शनिवार, 31 जनवरी 2026

ज्योतिसर तीर्थ-कुरुक्षेत्र-श्रीमद्भगवत गीता की जन्मभूमि

 

"ज्योतिसर तीर्थ-कुरुक्षेत्र-श्रीमद्भगवत गीता की जन्मभूमि"










29 नवंबर 2025 को मुझे गुरुग्राम से  हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले के पवित्र "ज्योतिसर तीर्थ" जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ जो सनातन हिन्दू धर्म की सबसे पवित्र, प्राचीन और पठनीय  पुस्तक श्रीमद्भगवत गीता की जन्मभूमि होने का सौभाग्य प्राप्त है। 196 किमी का जीटी रोड का रास्ता बहुत ही शानदार और सुगम था। ऐसी मान्यता हैं कि इसी स्थान पर भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध के दौरान शोक और विषाद से ग्रसित अपने प्रिय शिष्य  अर्जुन को उपदेश देते हुए  

तस्मादज्ञानसंभूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनाऽऽत्मनः।
छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत।।4.42।।   अर्थात इसलिए हे भरत वंशी अर्जुन! हृदय में स्थित इस अज्ञान से उत्पन्न अपने संशय का ज्ञानरूप तलवार से छेदन करके योग में स्थित हो जा और युद्ध के लिये खड़ा हो जा।

का उपदेश देकर धर्म युक्त युद्ध के लिये प्रेरित किया। श्रीमद्भगवत गीता के 18 अध्याय मे वर्णित  700 श्लोकों से,  अर्जुन के माध्यम से विश्व और मानवता को कर्म योग का  संदेश दिया।   

4/42 श्रीमद्भगवत गीता को राज्याश्रय के बिना (राज्याश्रय के बिना से तात्पर्य जैसे अन्य धर्मों की पवित्र पुस्तकें अपकों निःशुल्क मिल जाएंगी किन्तु श्रीमद्भगवत गीता और सनातन धर्म  की अन्य पुस्तकों के लिए आपको उनकी कीमत का भुगतान करना पड़ेगा) दुनियाँ की सबसे अधिक अनूदित, अनुवादित और भाषांतरित पुस्तक का दर्जा प्राप्त है। कुछ स्रोतों के अनुसार 300 से अधिक भाषाओं मे इस पुस्तक का अनुवाद हुआ है। अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभवनामृत संघ (ISCON- International Society for Krishna Consciousness) द्वारा स्वयं 80 से अधिक भाषाओं मे श्रीमद्भगवत गीता का अनुवाद प्रकाशित किया गया है। श्रीमद्भगवत गीता का अध्यन लगभग 186 देशों मे किया जा रहा है, इसके अलावा दुनियाँ के अनेकों विश्व विध्यालय और कॉलेजों मे दर्शन, धर्म और साहित्य विभागों मे गीता का अध्ययन और पठन पाठन शामिल है इसके अतिरिक्त श्रीमद्भगवत गीता पर हजारों शोध पत्र प्रकाशित हो चुके है।

मुरुथल मे अमरीक सुखदेव के आलू पराठे और दही का नाश्ता करने के बाद हम लोग जीटी रोड पर कुरुक्षेत्र की ओर बढ़े। बैसे तो इस ज्योतिसर की इस धरा को  पवित्र ग्रंथ श्रीमद्भगवत गीता  के जननी होने के कारण करोड़ो भक्तों की श्रद्धा और सम्मान के कारण तीर्थ का दर्जा प्राप्त है परंतु स्वयं श्रीमद्भगवत गीता  का नित्य पाठक होने के कारण मुझे इस स्थान के दर्शन, आराधना, उपासना और पूजा का परम सौभाग्य मानता हूँ। कुरुक्षेत्र से लगभग 12-15 किमी दूर पहोवा मार्ग पर स्थित इस छोटे लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण ज्योतिसर तीर्थ का मार्ग अच्छी तरह से जुड़ा है।

