"पुणे,
महाराष्ट्र मे गणपति उत्सव की धूम"
इन दिनों पूरे देश मे गणपति उत्सव अपनी चरम
सीमा पर हैं। महाराष्ट्र के पुणे शहर तो
गणपति उत्सव के रंग मे पूरी तरह डूबा हैं। श्री गणपति उत्सव मे पुराने पुणे
मे जगह जगह जहां श्री विघ्न्हर्ता गणेश की एक से बढ़ कर एक झाँकियाँ तो दिखाई देती
है जिनके दर्शन के लिए लाखों भक्त दर्शन
की अभिलाषा लिए अपनी बारी की प्रतीक्षा करते दिखाई दिये। स्वाभाविक रूप से इसके
पश्चात पेट पूजा के लिए विभिन्न व्यंजनों की भी दुकाने देर रात तक अपने स्वाद और
की छंटा चारों ओर विखेरती दिखाई देती हैं। कहीं रस्सी पर झूलते करतब दिखाने वाले
कलाकार एक मेले के स्वरूप का दर्शन करा रहे थे।
पूना के दस प्रसिद्ध गणपति पंडालों मे से
शुरुआत शनिवार वाड़ा के कसबा गणपति,
जिन्हे पूना शहर के सबसे पुराने और पहले स्थान पर रक्खा जाता है से हुई। पंडाल के प्रवेश द्वार पर विभिन्न ताजी
हरी वेलों और सफ़ेद फूलों से द्वार को
सजाया गया था। दूर तक दर्शनार्थियों की लंबी लाइने दिखलाई दे रही थी जो लोगों के
भगवान श्री गणाध्यक्ष के प्रति गहरी आस्था,
सम्मान और समर्पण के भावों को दर्शा रही थी। बड़े बड़े झूमरों से पंडाल को आकर्षित
ढंग से सजाया गया था। चाँदी के सिंहासन पर विराजे सुंदर और भव्य श्री गणेश की
प्रतिमा को लोग पूरे मनोयोग से भक्तिभाव से ओत प्रोत हो गणपति बाप्पा मोरया के जयकारे लगा रहे थे। पास मे ही एक अन्य पंडाल को भगवा रंग की
बेलबूटे से दक्षिण भारतीय पाषाण स्तंभों की नक्काशी से सजाया गया था। केले के
पेड़ों को प्रवेश द्वार के दोनों ओर रखने से पंडाल की सुंदरता और निखर आयी थी। कमल
के आकार की पंखुड़ियों पर विद्धुत प्रकाश से सजाकर श्री जी की प्रतिमा के चारों ओर
एक सुंदर आभा मण्डल, एक आलौकिक दृश्य
उत्पन्न कर रहा था। इस पंडाल के प्रबंधन ने पेन,
पेंसिल और कॉपी को चढ़ावे के रूप मे प्रोत्साहित करने का संदेश दिया था इसलिए लोग
इन वस्तुओं को ही चढ़ा रहे थे जिसे बाद मे वंचित और असहाय बच्चों मे वितरित कर दिया
जाएगा। ये एक अनूठी पहल थी जिसकी प्रशंसा की जानी चाहिए। एक अन्य पंडाल की झांकी
मे आकर्षक श्वेतांबर रंग मे रंगी भव्य
गणेश प्रतिमा सजाई गयी थी जिसके आगे क्षीरसागर मे शेषनाग की कुंडलियों पर
योगनिद्रा मे विश्राम करते भगवान विष्णु को दर्शाया गया था जिन की नाभि से कमल और
उस पर विराजमान ब्रह्मा जी तथा देवी
लक्ष्मी को एक बड़े और ऊंचे मंच पर सुदर
ढंग से प्रस्तुत किया गया था।
अब बारी थी पूना के एक और प्रसिद्ध गणेश
पंडाल दगड़ू सेठ हलवाई के गणपति की। दगड़ू सेठ हलवाई मंदिर को हरे मोरपंख को दर्शाती
लाइट एवं नीली और लाल रंग की पृष्ठभूमि को आकर्षक विद्धुत प्रकाश से सजाया गया था। नजदीक
ही वृन्दावन के सफ़ेद संगमरमर से बने प्रेम
मंदिर की थीम पर पंडाल को बनाया और सजाया गया था। प्रवेश द्वार के उपर सफ़ेद रंग के
गाय और उसके दूध पीते बछड़े को दर्शाया गया था जो हमारी भारतीय परंपरा के एक आवश्यक
हिस्सा हैं। दगड़ू सेठ हलवाई के पंडाल मे विराजे चतुर्भुज श्री गणेश स्वर्ण
आभामण्डल से सुशोभित थे। एक हाथ मे स्वर्ण त्रिशूल और दूसरे मे स्वर्ण फरसा (परशु)
तीसरा हाथ ध्यान मुद्रा और चौथे मे स्वर्ण
लड्डू था। गले मे अनेक स्वर्ण हार और मालाएँ,
कानों मे स्वर्ण कुंडल,
