"पौराणिक-भद्रकाली
मंदिर, कुरुक्षेत्र"
दिनांक
29 नवंबर 2025 को अपनी कुरक्षेत्र तीर्थ यात्रा के बाद हमारा अगला पढ़ाव प्राचीन
इतिहासिक मंदिर माँ भद्राकाली मंदिर के दर्शन करना था। शहर के मुख्य बाजार मे
स्थित मंदिर का प्रांगण काफी विशाल और सुंदर था। कुरुक्षेत्र मे चल रहे
अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव की भीड़ भाड़ के बावजूद मंदिर के मैदान मे वाहन आदि रखने की समुचित और अच्छी व्यवस्था थी।
स्वर्णिम रंग से रंगे मंदिर भवन का शिखर दूर से ही सूर्य की स्वर्णिम किरणों से चमक रहा था। मंदिर
की छत्त के सामने की पट्टी पर घोड़ों की मूर्तियाँ सुंदर दिखलाई दे रही थी। पूरा
मंदिर परिसर रंग-बिरंगी पताकाओं, फूल और पट्टियों से से सजाया गया था। मंदिर के गोपुरम पर भगवा ध्वज फहरा कर सनातन की
यश और कीर्ति को चारों दिशाओं मे लहरा रहा था।
मुख्य मंदिर तक पहुँचने, प्रसाद लेने, पानी पीने और टॉइलेट के साथ जूते
चप्पल आदि रखने और साफ सफाई की समुचित व्यवस्था थी। मंदिर के मुख्य द्वार मे
प्रवेश करते ही सामने माँ भद्राकाली के देवी कूप के भव्य दर्शन हुए। कुएं की मुडेर पर शेर पर सवार मे
दुर्गा की भव्य और दिव्य प्रतिमा के दर्शन
हुए। प्रतिमा के पीछे बने कूप के उपर कमल पुष्प बना हुआ था। मंदिर की वृत्ताकार
मुडेर पर सफ़ेद संगमरमर के चार-चार सुंदर घोड़े रक्खे हुए थे। कुरुक्षेत्र स्थित भद्राकाली मंदिर एक पौराणिक
और इतिहासिक महत्व का है। ऐसी मान्यता है कि पुराणों उल्लेखित 51 शक्तिपीठों मे से
एक इस स्थान पर देवी सती का दाहिने पैर का
टखना गिरा था, इससे यहाँ
एक कूप बना जिसके दर्शन का सौभाग्य आज
मंदिर कूप को देख कर प्राप्त हुए। इस कूप का वर्णन ब्रह्म पुराण और वामन पुराण मे
भी मिलता है। इसलिए इसे श्री देवीकूप और श्री सावित्री पीठ के नाम से भी जानते हैं। श्रद्धालुओं
की एक छोटी सी लाइन के बाद मुझे मंदिर के गर्भ गृह मे विराजित माँ काली की शांत, सौम्य और भद्राकाली स्वरूप के
दर्शन हुए। लाल चुनरी ओढ़े, चाँदी के सुंदर छत्र के
नीचे चाँदी का मुकुट धारण किये, माँ भद्रकाली की प्रतिमा आकर्षक
आभूषणों से सुसज्जित थी जिनके एक हाथ मे असुरों का नाश करने का प्रतीक खड़ग थी। चाँदी
के सिंहासन की पृष्ठभूमि पर बारीक वेलबूटे और दोनों ओर हंस की जोड़ी को सुंदर ढंग से उकेरा गया था। सिंहासन
पर भगवान शिव लिंग और भगवान गणेश की प्रीतिमाएं भी दिव्य ज्योति के पास मे ही
विराजित थी।
महाभारत
युद्ध के पूर्व भगवान श्रीकृष्ण के आग्रह और प्रेरणा से अर्जुन ने महाभारत युद्ध
मे विजय आशीर्वाद प्राप्त करने हेतु माँ भद्रकाली मंदिर मे पूजा अर्चना की थी और
विजय के पश्चात अपने घोड़े माँ भद्राकाली को अर्पित करने का बचन दिया था। महाभारत
युद्ध विजयी के बाद अर्जुन ने माँ के चरणों मे अपने घोड़ो का दान किया था। तभी से इस
मंदिर मे भी ऐसी मान्यता है कि जिन भक्तों और श्रद्धालुओं की मनोकामनाएँ पूर्ण हो
जाती है वे मंदिर मे माँ भद्रकाली मंदिर मे अपनी श्रद्धा और क्षमता अनुसार मिट्टी, चीनी
मिट्टी, चाँदी और सोने के घोड़ो के स्वरूप को मंदिर मे अर्पित करते हैं। मंदिर मे देवी
माँ के कूप के चारों ओर बनी वृत्ताकार दीवार पर श्रद्धालुओं द्वारा अर्पित इन घोड़ो
की प्रतिमाओं को देखा जा सकता है। मंदिर के एक कक्ष मे भगवान श्रीकृष्ण-राधा, भगवान ब्रह्मा और भगवान श्रीराम-सीता की भव्य मूर्तियाँ भी रक्खी हुई थी।
मंदिर मे ही एक कक्ष मे पौराणिक मान्यता
हैं कि भगवान श्रीकृष्ण और उनके अग्रज बलराम जी का भी मुंडन संस्कार यहाँ हुआ था।
मंदिर
परिसर मे ही एक अति प्राचीन वट वृक्ष के
दर्शन भी कृतार्थ करने वाले थे। ऐसी मान्यता है कि उक्त वृक्ष मे महाभारत कालीन
दिव्य वृक्ष है। दिव्य कूप के जल का आचमन और माँ भद्राकाली के प्रसाद का पान कर जब
हम मंदिर मंडप से बाहर आए। ठीक सामने ही
शनि मंदिर मे भगवान शनि देव के दर्शन कर आगे की यात्रा के लिए श्रीमद्भगवत गीता की
जन्मस्थली ज्योतिसर के दर्शनार्थ आगे बढ़ गए।
विजय
सहगल






