श्री राम नवमी पर विशेष "अयोध्या के
राम, राम की अयोध्या"
2
नवंबर 2025 को मुझे मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की जन्म स्थान अयोध्या जाने
का परम सौभाग्य प्राप्त हुआ। भारत भूमि की सनातन संस्कृति के आराध्य भगवान श्री
राम के प्रति यहाँ के करोड़ो करोड़ लोगों की, वे आस्था, सम्मान श्रद्धा के
केंद्र हैं। ऐसी परम पावन राम जन्म भूमि अयोध्या
के दर्शन का सुयोग मुझे दूसरी बार प्राप्त हुआ। इसके पूर्व शायद 1972 मे मै
अपने ताऊ-ताई और बुआ के साथ गया था। तब की वीरान और सुनसान अयोध्या और आज की
अयोध्या मे जमीन आसमान का अंतर स्पष्ट दिखलाई पड़ता है। उन दिनों बिड़ला धर्मशाला मे
रुका था जो राम जन्मभूमि के ठीक सामने आज भी स्थित है। संजोग देखिये धर्मशाला के
सामने रुकने के बावजूद राम जन्मभूमि के दर्शन का आनंद, सुख
सौभाग्य मुझे अभी ही प्राप्त हुआ। भगवान राम को यूं ही मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं कहा
जाता है, आज दुनियाँ के तमाम धर्मों, संप्रदाय
या वंशों मे ऐसा दृष्टांत देखने को नहीं मिलता जब एक पुत्र के रूप मे भगवान श्री राम
ने पिता की आज्ञानुसार राज्य को त्याग कर वनवास जाना स्वीकार किया और विडंबना देखिये
जिस माता कैकई ने अपने पुत्र भरत के लिए राज्य सिंहासन की मांग की थी उसने भी राम की पादुकाओं को सिंहासन
पर रख, स्वयं वनवासी के रूप मे रहते हुए एक सेवक के रूप मे राम
काज किया!! अन्यथा दुनियाँ के सारे मजहब, धर्म पंथ और संप्रदाय
मे सत्ता के सिंहासन के लिए हिंसा, युद्ध झगड़े हुए जिसमे मानव
हत्या, षड्यंत्र और संहार हुए है।
1
नवंबर को देवठानी ग्यारश होने के कारण परिक्रमा लगाने बालों की बड़ी भारी भीड़ के कारण अयोध्या मे पहुँचने के बावजूद वहाँ
के केंद्र रमजन्मभूमि पहुँचना कठिन हो गया। रात के 11 भी बज चुके थे अतः रात्रि
विश्राम के बाद 2 नवंबर की सुबह ही राम जन्मभूमि जाना हुआ। एक विशाल प्रवेश द्वार
से होकर जब श्री राम जन्मभूमि की ओर बढ़े तो हजारों लोगो के कदम भी उसी ओर बढ़ रहे
थे। पूरे विशाल परिसर मे लाखों लोगों की तरह ही राम जन्मभूमि के प्रथम बार दर्शनों की जिज्ञासा, आतुरता, कौतूहल और उत्सुकता मेरे हृदय मे भी हिलोरे मार रही थी। जल्दी से जल्दी न
केवल राम लला के दर्शन की अभिलाषा अपितु पूरे जन्मभूमि परिसर देखने की उत्कंठा सब
कुछ शीघ्र अति शीघ्र करना चाहती थी। परिसर मे दर्शन,
बहुमूल्य समान की सुरक्षा एवं पादुकाओं के रखने के स्थान आदि व्यवस्था समझने के
पश्चात मेरी राय थी कि इतनी सुचारु व्यवस्था, इतना सुविधा
जनक तंत्र और इतनी सुरक्षित प्रणाली मैंने पहले कभी नहीं देखी!! मंदिर परिसर के
बाहरी क्षेत्र मे बने एक विशाल हाल मे बनी लगभग 50 एकल खिड़की बनी हैं। यहाँ पर हर
खिड़की पर मोबाइल, मूल्यवान वस्तुएँ एवं चरण पादुकाएं रखने
की सुविधा प्रदान की जाती हैं। एक खिड़की के
दोनों ओर 7-7 खंड के लॉकर कैबिनेट एक सिरे
से दूसरे सिरे तक रक्खे गए हैं। एक खंड मे लगभग 20 लॉकर हैं इस तरह एक खिड़की से 280
लगभग लॉकर संचालित होते हैं। अप अपना सारा मूल्यवान सामान,
मोबाइल एक प्लास्टिक की टोकरी मे रखते हैं एवं सारे जूते चप्पल एक प्लास्टिक की
बोरी मे रख कर खिड़की मे बैठे कर्मचारी को दे दीजिये। वह आपके सामने ही किसी भी
खाली लॉकर मे मूल्यवान वस्तुओं और मोबाइल को रख कर उसमे ताला लगा कर चाबी आपको दे
देगा, जिसमे आपके खिड़की संख्या और लॉकर संख्या अंकित होगी।
