सोमवार, 23 अगस्त 2021

सौ सौ चूहे खाके बिल्ली हज को चली

"सौ सौ चूहे खाके बिल्ली हज को चली"





सोसाइटी मे हमारे मित्र कहें या पितातुल्य संरक्षक, 84 वर्षीय, श्री इंदर राज शर्मा जी से  रोज प्रातः भ्रमण पर मुलाक़ात हो जाती है। भ्रमण के दौरान कुछ समय धर्म, अध्यात्म या राजनीति पर भी चर्चा हो जाती है। आईआईटी खड़गपुर से स्नातक और कलकत्ता मे हिंदुस्तान मोटर्स से महा प्रबन्धक पद से सेवानिवृत्त शर्मा जी कुछ दिन पूर्व साठ-सत्तर के दशक के कलकत्ता के बारे मे सुना रहे थे कि स्वतन्त्रता के समय से ही कलकत्ता देश का सबसे बड़ा औध्योगिक शहर रहा है। वे बताते है कि जब वे हाबड़ा से ट्रेन द्वारा  निकलते थे तो मीलों दूर तक रेल्वे लाइन के दोनों ओर बड़ी बड़ी फैक्ट्री, कारखानों और उनकी चिमनियों से निकलते धुएँ को मीलों दूर तक ट्रेन से देखा जा सकता था।  दशकों बाद  वामपंथियों और तृणमूल के शासन मे अब एक भी उध्योग नज़र नहीं आता है। इन दलों की यूनियन सांस्कृति, टोला बाजी, और कट मनी ने इस प्रदेश को विकास की दौड़ मे दशकों पीछे धकेल दिया। 

पिछले दिनों पश्चिमी बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी अचानक केंद्र की राजनीति मे अपनी दिलचस्वी और आत्मीयता दिखाने के लिये दिल्ली मे थी। जिस दिन से उन्होने संसद के मानसून सत्र 2021 के दौरान पार्लियामेंट  मे भी "खेला होबे" का आवाहन किया है तब से तृणमूल कॉंग्रेस के सांसदो का उच्छृंखल व्यवहार देश भर मे किसी से छिपा नहीं है। मंत्री से पेपर छीन फाड़ना उनके "खेला होबे" मिशन का ही एक हिस्सा था। किस तरह कुछ सांसदों ने जुलाई-अगस्त के संसद के मानसून अधिवेशन का हरण कर पूरे सत्र को नहीं चलने दिया। दोनों सदनों मे विपक्ष इन कुछ सांसदों ने लोकतन्त्र की मर्यादा का गला घोंट दिया।   पश्चिमी बंगाल मे विजयी होने के बाद दिल्ली मे अचानक बीजेपी के विरुद्ध विपक्षी दलों का प्रधानमंत्री के पद पर सर्वमान्य प्रत्याशी के दावे को सुस्थापित करने  और अपने इसकी  पुष्ट करने का एक प्रयास है। एकाएक वर्तमान सरकार से  लोकतन्त्र और देश की रक्षा हेतु उनकी चिंता जाहिर करना घोर आश्चर्य दिखाने वाला है। कल तक बंगाल मे लोकतन्त्र को ताक पर रख अपने अनुयायियों के माध्यम से दल विशेष एवं संप्रदाय विशेष के लोगो के विरुद्ध  हिंसा, आगजनी और हत्या तक मे मौन रहने वाली ममता बैनर्जी से लोकतन्त्र की रक्षा की अपेक्षा करना कुछ बैसा ही है जैसे "सौ सौ चूहे खा के बिल्ली का हज पर जाना!!

