"बिच्छू
का मंत्र न जाने साँप के बिल मे हाथ डाले"!!
28 जुलाई 2024 की बात है। दाना पानी संस्था
के प्रमुख आदरणीय राज चड्ढा जी ने ग्वालियर स्थित शारदा बाल ग्राम मे एक वृहद
वृक्षा रोपण का कार्यक्रम रक्खा था। यहाँ मै संक्षिप्त मे वृक्षा रोपण की चर्चा कर
इस ब्लॉग के मूल शीर्ष बिच्छू का मंत्र न
जाने........ पर ज्यादा ज़ोर दूंगा। राज
चड्ढा जी ने दो-तीन दिन पहले से शारदा बाल ग्राम की पहाड़ी पर अपने प्रयास और
प्रभाव से लगभग 500 गड्ढे कराये थे। पेड़ो और पौधों की व्यवस्था भी रोपने के एक दिन
पहले भली भांति कर ली गयी। तय वक्त और दिन पर आश्रम के प्रमुख स्वामी श्री
ब्रह्मयोगानन्द जी अगुआई मे आश्रम के प्रबन्धक संजय करकरे एवं आश्रम मे रहने वाले
बच्चे-बच्चियों के अलावा बड़ी संख्या मे दाना-पानी संस्था के सदस्य उनके परिवार और
बच्चों की शारदा बाल ग्राम मे उपस्थिति ने वृक्षा रोपण कार्यक्रम को अति भव्य और
महत्वपूर्ण बना दिया था। हर कार्यक्रम मे अपनी सक्रिय भागीदारी दर्ज़ कराने वाली श्रीमती
नीति चड्ढा भी उस कार्यक्रम मे उपस्थित थी,
दुर्भाग्य से वे आज हमारे बीच नहीं हैं,
हम उन्हे सादर नमन करते हैं। सभी लोगो मे बड़ा उत्साह था। छोटे छोटे बच्चों बड़े
बुजुर्गों और नौजवान किशोरों ने वृक्षारोपण कार्यक्रम का लगभग 500 पेड़ो को रोप कर
और उनमे तुरंत ही दूर दराज से पानी लाकर,
पेड़ों डाल कर अत्यंत सफल बनाया। कार्यक्रम
के बाद आश्रम के बच्चों सहित सभी उपस्थित समूह के लिए स्वल्पाहार की व्यवस्था थी
जिसकी ज़िम्मेदारी मेरे ऊपर थी।
शारदा बाल ग्राम की एक-डेढ़ किमी॰ क्षेत्र मे
फैली पहाड़ी पर लगभग दो घंटे के इस
श्रमसाध्य वृक्षा रोपण के बाद, सभी लोगो को
शारदा बालग्राम मे स्थित शिकागो भवन के मुख्य द्वार पर एकत्रित होना था जहाँ छोटे-बड़े
लगभग डेढ़ सौ लोगो के स्वल्पाहार के लिए समोसे और फल की व्यवस्था की गई थी। शिकागो
भवन जो एक छोटी ऊंची पहाड़ी के मध्य मे बना है और उसके दोनों ओर आने जाने के दो
रास्ते अलग अलग बने है। आश्रम का मुख्य दरवाजा शिकागो भवन से लगभग
आधा-पौना किमी॰ अंदर था, मैंने ये सोच कर
कि बालग्राम मे पौधों, पानी,
स्वल्पाहार आदि कार्यों को सुचारु रूप और त्वरित गति से संपादित करने हेतु अपनी
टाटा-नेक्सोन कार की सेवाएँ लेना उचित समझा जिसे कुछ माह पूर्व ही मैंने क्रय किया
था। मै टाटा की इस कार को चलाने मे अभी इतना निष्णात,
निपुण दक्ष नहीं था। यध्यपि, मेरा इस दौरान
दो-तीन बार कार से शिकागो भवन के एक रास्ते से प्रवेश कर दूसरे रास्ते की ढलान पर
कार के हैंड ब्रेक अच्छी तरह लगा कर,
एक तरफ रोक कर खड़ा करना हुआ था। कहीं किसी तरह की कोई परेशानी नहीं थी। इसी क्रम
मे इस बार भी किसी कार्यवश फिर से कार से आना हुआ और जल्दीबाजी या यूं कहें नासमझी
मे मैंने इस बार भी कार को एक तरफ से चढ़ा कर दूसरी तरफ की ढलान पर खड़ा कर दिया और
हैंड ब्रेक लगाना भूल गया। जैसे ही मै कार से नीचे उतर कर कार्यक्रम स्थल की ओर कुछ कदम बढ़ा पाता,
वही कार्यक्रम स्थल पर खड़ी मेरी श्रीमती जी ने कहा कार आगे बढ़ रही है,
क्या ब्रेक नहीं लगाया? जब तक मै पीछे
मूढ़ कर, कार को रोकने के लिए
दौड़ता कार धीरे-धीरे ढलान की ओर बढ़ गयी। गनीमत थी कि रास्ते मे कहीं कोई बच्चा या बड़ा
नहीं आया और साथ ही रास्ते के एक दूसरे
किनारे पर नाली बनाने के कारण मिट्टी का ऊंचा ढेर था जिस पर कार आगे बढ़ी। मै तो ये
सोच कर सिहर उठा कि अब कार मिट्टी के ढेर को लांघ कर नाली के गड्ढे मे गिरी!! नई
कार को इस तरह अपनी आँखों के सामने गड्ढे की ओर बढ़ते,
गिरने की सोच कर ही मेरे रोंगटे खड़े हो गए। लेकिन ये क्या!! कार मिट्टी के ढेर पर
तो चढ़ी और उसके दोनों अगले पहिये हवा मे
लटक कर झूलने लगे और कार के नीचे की तली मिट्टी के ढेर से रगड़ कर रुक गयी। अगर कुछ
कदम कार और बढ़ती तो निश्चित ही आगे गड्ढे मे गिर जाती!! ईश्वर का लाख लाख शुक्र था
कि घटना स्थल के पास इतने बच्चों-बड़ों की भीड़ के बावजूद कोई बड़ी अनहोनी,
दुर्घटना होने से बच गई और कार को भी कुछ नुकसान नहीं हुआ।
जो जैसा हुआ वो यहाँ तक तो फिर भी ठीक रहा,
लेकिन इसके बाद जो हुआ वो इस ब्लॉग के हेडिंग या शीर्षक को चरितार्थ करने वाला भयावह
अनुभव था, जिसको याद कर भय से
पूरे शरीर मे सिहरन पैदा हो जाती है। हुआ यूं कि कार के अगले पहिये अब भी हवा मे
झूलते हुए लटकी थी। मै तो हक्का-बक्का हो किंकर्तव्य विमूढ़ता को प्राप्त, अपनी सुधि-बुध खो बैठा। दुर्घटना स्थल को देख
मेरे हाथ-पैर फूल गए कुछ सूझ नहीं रहा था कि क्या करूँ?
