"रे मन मूरख
जनम गँवायौ.........."
मेरा
मानना है कि हर आम या खास आदमी की ज़िंदगी मे खुशियाँ चारो तरफ बिखरी पड़ी है आवश्यकता
है इन खुशियों को पहचान उनके साथ चलने की। खुशियों के साथ चलने/दौड़ने मे आपको त्वरित
निर्णय के साथ अपने पद प्रितिष्ठा के "छद्म नकाब" को भी परे रखने की जरूरत
है, अन्यथा आप अपनी स्वाभाविक जीवन मे पल-पल मिलने वाली खुशियों से वंचित रहेंगे!!
कोरोना काल के पूर्व लगभग एक साल तक जब निर्माण कार्य मे लगे माजदूरों के बच्चों के
साथ जुड़ा तो झोपड़ पट्टी मे रह रहे उन बच्चों को अक्षर ज्ञान देने के काम मे जो खुशी
मिली उसको व्यक्त नहीं किया जा सकता। ऐसा ही आज कुछ मेरे साथ घटित हुआ।
आज
सुबह जब प्रातः भ्रमण के लिए निकला तो काफी तेज बारिस की आवाज सुनाई दी। बाहर
निकला तो दिल्ली एनसीआर मे आज झमा झम बारिस हो रही थी। सोसाइटी की 13वी फ्लोर
पर ही स्थित गैलरी मे भ्रमण करता रहा। अपनी आदत के अनुरूप विविध भारती की
राष्ट्रीय प्रसारना सेवा पर प्रातः छह बजे के समाचार के बाद रामचरित मानस की चौपाइयों
का मधुर संगीत के साथ हो रहे वाचन को सुनता रह। ये मेरे नित्य दिनचर्या का एक अंग है।
घूमने के निर्धारित समय की पूर्ति के बाद आज व्यायाम की छुट्टी थी क्योंकि फ्लोर की
गैलरी पर हाथ पैर चारों तरफ चलाना संभव नहीं था। अतः नोएडा स्थित घर से कुर्सी
निकाल सड़क की ओर आने-जाने की सीढ़ियों पर बैठ बरसात का आनंद ले भजन सुन रहा था और
सामने घनघोर बरसात हो रही थी। बादलों के बीच कड़कती बिजली मे दूर से लाइट देख कर ही
आभास हो सकता था कि मेट्रो ट्रेन जा रही
है। पानी इतना तेज था कि मेट्रो ट्रेन पूरी तरह नज़र नहीं आ रही थी। ऊपरी मंजिल पर हवा का वेग कुछ ज्यादा ही होने लगा था।
हवा के झोंके से कभी पानी की फुहार चेहरे और कपड़ो पर भी पड़ जाती। अचानक प॰ भीम सेन
जोशी की मधुर आवाज मे सूर दास जी के भजन की सुरीली ध्वनि कानों मे सुनाई दी:-
प॰ भीम सेन जोशी की आवाज का
मै दीवानगी की हद तक कायल हूँ। उनका गाया
कोई भी भजन या शास्त्रीय संगीत/गीत की
आवाज मुझे सब कुछ छोड़ उन्हे सुनने को
बाध्य कर देती है। आज भी जब उनकी आवाज मे
उक्त भजन को सुन रहा था और सामने घनघोर घटाओं को बरसते देख मन प्रफ़्फुलित जो हो
रहा था। यद्यपि भजन के अर्थ तो बड़े गूढ और अध्यात्म से ओत-प्रोत हो
विषय-वासना से दूर "ईश्वर की शरण" मे जाने का संदेश दे रहे थे। पर न
जाने क्यों मेरे को लगा कि सूरदास जी पंडित भीम सेन जोशी की आवाज के माध्यम से जैसे
कह रहे हों, "रे मूर्ख, ईश्वर
द्वारा रचित इस सृष्टिचक्र के साक्षात दर्शन, भगवान तुझे कराने
तत्पर है और एक तू है कि यहाँ बरसात से बच के बैठा है। चल उठ और ईश्वर का
साक्षात्कार कर प्रकृति के साथ एकाकार हो जा!!
मेरे मन मे आनंद का उद्वेग
हिलोरे मार मुझे बचपन के दिनों मे बरसात मे नहाने की याद दिलाने लगा। नाली मे वह रहे
जल राशि के साथ प्रवाहित कागज की नाव के
पीछे भागते हुए झाँसी मे घर से दूर बनी पुलिया मे बरसाती पानी से बने सरोबर की ओर ले
जाने की विस्मृत घटनाओं को पुनः स्मरण कर आनंद और उत्साह से भर गया। बचपन ही नही
युवा अवस्था मे स्कूल और कॉलेज से भीगते हुए घर आने की घटनाओं से मिली खुशी और
उल्लास का बार-बार स्मरण अचानक आज हो आया।
फिर क्या था भजन की समाप्ति के तुरंत बाद मोबाइल को अपने फ्लैट मे रख शीघ्र नीचे
सोसाइटी के मैदान मे उतर आया और बिना एक मिनिट की देरी के मै सोसाइटी के अंदर बने रास्ते
पर मस्ती के साथ घूम रहा था। 4-5 मिनिट के भ्रमण मे ही पानी से सराबोर था। सोसाइटी
मे लगभग आधा घंटे बरसात मे घूमने से मिले हर्ष
और उल्लास को आज शब्दों मे व्याँ करना कठिन हो रहा था।
बैसे मै "सेल्फी" रूपी बीमारी से अछूता हूँ पर आज प्रातः मे मिले इस आनंद को कैमरे मे कैद करने की बड़ी ख्वाहिश तो थी पर मोबाइल तो घर पर ही रक्खा था। चूंकि आजकल देश की हवा मे बगैर प्रमाण के किसी घटना की प्रामाणिकता के पुष्टि नहीं की जा सकती थी। राजनीति से लेकर अर्थनीति मे बगैर प्रमाण के कोई भी कार्य अप्रामाणिक ही माना जाता है। फिर चाहे घटना "एयर स्ट्राइक" या आज के आनंद, उमंग और खुशी की ही क्यों न हो? बिना एक दो चित्रो के भावनाओं की अभिव्यक्ति हेतु भी आनंद की प्राणिकता अधूरी थी। अतः मैंने सोसाइटी के प्रवेश और निकासी द्वार मे तैनात गार्ड से अनुरोध किया जिनहोने एक छोटा वीडियो और दूसरे ने कुछ फोटो ग्राफ लिये जिन्हे मै आप के साथ सांझा कर रहा हूँ।
यध्यपि श्रीमती जी द्वारा बरसात मे भीगने कि इस घटना को बुढ़ापे मे उपजे इस आनंद पर कुठराघात किया तो अपन भी अमिताभ बच्चन की स्टायल मे जबाब देने से कहाँ चूकने वाले थे कि "बूढ़ा होगा............ (वाकि तो आप समझ ही गये होंगे)। पर वास्तव मे आज "रैनी डे" मनाने से मिले आनंद को भुलाया नहीं जा सकता। आज के आनंद की जय!!
विजय सहगल
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