जूते चप्पल भी उस लॉकर के कुंडे मे लटका दिये जाएंगे। बापसी के समय हाल मे दूसरे
तरफ बनी उसी नंबर की खिड़की से आपके वस्तुओं को आपको सुपुर्द कर दिया जाएगा। कहने
का तात्पर्य वस्तुओं की प्राप्ति और सुपुर्दगी की खिड़कियाँ अलग अलग है। जिससे
व्यवस्था सुचारु रूप से संचालित होती है। ये सारी सुविधाएं निशुल्क हैं।
विशाल
परिसर मे जगह जगह पीने के पानी एवं टॉइलेट
की व्यवस्था है। अब जब आप मंदिर परिसर के बाहरी क्षेत्र से मंदिर के दर्शन
हेतु प्रवेश करते हैं तो 8-10 स्टील के पाइप से बनी लाइनों से अंदर प्रवेश करते
हैं। प्रथम साधारण सुरक्षा जांच से गुजर कर जब आप मंदिर के प्रवेश द्वार के पूर्व
सघन सुरक्षा जांच क्षेत्र मे पहुँचते है जहां आपकी ठोस और गहन जांच होती हैं। किसी भी तरह के
आग्नेय अस्त्र/शस्त्र बीड़ी, मोबाइल, सिगरेट, पान मसाला
आदि ले जाना सख्त निषेध है। इस जांच परिसर के बाहर आते ही कुछ कदम की दूरी पर मुख्य
मंदिर का विशाल चबूतरा बना है। चबूतरे के दायें व बाएँ दो दो लाइने एवं मध्य मे
चार लाइनों के माध्यम से बनी 30-32 सीढ़ियाँ चढ़ कर आप मुख्य मंदिर मे प्रवेश करते
हैं। मुझे बताया गया था कि आप सबसे दाहिने की सीढ़ियाँ चढ़ कर ही जायें क्योंकि ये पहली
वाली लाइन रामलला भगवान के सबसे निकट, ठीक सामने से होकर
जाती हैं बाकी की लाइने भी एक के पीछे एक छह लाइन मे लग कर लोग दर्शन करते हैं। असक्त
और वृद्ध जनों के लिए व्हील चेयर की व्यवस्था है जो लिफ्ट के माध्यम से मंदिर के
गर्भ गृह तक जा सकती हैं। मुख्य मंदिर मे पाँच कक्ष है जिनहे क्रमशः नृत्य, रंग शाला, सभा कक्ष,
प्रार्थना और कीर्तन मंडप कहते है तत्पश्चात गर्भ गृह मे भगवान राम लला बालरूप मे विराजमान हैं। नागर शैली मे गुलाबी राजस्थानी बलुआ पत्थर से बने इस परिसर मे काफी
दूर से ही ऊंचे चबूतरे पर विराजित रामलला के सहज, सरल दर्शन
हो जाते हैं। हर मंडप मे बने स्तंभों पर देवी देवताओं की छोटी बड़ी मूर्तियों को
उत्कीर्ण किया गया है। बारीक नक्काशी की बेल बूटे मूर्तिकारों के श्रम और
कलात्मकता को दर्शाते हर ओर दिखलाई देते हैं। आज के आधुनिक समय मे बिना लोहे के
निर्मित इस तीन मंज़िला भवन की भव्यता और दिव्यता देखते ही बनती हैं। मुख्य मंदिर
की आधार चबूतरे की लंबाई 380 फुट चौड़ाई 250 फुट और ऊंचाई 161 फुट हैं। मंदिर मे
392 खंबे और 44 दरबाजे हैं जिसमे 42 दरबाजे स्वर्ण जड़ित हैं। पूरे मंदिर का निर्माण बिना किसी राज्याश्रय के देश
के पाँच लाख गाँव से एकत्रित आम जनों के दान और भेंट से एकत्रित तीन हजार करोड़
रुपए से किया जा रहा है।
500
वर्षों के लंबे संघर्ष कानूनी दांव पेंचों के बाद बने इस भव्य मंदिर पर प्रत्येक
भारतवासी को गर्व है। दर्शनों के बाद उत्तरी दिशा के दरवाजे से हम लोग बाहरी
बरामदे मे निकले जहां निर्माण का शेष कार्य काफी तेजी से चल रहा था। बाहरी दरबाजे
के निकासी द्वार पर प्रत्येक भक्तजन को इलाइचि दाने का सील बंद सफ़ेद कागज के
लिफाफे मे प्रसाद के रूप मे प्रदान किया जा रहा था। बापसी के समय एक हरे घास के
मैदान पर एक सुंदर गिलहरी की प्रतिमा भगवान राम और गिलहरी के प्रसंग के प्रतीक की
कहानी कह रहा था। बापसी मे अमानती समान गृह से वस्तुओं को लेने के पूर्व शानदार
प्रतीक्षालय मे कुछ विश्राम और प्रसाधन सुविधाओं के उपभोग पश्चात पुनः मंदिर परिसर
की भव्यता को निहारते हुए भगवान श्री राम का स्मरण करते हुए अगले लक्ष्य की ओर बढ़ लिए।
जय
श्री राम!!
विजय
सहगल






