शुक्रवार, 19 जून 2020

शाखा विस्तार



"शाखा-विस्तार"


 


ग्वालियर शाखा  मे मेरा कार्यकाल विभिन्न समय मे विविध  हैसियत से रहा। मै 1984 मे यहाँ पहली बार लिपिक पद पर लखनऊ से स्थानांतरण होकर ग्वालियर आया था। इस शाखा मे मैने  ऑफिसर और बाद मे सन् 2000 मे प्रबन्धक के पद पर भी सफल कार्यकाल पूरा किया था। मेरे पूर्व और पश्चात इस शाखा के प्रबन्धक पद को कई अन्य  गणमान्य एवं बैंक के  अखिल भारतीय स्तर पर ख्याति प्राप्त सम्मानीय लोगो ने भी इस पद को सुशोभित किया। मेरे लिये इस शाखा मे प्रबन्धक के पद पर आसीन होना अतरिक्त सम्मान की बात यूं भी थी क्योंकि प्रबंधन/संगठन के श्रेष्ठ पुरुषों  ने मेरे जैसे एक मात्र इकलौते स्केल-ii प्रबन्धक को लगभग 3 वर्ष स्केल-iv की इस  शाखा का उत्तरदायित्व सौंपा था जिसे मैंने सफलता पूर्वक पूर्ण किया। एक बार तत्कालीन सीएमडी द्वारा केवल मार्च माह मे गैर व्याज आय के कमीशन मद के रूप मे पचास लाख रुपए से अधिक की आय प्राप्त करने पर शाखा के स्टाफ को  विशेष प्रशंसा  पत्र देकर सम्मानित किया था। विभिन्न कार्यकालों के प्रवास और निजी  आवास का भी ग्वालियर मे होने के कारण भी ग्वालियर से लगाव होना स्वाभिक था।

सन् 2000 मे ग्वालियर मे बैंक के कार्यालयों की स्थिति करेंसी चेस्ट एवं पाँच  शाखाओं सहित कुल छः कार्यालयों की थी। ग्वालियर सहित चंबल के सभी स्टाफ सदस्यों की आकांक्षा और अपेक्षा के बावजूद भी  सन् 2000 से अनेकों प्रयास के बावजूद सन् 2010 तक, दस  वर्ष के कार्यकाल मे  ग्वालियर मे एक भी शाखा का विस्तार न होना सभी स्टाफ सदस्यों को कचोटता था। ऐसा नहीं था कि इन दस वर्षों मे शाखा विस्तार के प्रयास न हुए हों? यहाँ के स्टाफ यशवीर जी, गुप्ता जी, मिश्रा जी, हिमांशु सहित अन्य अनेकों लोगो  ने ग्वालियर और उसके आसपास अपने अपने स्तर पर मुरार, ट्रांसपोर्ट नगर, सिथौली, ओहदपुर, दतिया, रायरु, बानमोर, महाराजपुर, भितरवार, पिछोर सहित अन्य जगहों का सर्वे भेज शाखा विस्तार के लिये अनथक प्रयास किये पर प्रादेशिक कार्यालय के स्तर पर ग्वालियर और चंबल क्षेत्र मे शाखा विस्तार के कार्य मे रुचि न रखने के कारण 10 वर्षों मे एक भी शाखा न खुली। ऐसा तब था जबकि प्रादेशिक कार्यालय के बैंक विकास और शाखा विस्तार के लिये उत्तरदाई  "योजना और विकास" विभाग, ग्वालियर और चंबल संभाग से विशेष स्नेह करने बाले और संगठन से जुड़े हमारे अपने लोग इस विभाग के प्रमुख नीति नियंता और  सर्वे-सर्वा हुआ करते थे। इन सम्मानीय स्वजनों ने अपने पद की गरिमा और प्रभाव का इस्तेमाल प्रत्यक्ष रूप मे कुछ  क्षेत्र विशेष तक ही सीमित रखा। इस दौरान बैंक/शाखा विस्तार की ये बयार हर साल ग्वालियर क्षेत्र को बगैर छूए निकल पूरे देश सहित भोपाल, रायपुर और  इंदौर क्षेत्र मे बड़ी तीव्र गति से प्रवाहित होती रही। ऐसा होना एक प्रगतिशील संस्था और विशेषतः बैंक मे विकास के लिये अंत्यन्त आवशयक भी था, पर ग्वालियर और चंबल की धरती और यहाँ के लोग टकटकी लगाये बैंक के विस्तार और विकास रूपी बादलों के बरसने का इंतज़ार हर साल लगातार बीस वर्ष  तक करते  रहे पर इन  निष्ठुर निर्दयी बादलों ने एक शाखा रूपी बूंद भी ग्वालियर और चंबल संभाग मे नही गिराई।

