"सोलापुर
का दूध मार्केट"
12 सितंबर 2026 को अपने लंबे पर्यटन प्रवास
के दौरान जब सोलापुर देशांतर गमन के दौरान मैंने सिद्देशवर मंदिर के पास प्रदर्शनी
ग्राउंड के बाहर पार्किंग मे अनेक दूध वालों की भीड़ देखी जहां अनेक ग्वाले
मोटरसाइकल पर अपने बड़े बड़े दूध कैन लादे नज़र आए। जिज्ञाशा और उत्सुकतावश मैंने एक
नौजवान दूधिये को रोक, उससे यहाँ
एकत्रित दूधियों के बारे मे पूंछा?
सामान्य शिष्टाचार के दौरान उस नौजवान ने अपना नाम प्रशांत निड़े बताया। वह एक
ग्रामीण पृष्ठभूमि के किसान परिवार से था,
स्वाभाविक रूप से कृषि प्रधान देश भारत मे खेती बाड़ी से संबद्ध गौपालन एक महत्वपूर्ण आर्थिक गतिविधि है जो
किसानों को एक मजबूत आर्थिक संबल प्रदान करती है। लेकिन वर्षों से किसानों को उनके
कृषि उत्पाद के साथ संबद्ध गतिविधियों के उत्पाद की कीमत कभी पूरी नहीं मिली।
लेकिन सोलापुर के मिल्क मार्केट अर्थशास्त्र के प्रमुख मांग और पूर्ति और खुली बाज़ार
व्यवस्था का अनुपम या आदर्श उदाहरण है।
प्रशांत ने बताया कि वह खेतीबाड़ी के साथ साथ
दूध का व्यापार करता है और गाँव से कुछ अपना और कुछ दूसरे किसानों का दूध क्रय कर
मार्केट मे सप्लाई करता है। दूध की कमी होने पर वह यहाँ एकत्रित दूध का व्यापार
करने वालों से दूध क्रय करता है और दूध की अधिकता होने पर यहीं पर दूध का विक्रय
करता है। इस मार्केट मे मांग ज्यादा होने पर दूध के दाम भी अच्छे मिल जाते हैं
निश्चित ही दूध की पूर्ति मे कमी पर दाम कम हो जाना स्वाभाविक है। पैसे का
लेन देन नगद होने के कारण किसान के हाथ मे
हमेशा नगदी रहती है जो उसके दैनंदिनी खर्चों की पूर्ति के लिए आवश्यक है। इस
मार्केट की एक असाधारण लेकिन अति उल्लेखनीय
बात जो मैंने देखी कि दूध की शुद्धता पर
व्यापारियों का विशेष ध्यान था। इसके लिए वहाँ कुछ नौजवान,
दूध की शुद्धता नापने की कम्प्युटर मशीन लेकर धूप से बचने के एक बड़े छाते की छाँव
मे बैठे थे। वे मात्र 5 रुपए मे 20-30 मिलिलीटर दूध को उक्त कम्प्युट्रीकृत मशीन
मे डालते और तुरंत ही दूध की शुद्धता जांच रिपोर्ट दोनों पक्ष अर्थात बिक्रेता और क्रेता के सामने
आ जाती। 45000 से 65000 रुपए कीमत की यह मशीन,
अल्ट्रासोनिक तकनीक से दूध की शुद्धता को मापती है। जब एक तय मानदंडों का दूध खुले
बाज़ार मे क्र्य बिक्रय के लिए हाजिर हो तो विनिमय करने मे आसानी तो हो ही जाती है।
कहते हैं न कि बूंद बूंद से घड़ा भर जाता है इस किवदंती को यहाँ साक्षात देखने को
मिली। छोटे छोटे लाभ को एकत्रित कर कैसे बढ़ा बनाया जाय इसका भी उदाहरण यहाँ देखने
को मिला। दूध की शुद्धता जाँचने का कार्य करने वाले नौजवान,
जिस 20-30 एमएल॰ दूध को जांच के लिए लेते उसको मार्केट के नियमानुसार उसे शुद्धता
जाँचने वाले की संपत्ति मान लिया जाता और उसको वे बापस न देकर अपने पास एकत्रित
करते जाते। पूरे दिन व्यापार विनिमय के दौरान वे भी 2-3 लि॰ दूध एकत्रित कर लेते
इस तरह वे रूंगन (टेस्ट करने वाले सैंपल) से भी दो-ढाई सौ रुपए की कमाई कर लेते हैं।
ऐसा नहीं कि इस बाज़ार मे सिर्फ दूध का
व्यापार करने वाले ही आते है, घर परिवार मे
किसी त्योहार या उत्सव के दौरान मिष्ठान,
खीर आदि के लिए लगने वाले दूध की खरीद के लिए भी घरेलू व्यक्ति,
संस्थाएं भी यहाँ दूध क्रय करने आते है,
तब दूध वालों को कुछ अतिरिक्त लाभ और कीमत भी मिल जाती है और ये घरेलू व्यक्ति भी
बिचौलिये के कमीशन से बच जाते है। इस तरह
किसी एक समय पर 40-50 दूधिये दोपहर तक इस दूध व्यापार को कर अपने अपने घरों को
बापस चले जाते। इस बाज़ार मे सुबह से दोपहर तक हजारों लिटर शुद्ध दूध का व्यापार हो
जाता है। अर्थशास्त्र के बुनियादी सिद्धांतों को समझने के लिए अर्थशास्त्र के प्राथमिक विध्यार्थियों को सोलापुर के इस छोटे मिल्क
मार्केट मे अवश्य आना चाहिए जहां वे अर्थ
शास्त्र के मांग और पूर्ति तथा खुली बाज़ार व्यवस्था के नियमों को जीवंत देख सकते
है और अपने किताबी ज्ञान का साक्षात रूप देख अर्थशास्त्र के ज्ञान मे बृद्धि भी कर
सकते है। यह बाज़ार मेरे लिए भी कौतूहल और खुशी देने वाले विषय था क्योंकि विज्ञान
से स्नातक के बाद बैंकिंग की परीक्षा मे एक विषय अर्थशास्त्र भी था।
विजय सहगल