ज्योतिसर मंदिर के प्रांगण के  संगमरमर के भव्य प्रवेश द्वार मे प्रवेश करते ही सबसे पहले दर्शन होते है उस प्राचीन वट वृक्ष के जो गवाह है भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन के बीच हुए मे  संवाद का जिसे आज हम श्रीमद्भगवत गीता के रूप मे जानते हैं। इस तरह के इस स्थान पर बरगद के  5-6 वृक्ष है जिनकी हवाई जड़े वृक्ष के चारों ओर जमीन के नीचे गहरे तक जमी हैं। प्रशासन ने इन वट वृक्षों और उनकी हवाई जड़ों को बड़ी अच्छी तरह सहेज कर एक चबूतरे का रूप दिया हैं। साफ सुथरे चबूतरे पर ज्योतिसर मे आने वाले श्रद्धालुओ को इन चबूतरों पर बैठे देखा जा सकता हैं जो श्रीमद्भगवत गीता का स्वाध्याय करते हुए अपने को भगवान श्री कृष्ण के साथ एकाकार का प्रयास करते हुए देखा जा सकता है। पूरे क्षेत्र मे साफ सफाई की बहुत अच्छी व्यवस्था थी। ऐसी मान्यता है कि आदि शंकराचार्य ने ईसा पूर्व नौवीं शताब्दी मे अपनी हिमालय यात्रा के दौरान इस परम पवित्र स्थान की पहचान की थी। सन् 1850 ई॰ इस स्थान पर कश्मीर के राजा ने एक शिव मंदिर का निर्माण कराया था। 1924 मे दरभंगा के महाराज ने इस पवित्र वट वृक्ष के चारों ओर संरक्षित कर एक चबूतरा बनवाया था। कालांतर मे कांची कमकोटि के शंकराचार्य ने 1967 मे संगमरमर के चबूतरे पर पूर्व मुखी मार्बल के पत्थर से निर्मित एक खूबसूरत रथ स्थापित किया जिसमे भगवान श्री कृष्ण, हाथ जोड़े अर्जुन को श्रीमद्भगवत गीता का उपदेश देते हुए दिखाई देते हैं। इस पूरे प्रांगण मे किसी स्कूल से आए बच्चों का समूह और उनके अध्यापक भजन करते दिखलाई दिये। कुछ लोग श्रीमद्भगवत गीता के श्लोकों का उच्चारण करते दिखलाई दिये। भगवत गीता का विध्यार्थी होने के कारण मैंने मे अपने मोबाइल मे संरक्षित गीता के मुख्य श्लोकों का सस्वर वाचन किया तत्पश्चात महर्षि वेदब्यास द्वारा पद्म पुराण मे वर्णित गीता महात्मय का पाठ किया जो मुझे कंठस्थ है और जिसका उच्चारण मुझे अतिसय प्रिय है।

ज्योतिसर मंदिर के पूरे क्षेत्र मे एक दिव्य और अलौकिक वातावरण को महसूस किया जा सकता है। कुछ आगे बढ़ने पर स्वर्णिम आभा से आलोकित एक विशाल लगभग 40 फुट ऊंची अष्टधातु की प्रतिमा दिखलाई दी। श्रीमद्भगवत गीता के अध्याय 11 मे वर्णित विराट  विश्वरूप दर्शन योग के दिव्य दर्शन इस प्रतिमा मे होते हैं। इस प्रतिमा मे भगवान के नौ रूपों के दर्शन होते है जो शेष नाग के छत्र के नीचे हैं। इन नौ रूपों मे विष्णु, शिव, गणेश, नरसिंह अवतार, परशुराम, हनुमान, सुग्रीव, अग्निदेव और स्वयं भगवान श्री कृष्ण शामिल हैं। इस मूर्ति के निर्माता मूर्तिकार राम वन जी सुतार हैं जिन्होने स्टैच्यू ऑफ यूनिटी सहित अनेक मूर्तियों का निर्माण किया। शाम के समय हरियाणा पर्यटन विभाग इस स्थान पर लेजर लाइट एंड  साउंड शो का आयोजन हिन्दी और अँग्रेजी भाषा मे किया जाता है। प्रवेश द्वार के बाएँ ओर एक सरोवर हैं निश्चित ही मुख्य पर्वों और त्योहारों पर यहाँ स्नान पर बड़ी भीड़ रहती होगी। सरोवर के परे शायद औडीटोरियम और संग्रहालय का कार्य प्रगति पर था। एक सीमित दायरे मे वसे इस क्षेत्र मे फैली दिव्यता को अनुभव किया जा सकता है। मंदिर परिसर मे अन्य देवी देवताओं के भी मंदिर बने हुए है। मंदिर से बापसी पर परिसर के बाहर भी छोटे छोटे गुमटी और ठेलों पर खान पान सहित विभिन्न वस्तुओं की विक्रय हो रहा था। उन्ही मे से एक पर चाय पान कर हम लोग बापस कुरुक्षेत्र होते हुए अपने गंतव्य के लिए प्रस्थान किया।  

बैसे तो श्रीमद्भगवत गीता अपने अताह समुद्र से परिपूर्ण ज्ञान और आलोक का भंडार है और जिसे किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं। भगवत गीता के  नित्य पठन पाठन से इह लोक और परलोक सुधरता  है ऐसा हम अपने पूर्वजों से सुनते आए हैं लेकिन श्रीमद्भगवत गीता मे तो स्वयं भगवान श्री कृष्ण अपने श्रीमुख से कहते है कि भगवत गीता शास्त्र के संदेश को  प्रचार प्रसार करने वाले मनुष्य को अपना सर्वाधिक प्रिय बताते हैं-

न च तस्मान्मनुष्येषु कश्िचन्मे प्रियकृत्तमः।
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि।।18.69।।  अर्थात उसके समान मेरा अत्यन्त प्रिय कार्य करनेवाला मनुष्योंमें कोई भी नहीं है और इस भूमण्डलपर उसके समान मेरा दूसरा कोई प्रियतर होगा भी नहीं।

बैसे तो श्रीमद्भगवत गीता के श्लोक और उनकी शिक्षाएं देश, काल, पात्र भाषा, धर्म और संप्रदाय के परे हर मनुष्य के जीवन मे उतनी ही प्रासंगिक है जैसे आज से लगभग पाँच हजार वर्ष पूर्व भगवान कृष्ण द्वारा अर्जुन को उपदेश के समय थी। लेकिन अपने सुधि पाठकों से भी आग्रह करते हैं कि अपने घरों मे श्रीमद्भगवत गीता की स्थापना कर नित्य पठन पाठन करें।

विजय सहगल