"अफगान तालेबान"
लोकतान्त्रिक अफगानिस्तान देश का इससे
ज्यादा दुर्भाग्य क्या होगा कि उसके आज़ादी के दिन 19 अगस्त
2021 की पूर्व संध्या पर इस्लामिक आततायी तालेबानियों ने उसकी आज़ादी का बलात हरण
कर लिया। अफगानिस्तान का दुर्भाग्य रहा है कि विभिन्न कबीलों मे बंटे इस देश मे
कभी स्थायित्व नहीं रहा। 300 ईसपूर्व वर्ष मे यहाँ बुद्ध धर्म लोकप्रिय था। शकों,
गजनी, गोरी,लोदी,
मुगल, अब्दाली वंशो का इस देश पर विभिन्न कालखण्डों पर शासन रहा।
1793 के आसपास सिखों ने महाराज रणजीत सिंह
के नेतृत्व मे अफगानिस्तान पर लंबे समय तक शासन किया। तदुपरान्त ब्रिटिश हुकूमत और
उसके बाद का इतिहास इन विभिन्न अफगानी काबाइलों के आपसी युद्धों से अभिशप्त रहा।
जिसके परिणाम स्वरूप 15 अगस्त 2021 को चीन और पाकिस्तान की शह,
समर्थन और सहायता से 20 वर्ष बाद एक बार फिर
पुनः कब्जा कर अफगानिस्तान को तालेबानियों के कठरपंथियों मुल्ले मौलवियों ने गुलाम
बना लिया।
20 वर्षों तक अमरीकन फौजों की बंदूक की नाल
से डरे सहमे डरपोक तालेबान के लड़ाके पहाड़ों और जंगलों मे चूहों की तरह अपने बिल मे
छुपे सहमे बैठे रहे। अमरीकन, भारतीय सहित
विभिन देशों की सरकारों ने इस अभिशप्त देश अफगानिस्तान के नागरिकों के जीवन मे विकास,
शिक्षा और स्वस्थ के लिए अपने काफी संसाधन झौंके पर अमरीका मे बौद्धजीवियों के
दबाब के कारण अपने सैनिकों की जानमाल और संसाधनों को एक अकृतज्ञ राष्ट्र के लिए यों
ही जाया करने के निर्णय पर पुनर्विचार ने,
अमरीकन फौजों को अफगानिस्तान से बापस बुलाने की नीति का एलान कर दिया। जिसके नतीजे
के कारण भारी संसाधन और धनराशि व्यय करने के बावजूद अफगानी नागरिकों को फिर उसी दो
राहे पर खड़ा कर दिया जहां से उन्होने विकास,
शिक्षा और संस्कार के लिए दौड़ भरी थी। अफगानी नागरिकों को बीच मँझधार मे छोड़ने पर जहां
एक ओर अमेरिकन फौज जिम्मेदार है वही स्वयं अफगानी नागरिक,
उनकी सरकार और सेना भी कम जिम्मेदार नहीं।
भारत की
फिल्मी दुनियाँ के बिके हुए निर्माताओं और अभिनेताओं ने "पठान"
के रूप मे एक बहुत बड़ा झूठ भारतियों के
बीच परोसा गया जिसमे पठान की एक बहादुर,
ईमानदार और देश भक्ति की छद्म छवि प्रस्तुत की गयी थी। आज उस झूठ और फरेब का हिंदुस्तान सहित सारी दुनियाँ के सामने पर्दाफाश
हो गया। इनके राष्ट्र प्रमुख एवं तथाकथित
सेना ने बड़े ही कायरना और आकंठ भ्रष्टाचार मे डूबी इनकी फौज ने लड़ना तो दूर चाँदी
के चंद टुकड़ो की खातिर अपना "दीन",
"ईमान" बेच अपने ही हथियार आतंकी तालेबानियों के सुपुर्द कर भाग खड़े
हुए। इनकी (पठान की) बहदुरी का ये आलम है कि सारे के सारे पठान अपनी माँ,
बहिन, बेटियों और बीबियों को घर मे तालेबानियों
के भरोसे छोड़ अमेरिका मे शरणार्थी बनने को आकुल और व्याकुल है। रही ईमानदारी तो वाह
रे!! पठान आधुनिकतम हथियार और प्रशिक्षण
के बावजूद आकंठ भ्रष्टाचार मे डूबी अफगानी सरकार और सेना ने पलायन और समर्पण कर
इस्लामिक तालेबानियों कठरपंथियों के समक्ष बिना युद्ध लड़े ही घुटने टेक दिया। बाकि
"देशभक्ति" के दर्शन तो अफगानी राष्ट्रपति द्वरा रातों रात देश छोड़
भागने और जिस सेना पर देश और देश के नागरिकों की रक्षा की ज़िम्मेदारी थी उसने
तालेबानियों के सामने बगैर लड़े ही समर्पण कर दिया या भाग खड़े हुए। वाह रे!!