2010 मे जब मेरा स्थानांतरण ग्वालियर से भोपाल हुआ तो यहाँ के स्टाफ की मुझसे अपेक्षा थी कि  ग्वालियर और चंबल के प्रतिनिधि के नाते इस क्षेत्र का हित ध्यान मे रख कर यहाँ  शाखा विस्तार के लिये प्रयास करेंगे जो स्वाभाविक भी था। भोपाल पदस्थापना के अपने पाँच वर्ष के दौरान ऐसे अनेकों अवसर आये जब हमने ग्वालियर और चंबल संभाग मे शाखा विस्तार के लिये "योजना एवं विकास विभाग" के प्रधान प्रमुखों के समक्ष  मजबूती से पैरोकारी की, पर दुर्भाग्य रहा कि हम अपने ही बांधवों/स्वजनों  को चंबल मे "एक शाखा के भी विस्तार हेतु" सहमत न कर सके। एक बार तो ऐसी स्थिति आयी जब श्री अशोक  शिवहरे, दतिया कलेक्टर, सीईओ जिला ग्रामीण विकास अधिकरण और मुख्य नगर पालिका अधिकारी जिनकी हमारे कुछ  स्टाफ सदस्यों से  घनिष्ठ मित्रता और पारवारिक रिश्ते थे, हर तरह का प्रशासनिक सहयोग बैंक को उपलब्ध था। उन प्रशासनिक अधिकारियों की ईक्षा भी थी कि हमारे बैंक की एक शाखा दतिया खुले पर प्रादेशिक कार्यालय के चंद नीति निर्धारकों के नकारात्मक रवैये के कारण ये सभी प्रयास निरर्थक और निष्फल रहे।

इन बीस सालों मे बैंक के साथ साथ हमारा प्रादेशिक कार्यालय भोपाल का मानव संसाधन विभाग, योजना और विकास विभाग,  शाखा विस्तार कार्यक्रम, ऋण और जमा राशियों के व्यवसाय का विकास  साल-दर-साल, सीढ़ी-दर-सीढ़ी, मंजिल दर मंजिल नई-नई ऊंचाइयों को छूता रहा पर प्रादेशिक कार्यालय के विकास रूपी सूर्य की एक किरण भी ग्वालियर और चंबल के अँधियारे रूपी विकास को रोशन न कर सकी। हम और हमारे उम्र के समकक्ष लोग बीस साल तक शाखा विस्तार की अधूरी हसरत दिल मे लिये बैंक से रिटायर हो गये और रह रह कर किसी शायर की ये लाइन याद करते रहे:-
     
"मुझे अपनों ने मारा, गैरों मे कहाँ दम था।
मेरी कश्ती वहाँ डूबी, जहां पानी बहुत कम था"॥  

पर कहते है न "समय बड़ा बलवान" होता है। हमारे पवित्र ग्रन्थों मे किसी भी घटना के घटित  होने के चार मुख्य कारक बतलाये गये है। देश, काल, पात्र और परिस्थिति। हमारे क्षेत्र के "शाखा विस्तार" मे भी इन्ही कारकों का प्रभाव रहा।  सरकार की अपनी नीतियाँ और कार्यक्रम के तहत बैंकिंग संस्थाओं को मानों ग्रहण लग गया और एक अप्रैल 2020 को वो अमंगल दिन आया जब बैंकों का समामेलन हुआ जिसमे इन मुख्य कारकों मे से "देश" और "पात्र" तो वही रहे पर "काल" और "परिस्थितियों" मे बदलाव के कारण  वर्षों  की शाखा विस्तार की चाहत भी अब मन मे कोई खुशी न ला सकी।  

क्योंकि "एक बो दिन था  जब बैंक तो था पर ग्वालियर क्षेत्र मे 20 वर्षों मे "शाखा विस्तार" नहीं था,  "अहो दुर्भाग्य" आज शाखा विस्तार (पीएनबी मे मर्जर के बाद ग्वालियर क्षेत्र मे शाखा 5 से 25 हो गई) तो मिल गया पर आज बो प्यारा "ओबीसी बैंक" न था।  

मै जानता हूँ आज ओबीसी इतिहास का एक हिस्सा बन चुका है पर रह रह कर हम सबके दिलों मे "हे ओबीसी तुम ताउम्र जिंदा रहोगे और बार-बार, हर बार  याद आओगे"           



विजय सहगल



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