शनिवार, 3 अक्टूबर 2026

"मुख्य चुनाव आयुक्त के विरुद्ध इंडि गठबंधन का युद्धघोष"

 

     "मुख्य चुनाव आयुक्त के विरुद्ध इंडि गठबंधन का युद्धघोष"




23 सितंबर 2026 को राजधानी के एक प्रमुख अँग्रेजी दैनिक मे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध अपने ही दो चुनाव आयुक्तों विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधु की असहमति और मतांतर की अनदेखी करने के आरोपों ने देश के राजनैतिक हलक़ों मे हँगामा और कोहराम की स्थिति पैदा कर दी। रितिका चोपड़ा द्वारा लिखित इस लेख मे पिछले दस महीनों मे दोनों चुनाव आयुक्तों ने ऐसे 14 अवसरों का उल्लेख किया जिसमे उन्होने चुनाव आयोग द्वारा लिए गए निर्णयों मे अपने असहमति और अस्वीकृति दर्ज़ कराई। चुनाव आयोग जैसी स्वतंत्र संवैधानिक संस्था मे मत-अभिमत मे मतांतर होना स्वाभाविक है पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर दोनों चुनाव आयुक्तों के बहुमत के निर्णयों की अवेहलना के गंभीर आरोप लगाना चिंता का विषय था। मृतप्राय: पड़े  विपक्षी इंडि गठबंधन के घटक दलों को इस मुद्दे ने संजीवनी का कार्य करते हुए एक बड़ा मुद्दा उनकी झोली मे स्वतः ही डाल दिया।

अँग्रेजी अखबार मे प्रकाशित रिपोर्ट की लेखिका रीतिका चोपड़ा ने, चुनाव आयोग मे चुनाव आयुक्तों के बीच चल रहे विवादों पर अपनी गहन रिपोर्ट मे बिन्दुवार उल्लेख कर मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य दोनों आयुक्तों के बीच अहं, दंभ और अहंकार के साथ आयोग के निर्णयों मे सर्वानुमति के आभाव और बहुमत के निर्णयों की अनदेखी के मुद्दों का उल्लेख किया। सरकारी संस्थाओं मे किन्ही मुद्दों पर असहमति होना स्वाभाविक है लेकिन रिपोर्ट मे नई मतदाता सूची तैयार करना, मतदाताओं का पंजीकरण और उन्हें हटाना, मतदाता सूचियों के संशोधन के खिलाफ अपील दायर करने की प्रक्रिया, तथा मतदाता सूचियों के SIR की प्रक्रिया की निगरानी और अभिरक्षा, फोरम संख्या 06, गोवा राज्य के 97 मतदाताओं जैसे विषयों मे बहुमत की अनदेखी ने चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल जरूर खड़े किये है? निश्चित ही रिपोर्ट को लंबे समय मे गहन जांच और चुनाव आयोग के अधिकारी या कर्मचारी की मिलीभगत के बिना, बना पाना असंभव रहा होगा। आज रिपोर्ट के चार दिन बाद भी, न तो रिपोर्टर अपने आरोपों के सबूत दे सकी और न ही मुख्य चुनाव आयुक्त ने  उन आरोपित और विवादस्पद मुद्दों को नकारा और न ही उप चुनाव आयुक्तों ने अपनी असहमति या बहुमत के मुद्दों की अवेहलना  को सार्वजनिक रूप से स्वीकार  किया। इसलिए ऐसा प्रतीत होता है कि यह विषय यूं ही ब्रह्मांड मे विचरण करता हुए एक दिन समाप्त हो जाएगा। हर व्यक्ति, संस्था या राजनैतिक दल इसे अपनी स्वार्थ, सुविधा और उससे मिलने वाले राजनैतिक हित, लाभ की कसौटी पर कस कर उपयोग करेंगे।