बड़ा खेद और अफसोस का विषय है कि कैसे किसी राज्य का एक मुख्यमंत्री अपने दंभ, अहंकार और घमंड मे आकार अपने राज्य के करोड़ो किसानों और आम जनों को केंद्र सरकार की योजनाओं से मिल रहे लाभ से वंचित कर सकती है? केंद्र और राज्यों के मतभेदों, मतांतरों से इन्कार नहीं किया जा सकता परंतु हम अपने गरुर और ठसक  मे इतने मग्न हो जाये कि प्रदेश के गरीब किसानों और मजदूर वर्ग के हितों को भी ताक पर रक्ख दे? किसी कल्याण कारी राज्य के प्रमुख से ऐसी अपेक्षा कैसे की जा सकती है?? लेकिन दुर्भाग्य से पश्चिमी बंगाल मे ऐसा पिछले सात सालों से लगातार हो रहा है। पश्चिमी बंगाल मे केंद्र सरकार की किसानों को दी जा रही छह हजार रुपए बार्षिक की "किसान सम्मान निधि" और गरीबी रेखा के नीचे रह रहे परिवारों को स्वास्थ और बीमारियों के इलाज़ के लिये पाँच लाख तक की राशि के चिकित्सा बीमा की "आयुष्मान योजना" से वंचित रक्खा जा रहा है। ये सिर्फ और सिर्फ राज्य की मुख्य मंत्री ममता बैनेर्जी अपने अहंकार और दंभ की आत्मतुष्टि की पूर्ति हेतु कर रही है। ऐसा बचकाना व्यवहार एक मुख्यमंत्री अपने राज्य के लोगो के साथ कैसे कर सकता है?  इस योजना का लाभ बाकी देश के किसान और गरीब परिवार ले और एक राज्य के लोगो को इससे वंचित रक्खा जाये ऐसा कोई कैसे कर किया जा सकता है? लेकिन पश्चिमी बंगाल मे दुर्भाग्य से ऐसा हो रहा है जो अत्यंत दुःखद है।  

एक ऐसा प्रदेश जिसकी सीमाएं बंगला देश से लगी हों और अवैध घुसपैठियों की समस्या एक विकराल रूप धारण कर चुकी हो। सीमांत इलाकों मे एक सुनोयोजित षणयंत्र के तहत जनसांख्यिकि बदलाब किये जा रही है जो एक चिंताजनक बात है। खेद का विषय है कि राज्य की मुख्यमंत्री का इस समस्या मे सहायक होने के चलते इस चुनौती को स्वीकार करने मे लेश मात्र भी दिलचस्वी नहीं है। पिछले दिनों अपने दिल्ली प्रवास पर जब उनके मुँह से दिल्ली मे सड़क परिवहन मंत्री श्री नितिन गडकरी से सड़कों के निर्माण की बात कहना, प्रदेश मे इंडस्ट्रीज़ की स्थापना के लिये उधयोगपतियों का आवाहन सुन कर अनायास सिंगूर मे टाटा समूह द्वारा अपनी छोटी "नैनो" कर के निर्माण हेतु अधिगृहीत जमीन को बापस लेने और फ़ैक्ट्री  के विरोध की नीति याद हो आयी। कैसे विकास की राह मे रोड़े अटकाकर लोगो को बरगला कर नैनो कार के कारखाने को बंद करा पश्चिमी बंगाल के नौजवानों, छोटे-बड़े व्यापारियों, मजदूरों  को रोजगार से बंचित किया गया था।  आज वही ममता बैनर्जी प्रदेश मे विकास के लिये ऊधयोग स्थापित करने की मांग कर रही है!! इसे कहते है घड़ियाली आँसू बहाना!  इससे विस्मयकारी मांग क्या हो सकती है। एक दशक तक निरंकुश शासन के समय उन्हे प्रदेश के विकास की लेश मात्र भी चिंता नहीं हुई? विस्तृत विवरण सुनेने के लिये इस लिंक को क्लिक करे-: (https://www.livehindustan.com/videos/national/west-bengal-cm-mamata-banerjee-meets-union-minister-nitin-gadkari-in-delhi-1-4271549) 

