"बड़े भाई
साहब"
कृपया
शीर्षक पढ़ कर आप मुंशी प्रेमचंद की कहानी के पात्र "बड़े भाई साहब" के
बारे मे भ्रमित न हों। मात्र "शीर्षक" मे ही समानता है, कथानक एकदम
अलग है। "बड़े भाई साहब" कहानी
के पात्र का आचरण हमारे बड़े भाई साहब से एक दम विपरीत एक आज्ञाकारी पुत्र और बुद्धिमान
विध्यार्थी का था। हमारे बड़े भाई श्री शरद सहगल
जिन्हे हम सभी भाई बहिन एवं परिवार के अन्य सदस्य "भाई साहब" नाम
से सम्बोधित कर बुलाते है। भाई साहब हम छः
भाई बहिनों मे सबसे बड़े है। पापा का रेल्वे मे समय-वे समय दिन-रात, लाइन पर चलने की नौकरी की बजह से रोज की दिनचर्या मे सहयोग नहीं कर पाते
थे जिसकी पूर्ति बड़े होने के कारण भाई साहब पर आती। ज़िम्मेदारी के अहसास के कारण दैनिक कार्यों मे, किसी
बाहरी व्यक्ति से बातचीत, बिजली, पानी, राशन, मिट्टी के तेल आदि लाने मे बचपन से ही मैंने
उन्हे जूझते और सामना करते देखा था। हम निश्चिंत होकर सिर्फ खाने पीने और अन्य
भाइयों से खाने पीने की चीजों मे ज्यादा हिस्सा पाने की जुगत मे लगे रहते। मै बचपन मे घर के काम आदि मे पूरी तरह
निक्कमा और काम से जी चुराने वाला था, जिसकी एक मुख्य बजह, न तो मै घर मे सबसे बड़े था और
न ही सबसे छोटा, पर
हाँ लड़ाई झगड़े मे अव्वल थे, फिर लड़ाई चाहे घर मे हो या आस
पड़ौस से!! घरेलू काम चाहे सब्जी-भाजी हो या राशन और केरोसिन तेल की लाइन मे लग समान लाना हो तो ये सब काम बड़े
भाई साहब के हिस्से ही आते लेकिन अनीति या
अन्याय से झगड़ालू स्वभाव के कारण खराब
वस्तुओं को दुकानदार से बदलना या बापस करने की ज़िम्मेदारी मेरी रहती।
बड़े
भाई साहब जैसे जैसे ऊंची कक्षाओं मे प्रोन्नत होते गये मुझे अपनी पढ़ाई की भी चिंता
होती। पर इस चिंता पर गोली-कंचे, गिल्ली-डंडा, लंगड़ी, गैड़ी, क्रिकेट, पतंग हमेशा हावी हो जाती और पूरा दिन खेलने के बाद
शाम को आत्मग्लानि के कारण पढ़ाई से उपजी चिंता
से ग्रसित हो जाता। जो सुबह होने तक फिर
काफ़ूर हो जाती थी। बहुत दिनों तक रोज यही क्रम दोहराया जाता रहा। पर भाई साहब अपनी
पढ़ाई लिखाई मे हमेशा गंभीर और अव्वल रहते। उन दिनों आज की तरह मेडिकल की संयुक्त
प्रवेश परीक्षा नहीं होती थी अतः हर मेडिकल कॉलेज की परीक्षा के लिये उस शहर जाना
पड़ता था जो एक दुरूह कार्य था। इंटर के बाद भाई साहब ने यध्यपि मेडिकल के प्रवेश के लिये प्रयास किये
पर मै जनता हूँ कि संयुक्त परिवार मे आर्थिक
ज़िम्मेदारी को सांझा करने की चाह उनमे ज्यादा थी तभी तो हाई स्कूल के बाद से ही
उन्होने अँग्रेजी टायपिंग, शॉर्ट हैंड सीखने क्लास जॉइन कर