इंडि गठबंधन के प्रमुख घटक दल कॉंग्रेस के राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, ममता ऑल इंडिया तृणमूल  कॉंग्रेस की प्रमुख ममता बैनर्जी, समाजवादी के अखिलेश गांधी, शिव सेना उद्धव गुट के उद्धव ठाकरे, संजय राऊत, राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव ने तो रितिका चोपड़ा की रिपोर्ट को ब्रहम वाक्य मानते हुए चुनाव आयोग के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार  को पद से हटाने और देश के साथ गद्दारी और उसके विरुद्ध आपराधिक षड्यंत्र रचने के लिए गिरफ्तार कर, जेल भेजने की मांग तक कर डाली! इन सभी दलों ने ज्ञानेश कुमार पर वोट चोरी के आरोप लगा कर, उन पर भाजपा का पक्ष ले, उन्हे अवैध और असंवैधानिक तरीके से बिहार, पश्चिमी बंगाल मे सरकार बनाने और जिताने जैसे संगीन आरोप लगाये। आप पार्टी  प्रमुख सहित अन्य इंडि गठबंधन दलों ने भी पिछले दिनों विधान सभाओं के गठन  को भंग कर ईवीएम की बजाय दुबारा मत पत्रों से चुनाव करने की मांग की। हर बार की तरह राहुल गांधी लंबी चौड़ी प्रैस कॉन्फ्रेंस मे वोट चोरी के आरोप तो लगाते नज़र आए पर वोट चोरी के  कोई भी सबूत देने मे नाकामयाब रहे? इन दलों के, ज्ञानेश कुमार पर वोट चोरी के आरोपों को जब सबूतों की कसौटी पर कस कर देखते हैं तो इंडि गठबंधन की तर्कहीनता स्पष्ट नज़र आती है जो उनकी सोच और समझ पर सवालिया निशान खड़े करती है? यदि बिहार, पश्चिमी बंगाल, पांडिचेरी, और  असम  मे भाजपा मुख्य चुनाव आयुक्त के पक्षपात या वोट चोरी के कारण जीती तो केरल मे कॉंग्रेस तमिलनाडू मे सी॰ जोसफ विजय के नेतृत्व वाली टीवीके कैसे विजयी रही? क्या यहाँ वोट चोरी नहीं हुई? इस बात का कोई तर्क इनके पास नहीं है? दरअसल रितिका चोपड़ा की रिपोर्ट ने तो  इंडि गठबंधन के सभी प्रमुख राजनैतिक दलों को, अपनी नकामयाबी, पराजय असफलता और शिकस्त का ठीकरा, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के सिर फोड़ने का मानो सुनहरा  मौका मिल गया? अन्यथा क्या कारण थे कि बिहार और अन्य राज्यों मे एसआईआर के लागू होने को तो देश के  उच्चतम न्यायालय ने भी उचित ठहराते हुए इसे चुनाव आयोग का संवैधानिक  अधिकार बतलाकर किन्ही  भी खामियों से परे बतलाया, और फिर पश्चिमी बंगाल की एसआईआर प्रिक्रिया तो सुप्रीम कोर्ट की देखरेख मे हुई, जिसमे 500 से 530 न्यायिक अधिकारी (जज) तैनात किए गए थे।

इंडि गठबंधन और कॉंग्रेस ने तो पूरे देश के जिला मुख्यालयों मे विरोध प्रदर्शन कर मुख्य चुनाव आयुक्त की गिरफ्तारी की मांग की। उन्हे देश द्रोही और गद्दार तक ठहरा दिया। उनसे इस्तीफा देकर, राहुल गांधी ने बड़े सख्त लहजे और अशिष्ट भाषा मे ज्ञानेश कुमार को धमकी भरे लहजे मे अपने पद से इस्तीफा देकर सरकारी गवाह बनने की सलाह दी!! इस सलाह की पीछे राहुल गांधी की मंशा और मकसद समझ से परे है? अँग्रेजी दैनिक मे छपी रिपोर्ट मे, चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधु की असहमति के आधार पर मुख्य चुनाव आयुक्त के विरुद्ध मोर्चा खोलने वाले ये वही राहुल गांधी हैं, जिन्होने चुनाव आयोग मे विवेक जोशी और सुखबीर संधु की  नियुक्ति पर, चयन समिति के एक सदस्य के रूप मे अपनी  असहमति जताई थी, लेकिन दोनों चुनाव  आयुक्त (जोशी और संधु), आज उनके (राहुल गांधी के) के प्रिय पात्र बने हुए हैं।

यहाँ भी इंडि गठबंधन के नेताओं विशेषकर राहुल गांधी पर दोहरे मापदंड अपनाने के आरोप लगे।  जिन नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी सहित अन्य विपक्षी दलों के नेताओं पर, सन 2016 और 2019 मे, भारतीय सेना द्वारा पाकिस्तान के विरुद्ध की गयी सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक के विडियो, फोटो आदि सबूत मांगने के अनेकों बार आरोप लगाए गए हैं वही लोग आज बिना किसी सबूत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर वोट चोरी और देश के साथ गद्दारी के आरोप लगा कर गिरफ्तारी की मांग कर रहे है!! जो हाल के दिनों मे भारतीय राजनीति के नैतिक अधोपतन और मानसिक, बौद्धिक और आत्मिक  दिवालियापन को दर्शाता है।

इस विषय मे एक सकारात्मक परिणाम, शनिवार दिनांक 6 सितंबर 2026 को मध्यान्ह 3.00  देखने को मिले,  जब मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ दोनों चुनाव आयुक्तों की चाय पीते तस्वीर देखने को मिली। शाम तक चुनाव आयुक्तों की मीटिंग मे लिए निर्णयों ने काफी कुछ हद तक तीनों आयुक्तों के बीच चल रही कड़वाहट कम होने के सबूत दिखलाई पड़े। आयोग की 9 मुद्दों पर सफाई मे विशेष मुद्दे जैसे एसआईआर के दौरान नोटिस प्राप्त मतदाताओं के घर स्वयं बीएलओ के आने, गरीब बेघर लोगों के लिए हेल्प डेस्क, चुनाव आयोग के डिजिटल नेट वर्क तक अधिकारियों की सहज पहुँच, दावे और आपत्तियों दाखिल करने की समय सीमा मे बढ़ोतरी तथा चुनाव आयोग की नियमित बैठकों पर सहमति जैसे मुद्दे शामिल हैं। आशा की जानी चाहिये चुनाव आयोग के बीच चल रहे इस संग्राम का अब शुभ पटाक्षेप हो जाएगा?  लेकिन पक्ष और विपक्ष के बीच चल रही वोट चोरी के मुद्दे के पटाक्षेप मे कितने और चुनाव कराने पड़ेंगे कहना मुश्किल है।

विजय सहगल