सिर पर स्वर्ण मुकुट और सूड़ पर हीरे और स्वर्ण से बने आभूषण से सुशोभित थे। ऐसा
भव्य और दिव्य अलौकिक दुर्लभ दर्शन अत्यंत भावुक कर देने वाले थे। इस झांकी के
पीछे ही दगड़ू सेठ की धर्मपत्नी श्रीमती लक्ष्मीबाई दगड़ू सेठ द्वारा निर्मित चाँदी
के दरवाजों और स्तंभों पर चाँदी के पत्रों से सुसज्जित एक छोटा लेकिन अत्यंत
आकर्षक श्री दत्त भगवान मंदिर के दर्शन भी महत्वपूर्ण और कृतार्थ करने वाले थे।
जगह जगह रंग मंच पर छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन से जुड़े प्रसंगों पर आधारित
नाटकों एवं मराठी लोक नृत्यों को अभिनीत किया जा रहा था। निकट ही दिल्ली के इंडिया
गेट की तर्ज पर बनी एक झांकी को हू-ब-हू
इंडिया गेट की छवि का मूर्त रूप दिया गया
था राष्ट्रियता और देश प्रेम को दिखलाती इस झांकी मे इंडिया गेट के मध्य मे बिराजे
गजानन की भव्य प्रतिमा एवं दोनों ओर भारतीय सैनिकों की प्रतिमाओं ने "भारत
माता की जय!!" के नारे को राष्ट्र भक्ति से ओत प्रोत माहौल बना दिया था। अब
तक कानों मे श्री गणपति की आरती के स्वर "सुखकर्ता दुखहर्ता वार्ता विघ्नाची, नूर्वी पूर्वी प्रेम कृपा जयाची........
जय देव!, जय देव!! जय मंगल
मूर्ति............ भी कई जगह सुनाई देने लगे थे जो कि भगवान गौरीसुत की आरती का
आगाज था।
एक दूसरे पंडाल को पीले लाल रंग एवं सुंदर
फूलों की माला से वंदनवार लगा कर पुरी मे भगवान जगन्नाथ के रथ का आकार दिया गया था,
जिसमे विराजे श्री विनायक के दर्शन हेतु लोग पंक्तिवध होकर श्री लंबोदर के
दर्शनार्थ रथ पर चढ़ रहे थे। चारों तरफ गजानन भगवान के जयकारों की गूंज या एकदंत
भगवान के भजनों की गूंज सुनाई दे रही थी। अष्टलक्ष्मी महल नामक पंडाल मारुति मण्डल
द्वारा सजाया गया था जो काफी कुछ कसबा गणेश पंडाल की तर्ज पर लाइट के झूमरों से
सुसज्जित था। श्री तांबडी जोगेश्वरी गणेशोत्सव मण्डल की थीम शनिवार वाड़ा के मुख्य
प्रवेश द्वार की तर्ज पर थी। इसी तरह गुरुजी तालीम मण्डल द्वारा जगन्नाथ पुरी के
मंदिर और उसके शिखर पर लगे अष्टधातू के गोल
नीलचक्र की तरह बनाया गया था। मंडप
मे श्री सिद्धविनायक की एक विशाल काय
प्रतिमा सिंहासन आरूढ़ थी। विजय क्रिकेट क्लब द्वारा विराजित वक्रतुंड की पीछे
पंढरपुर स्थित बिट्ठल भगवान की प्रतिमा थी। पास मे ही भगवान प्रथमेश्वर की खड़ी
प्रतिमा थी जो एक पैर पर खड़े थे। इस तरह
लगभग सौ से अधिक छोटे बड़े पंडालों मे देवाधिदेव भगवान श्री गणेश को सिर नवा कर हमारी
यात्रा का समापन भोपला घारगे बंधुओं द्वारा संचालित पुरणपोंली घर पर हुई जहां पर
विभिन्न मधुर स्वादों वाली दाल पुरणपोंली और मावा पुरणपोंली के साथ मावा मोदक का
सेवन किया जिन पर शुद्ध घी डाल कर परोसा गया था। यध्यपि पेट पुरणपोंली और मोदक
से पूरी तरह भर गया था लेकिन नीरा बिक्री
केंद्र पर अमुरुद के स्वाद वाला सोडा शर्बत और कुछ आगे ही ताजे जामुन के पल्प से
बने अनूठे स्वाद वाले पेय को पीने से अपने आप को नहीं रोक पाया। यहाँ यह लिखना अतिसन्योक्ति
न होगी कि महाराष्ट्र पुलिस की, कानून व्यवस्था को
लागू करने एवं सुचारु ढंग से शांति बनाये रखने
मे अहम भूमिका थी। इस तरह पूना के श्री
गणपति उत्सव के नयनभिराम दर्शन पूजा और स्वादपूर्ण पेट पूजा के साथ इस यात्रा को
विराम दिया।
विजय सहगल















