विनिमय से जीवन यापन कैसे संभव, सहज और सुलभ हो रहा होगा? निशांत ने बतलाया कि आज भी पुराने स्याही पेन के पारखी, प्रशंसक और क़द्रदान इस संस्कारधानी बनारस मे हैं। उनकी दुकान पर दस-पंद्रह रुपए से दो  लाख रुपए तक का मोंटब्लंक कंपनी का पेन हैं जो नक्काशीदार कारीगरी का नायाब नमूना है जो पूर्णत: अखरोट की लकड़ी से बना है। इस पेन को वे दुकान के एक छोटे लॉकर मे सुरक्षित बंद कर रखते हैं। आज ये शहर की इकलौती दुकान हैं जहां देश विदेश के फाउंटेन पेन, स्याही और अन्य संबन्धित सामाग्री मिलती हैं। कुछ चमत्कारिक और अजूबे पेन का संग्रह भी इनकी दुकान मे प्रदर्शित है।  पूर्व ब्रिटिश प्राइमिनिस्टर विसटन चर्चिल सहित अनेक  नाम चीन हस्तियाँ हमारी इस दुकान पर आ चुकी हैं। आज भी पुराने पेन की मांग हैं जिन्हे खरीदने लोग यहाँ आते हैं। इंडिया टूड़े के राजदीप सरदेसाई ने इनकी दुकान के बारे मे एक छोटी डॉकयुमेंट्री भी प्रसारित की है। विभिन्न प्रकार के पेनों के साथ विभिन्न प्रकार की स्याही की आकर्षक दवात भी उनकी दुकान मे देखने को मिली जो एक अद्भुत अनुभव था।

अगली बार जब आप वाराणसी जाय तो  बाबा विश्वनाथ के दर्शन कर वाराणसी के अन्य प्रसिद्ध स्थलों के साथ पेन को॰ पेन की दुकान का भी अवश्य भ्रमण करें।

 

विजय सहगल