(कारगिल
के वीरों को समर्पित)
कैसे
तुम्हें भुलाये हम?
वादा
हमसे आने का था,
कैसे
तुम्हें भुलाये हम?
बाट
जोहती माँ द्वारे पर,
उसको
क्या बतलाये हम?
जिस
माता की रक्षा करने,
माँ
ने तिलक लगाया था।
शिखर
कारगिल विजयी पताका,
फहरा, कदम बढ़ाया
था॥
छल से
अरि ने घात पीठ पर,
वार
अस्त्र का गोला था।
घोर
नीचता, कायरता थी,
अखिल
विश्व ये बोला था॥
नयन
नीर जिन आँखों सूखे,
दिवास्वपन
झुठलाये भ्रम?
वादा
हमसे आने का था,
कैसे
तुम्हें भुलाये हम?
हिम
शिखरों की चोटी से,
जब दुश्मन
ने हमला बोला।
अटल
इरादों, ऊंचे हौसलों,
रौंदे
शत्रु औ झांकड़ झोला॥
याद
दिलाया दूध छटी का,
कुटिल
चाल गीदड़ की तोड़ी।
पाक
फौज को बना अपाहिज,
लूला, लंगड़ा, अंधा कोढ़ी॥
नस्ले
उनकी याद करेंगी,
साहस, शौर्य, भारत हरदम।
वादा
हमसे आने का था,
कैसे
तुम्हें भुलाये हम?
सच का
घात सह लिया हमने,
पर, शिशु-कुमार
को क्या बतलायेँ।
वादा
जाकर आने का था,
कल पर
कितने कल टलवायेँ?
मिथ्या
दरों-दीवार समझते,
सच मासूम
बतायें कौन?
समझदार
हम, भी न समझे,
बयां
कर रहा उसका मौन॥
दूर
सितारों पर होकर भी,
रौशन
राह दिखा, बच "तम"।
वादा
हमसे आने का था,
कैसे
तुम्हें भुलाये हम?
युद्ध
कारगिल "घोष" सही था।
"गीता"
कृष्ण, संदेश यही था॥
या तो
युद्ध मे हो बलिदान,
स्वर्गारोहण
गमन करेंगे।
अथवा
विजयी श्री वरण कर,
धरा
लोक सुख भोग करेंगे॥
विजय
सहगल




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