"खराब ऋण खातों (NPA) की
तरह गैर निष्पादनकारी नागरिक की अवधारणा"
एक
विश्व प्रसिद्ध अँग्रेजी लोकोक्ति या कहावत
है कि "Justice delayed,
Justice deny" अर्थात देर से मिला
न्याय, न्याय न मिलने के बराबर है। उक्त न्यायिक
सिद्धान्त भारतीय न्याय व्यवस्था पर सटीक बैठता है। जहां ऐसे अपराधी,
गुंडों और असामजिक तत्व जिन पर अनेकों और कहीं कहीं तो सैकड़ों आपराधिक मुकदमों के
बावजूद, जिन्हे जेल की सलाखों
के पीछे होना चाहिये था, वे भारतीय कानून
व्यवस्था की खामियों का फायदा उठाकर वे मजे से स्वतन्त्रता पूर्वक घूम रहे हैं। जहां एक ओर बाहुवली,
धनाढ्य अपराधी कानून को अपनी अंगुलियों पर
नचाकर, मनमाफिक लाभ प्राप्त कर लेते हैं,
वहीं वंचित और गरीब वर्ग को,
कानून अपनी अंगुलियों पर नचाते हुए "तारीख पर तारीख" देते हुए अपनी एड़ियाँ
घिसवाने को मजबूर हो जाता है। चोरी,
लूटमार और मारपीट जैसे छोटे-मोटे अपराध तो छोड़िए हत्या,
बलात्कार जैसे घिनौने और गंभीर अपराध करने वाले अपराधी भी कानून के छिद्रान्वेषण
का फायदा उठाकर खुले आम घूमते नज़र आते हैं। पिछले दिनों कुछ वर्ग विशेष के लोगों
मे एक नयी प्रवृत्ति भी देखने को मिली जहां नबालिग भी हत्या,
लूट और बलात्कार जैसे अमानवीय अपराधों मे लिप्त पाये गए ताकि अवयस्क कानून का
फायदा लेकर जेल जाने और कठोर सजा पाने से बच जाएँ?
ऐसे मामलों मे उन नाबालिग बच्चों के संरक्षक और परिवार के लोगों का,
अवयस्क को प्रोत्साहन और संलिप्तता पर कानून के विध्यार्थियों और समाज
शास्त्रियों को शोध करने की महति आवश्यकता
है। ऐसे लोग जानते हैं कि अवयस्क के लिए बने कानून के कारण अन्तोत्गत्वा न तो
उन्हे कठोर कारावास और न ही फांसी की सजा मिलेगी,
कम से कम जीवित तो बच जाएंगे और शीघ्र ही
छूट जो जाएंगे? कमोवेश ऐसी ही सोच और
मानसिकता क्रूर, निर्दयी,
नराधम, बर्बर और आदतन अपराधी की होती है कि कितने
भी बड़े अपराध, दुष्कर्म और दुराचार पर
उसे, लचर भारतीय कानून व्यवस्था के चलते कदाचित
ही सजा मिले या मिल भी गयी तो निचली अदालत से जिला न्यायलय,
उच्च और उच्चतम न्यायालय की सीढ़ियाँ चढ़ने मे लगना वाला अंतहीन समय कानून के डर से,
अपराधी को निर्भय बना देता है!! संभवतः उसके जीवन काल बीतने के बाद भी अदालत का अर्दली "हाजिर हो!!" की आवाज लगता रहे?
खुदा न खास्ता यदि सजा हो भी गयी तो,
सजायाफ्ता लोगों की तरह "पैरोल"
या "फरलों" और जमानत जैसे कानून
शायद ही उन्हे जेल की दीवारों के अंदर रख सकने
मे समर्थ हों?
भारतीय
कानून व्यवस्था की इसी धीमी गति, लचर और दुर्बल
व्यवस्था के चलते ही, साधारण नागरिकों
का विश्वास कानून से उठ गया है या कम हो गया है। लोग त्वरित न्याय की चाहत मे
कानून को अपने हाथ मे लेने से नहीं हिचकते हैं और अपराधी को त्वरित सजा के चक्कर
मे स्वयं या समूहिक रूप से भीड़ तंत्र या मोब लिचिंग का हिस्सा बन स्वयं अपराध कर
रहे है जो एक गंभीर चिंता का विषय है?
