"दरिद्र का दर्द"
आश्रय हो कर भी पतित का,
"नीर" निराश्रय ही कर जाते।
नौनिहाल भींगे बारिश मे,
टपके छाजन से बरसाते॥
ऋतु सावन की, देख घटायेँ,
जी घबड़ाता, मन डर जाता।
चिंतातुर घर के छप्पर मे
जलद कोप भेदन कर जाता।
कैसे क्षुदा मिटे "चून" से,
मेघ उसे गीला कर जाते।
नौनिहाल भींगे बारिश मे,
टपके छाजन से बरसातें॥
बाढ़ जो आती कहर मचाती,
कुटीर हमारे ही बहते, क्यों?
अंबर मे जब कड़के बिजली,
गाज़ गिरे ओसर ढहते ज्यों?
जबर जोतते, ढ़ोर रौंदते,
खेत उजाड़े मेरे ही जाते।
नौनिहाल भींगे बारिश मे,
टपके छाजन से बरसाते॥
झिड़की भूमिहार की मिलती,
बेगारी निजि नियत मानली।
आधे पेट भरे भोजन को,
भावि भविष्य तकदीर जान ली॥
पुश्ते सात बिता घूरे पर,
"भाग" नहीं पर बदले जाते।
नौनिहाल भींगे बारिश मे,
टपके छाजन से बरसाते॥
मैला गाँव भरे सिर ढोया।
जी को, कोस कोस मन रोया॥
थी हर घर मे ठौर हमारी,
गिरती घर की जहाँ पनारी।
तरसे इक घट, जल मे भेद था,
जगत कुएं, चढ़ना निषेध था॥
खाली गगरी, लेकर बैठी,
सुबह से शाम तक जोहे बाटे।
नौनिहाल भींगे बारिश मे,
टपके छावन से बरसाते॥
विजय सहगल



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