रविवार, 8 मार्च 2026

"अम्माँ" - कहां तुम चली गईं?

"अम्माँ" - कहां तुम चली गईं?








पौर मे देखा आँगन निहारे।
रसोई भी खोजी, थी तेरे सहारे॥
मंदिर में आसन औं खाली, पिढ़ी थी।
इतनी भी जावे की क्या जल्दी पड़ी थी॥
ठाकुर, कलेवा करा के तो जातीं ।
मुहँ अपना थोड़ा जूठारे तो आतीं॥
बिना सहारे के चलना था भारी ।
लंबी डगर कैसे तूने गुजारी ॥
अब न सफ़र करो।
कुछ तो खबर करो॥ ,
जहाँ तुम चली गईं?
कहां तुम चली गईं ?


स्कूल से जब घर आता था।
तुम को जब न पाता था॥
सीधा नानी घर जाते थे।
पक्का तुम मिल जाते थे॥
पर आज वहां मैं टेर रहा ।
हर कोई आंखें फ़ेर रहा॥
हमसे नजर चुराता है।
मुझ को ये बतलाता है॥
आज तुम यहीं नहीं ।
कहां फिर चली गईं ॥
कुछ तो खबर करो ।
अब न डगर चढ़ो॥
जहाँ तुम चली गईं?
कहां तुम चली गईं?



घबड़ाता है दिल बेचैनी है।
ये कैसी अजब अनहोनी है॥
रात में जब उठ जाते हैं।
विस्तर पे न तुझ को पाते हैं॥
पथरीली राहों में कांटे भी होंगे।
नंगे पैरों को रुलाते भी होंगे॥
चप्पल बिना कैसे चलती तूँ होगी।
तेरी कमी मुझको सलती तो होगी॥
जाना कहां था, बता के तो जाती।
जाने के पहले, जता के तो जाती ॥
अब न सबर करो ।
जल्दी खबर करो ॥
जहाँ तुम चली गई ।
कहाँ तुम चली गई ॥


दुःखों ने फिर से घेरा है।
चारों तरफ अंधेरा है ॥
पहले भी तुमने साधा है।
दूर रहीं सब बाधा है ॥
हर पीड़ा को बेध दिया ।
चक्रव्यूह को भेद दिया ॥
फिर से आज उबारो मां ।
आये संकट को टारो मां ॥
राहें न सूझ रहीं ।
भूलें क्या बूझ रहीं ॥
सच्ची ख़बर करो ।
अब तो ख़बर करो ॥
तहां तुम चली गईं।
कहां तुम चली गईं ॥

-विजय सहगल