"स्व॰
डी॰ के॰ चटर्जी"
श्री दिलीप कुमार चटर्जी अर्थात दादा के
देहांत का समाचार दुःखद समाचार का सुन मन
वेदना और संताप से भर गया। उनका निधन 13.03.2021 को रायपुर मे हो गया। मेरी दादा
से मुलाक़ात रायपुर प्रवास पर 1996 मे स्टेट बैंक मुख्य शाखा मे बैंक के एक
प्रदर्शन के दौरान हुई थी। मैंने जब चंबल क्षेत्र ग्वालियर से अपने स्थानांतरण
प्रथम बार छत्तीसगढ़ आने का परिचय दिया तो उन्हे काफी प्रसन्नता हुई। जुलाई या
अगस्त 1996 की वो पहली मुलाक़ात का सिलसिला मेरे छत्तीसगढ़ प्रवास एवं छत्तीसगढ़
प्रदेश के गठन पश्चात भी जनवरी 2000 तक चलता रहा। अविभाजित मध्यप्रदेश एवं
छत्तीसगढ़ के गठन पश्चात भी उनका बैंक ट्रेड यूनियन मे सक्रिय भागीदारी को नहीं
भुलाया जा सकता। एआईबीईए मे सहायक सचिव के साथ ही वे मध्यप्रदेश एवं नवगठित
छत्तीसगढ़ राज्य ईकाई के महासचिव पद पर लंबे समय पदस्थ रहे एवं सेंट्रल बैंक कर्मचारी
फेडरेशन के संयुक्त सचिव भी थे। वे 74 वर्ष के थे।
दुबली पतली काया के धनी लेकिन मजबूत इरादों
के संकल्प और ओजस्वी वक्ता के रूप मे मैंने उन्हे अपने साढ़े चार साल के सानिध्य मे
बैंक कर्मियों के संघर्ष मे सदा अग्रिम पंक्ति मे देखा। सेंट्रल बैंक के पूर्व वे कॉपरेटिव
बैंक जगदलपुर मे जीवन के अपने प्रारम्भिक काल मे पदस्थ रहे। मेरा सेंट्रल बैंक जी॰ई॰रोड
की शाखा मे सैकड़ो बार उनसे मिलना होता रहा। सौभाग्य से उनके बूढ़ा पारा स्थित
पुराने आवास पर भी मेरे परिवार सहित आना जाना रहा। अथिति सत्कार मे अदरणीय भाभी जी
उनके जीवन की सफलता और संघर्ष मे समान रूप से सहभागी रही। दो कमरे के उस छोटे से फ्लैट मे जहां तहां बैंक और
उससे संबन्धित सर्क्युलर, पत्र पत्रिकाओं
एवं साप्ताहिक संदेश के पम्फ़लेट बिखरे पड़े रहते,
इनके बीच मे बमुश्किल बैठने की जगह मे मुझे अथित्य ग्रहण करने का प्रायः सौभाग्य
मिला। साधू संतों की भांति उनका आश्रम रूपी आवास सभी कॉमरेड्स के लिये हमेशा खुला
रहता था। गृह ऋण लेने के बाद उन्होने अपना आवास प्रियदर्शनी नगर मे बनाया था जो भी
हमारे आवास टैगोर गार्डेन के बेहद नजदीक था। उनके मकान का नंबर 365 था जो साल के 365
दिनों की याद दिलाता था इसलिये मुझे आज भी याद है। गृह प्रवेश कार्यक्रम पर मुझे भी शामिल होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ
था। कॉम॰ पुरषोत्तम, पप्पू दादा,
कॉम॰ चौधरी, कॉम॰ मण्डल के साथ
अनेकों बार कलेक्ट्रेट शाखा मे मेरी पदस्थपना के दौरान उनका आना जाना,
सरकारी मांग, ज्ञापन आदि के समबंध लगा रहता था। सफ़ेद सफारी
पहनने और पान के बेहद शौक रखने वाले दादा की अब मधुर स्मृतियाँ ही शेष है।
छत्तीसगढ़ मे दादा के सनिध्य मे बैंक ट्रेड
यूनियन मे दुर्ग, भिलाई,
बिलासपुर लगातार आना जाना रहा। एक सच्चे ट्रेड यूनियानिस्ट होने के नाते मेरे कहने
के बावजूद भी यदा कदा ही उन्होने यूनियन के कार्य हेतु मेरी कार की सेवाएँ ली।
दादा के आग्रह पर एक बार कम्यूनिस्ट पार्टी के महासचिव स्व॰ ए॰बी॰ बर्धन के रायपुर
प्रवास पर उनको मेरी कार से रायपुर हवाई अड्डे से शंकर नगर तक पोस्ट एंड टेलीग्राफ
के यूनियन कार्यक्रम मे छोड़ने का सौभाग्य मुझे मिला जो मेरे लिये अविस्मरणीय पल था।
रायपुर से मेरे ग्वालियर स्थानांतरण पर दादा
का मुझे मेरे परिवार एवं माता-पिता सहित अपने घर स्नेह आमंत्रण मेरे लिये एक सुखद
एवं यादगार पल थे। रायपुर छोड़ने के पश्चात भी,
ट्रेड यूनियन के कार्यक्रमों मे शामिल होने के कारण मेरा उनसे संपर्क इंदौर,
भोपाल और ग्वालियर मे बना रहा। सुगम,
सरल एवं आधुनिक सामाजिक माध्यमों के कारण मेरा होली,
दिवाली, नये वर्ष पर संदेशों का
आदान प्रदान अब तक लगातार बना रहा। दादा उन गिने चुने बैंक कर्मचारी नेताओं मे से एक थे जिन्हे मै सर्वोच्च सम्मान देता
रहा।
चटर्जी दादा को एक सच्चे श्रमिक नेता,
बैंक कर्मियों के सच्चे हितैषी, ट्रेड यूनियन को
समर्पित कॉमरेड से भी बढ़ कर एक ज़िंदादिल,
नेक, मानवीय समवेदनाओं से परिपूर्ण अच्छे इंसान
के रूप मे हमेशा याद किया जाएगा। उनके इस दुःखद निधन पर हम अपनी विनम्र एवं
भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते है। शोक संतृप्त परिवार की इस दुःखद एवं कठिन घड़ी मे हम उनके साथ है, ईश्वर से प्रार्थना करते है कि उनके स्वजनों को
इस आपदा मे धैर्य धारण करने की शक्ति
प्रदान करें। ॐ शांति।
विजय सहगल

1 टिप्पणी:
सच्ची श्रद्धांजलि सर। सहगल सर आप सचमुच एक लेखक से भी बड़कर हैं।
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