"पठान", तुम्हारी बहदुरी,
ईमानदारी और देश प्रेम के साक्षात दर्शन अफगानिस्तान मे हो गये!! अब और कुछ देखने
को बाकी नहीं रहा!!
तालेबानियों आतंकियों का अफगानिस्तान मे कब्जा कुछ ऐसा ही है जैसे
लुटेरों डाकुओं द्वारा किसी गाँव पर कब्जा कर गाँव की पंचायत का प्रशासन आपने हाथ
मे लेना!! कुछ अधिसंख्य अनपढ़, गंवार कट्टरपंथि
तालेबानियों द्वारा शरीयत के अनुसार शासन करना कुछ बैसा ही है जैसे पंचतंत्र की
कहानी मे रोटी के लिये आपस मे लड़ रही
बिल्लियों को बंदर द्वारा न्याय देना। जिन
तालेवानियों को इस्लाम का क॰ ख॰ ग॰ भी नहीं मालूम वे अपनी मनमर्जी और पाशविक सोच
को ही अपना कानून प्रतिवादित कर शरीयत का शासन बता रहे है!! इन अतिवादियों पर वो
कहावत एक दम उपयुक्त होगी कि "अनपढ़ दोस्त से अच्छा पढ़ा लिखा दुश्मन"।
स्वचालित हथियारों से सुसज्जित उस मूढ़,
मंदबुद्धि अतिवादी द्वारा देश के नागरिकों
से सामान्य व्यवहार की अपेक्षा कैसे की जा सकती है?
जिसकी पाशविक सोच 12 वर्ष से बड़ी बच्चियों की शादी अतिवादी तालेबानियों लड़ाकों से
कराने की हो?? अमेरिका द्वारा आफगानी
सेना को दिये हथियारों का इन तालेवानियों के हाथ लग जाने की आशंका का अभिप्राय है कि किसी मूर्ख के हाथ मे किसी शक्ति
या अधिकार का देना? अफगानी नागरिकों के
लिये ये कुछ बैसा ही है जैसे बंदर के हाथ मे उस्तरा!!
अमरीकी फौज के आने के पूर्व इन तालेबानियों
के शासन मे अत्याचार, निरंकुश शासन और
हैवानियत के किस्से दुनियाँ भूली नहीं है। ड्रग तस्करी,
लूट, हिंसा आतंक एवं अपहरण मे रत इन तालेबानियों
के झूठे आश्वासन, वायदे और विश्वास मे
दुनियाँ अब आने वाली नहीं है। इनकी सोच और स्वभाव मे अब तक कुछ भी बदलाब नहीं आया
है। सारी दुनियाँ सामान्यतः और भारत विषेशतः जनता है कि इन तालेबानियों रूपी
"कुत्ते की पूंछ को बारह साल तक भी नलकी मे रखने के बाद भी टेढ़ी की टेढ़ी
रहेगी!!