अचानक वहाँ भीड़ मे उपस्थित एक सज्जन अति उत्साह से आए बोले मैंने बड़े बड़े
मंत्रियों की कार चलाई हैं, लाओ मै गाड़ी को
बैक कर निकलता हूँ। मै उन सज्जन को नहीं जानता था इस लिए संकट की इस घड़ी मे उनको,
अपनी कार की चाबी दे दी। उन्होने अति उत्साह से कार का दरबाजा खोल,
ड्राईवर सीट पर बैठ कर कार स्टार्ट की। अब तक मै संयत हो चुका था मैंने उन सज्जन
को सौजन्यता वश धन्यवाद देते हुए कहा,
"कि आप बैक गियर मे गाड़ी चलाये हम एक
दो लोग बोनट पर आगे से कार को पीछे की तरफ धकेलते है। जैसे ही अगले पहियों को जमीन
की थोड़ी सी पकड़ भी मिलेगी तो कार पीछे हो जाएगी और धीरे से कार को मिट्टी के
ढेर से उतार लेगी।
हम एक दो लोग कार के आगे खड़े हो बोनट से
पीछे की ओर धकेलने लगे लेकिन जब कार के
पहियों को पीछे घूमते न देख,
आगे की ओर घूमते देखा तो मुझे समझते देर न लगी कि कार मे बैठे सज्जन को नेक्सोन
कार चलाने का अनुभव नहीं, क्योंकि नेकसोन
कार का पिछला गेयर और छठा गैयर दाहिने साइड मे पीछे एक ही दिशा मे लगते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि बैक गेयर लगाते समय गेयर
बॉक्स के, एक लीवर को साथ साथ
ऊंचा उठाना पड़ता है। गनीमत ये रही कार के स्वतः आगे बढ्ने पर तो कोई बड़ी दुर्घटना
नहीं हुई पर उन नासमझ सज्जन ने बैक गेयर
के बजाय गाड़ी को छठे गैयर मे आगे गेयर को लगा दिया था,
जिसेस कार आगे बढ़ जाती!! पर कार के पहिये आगे घूमने के बावजूद आगे नहीं बढे क्योंकि उसके दोनों अगले पहिये हवा मे झूल रहे थे।
इस तरह,
होने वाली संभावित दुर्घटना केवल इस लिए नहीं घटी क्योंकि कार के पहिये हवा मे झूल
रहे थे। यदि उन सज्जन के छटे गेयर मे गाड़ी चलाने मे पहियों को कुछ जमीन का आधार
मिल जाता तो गाड़ी आगे तेजी से बढ़ती और मेरे सहित अन्य लोग जो कार के आगे खड़े होकर,
पीछे धकेलने का प्रयास कर रहे थे, रौंदते हुए
निश्चित ही कार गड्ढे मे गिर जाती और एक और बड़ी अनहोनी दुर्घटना हो सकती थी?
पर कहते हैं न
जाको राखे साइयां मार सके न कोय!!
ईश्वर का निश्चित ही मेरे ऊपर अपार स्नेह और
आशीर्वाद था, मित्रो की शुभकामनायें
थी कि पहली दुर्घटना मे जहां कार गड्ढे मे गिरने से बची वहीं दूसरी दुर्घटना मे
यदि कार आगे बढ़ जाती तो पहली घटना से बड़ी दुर्घटना हो सकती थी जिसमे आगे खड़े लोगो
की जान को खतरा हो सकता था। फिर मैंने
शांत और संयत होकर स्वयं ही गाड़ी को पीछे किया। अनहोनी टल चुकी थी। ईश्वर को पुनः
एक बार आभार ज्ञापित कर हम बच्चों की खुशियों मे शामिल होकर उनके सांझीदार बने। कहने
का तात्पर्य यह है अतिउत्साह और जोश मे ऐसे किसी कम को न करें जिसकी जानकारी आप हो
ही नहीं अर्थात बिच्छू का मंत्र न जाने और साँप की बाँबी मे हाथ डालें!!
विजय सहगल






