" माउंट आबु पार्ट-2"
सूचना - माउंट आबु की विभिन्न पाषाण रॉक्स एवं प्रकृतिक चट्टानों की फोटोस को निम्न लिंक को क्लिक कर देखा जा सकता है : https://sahgalvk.blogspot.com/2021/03/blog-post_17.html
3 मार्च 2021 को गुरु
शिखर तक का पूरा रास्ता साफ सुथरा था। तलहटी से शिखर के बीच सीढ़ियों का रास्ता
यहाँ भी तय करना था। नीचे स्कूटर को छोड़ जब शिखर की ओर प्रस्थान किया तो सारे
रास्ते साफ सफाई देख मन प्रसन्न था पर सारे रास्ते एक कमी दिखाई पड़ी कि सीढ़ियों के एक ओर लोगो ने अपनी दुकान सजा कर
रास्ता घेरा हुआ था और रास्ते के दूसरी ओर लोहे की रेलिंग से सुरक्षा की दृष्टि से
रास्ता घेरा था। शिखर पर चढ़ाई चढ़ने वाले धर्मावलंबियों को विश्राम और सुस्ताने की
कोई तिल मात्र जगह नहीं छोड़ी गई थी। रास्ते के एक ओर पूरे रास्ते दुकानों, चाय की
गुमटियों, और अन्य दूकानदारों का मक्कड़ जाल फैला हुआ था। हम
जैसे थके वरिष्ठ जन मजबूरी मे या चल रहे थे या जहाँ तहाँ सीढ़ियों पर बैठ यात्रियों
की राह मे अवरोध उत्पन्न कर रहे थे। स्थानीय दूकानदारों से "ग्राम पंचायत
ओरिया" की सरपंच का मोबाइल नंबर ले उनसे संपर्क किया। सरपंच जी से तो नहीं उनके
पति श्री प्रेम जी से मोबाइल पर चर्चा हुई। "ग्राम पंचायत ओरिया" (जिला
सिरोही) के क्षेत्रन्तेर्गत आने वाले "गुरु शिखर" की सफाई व्यवस्था की तारीफ हमने प्रेमजी से की और बैठने
की जगह के आभाव से उनको अवगत करा संदेश पहुंचाने का अनुरोध किया। सौभाग्य से सरपंच
पति श्री प्रेमजी भी सेवानिवृत बैंक कर्मी थे, अच्छी बातचीत हुई।
बापसी मे गाँव मे सरपंच जी से मिलने के प्रेमजी भाई के अनुरोध को नहीं ठुकरा सका। बापसी
मे सरपंच श्रीमती शारदा देवी एवं उनके स्टाफ
से मुलाक़ात सुखद थी। मैंने जहां एक ओर उनकी पंचायत द्वारा साफ सफाई की प्रशंसा की
वही दूसरी ओर शिखर पर जाने वाले रास्ते पर यात्रियों के बैठने के स्थान के अभाव से
भी सरपंच जी को अवगत कराया। चाय पानी से सरपंच श्रीमती शारदा जी का अथित्य ग्रहण
करना एवं उनके कार्यालय के स्टाफ एवं उनसे भेंट करना हम पति-पत्नी के लिये एक
अविस्मरणीय पल था।
गुरु
शिखर पर श्री दत्तात्रेय भगवान का मंदिर दर्शनीय था। चटक सिंदूरी रंग मे रंगे
मंदिर की दीवारे किसी देवलोक के से देवालय सा प्रतीत कराती है। प्रकृतिक गुफाओं को
बगैर तोड़े मंदिर निर्माण आधुनिक और पुरातन निर्माण का अनूठा संगम प्रस्तुत करता
नज़र आया। मुख्य मंदिर एक बड़ी चट्टान की
गुफा मे बनाया गया था। शिखर के सर्वोच्च विंदु पर भगवान दत्तात्रेय के चरण कमलों
के निशान को पूजा जाता है जो एक छोटी सी गुफा मे स्थित है। कुछ कदम नीचे पीतल का
एक बड़ा सा घंटा और उससे निकली ध्वनि शिखर के प्रहरी की तरह अपनी उपस्थिती दर्ज़
करती प्रतीत होती रही। ऐसी मान्यता है कि तीन बार ध्वनि करने से मांगी हुई ईक्षा