यही कारण है कि जब देश के किसी हिस्से मे कहीं,
कोई गंभीर हत्या या बलात्कार की घटना घटती है और जब संबन्धित प्रदेश की पुलिस उस
अपराधी का एंकाउंटर कर अपराधी को मुठभेड़ मे मार गिराती है तो लोग वाहवाही कर पुलिस
की कार्यवाही के समर्थन मे खुल कर आ जाते
हैं। इस तरह की मुठभेड़, समान्यतः देश के सभी प्रेदेशों मे और विशेषतः उत्तर
प्रदेश मे देखने को मिल रही है और लोगों
का समर्थन और स्वीकृति भी उन राज्य सरकारों को मिली है। उत्तर प्रदेश मे तो हत्या,
बलात्कार और बाल अपराधियों के विरुद्ध
पुलिस की ऐसी त्वरित कार्यवाही से बहुत हद तक कानून व्यवस्था की स्थिति मे
काफी सुधार देखने को मिल रहा है। इसी कड़ी मे एक नया शब्द इन दिनों अपराध की
दुनियाँ मे सुनाई दे रहा है, "हाल्फ
एंकाउंटर"। ऐसी घटनाओं मे अपराध की दुनियाँ मे बढ़ रहे अपराधी के पैरों मे
गोली मारकर हमेशा के लिए अपंग कर दिया जाता जो अपराध की दुनियाँ मे दुस्साहस
दिखाने वाले इन नव अपराधियों को नियंत्रित करने और चेतावनी देने का पुलिस द्वारा
स्पष्ट संकेत है। अपने वोट बैंक और राजनैतिक हित लाभ के लिए विरोधी दल वेशक योगी
सरकार की निंदा करें, मानवाधिकार के
हिमायती उत्तर प्रदेश पुलिस को कोसें या आलोचना करें या संविधान के पंडित नैतिकता
की दुहाई दें, लेकिन ये स्पष्ट है कि
उत्तर प्रदेश के आम जन, कानून प्रिय
नागरिक, उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा
अपनी आत्मरक्षा मे, इन मुठभेड़ की कार्यवाही
से, न केवल संतुष्ट है अपितु प्रसन्नता से
पुलिस के समर्थन मे खड़े हो रहे है। हों भी
क्यों न जब अपराधियों के पक्ष मे खड़े होने वाले पक्षकार,
अपराधियों के मानवाधिकार की चिंता मे दुबले होकर पुलिस कार्यवाही पर सवाल उठा रहे
हैं, वे क्यों भूल जाते हैं कि हत्या,
बलात्कार और बाल यौन अपराध से पीढ़ित लोगों,
परिवारों के भी तो मानवाधिकार हैं?
जो अपराधी अपने कुकृत्यों का कानून जानते हुए
भी लोगों के विरुद्ध अपराध कर, कानून को ठैँगा
दिखा सकता है तो पुलिस को भी क्यों,
ये अधिकार नहीं होना चाहिये कि कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए अपराधियों को ठैँगा दिखाये और उन्हे पुलिस का सामर्थ्य और अपराधियों को उनकी वास्तविक हैसियत याद दिलाये?