कानून व्यवस्था का दंभ भरने वाली ममता बैनर्जी शायद भूल गयी कि अभी हाल ही मे बंगाल मे चुनाव के पश्चात हुई हाई कोर्ट के आदेश पर हिंसा की जांच करने पहुंचे मानवाधिकार आयोग को जांच करने देने से रोकने के लिये कैसे कैसे हथकंडे आजमाये गए, कैसे पुलिस की उपस्थिती के बावजूद जांच मे उपस्थित हुए लोगो उपर असामाजिक तत्वों द्वारा हिंसा की गयी यहाँ तक कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की जांच करने वाले सदस्यों के साथ भी असहयोग कर उनके कार्य मे बाधा उत्पन्न की गयी। अपने राजनैतिक विरोधियों के विरुद्ध हिंसा, हत्या और बलात्कार की सुर्खियां अभी धुंधली नहीं हुई। ममता बैनर्जी द्वारा एक संप्रदाय विशेष के लोगो से उन्हे वोट करने के आवाहन पर चुनाव आयोग द्वारा दो दिन प्रचार करने से रोकने की सजा दी गयी। आयोग की चेतावनी इस बात को स्पष्ट दर्शाती है कि चुनाव विजयी के लिये कैसे-कैसे और क्या-क्या हथकंडे आजमाये गये। लोकतन्त्र मे असहमति पर इतने निम्नस्तरिय अधोपतन कारी सोच एक राष्ट्रीय स्तर के राजनैतिक नेता को शोभा नहीं देती। ममता बैनर्जी जैसे जमीनी नेता जिन वामपंथियों की अनीतियों और ध्वंसकारी मनोवृत्तियों के विरुद्ध संघर्ष कर सत्ता मे आयी थी उन्ही दुष्प्रवृत्ति की पुनरावृत्ति कर वे पुनः शासन मे आएँगी ऐसी अपेक्षा देश के बुद्धिजीवियों द्वारा कदापि नहीं की गयी थी। वामपंथियों के जिस पौंजी स्कीम घोटाला, कट मनी, टोला बाज़ी टैक्स  और संगठित गुंडागर्दी के विरोध के चलते ममता बैनर्जी ने सत्ता प्राप्त की थी अपने समर्थकों के माध्यम से उन्ही बुराइयों की पुनर्स्थापना कुछ उसी तरह थी जैसे "नई बोतल मे पुरानी शराब"।

पिछले दिनों राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने ममता सरकार को चुनाव बाद हिंसा, लूटपाट, बलात्कार एवं हत्या की घटनाओं के लिए दोषी ठहरती रिपोर्ट हाई कोर्ट मे प्रस्तुत की जिसके आधार पर आज 19 अगस्त 2021 को हाई कोर्ट कलकत्ता ने चुनाव बाद टीएमसी के अराजक एवं असामाजिक तत्वों द्वारा हत्या, लूट बलात्कार  के समस्त मामलों मे सीबीआई और एसआईटी से जांच कराने के आदेश दिये है। बड़ा अफसोस होता है  कि राजनैतिक असहमति के कारण किसी राज्य का मुखिया अपने ही प्रदेश के लोगो पर अत्याचार, हत्या, बलात्कार एवं हिंसा  को बढ़ावा दे!! सर्व सम्मति से  हाई कोर्ट कलकत्ता के जजों की पीठ ने हत्या हिंसा, लूट और बलात्कार के सारे मामलों की जांच के आदेश देकर ठीक ही किया। चुनाव बाद ही लोगो ने पश्चिमी बंगाल की इस कुत्सित एवं घृणित "सोच" की आशंका को कलकत्ता हाई कोर्ट ने जांच के आदेश दे "सच" मे परिवर्तित कर दिया।  

मैंने स्वयं दो बार पश्चिमी बंगाल मे वामपंथियों की उस संगठित गुंडागिर्दी को 24 घंटे के बंद के आवाहन को भुक्तभोगी की तरह भुक्ता है। दोनों ही बार न खाने-पानी के व्यवस्था और न चाय पानी के इंतजाम के बिना बच्चों बूढ़ों को परेशान होते देखा है। एक बार राजीव गांधी की हत्या पर खड़गपुर रेल्वे स्टेशन पर और दूसरी बार अंडमान की यात्रा के समय कलकत्ता हवाई अड्डे पर। दोनों बार 24 घंटे के बंद से उत्पन्न परेशानियों दिक्कतों के  पलों की यादें  आज भी हमारे जेहन मे  ताजा है।  आशा है केंद्रीय अन्वेषन व्यूरों अपनी निष्पक्ष जांच कर चुनाव हिंसा के पीढ़ित लोगो के साथ न्याय संगत कार्यवाही कर उपद्रवियों को कड़ी सजा दिलाएगा।

विजय सहगल   


कोई टिप्पणी नहीं: