मंगलवार, 30 मार्च 2021

अंबाजी मंदिर (गुजरात)

                 "अंबाजी मंदिर (गुजरात)"








दिनांक 27 फरवरी 2021 को जब मेरी परिवार सहित उदयपुर की  यात्रा शुरू हुई तो सबसे पहले हम पांचों सदस्यों ने उदयपुर भ्रमण की शुरुआत सोलहवी शताब्दी के जगदीश मंदिर के दर्शन से की। भव्य और ऊंचे शिखर पर ध्वज लगे  उक्त भव्य मंदिर की  सड़क को तलहटी माने तो सड़क से 125 फुट ऊंचा था। सीधी सपाट सीढ़िया थी तो कम  पर नाश्ते से मिली सारी ऊर्जा मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ते चढ़ते समाप्त हो गई। मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ते समय एक वृद्ध सज्जन को भी मैंने मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ते समय देखा पर बहुत ज्यादा नोटिस नहीं किया। मंदिर के मुख्य मंडप मे बैठ उन वृद्ध सज्जन ने प्रचलित आरती "ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे....... का पूरा वाचन करते समय भी मैंने देखा। दर्शन के पश्चात जब वे और मै सीढ़ियों से उतरे तो सौजन्यता वश मैंने उनका अभिवादन कर उनके इस उम्र मे इतनी सीढ़ियाँ चढ़ने के लिए उनके  हौसले और हिम्मत की प्रसंशा की। बातचीत मे उन्होने बताया कि उनकी उम्र 84 वर्ष है और उनका ये नित्य क्रम है। हर रोज वे इसी समय मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ प्रभु के दर्शन के लिए मंदिर मे ढोक लगाने आते है। नाम पूछने पर उन्होने विनम्रता से उपर हाथ उठा विनीत भाव से भगवान का उदाहरण दिया अर्थात अपना नाम भगवान बताया। आरंभिक परिचय पश्चात उन्होने अपनी कुलदेवी माँ अंबाजी का स्मरण कर मुझे और मेरे परिवार के लिये आशीर्वचन कहे, जो स्नेह और ऊर्जा से  भरे थे।

उस समय तो श्री भगवान जी जैसे सज्जन का स्मरण न हुआ पर माउंट आबू जाते समय कुछ यात्रियों ने आबू रोड से 20-22 किमी॰ दूर गुजरात के बनासकांठा जिले के अंबाजी ताल्लुका स्थित  माँ अंबाजी के दर्शन हेतु मार्ग दर्शन किया। अंबाजी मंदिर गुजरात का नाम तो सुन रक्खा था पर उस समय तक हमे स्मरण न था कि सहयात्री अरावली पर्वत श्रंखला के बीच गुजरात राज्य स्थित विश्व प्रसिद्ध अंबाजी की चर्चा कर रहे है वह आबु रोड से मात्र 20-22 किमी॰ है!! मुझे भान भी  न था कि गुजरात राज्य की सीमाएं अबूरोड से इतनी नजदीक है। 51 शक्तिपीठों मे से एक अंबाजी मंदिर जाने का जैसे ही सुनिश्चित हुआ हमने अपने यात्रा कार्यक्रम मे एकदिन की बढ़ोतरी कर माउंट आबू से बापसी मे कार्यक्रम निश्चित कर लिया। तभी हमे उदयपुर के जगदीश मंदिर मे हुई भेंट के उन बुजुर्ग श्री  भगवान का स्मरण  हो आया जिनका माँ अंबाजी का आशीर्वाद  अंबाजी मंदिर के दर्शन का माध्यम बना।

दिनांक 4 मार्च 2021 को प्रातः 6.15 बजे बस से बापसी मे माउंट आबू से चलते समय बड़ी उहाँ-पोह की स्थिति थी कि कैसे आबू रोड से अंबाजी पहुंचेंगे। लेकिन जैसे ही अबूरोड मे उतरे गुजरात राज्य परिवहन की बस अंबाजी जाने को तैयार खड़ी थी जैसे हम दोनों का ही इंतज़ार कर रही हो। अबूरोड से बमुश्किल 8-10 किमी॰ सड़क के दोनों ओर सूचना दर्शाते बोर्ड से हिन्दी गायब हो चुकी थी। समझते देर न लगी कि हम गुजरात राज्य मे प्रवेश कर चुके है। तुक्के लगा कुछ शब्द समझ तो आ जाते पर क्षेत्रीय भाषाओं के राज्यों मे पर्यटकों को एक समस्या समान होती है कि सिवाय स्थानीय भाषा के अङ्ग्रेज़ी या हिन्दी भाषाओं के सांकेतिक या सूचनाओ का अभाव हो जाता है। क्षेत्रीय राज्यों के पर्यटक मंत्रालय या सरकारे इस समस्या को क्यों नहीं जान या समझ पाते?? उनको चाहिए कि क्षेत्रीय भाषा के अतिरिक्त, कम से कम अँग्रेजी या हिन्दी मे भी सूचनाओं/संकेतिकों का उल्लेख अवश्य करें विषेशतौर पर बसों मे प्रस्थान और गंतव्य स्थान की जानकारी के मामले मे।    

