"भक्तों को विभक्त करते स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद"
भारतीय
सनातन सांस्कृति के विकास और प्रचार प्रसार मे आदि शंकराचार्य का अति महत्वपूर्ण
योगदान है जिससे सनातन धर्मावलंबियों के बीच उत्तर से दक्षिण तक, पूर्व से पश्चिम
तक आपसी एकता, संघटन और समन्वय स्थापित हुआ। उनके द्वारा स्थापित
भारत की चार दिशाओं मे सनातन हिन्दू धर्म के चार पवित्र तीर्थों यथा जगन्नाथ पुरी, रामेश्वरम, द्वारका एवं बद्रीनाथ की स्थापना एक असाधारण, अद्व्तिय
कार्य था जहां हर सनातनी हिन्दू, जीवन मे एक बार तीर्थ
यात्रा पर जाना, दर्शन कर पूजा अर्चना करना, मन मे इच्छा रखता है। आदि शंकराचार्य का जन्म सन 507 ईस्वी पूर्व केरल के
कालड़ी नामक ग्राम मे हुआ था। पिता शिवगुरु भट्ट, माता अयम्बा की शिवभक्ति से उत्पन्न बालक का नाम शंकर रक्खा गया। मेधावी
बालक शंकर जन्म से ही प्रतिभासम्पन्न, बुद्धिमान और
प्रतिभाशाली था। 6 वर्ष की अवस्था मे वेद, शास्त्रों के
अध्यन के फलस्वरूप प्रकांड पंडित हुए। 8 वर्ष की अल्पायु मे संन्यास ग्रहण कर
सनातन धर्म की पताका, ज्ञान, बोध और
विध्या के प्रचार हेतु तत्पर हुए। आदि शंकराचार्य ने पूरे भारत के पैदल भ्रमण कर
सनातन सांस्कृति और परंपरा की रक्षा हेतु भारत
के चार कोनों मे चार मठों की स्थापना की जिनका सनातन धर्म मे अति महत्वपूर्ण और
हिन्दू धर्म मे एक सम्मानीय स्थान प्राप्त
है। ज्योतिषपीठ, श्रृगेरी पीठ,
द्वारिका पीठ और पुरी गोवर्धन पीठ। आदि शंकराचार्य के काल से, इन चारों पीठ पर आसीन सनन्यासी को शंकरचार्य कहा जाता है। वेदों, उपनिषदों और श्रीमद्भगवत गीता सहित सनातन धर्म की अन्य अनेकों धार्मिक
ग्रन्थों के भाष्य, टीका लिखने का श्रेय आदि शंकराचार्य को
दिया जाता है। 32 वर्ष की अल्पायु मे संवत 475 ई॰ पूर्व मे केदारनाथ के समीप वे शिवलोक गमन कर गये। केदार नाथ मंदिर के पास ही आदि
शंकराचार्य जी की समाधि स्थित है। आदि शंकराचार्य को सनातन हिन्दू धर्म मे
अद्व्तिय, अमूल्य और अतुलनीय योगदान के कारण उन्हे भगवान शंकर के अवतार रूप
मे प्रतिष्ठा प्राप्त है।
आदि
शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार पवित्र पीठों मे से एक ज्योतिर्मठ (जोशीमठ) पीठ के
वर्तमान शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की
नियुक्ति इस पीठ के पूर्व शंकराचार्य स्वरूपानन्द सरस्वती के निधन के बाद सितम्बर
2022 मे उत्तराधिकारी के रूप मे हुई।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद इस पीठ के 55वे शंकरचार्य है हालाँकि स्वामी
अविमुक्तेश्वरानंद के शंकराचार्य होने को लेकर कुछ कानूनी और संतों को लेकर विवाद
बना हुआ है और मामला सुप्रीम कोर्ट मे विचारधीन है क्योंकि अन्य मठों के शंकराचार्य
उनके मनोनयन से असहमति रखते हैं। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद हमेशा से विवादों के
घेरे मे रहे हैं फिर वह चाहे उत्तर प्रदेश मे सफलता पूर्वक सम्पन्न महाकुंभ हो, अयोध्या
मे राम जन्मभूमि मे प्रतिष्ठापित मंदिर हो, प्रयागराज मे माघ मेले का स्नान। अभी हल ही मे 18-19 जनवरी 2026 को मौनी
अमावस्या के दिन स्नान को लेकर उनका प्रशासन से विवाद चर्चा मे रहा। स्वामी
अविमुक्तेश्वरानंद अपने लाव लश्कर और रथ के साथ गंगा स्नान करना चाहते थे, प्रशासन ने भगदड़ जैसे सुरक्षा कारणों की दुहाई देकर उनसे पालकी/रथ छोड़ कर
कुछ कदम पैदल चल गंगा स्नान करने का
अनुरोध किया। उन्होने इसे शंकराचार्य का अपमान बता इसे अपने अहम और अहंकार का
प्रश्न बना 10 दिन तक धरना दिया और अंत मे मुख्यमंत्री योगी
को नकली हिन्दू घोषित कर बुरा-भला कर अपनी राजनैतिक कुंठा का प्रदर्शन किया। प्रत्युत
मे मुख्यमंत्री ने बिना उनका नाम लिए
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की तुलना कालनेमि नामक दैत्य से कर उन पर सनातन धर्म को कमजोर करने के कुप्रयासों मे
शामिल होने का आरोप लगाया। दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है की नीति का लाभ उठाते
हुए समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव, स्वामी
अविमुक्तेश्वरानंद के पक्ष मे खड़े दिखाई दिये। ये वही अखिलेश यादव हैं जिन्होने
2015 मे इन्ही स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पर गंगा मे मूर्ति विसर्जन के विरोध मे
पुलिस से लाठी चार्ज कर पिटवाया था। प्रायः एक धर्म विशेष की राजनीति करनेवाले समाजवादी के सांसद अफजल
अंसारी और काँग्रेस सांसद इमरान मसूद का
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के पक्ष आवाज उठाना हतप्रभ,
स्तब्ध और अचांभित करने वाला था। क्या हिन्दू धर्म के सर्वोच्च पदासीन किसी
धर्माचार्य को ऐसी बातें और व्यवहार शोभा देती हैं? क्या
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के ऐसे
आचार-विचार, आदि शंकराचार्य द्वारा सृजित शंकराचार्य जैसे पद
की प्रतिष्ठा और उसकी गरिमा के अनुरूप है?