ली थी। उन्ही के पदचिन्हों पर चलते हुए मैंने भी अपनी पढ़ाई के साथ इस अतरिक्त
योग्यता को हांसिल करने के प्रयास शुरू कर दिये थे। उन दिनों 70-80 के दशक मे हर
मध्यम वर्गीय परिवार मे एक कमाने वाले व्यक्ति पर परिवार के 7-8 व्यक्तियों के
भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी होती थी। हर परिवार मे
बड़े नौजवान सदस्य की कमोवेश यही ईक्षा रहती की शीघ्र अति शीघ्र कैसे
भी नौकरी कर अपने परिवार की जिम्मेदारियों
को सांझा किया जाये। शायद इसी उद्व्येग और आकुलता ने विज्ञान विषय मे स्नातक के
बाद उन्हे नौकरी की तलाश के लिये व्याकुल किया। उन दिनों सीमित विभागों मे रोज़गार
की सीमित साधन होने से संघर्ष अधिक था। सेवा पाने मे ज्यों-ज्यों विलंब हुआ त्यों-त्यों
उन्होने रोज़गार पाने के प्रयासों मे तेजी लाते हुए बी॰एड॰ और एलएलबी भी कर लिया।
कुछ माह वकालत की प्रैक्टिस मे भी हाथ आजमाया। दिन भर कोर्ट मे दौड़ धूप के
बाद शाम को चेहरे पर रोज़गार का निर्धारित
लक्ष्य हांसिल न हो पाने की कसक उनके चेहरे पर स्पष्ट झलकती थी।
कुछ
आर्थिक लाभ हो इसके लिये त्योहारी व्यवसाय के अंतर्गत दीपावली त्योहार के दो-तीन
दिन का आतिशबाज़ी का व्यवसाय भी किया। जिसे हम भाइयों ने मिलकर 4-5 साल चलाया।
60-70 के दशकों मे कोई भी सरकारी कार्य बगैर घूस और रिश्वत के कराना असंभव था।
आतिशबाज़ी के व्यवसाय हेतु मिलने वाले लाइसेन्स मे भी कलेक्ट्रेट के बाबुओं, पुलिस विभाग मे रिश्वत का एक पैसा
न देने के लिये भी चालबाज बाबुओं की टालामटोली के विरुद्ध संघर्ष किये। इस हेतु उच्च अधिकारियों से शिकवे
शिकायत एवं संपर्क कर लाइसेन्स हर साल बगैर किसी घूस और परितोषण के प्राप्त किया। प्रायः हर
मध्यम वर्गीय परिवारों के लोगो ने इस घूस और बेईमानी के कारण अपने बच्चों
की सुख सुविधाओं मे कटौती कर और कभी कभी
तो खुशियों से वंचित हो कर भी अपने मेहनत और ईमानदारी से कमाये पैसों
को घूस के रूप मे दिया। उस दौरान पली-बढ़ी, पीढ़ी के हर सदस्य को
इस रिश्वत रूपी नासूर से कभी न कभी, कहीं न कहीं अवश्य दो-चार होना पड़ा होगा जिसको लिखने मे कोई अतिश्योंक्ति
न होगी।
जब
एक दिन खुश खबरी मिली कि भाईसहब को कैंटॉन्मेंट बोर्ड, बबीना से
नौकरी का बुलावा आ गया तो घर मे खुशी का
ठिकाना न रहा। संघर्ष से मिली सफलता ने न
केवल भाई साहब के अपितु पूरे परिवार के सदस्यों के चेहरे पर खुशी ला दी,
जिसे स्पष्ट महसूस किया जा सकता था। बबीना
था तो झाँसी से 25-30 किमी॰ पर पर रोज आने जाने मे व्यय होने वाले समय ने मानो इस दूरी को सौ-दो सौ किमी॰ से
भी ज्यादा दूर कर दिया था। प्रातः छह बजे की पैसेंजर ट्रेन को पकड़ने के लिये घर से