अंबाजी मंदिर मे स्नान ध्यान के बाद दर्शन हेतु प्रस्थान किया जो होटल के नजदीक ही था। दर्शन हेतु मंदिर तक पहुँचने हेतु बनाए गये रास्ते और बैरिकेड को देखते हुए अनुमान लगाना मुश्किल न था कि विशेष एवं प्रमुख त्योहारों पर कितने श्रद्धालुओं का आना लगा रहता होगा। मंदिर मंडप एवं विशाल मंदिर परिसर मे फोटोग्राफी निषेध होने के कारण मंदिर प्रांगण की फोटो उपलब्ध नहीं है।  यध्यपि उस दिन बिलकुल भीड़ दर्शनार्थियों की न थी। लाइन के लिये रेलिंग से बनाये रास्ते से बगैर किसी बाधा के सीधे मुख्य मंदिर मंडप मे प्रवेश कर गया। संगमरमर की बारीक कसीदकारी से सजी देव, यक्ष, गणों की सुंदर प्रतिमाओं एवं मंडप मे लटके विशाल झूमर ने मंदिर की सुंदरता को शोभयमान कर रहे थे। फूलों से श्रंगार की हुई सिंह पर सवार माँ अंबे की जाग्रत प्रतिमा के दर्शन श्री यंत्र के रूप बड़े ही नयनभिराम थे। दर्शन के लगी लंबी लाइनों के बावजूद रास्ते के दोनों ओर बने स्थान पर श्रद्धालू देवी माँ के दर्शन पश्चात कुछ समय बैठ ध्यान मे मग्न थे। यध्यपि कोरोना एवं सुरक्षा की दृष्टि से देवी को अर्पित फल, फूल, नारियल को मंदिर के मुख्य दरवार मे ले जाना वर्जित था पर मंदिर प्रबंधन ने देवी माँ के प्रसाद के वितरण की व्यवस्था नाममात्र के शुल्क ले की जा रही थी। स्वादिष्ट प्रसाद ग्रहण कर मंदिर मंडप के बाहर खुले मे बैठ कुछ समय मंदिर को निहारते बैठे रहे। पास मे ही ठंडे पानी के व्यवस्था जगह जगह की गई थी। विशाल खुले आँगन के एक ओर हवन वेदीयां मे श्रेष्ठ पारंगत पुरोहितों द्वारा  विवाह, मुंडन, जन्मदिन, विवाह वर्षगांठ हेतु संस्कार संपादित कराये जा रहे थे। कुछ देर इन संसकारों को संपादित होना देख हम दोनों पति पत्नी राजमार्ग के मुख्य द्वार की ओर बढे।

दोपहर कुछ आराम के पश्चात एक बार पुनः शाम की आरती मे शामिल होने हेतु हम लोग पुनः प्रवेश हेतु मंदिर पहुंचे। मुख्य राज मार्ग से लगे प्रवेश द्वार पर जूते आदि रख प्रवेश किया। मंदिर के शिखर सहित विशाल सम्पूर्ण मंदिर प्रांगण के दर्शन राजमार्ग से लगे प्रवेश द्वार से किया जा सकता था। एक बात मानने होगी 150 मीटर चौड़े एवं लगभग एक किमी से कुछ कम आयतकार मंदिर के विशाल आँगन, मंडप और सम्पूर्ण प्रांगण का ये रूप नव निर्वाण लगता प्रतीत होता है जो शायद पूर्व मे ऐसा न रहा हो। पूरे मंदिर का वास्तु निर्माण इस तरह किया गया है कि रात्रि मे आरती के समय मंदिर के अंदर जल रही दीपक की ज्योति को  मुख्य राजमार्ग से भी  देखा जा सकता है जिसे मैंने बापसी पर स्वयं महसूस किया। चूंकि मंदिर के अंदर मुख्य मंडप मे मोबाइल, कैमरा से फोटोग्राफी प्रतिबंधित है इसलिए दर्शन पश्चात मंदिर की  कुछ फोटो राजमार्ग से ली है। सूर्यास्त की सुनहरी किरणों से 103 फुट ऊंचे मंदिर के शिखर पर चढ़ी सोने की परत की स्वर्णिम आभा देखते ही बनती। साफ सुथरे लंबे-चौडे प्रांगण के दोनों ओर फूल, धार्मिक समग्रियों की दुकाने आदि बनी थी बीच का खुला आँगन मंदिर की भव्यता और दिव्यता को चार चाँद लगा रहा था। 358 सुंदर स्वर्ण कलश मंदिर के अन्य छोटे शिखरों पर लगाये गये थे। चैत्र नव रात्रि शारदीय नवरात्रि पर लाखों श्रद्धालु अंबाजी मंदिर मे दर्शन हेतु आते है।      