पूरी होती है। भगवान दत्तात्रेय के चरण कमलों मे नतमस्तक हो तीन वार घंट ध्वनि कर विश्व
कल्याण की कामना की एवं माउंट आबू के सर्वोच्च शिखर की परिक्रमा कर चारों तरफ के सुंदर
नज़रों को अपने मोबाइल और आँखों मे कैद किया। सुंदर मनोहारी दृश्य था।
शिखर
से वापसी यात्रा मे भी पत्थरों की देवाकृतियों को देखने की ललक से स्कूटी को जगह
जगह रोकना जारी था। इन संरचनाओ का लोभसंभारण यात्रा के पूरे होते होते भी मै नहीं
रोक सका। एक कछुआ की सी आकृति ने तो मन ही मोह लिया पर बदजात मानव अपनी घ्राणास्पद छाप यहाँ भी छोड़ने से वाज़ नहीं आया।
जहाँ तहाँ बीयर की बोतलों के टूटे काँच के टुकड़े और अन्य गंदगी उन की पशुता की
कहानी कह रहे थे।
मै
प्रायः भ्रमण के दौरान कोशिश करता हूँ कि घूमने के साथ साथ स्थानीय लोगो से उनकी
भाषा और संस्कृति से अपने आपको जोड़ूँ। उनके रीति-रिवाज त्योहार आदि मे शामिल हो
ज्यादा से ज्यादा जानूँ! दोपहिया वाहन इस तरह की यात्रा को पूरा करने मे सुगम और
सरल होते है इसीलिए मेरी कोशिश होती है कि गहन संपर्क और सरल यात्रा मे दोपहिया
वाहनों से यात्रा करूँ। मेरी अब तक जितनी यात्रा मोटरसाइकल या स्कूटर से हुई बड़ी
यादगार रहीं। बापसी मे एक जगह मैंने महिलाओं के कई समूह एक दिशा मे जाते देखे जो
शायद गाँव के किसी सामाजिक कार्यक्रम से अलग अलग समूहों मे बापस हो रही थी।
महिलाओं के इन समूहों मे एक विशेष समानता मैंने देखी कि वे अपने राजस्थानी पहनावों
के साथ एक हल्के बैगनी रंग का वस्त्र ओढ़े हुए थी। एक ही रंग के इस पहनावे की
जिज्ञासा ने मुझे इस बारे मे और जानने को विवश कर दिया। मै और मेरी पत्नी ने "नमस्ते" और "राम राम"
कहते हुए एक समूह मे चल रही 4-5 महिलाओं
का अभिवादन कर एक ही रंग की ओढनी के बारे मे पूंछा। उन्होने बताया की उनके समाज मे
किसी वृद्ध-बुजुर्ग के देहावसान के बाद आज उस परिवार मे अपनी शोक-संवेदना के कार्यक्रम
मे शामिल हो गाँव के उसी घर से बापस आ रही थी। उन्होने बताया कि कुछ रिश्तेदार तो
दूर दराज के गाँव से पहाड़ी रस्तों से होकर 8-10 किमी॰ पैदल यात्रा कर बापस हो रहे
है। उनकी इस समाजिकता के बारे मे जान मेरा सिर उनके प्रति सम्मान से झुक गया!! उन
महिलाओं का आत्मीयता पूर्ण निश्छल भाव से अपने घर चाय-पानी के आमंत्रण ने मन को
अविभूत कर दिया। शहरीकरण की इस आधुनिकता और भागम-भाग भरी ज़िंदगी की परिस्थितियों मे आज इस
समाजिकता का नितांत अभाव देख मन उदास हो उठता है!! नगरों की चका-चौंध भरे एकाकी
जीवन के कितने अभयस्थ हो गये है कि
सामाजिक जीवन मे हम एक दूसरों के सुख-दुःख मे शामिल होने से भी वंचित रह जाते है।
क्या वास्तव मे हमने ऐसे ही जीवन की आशा पाली थी? क्या ऐसे ही जीवन की कल्पना
की थी?? सोच कर मन उदास हो जाता है।
विजय सहगल

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