शुक्रवार, 20 मार्च 2026

अनियोजित गंगा -संगम स्नान, पटना

 

"अनियोजित गंगा स्नान, पटना"












कभी कभी निरुद्देश्य घूमते हुए जब ये भी न पता चले की अगले  कदम पर कहाँ जाना है और फिर एक नया कदम, बगैर पूर्वनियोजित घूमते हुए 2-3 घंटे हो जाएँ तो एक अच्छी ख़ासी कहानी बन जाती है। 9 मार्च 2026 को ऐसा ही कुछ हुआ जब मै अपने पटना प्रवास पर सुबह 6.30 बजे प्रातः पैदल-पैदल भ्रमण पर निकला। रोज एक ही जगह एक पार्क मे जाने वाले बोरिंग रूटीन से हट कर मन मे आया चलो गंगा घाट की तरफ चलते हैं। कदम बढ़ते जा रहे थे रास्ता गूगल दिखा रहा था। चूंकि कार या मोटरसाइकल का रास्ता तीव्र गति से चलने के कारण  आसानी से समझ आ जाता है पर पैदल रास्ता दिखाने मे गूगल, कभी दायें-कभी बाएँ कभी विपरीत दिशा बताने के कारण उलझन हो रही थी। कुछ ऐसी ही उलझन आज भी थी। पता नहीं किन पतली, छोटी गलियों से होकर जब मुख्य सड़क पर आया और आस-पास के दुकानों पर लगी बोर्ड पर नज़र डाली तो पता लगा कि मै खजांची रोड पर हूँ।  मै पहली बार पटना मे इन अंजान रास्ते पर अकेले जा रहा था। एक दो जगह कुछ भ्रमित होने पर लोगो से मार्ग दर्शन  लिया और इस तरह खोजते खोजते दरभंगा हाउस पहुँच गया जहां से काली घाट के  रास्ते से मै परिचित था। घाट पर सुबह लोग चहल-कदमी करते और घूमते नज़र आए। मै भी खुश था कि चलो आज बंधे-बंधाये रास्ते को छोड़ एक नई जगह पर तो आए।

लोगो के प्रातः भ्रमण के बीच, घाट पर साफ सफाई का काम भी चल रहा था। घाट अच्छे थे, घूमना अच्छा लग रहा था।  हमारी सनातन संस्कृति मे पावन गंगा का बड़ा महत्वपूर्ण स्थान है। गंगा को प्रणाम कर,  मन मे आया कि चलो गंगा जल की कुछ बूंदों से आचमन कर अमृतपान किया जाय। मानवीय तृष्णा ने, घाट से कुछ दूर बह रही पवित्र गंगा का किनारा काफी अस्वच्छ बना दिया था, आगे शायद कुछ स्वच्छता मिले, ऐसा विचार कर आगे बढ़ते-बढ़ते विश्वविध्यालय घाट, कृष्णा घाट होते हुए जब गांधी घाट पर पहुंच गया। लेकिन आगे भी स्वच्छता के स्तर कोई सकारात्मक परिणाम न पा कर आचमन का विचार त्याग कर पूरे शरीर पर गंगा जल छिड़क कर ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥ मंत्र का जाप कर पवित्र होने की सोची। इसी आशय से घाट की सीढ़ियाँ उतर कर कुछ दूर बह रही गंगा नदी की ओर बढ़ा। तभी वहाँ खड़ी नाव के मल्लाह ने गंगा पार जाने की आवाज लगा लोगों को आमंत्रित किया। इरादा तो मात्र घाट पार प्रातः भ्रमण का था, गंगा किनारे आचमन और पवित्रीकरणम का विचार भी हमारी संस्कृति के कारण वरवश आना ही था पर गंगा पार जाने का कहीं कोई दूर दूर तक जाने का  इरादा न था, क्योंकि सुबह विविध भारती सुनने के शौक के कारण, सिवाय मोबाइल के, जेब मे फूटी कौड़ी भी नहीं थी।  जिज्ञाशा वश मल्लाह से पूंछा कितने पैसे लोगे?  तब उसने बताया रुपए 50/- दोनों तरफ अर्थात जाने और आने के। फिर पूंछा क्या यूपीआई से पेमेंट लेते हो? उसने सिर हिलाते हुए कहा हाँ! फिर क्या था, मै भी लपक कर नाव मे पहली सवारी के रूप मे चढ़ गया।  