इन तालेबानियों के कुछ पैरोंकार हमारे देश मे भी है। हमारे देश के विपरीत बुद्धि एक नेता, एक मनहूस शायर और एक तथाकथित धार्मिक विद्वान सभ्य समाज मे रहने के बावजूद इनकी सोच और स्वभाव अभी भी पाशविक परिवेश मे पले बढ़े तालेबानियों की तरह ही है। सारी शर्मोहया छोड़ इन निर्लज्जों ने तालेबानियों को "मुबारक" पेश किया? ये महाश्य दूर बैठ तालेबानियों की हिम्मत और हौसले पर "सलाम" पेश कर रहे थे!! इन "आँख के अंधे नाम नयन सुख" रूपी अभद्र जनों को किसी भी कीमत पर अफगानिस्तान छोड़ने के लिए अपनी जान की परवाह किए बिना, हवाई जहाज के पंखों और पहियो पर लटक कर यात्रा मे अपनी जान देने वाले नौजवानों का वीडियो भी दृवित न कर सका। एक सांसद इन धूर्त तालेबानियों की तुलना देश के स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों से कर रहा था!! इस कठोर, पत्थर दिल व्यक्ति के दिल मे उन माँओं की तस्बीर भी करुणा न भर सकी जो अपने कलेजे के टुकड़े "नन्हें-मुन्हे मासूम बच्चों को अजनबी अमेरिकन फौजों के हवाले करने मे संकोच नहीं कर रही थी क्योंकि उन माँओं को इन मासूमों का भविष्य तालेबानी आततियों के बीच रहने से ज्यादा सुरक्षित प्रतीत हो रहा था। जब इस दल विशेष के सांसद की ये सोच है तो आप समझ सकते है कि इस दल के हाथों मे देश का भविष्य कैसा होगा?? इनमे एक मूढ़ मंदबुद्धि सूरमा, "मनहूस" शायर इन दो टके के तलवानी हैवानों की तुलना "अंगुली माल" से हृदय परिवर्तित "आदि ऋषि" से कर रहा था? वो वनमानुष ये भूल रहा है कि "अंगुली माल" का हृदय परिवर्तिन उनके चहुंओर ज्ञानी जनों, ऋषियों, साधु-महात्माओं द्वारा निर्मित धर्म, अध्यात्म और संस्कारों से पोषित दिव्य वातावरण प्राप्त था इसके विपरीत साधू पुरुषों के संगत की अपेक्षा इन कलुषित क्रूरकर्मी तालेबानियों को मिल रहे "वातावरण" और मनहूस शायर जैसे सलाहकारों, पैरोकारों के रहते कदापि नहीं की जा सकती। इन जैसे असुर पृवृत्ति के लोगो को घुटने तक कीचड़ मे खड़े अफगानी नागरिक, महिलाएं, बच्चे नहीं दिखाई दिये जो तालेबानियों से मुक्ति के लिये किसी भी कीमत पर अपना देश छोड़ने पर अमादा है। दिल कचोटने वाली उस किशोरी की चित्कार इन अमानवीय लोगो के कान मे सुनाई नहीं दी जो अमेरिकन फ़ौजियों को रो-रो कर "हेल्प"...हेल्प... की आवाज लगा रही थी।
पिछले दिनों काबुल हवाई अड्डे पर आत्मघाती
बम धमाकों मे सैकड़ों निरीह नागरिकों की हत्या से संदेश स्पष्ट है कि इन आतंकियों
का धर्म-मज़हब से कोई सरोकार नहीं अन्यथा अपने ही इस्लामी मताबलम्बियों के प्रति ही
करुणा दया और प्रेम के "भाव" का आभाव इनके दिलों मे नहीं होता?
फिर कैसे ये पाशविक सोच के तालेबानी दूसरे अन्य मज़हब के प्रति सहिष्णु होंगे? न केवल हमे बल्कि सारी दुनियाँ को अफगानिस्तान
पर इन तालेबानियों के अन्यायपूर्वक हथियायी सत्ता और शासन का विरोध करना चाहिये।
विजय सहगल



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