5.15-5.30 बजे सुबह तो निकालना ही पड़ता था। ऑटो-टैक्सी न तो इतने सहज और सस्ते थे
कि उनकी सेवाए ले सके और तांगे समय की कसौटी पर खरे न उतरते थे। मै भाई साहब को
रोज साइकल से स्टेशन छोड़ने जाता था जो कि
घर से 4-5 किमी॰ दूर था। नित्य स्टेशन छोड़ने मे प्रत्यक्ष रूप से न सही पर परोक्ष
रूप से परिवार की इस सांझा ज़िम्मेदारी का हिस्सा बनने पर एक अलग ही खुशी होती थी।
इस खुशी का एक पहलू और भी था जो सुबह-सुबह
मानिक चौक मे शंकर हलवाई की गरमा-गरम जलेबी का रसास्वादन करने को मिलता था। जलेबी के लोभ से मिलने वाली खुशी भी इस परवारिक
ज़िम्मेदारी से कम न थी। शाम को बापसी मे भी पैसेंजर जो 7 बजे आती थी कभी कभी लेट
हो 8-9 बजे तक पहुँचती। एक दिन तो हद हो गई पैसेंजर से जल्दी पहुँचने की चाह ने
उन्हे मालगाड़ी से शीघ्र घर पहुंचेने के अनुमान ने उलझन मे डाल दिया। दूरसंचार के साधन न के
बराबर ही थे। मालगाड़ी झाँसी के एक स्टेशन पहले बिजौली मे निरस्त हो गई और 3-4 घंटे
वहीं खड़ी रही। घर पर माँ सहित परिवार मे सभी
सदस्य चिंतित हो जागते रहे। देर रात लगभग 12 बजे भाई साहब बिजौली से किसी तरह झाँसी पहुंचे और फिर जैसे तैसे स्टेशन से घर तब, सारे घर की जान मे जान आयी।
प्रायः
घर के बड़े सदस्य की सफलता-असफलता, जय-पराजय
पर ही परिवार के अन्य सदस्यों की शिक्षा-संस्कार का निर्धारण होता है फिर भी ऐसी
कोई परिभाष नहीं। लेकिन हमारे परिवार मे
घर के सदस्यों को शिक्षा-दिक्षा के दिशा निर्देशन देने का काम बड़े भाई साहब ने बखूबी पूरी
ज़िम्मेदारी, निष्ठा और समर्पण से किया। सुनहरे भावि भविष्य के
निर्माण हेतु संघर्ष की जो राह, भाई साहब ने बनाई, जो दिशा तय की और जो मंजिल
हांसिल की उस राह पर चल कर हम सभी भाई बहिनों को अपने भविष्य निर्माण मे ज्यादा
संघर्ष नहीं करना पड़ा।
आज
16 अगस्त, भाई साहब का जन्मदिन है। हम सभी परिवार के सदस्य और विशेष रूप से मै उनके
दीर्घ और स्वस्थ जीवन हेतु कामना करते है। जन्मदिन की बहुत बहुत बधाई, भाई साहब!
विजय सहगल




2 टिप्पणियां:
सहगल साहब,
आपका लेखन दिनों-दिन बहुत ही उन्नत होता जा रहा है! पढ़कर लगता है कि कोई अच्छा-सा लेखक का लेखन पढ़ रहा हूं! शब्दों का चयन और उपयोग करने का कला भी प्रशंसनीय है! मैं कामना करता हूं कि आप और अच्छा लिखें।
भाई साहब को उनके जन्मदिन के उपलक्ष्य में अनेक अनेक अभिनंदन। ईश्वर उन्हें स्वस्थ रखें एवं दीर्घायु प्रदान करें!
- शंकर भट्टाचार्य।
Achchha laga .Wishing Happy birthday to yr elder brother(my friend)
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