एकाध किमी की परधि के अंबाजी शहर बहुत  छोटा सा कस्बा है, पर साल मे लाखों श्रद्धालुओं के आने के कारण विश्व प्रसिद्ध है। अंबाजी मंदिर के पश्चात मंदिर से लगभग 3 किमी॰ दूर गब्बर पहाड़ी पर अंबाजी का प्राचीन मंदिर स्थित है। इस मंदिर मे ऐसी मान्यता है माँ अंबाजी के चरण कमलों की पूजा होती है। इस मंदिर मे माँ के चरण कमलों के दर्शन के साथ अखंड ज्योति के दर्शन के लिये भी दर्शनार्थी आते है। कष्टसाध्य लगभग 900 सीढ़ियों को  चढ़ने के अतरिक्त पारश्रमिक देकर बगैर किसी श्रम के भी आप उड़न खटोले (रोप वे) से शिखर पर पहुँच उक्त प्राचीन मंदिर के दर्शन कर सकते है। शिखर के शीर्ष पर दर्शन कर यहाँ भी मंदिर के प्रांगण मे लगे घंटे से ध्वनि कर अपनी उपस्थिती की प्रविष्टि की।

मंदिर की तलहटी मे भी माउंट आबु की तरह अरावली पर्वत श्रंखला की तरह प्राकृतिक शैल आकृतियाँ एक बार पुनः देखने को मिली। इस तरह बगैर किसी पूर्वनिर्धारित योजना के माँ अंबाजी के दिव्य दर्शन हमारी तीर्थ यात्रा के पुण्य कृतों मे शामिल हो गये। शाम को एक होटल मे भोजन करते समय एक आश्चर्य जनक घटना देखने को मिली। जिस होटल मे हम भोजन कर रहे थे नजदीक ही एक सज्जन भी वहाँ भोजन कर रहे थे। ये वही सज्जन थे जिनके कुछ दूर स्थित होटल मे हमने सुबह नाश्ता किया था। मुझे लगा हर व्यक्ति को अच्छे भोजन की तलाश मे हमारी तरह दूर दराज भटकना पड़ता है!!!

जय माँ अम्बे।      

विजय सहगल

                 

                 

3 टिप्‍पणियां:

P.c.saxena ने कहा…

आपके यात्रा वृतांत पढ़कर ऐसा लगता है जैसे कि स्वयं ही हम यात्रा कर रहे हैं आपकी लेखनी को बहुत-बहुत साधुवाद जो हमें नए स्थानों से बिना वहां जाए वहां की यात्रा करवाती रहती है

शंकर भट्टाचार्य ने कहा…

मुझे भी लगता है कि सहगल साहब आप इतना सुंदर लिखते हैं कि पढ़ते-पढ़ते ऐसा लगा कि हम भी वही जा पहुंचे। जनवरी 2020 में हम भी माउंट आबू गए हुए थे पर हमें अंबाजी मंदिर के बारे में पता भी नहीं था। अतः हम दर्शन भी नहीं कर सकें!
हम राजस्थान दोबारा जाएंगे। दो-तीन जगह हमसे छूट गया। हल्दीघाटी हम नहीं जा सकें। (हमारे साथ एक परिवार और था। वह लोग जाना नहीं चाहा, तो हम भी हल्दीघाटी नहीं जा पाए।) "हल्दीघाटी" मेरे लिए एक"तीर्थ स्थल" से कम नहीं है। इस बार जाऊंगा तो अंबाजी मंदिर जरूर घुम कर आऊंगा।
आपका लेख बहुत बढ़िया है!!

शंकर भट्टाचार्य ने कहा…

मुझे भी लगता है कि सहगल साहब आप इतना सुंदर लिखते हैं कि पढ़ते-पढ़ते ऐसा लगा कि हम भी वही जा पहुंचे। जनवरी 2020 में हम भी माउंट आबू गए हुए थे पर हमें अंबाजी मंदिर के बारे में पता भी नहीं था। अतः हम दर्शन भी नहीं कर सकें!
हम राजस्थान दोबारा जाएंगे। दो-तीन जगह हमसे छूट गया। हल्दीघाटी हम नहीं जा सकें। (हमारे साथ एक परिवार और था। वह लोग जाना नहीं चाहा, तो हम भी हल्दीघाटी नहीं जा पाए।) "हल्दीघाटी" मेरे लिए एक"तीर्थ स्थल" से कम नहीं है। इस बार जाऊंगा तो अंबाजी मंदिर जरूर घुम कर आऊंगा।
आपका लेख बहुत बढ़िया है!!
- शंकर भट्टाचार्य।