13
जुलाई 2024 को स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने देश के जाने माने उद्धयोगपति मुकेश
अंबानी के पुत्र अनंत अंबानी के चकाचौंध भरे विलास और वैभवपूर्ण विवाह समारोह मे
शामिल होकर नवदंपति को आशीर्वाद दिया। यूं तो किसी भी धर्माचार्य, साधू संत
को किसी बड़े अमीर, धनी और सम्पन्न उद्धयोगपति, व्यवसायी के निजि कार्यक्रम मे शामिल होने की मनाही नहीं है लेकिन ऐसे
धर्माचार्यों से ये भी अपेक्षा की जाती है कि वे एकाधि बार समाज के अनुसूचित
जाति/जनजाति वर्ग के वैवाहिक कार्यक्रमों मे भी शामिल होते या अपनी धार्मिक यात्राओं और कार्यक्रमों मे किसी अनुसूचित जाति के व्यक्ति का अथित्य
स्वीकार करते? समाज के उस दबे-कुचले वर्ग जिनको गाँव मे
छुआछूत और जातिगत विद्वेष और भेदभाव के कारण बारात मे घोड़ी पर चढ़ने और
बारात निकालने तक से वंचित किया जाता है। क्या
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को, सनातन धर्म मे व्याप्त ऊँचनीच, जातिपात के भेदभाव समाप्त करने और जातिगत समरसता फैलाने का कोई उदाहरण
प्रस्तुत नहीं करना चाहिये? प्रायः वंचित वर्ग के व्यक्तियों
को गाँव के कुएं से पीने का पानी तक लेने से रोक दिया जाता हैं, गाँव के मंदिरों और देवालयों मे अनुसूचित वर्ग के लोगो के प्रवेश पर
मनाही कर उन्हे अपमानित किया जाता हैं। क्या स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जैसे
शंकराचार्य/धर्माचार्यों से ये अपेक्षा नहीं की जानी चाहिये कि ऐसी घटनाओं मे उन
स्थलों का दौरा कर उन शोषित व्यक्तियों के पक्ष मे खड़े होकर तथाकथित सवर्ण लोगो को
जाति उत्पीढन जैसी बुराई के विरुद्ध नसीहत देते? स्वामी
अविमुक्तेश्वरानंद जहां उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी को नक़ली हिन्दू का
प्रमाण पत्र दे रहे है, क्या उन्होने कभी देश के कुछ हिस्सों
से विदेशी मिशनरियों द्वारा सनातन धर्म के वंचित वर्ग को धन और सुविधाओं की लालच देकर धर्म परिवर्तन का विरोध किया?
इसी
बीच बरेली के सिटी मैजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री के त्यागपत्र पर भी स्वामी
अविमुक्तेश्वरानंद ने राजनीति करने मे कोई कोर कसर नहीं छोड़ी जो पुनः शंकराचार्य
के पद और गरिमा के विपरीत था। लोगो का ऐसा मानना है कि इस प्रशासनिक अधिकारी
ने समाजवादी पार्टी के अपरोक्ष समर्थन से
राजनीति करते हुए रैगिंग के विरुद्ध बने यूजीसी कानून 2026 के विरोध मे सवर्ण और
गैर सवर्ण की कुत्सित राजनीति करते हुए स्तीफ़ा दिया साथ ही स्वामी
अविमुक्तेश्वरानंद के शिष्य बटुकों पर माघ मेले पर पुलिस के लाठी चार्ज और शंकराचार्य
को माघ मेले मे स्नान करने से रोकने के विषय को ब्राह्मण के सम्मान से जोड़ कर त्याग पत्र का मुद्दा बनाने की कुचेष्टा की। इस
विषय मे तत्कालीन सिटी मैजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री के विरुद्ध तो उत्तरप्रदेश सरकार
अपने प्रशासनिक नियमों, क़ानूनों और प्रावधानों के तहत कार्यवाही करेगी पर क्या सनातन धर्म की प्रमुख
पवित्र ज्योतिर्मठ (जोशीमठ) पीठ के प्रमुख को यूजीसी कानून 2026 की राजनीति मे सवर्णों के पक्ष मे खड़े होने के साथ
गैर सवर्ण शूद्र वर्ण पर रैगिंग के माध्यम से होने वाली हिंसक घटनाओं, अत्याचारों के विरुद्ध उनके पक्ष
मे भी नहीं आना चाहिये था? एक धर्माचार्य के पद पर पदासीन
होने के कारण उन्हे इस क्षुद्र राजनीति से परे जातिगत विद्वेष पर आग लगाने के
विपरीत शीतल जल डाल कर शांत करने के प्रयास नहीं करना चाहिये थे? ताकि सनातन धर्म के चारों वर्णों मे आपसी समरसता को कायम रखते हुए विभाजन
को रोका जा सके? इस पर गहन विचार करने की आवश्यकता है।
विजय सहगल

