मंगलवार, 23 मार्च 2021

माउंट आबु पार्ट-3 (देलवाड़ा मंदिर)

 

" माउंट आबु पार्ट-3 (देलवाड़ा मंदिर)"

 








11वी -12वी शताब्दी मे अरावली पर्वत श्रंखला के बीच स्थ्ति  देलवाड़ा जैन मंदिर यध्यपि कल भी देख चुका था। पर संगमरमर से निर्मित मंदिर की भव्यता, सुंदरता एवं वास्तु निर्माण के आकर्षण ने मुझे पुनः एक बार दर्शन हेतु मजबूर कर दिया। जैन धर्मब्लंबियों के तीर्थ का मुख्य देलवाड़ा मंदिर जो भगवान आदिनाथ को समर्पित है का संगमरमर से निर्मित वास्तु, स्तम्भ पर यक्ष-यक्षिणीयों की सुंदर श्रंगारित प्रतिमाएँ, मंडप की मुख्य छत्त के नीचे बारीक पुष्प और बेलबूटे से निर्मित आकृतियाँ देखते ही बनती है। मुख्य मंदिर के चारों ओर बरामदे मे अन्य जैन तीर्थांकारों की संगमरमर की प्रतिमाएँ भी दर्शनीय है। काफी देर साफ सुथरे मंदिर प्रांगण के मुख्य मंडप मे बैठने के बावजूद उठने का मन नहीं कर रहा था। मेरा मानना है खजुराहो के मंदिर और देलवाड़ा के मंदिरों का वास्तु सौन्दर्य के सामने ताजमहल की सुंदरता भी फीकी है। जो आध्यात्मिक सुकून, शांति और सुख इन मंदिरों मे  बैठ कर अनुभव की  जा सकती है  कदाचित ही श्रमिकों पर अत्याचार, निर्ममता और हिंसा से निर्मित कराये गये एक शहँशाह के मकबरे मे महसूस होता हो।

बापसी मे वन विभाग द्वारा संचालित  ट्रेवेर्स टैंक के भ्रमण हेतु उनके द्वारा निर्मित एवं  नियंत्रित पार्क बनाया गया है। इस पार्क मे रीछ, जंगली सूअर, बघेरा एवं पार्क के आखिरी सिरे पर स्थित झील मे विभिन्न मछलियों के अतरिक्त  मगरमच्छ, घड़ियाल आदि जलचर भी है। पक्षियों मे जंगली मुर्गे, मोर, उल्लू, मैना, तोता आदि बहुतायत मे कलरव करते मिलेंगे। नितांत सुनसान वनाच्छादित पेड़ो के बीच लोग पैदल ट्रेक करते है पर दोपहिया या चार पहिया वाहनों को आवश्यक फीस के भुगतान पर प्रवेश की अनुमति दी जाती है। दोपहिया वाहन की आवश्यक फी के भुगतान कर लगभग 4-5 किमी लंबे ट्रेक पर अंदर प्रवेश किया। पार्क के आखिरी मे झील मे विभिन्न रंगो और आकारों की मछलियों को देखना रोमांचकारी अनुभव था। मेरे पहुँचने पर कोई अन्य पर्यटक वहाँ नहीं था लेकिन कुछ समय बाद तीन चार अन्य वाहन आने से डर मे कुछ सुकून मिला। कुल मिला के जंगल के बीच यात्रा ठीक ठाक ही रही।

यात्रा के अंतिम पढ़ाव मे सूर्यास्त स्थल देखने के इरादे से प्रस्थान किया जो मेरे होटल के ही नजदीक ही था। अन्य पर्यटन स्थल की तरह माउंट आबू के सभी पर्यटकों  की दिशा सन सेट पॉइंट की तरफ ही थी। वन विभाग द्वारा आवश्यक फीस लेने के बाद लगभग 1 किमी॰ की चढ़ाई थी। एक विशेष छोटी बच्चा गाड़ी की सहायता से लोगो को उपर चढ़ाने की व्यवस्था की गई थी। सीढ़ियों चढ़ कर बड़ी से पहाड़ी से सूर्यास्त देखने की व्यवस्था थी। मेले जैसा माहौल था खाने पीने खेल खिलौने की वस्तुओं के  विक्रय हो रहा था। जैसे ही सूर्य अस्ताञ्चल की ओर बढ़ा मोबाइल और कैमरों के माध्यम से लोगो ने सूर्यास्त के फोटो निकालना शुरू कर दी। दूर पहाड़ियों के पीछे सूरज का डूबना देखना अलौकिक अनुभव था। सूर्य देव एक नई ऊर्जा और शक्ति प्राप्त करने के लिये अस्त हो रहे थे ताकि कल नए ओज और चमक के साथ पुनः उदय हो सके। मैंने भी सूर्यास्त की  कुछ फोटो अपने कैमरे मे कैद  की।            

माउंट आबू की इस शानदार अविस्मरणीय यात्रा ने मन की  प्रसन्नता और उत्साह को आनंद से भर दिया। शानदार मौसम साफ सुथरे वातावरण और धूल रहित पर्यावरण ने मन को मोह लिया। ग्रामीण परिवेश मे लोगो का अभावों और सुविधा रहित रहन सहन के बावजूद उनके सामाजिक और मानवीय मूल्यों से परिपूर्ण स्वभाव ने महानगरों की चकाचौंध को भी फीका कर दिया। माउंट आबू की यात्रा मेरे अंतर्मन की एक शानदार और यादगार यात्रा थी। माउंट आबू परिक्षेत्र और वहाँ के निवासियों को नमन, बारंबार नमन।

विजय सहगल    

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