घाट पर गंगा पार जाने वालों की कोई बहुत  ज्यादा भीड़ नहीं थी। नाव वाला हर थोड़ी देर बाद "गंगा पार" जाने की आवाज लगाता। मै भी चुप चाप इंतज़ार करता रहा, नाविक की सहायता के लिए मैंने भी कुछ लोगों से गंगा पार चलने का आग्रह किया। अब तक एक-दो सवारी और आ चुकी थीं। फिर 7-8 की संख्या मे एक परिवार भी आ गया। इस तरह गंगा पार जाने की नाव की यात्रा शुरू हो चुकी थी। नदी के बीच पानी काफी गहरा था। मन ही मन माँ गंगा को प्रणाम कर जगत के कल्याण की कामना की और एक नौजवान सहयात्री जो मेरी तरह अकेला ही मेरा सहयात्री था। रूपेश!, हाँ यही नाम बताया था उस युवा ने। हजारी बाग से आया था। होली पर लगे ग्रहण के बाद गंगा  स्नना के उद्देश्य से ही उसका पटना आना हुआ था। गंगा पार पहुँच कर केवट नानजी नाव किनारे लगा कर, सभी यात्रियों को गंगा पार रेतीले मैदान मे उतर दिया। सभी यात्री नहाने के सुविधाजनक स्थान की तलाश मे यहाँ वहाँ हो लिये। यहाँ पानी साफ सुथरा, आचमन के योग्य था पर यहाँ फिर मै असमंजस के दो राहे पर खड़ा था। गंगा स्नान का कोई उद्देश्य तो नहीं था। क्योंकि न तो कपड़े, न तौलिया, न कच्छा बनियान? क्या करें? रूपेश ने अपने लाये बैग को किनारे पर रख नाव के आगे की  तरफ साफ पानी मे स्नान की तैयारी कर स्नान भी शुरू कर दिया। कुछ सूझ नहीं रहा था क्या करें? कहाँ गंगा जल से आचमन फिर अपने शरीर पर गंगा जल से छींटे डालने की सोची, अब तो यहाँ गंगा स्नान का शुभ अवसर सामने था!!   हमने तुरंत ही इन्ही और ऐसी ही  परिस्थितियों मे स्नान करने का निर्णय लिया और किनारे पर ही लोअर, टी शर्ट और बनियान रख कर, प्राप्त हुए गंगा स्नान के ईश्वरीय सुयोग और सुअवसर का लाभ उठाते हुए गंगा की गोद मे बढ़ लिया। पानी ठंडा था, लेकिन एक डुबकी लगते ही ठंड तिरोहित हो गयी। अब तो अनेकों डुबकी लगा, सूर्य को अर्घ देते हुए अपने पूर्वजों को हाथ जोड़ कर उनके लिये शांति और श्रद्धा से नमन करते हुए गंगा का पवित्र जल अर्पित किया। बापस आकर अपने बासे वस्त्रो पर गंगा जल के छींटे डाल पवित्र किया, बनियान से तौलिये का काम लिया और चाय की दुकान के पीछे बने अस्थाई चेंजिंग रूम मे उन्ही बासी कपड़ों को पहन लिया। इसी बीच हजारी बाग के उस युवक रूपेश ने गंगा के पूर्वोत्तर छोर पर रेतीले मैदान के टीले के पीछे बहने वाली गंडक नदी को दिखलाया। गंडक गर्मी के इस शुरुआत के दिनों मे भी अपने तीव्र वेग और विशाल जलराशि के साथ बहते हुए भयावह लग रही थी। 15-20 फुट के ऊंचे टीले के रेतीले किनारे गंडक के तीक्ष्ण वेग से लगातार कट कर नदी मे गिर रहे थे। दृश्य बड़ा डरावना था। रेतीले टीले के  किनारे की थोड़ी भी चूक आपको गंडक मे फिसलने या गिरने से नहीं रोक सकती थी। गंडक नदी के रौद्र रूप का अभी ये हाल है तो बरसात मे इसकी विकरालता, तीव्रता और उग्रता का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। कुछ कदम आगे गंडक और गंगा का संगम स्पष्ट दिखलाई दे रहा था। संगम की धाराओं को प्रणाम कर हम दोनों,  वहाँ से  दिख रही  एक मात्र चाय की गुमटी  की ओर बढ़ लिये।

चाय के टपरे पर शिव पूजन यादव जी से भेंट हुई जो गाय का दूध निकाल रहे थे। गाय देखने मे तो साधारण लग रही थी पर जब स्टील की बाल्टी दूध से पूरी भर गयी, जो 12-13 लीटर से कम न थी, तब गाय की ऊंची नस्ल का अहसास हुआ। शिव पूजन जी की दुकान पर चाय, नमकीन, कोल्ड ड्रिंक पेड़ा आदि रक्खे थे। चाय-नमकीन की इच्छा तो थी पर यहाँ फिर नगदी भुगतान की समस्या आने को थी क्योंकि सिवा यूपीआई भुगतान के  जेब मे तो ठन-ठन गोपाल थी। पर अचानक दुकान पर यूपीआई कोड देख कर तसल्ली हुई। एक बात तो माननी पड़ेगी कि मोदी सरकार द्वारा यूपीआई लागू करने से हम जैसे लोगों ने पर्स रखना ही छोड़ दिया। प्रसंशा करनी होगी क्योंकि हर छोटा बड़ा दुकानदार, व्यापारी अब यूपीआई से भुगतान लेने लगा है। इस नदी के रेतीले किनारे पर पर दूर दूर तक शिवपूजन की दुकान के अतिरिक्त कोई दुकान न थी और इस घोर निर्जन मे यूपीआई की सुविधा!!, कहना अतिशयोक्ति न होगी कि भारत दुनियाँ मे डिजिटल भुगतान के मामले मे नंबर वन है।

यूपीआई भुगतान सुनिश्चित होने पर दम आ गयी, फिर क्या था इस निर्जन टापू पर  रूपेश, नानकी, शिवपूजन, महेश जनार्दन के साथ एक छोटी सी चाय पार्टी हो गयी क्योंकि अब पेमेंट की कोई चिंता जो नहीं थी।

आज का प्रातः भ्रमण भी यादगार हो गया कहाँ गंगा जल के  आचमन मे भी बाधा आ रही थी और कहाँ गंगा स्नान भी हो गया। एक अनियोजित यात्रा सुनियोजित यात्रा मे जो, बदल गयी थी।

विजय सहगल

    

      

 

जब मैंने कौतूहल से यहाँ संगम के बारे मे पूंछा तो रूपेश ने बताया, यहाँ पटना मे गंगा और गंडक नदी का संगम है।