बैंकों के खराब और गैरनिष्पादन कारी ऋण संपदाओं या
खातों की तर्ज़ पर देश के गैर निष्पादनकारी नागरिक के विचार की अवधारणा को यहाँ
प्रतिपादित करने का विचार प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे है।
बैंक
की लगभग 39 साल की सेवा के दौरान बैंक की कार्य प्रणाली मे बड़े भारी बदलाव देखे,
विशेषतः ऋण खातों मे। संक्षेप मे ऋणी द्वारा जिन ऋण खातों मे सालों साल से ब्याज
तो क्या मूलधन की राशि का एक रुपया भी नहीं
जमा किया जाता है, उन पर भी हर माह या तिमाही
मे ब्याज लगाया जाता था और उस ब्याज की राशि को ब्रांच के प्रॉफ़िट मे शामिल कर एक
अवास्तविक लाभ की स्थिति पेश की जाती थी। लेकिन
1992 मे अन्तर्राष्ट्रिय बैंकिंग व्यवस्था के अनुरूप नरसिंहम समिति की सिफ़ारिशों को
लागू किया गया। जिसके अनुसार ऐसे ऋण खाते,
जिनमे 3 मासिक किश्त या कम से कम, ब्याज की
बसूली ऋणी से नहीं होती है, तो ऐसे ऋण खातों
पर ब्याज नहीं लगाया जाता लेकिन इन ब्याज को अलग से लिखा जाता है और ऋणी के
विरुद्ध बसूली हेतु कानूनी कार्यवाही शुरू कर दी जाती है। अनेकों वर्गिकरण के बाद कालांतर
मे जब ऋणी से ऋण की बसूली मे बैंक असमर्थ हो जाता है तो ऐसे ऋण खातों को राइट ऑफ
(समाप्त) कर दिया जाता है। ताकि बैंक की बैलेन्स शीट स्वच्छ और स्वस्थ बनी रहे। क्यो
न बैंक के गैर निष्पादन कारी अकाउंट (NPA)
की तरह देश के ऐसे अपराधी, असामाजिक तत्वों,
गुंडे, बदमाश नागरिकों को "गैर निष्पादन कारी
नागरिक" (एनपीसी) घोषित किया जाना चाहिये जो देश और सभ्य समाज के सामान्य
मानवी के जीवन मे अपने आपराधिक कुकृत्यों से अशांति,
दुःख, पीढ़ा
और क्लेश उत्पन्न करते हों?
देश के हर छोटे बड़े कस्बों और शहरों मे ऐसे
अनेक उदाहरण देखने को मिल जाएंगे जब चोरी,
सेंधमारी, उठाईगिरी मारपीट करने
वाला एक अदना अपराधी पुलिस और कानून को धत्ता बताकर कालांतर मे बड़े बड़े अपराध करने
वाला गुंडा, दादा और अपराधियों का
सरगना बन गया। राजनैतिक संरक्षण के बाद तो ऐसे अपराधी ठेकेदारी,
चौथ बसूली, कट मनी के साथ खनन और
भू माफिया, शराब माफिया के रास्ते पर चल संगठित अपराध तंत्र गठन करने मे
कामयाब हो गए और दुर्भाग्य देखिये कि इन अपराधियों ने राजनैतिक वर्चस्व हांसिल कर
समाज मे एक भय और डर का माहौल उत्पन्न किया। दाऊद इब्राहिम,
अतीक, मुख्तार,
विनय दुबे आदि अनेक नाम गूगल सर्च मे तलाशे जा सकते हैं। बैंक के खराब ऋण खातों को
क्रमशः सब स्टैंडर्ड, डाउट फुल अर्थात
संदिग्ध संपत्तियाँ और लॉस एससेट्स अर्थात
डूबंत खातों मे वर्गीकृत कर तत्पश्चात राइट ऑफ अर्थात समाप्त कर कानूनी कार्यवाही के
लिए, बसूली विभाग के सुपुर्द कर देती है। इसी
तर्ज़ पर क्यों न कस्बे स्तर से शुरू कर शहर और जिला स्तर पर ऐसे अपराधियों की
लिस्ट बनाई जाय और उनके द्वारा किए गए अपराधों को श्रेणियों मे विभक्त कर
अपराधियों का वर्गीकरण हत्या, बलात्कार,
बाल यौन अपराधियों को क्रूरता की निम्नतम
श्रेणी मे रख उनकी समाप्ति को कानूनी अमलीजामा पहनाया जाय एवं उनकी सम्पत्तियों पर
बुलडोजर चलकर नष्ट कर उनकी आर्थिक रीढ़ को तोड़ा जाय। सभी दलों को आपसी विचार विमर्श
कर कोई ऐसा सर्वमान्य हल निकालना चाहिये ताकि अपराध और अपराधियों को नियंत्रित
किया जा सके। क्योंकि ऐसे अपराधी न
केवल मानवता के नाम पर कलंक हैं और पृथ्वी
पर बोझ है अपितु सामाजिक समरसता, शांति और सौहार्द्य के लिए गंभीर खतरा हैं,
जिनकी समाप्ति कानून व्यवस्था को बनाए रखने और कानून के प्रभावशाली
क्रियान्वयन के लिए आवश्यक है। ताकि
शांतिपूर्ण नागरिक अपना जीवन यापन सुख,
शांति और समृद्धि के साथ कर सके।
विजय सहगल


