"आत्मघात के निहितार्थ"
अभी पिछले दिनों सुशांत सिंह नामक अभिनेता
द्वारा आत्महत्या का समाचार,
द्रश्य एवं प्रिंट मीडिया मे सुर्खियों मे छाया रहा। यध्यपि फिल्मों और छोटे पर्दे के कार्यक्रमों मे अधिक
दिलचस्वी न होने के कारण उस अभिनेता और उसके
अभिनय के संदर्भ मे हमे बहुत ज्यादा जानकारी नहीं है। लेकिन सामान्य ज्ञान के नाते उनके एक सामान्य परिवार की पृष्ठभूमि से उठ चकाचौंध से परिपूर्ण अभिनय के
क्षेत्र मे अपने आप को स्थापित करने के "संघर्ष" से भलीभाँति परिचित
हूँ। दिग्गज पारिवारिक और आपराधिक चरित्र
के वर्चस्व वाले इस फिल्मी उद्योग मे बल और वैभवशाली लोगो की चुनौती को तोड़
एक मध्यम वर्गीय युवा का इस मायावी
दुनियाँ मे अपने आप को स्थापित करना एक बहुत बड़ी चुनौती को ललकारने के समान ही था।
जैसा की समाचार माध्यमों, सामाजिक
माध्यमों से सूचना मिल रही है इस तथाकथित चका
चौंध भरी, ठाट-बाट बाली,
छद्म चमक-दमक एवं चमकीली दुनियाँ मे पहले
से सुस्थापित तमाशाई परिवारों के सुकुमारियों,
सुकुमारों, फिल्मी सितारों एवं आपराधिक
डॉनों से सामंजस्य न बैठा पाने के कारण इस युवा अभिनेता ने अपने जीवन की ईह लीला
को समाप्त कर लिया। अभिनय, अभिनेता और अपने
सीमित फिल्मी ज्ञान को हम छोड़ भी दे तो एक
युवा के इस तरह असमय दुनियाँ से प्रस्थान से चिंतित और दुःखित होना स्वभविक है। मै कोई बहुत बढ़ी हस्ती तो नहीं पर मध्यम वर्गीय
परिवारों की संघर्षशील जीवन के अनुभव के
आधार पर तो कह ही सकता हूँ कि विपत्तियों संकटों से युद्ध मे इस तरह के पलायन से
कहीं बेहतर है इन आपत्तियों या विपत्तियों के सामने डट कर संघर्ष करना फिर भले ही
युद्ध मे खेत रह वीरगति को प्राप्त हों जैसे भगवान श्री कृष्ण ने श्रीमद्भगवद गीता
के अध्याय दो के श्लोक सैतीस मे अर्जुन से कहा है:-
"हतो
वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्"।
"तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः"॥ (2.37)
"तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः"॥ (2.37)
(अर्थात अगर
युद्धमें तू मारा जायगा तो तुझे स्वर्गकी प्राप्ति होगी और अगर युद्धमें तू जीत
जायगा तो पृथ्वीका राज्य भोगेगा। अतः हे कुन्तीनन्दन! तू युद्धके लिये निश्चय करके
खड़ा हो जा।)
ऐसा नहीं है इस तरह के
आत्मघाती कदम सिर्फ फिल्म उद्योग के लोगों द्वारा ही उठाये गये हों? जीवन के
व्यवसायगत या पेशागत स्पर्धा मे अहंकारी और अभिमानी वरिष्ठों एवं वैधानिक शक्तियों के मद मे चूर नौकरशाहों और
राजनैतिक नेताओं द्वारा अपने अधीनस्थों और
आम जनों के विरुद्ध इस तरह के उत्पीढन, अत्याचार, जुल्म, ज्यादती होते देखना आम बात है। सरकारी प्रतिष्ठान और बैंक भी
इससे अछूते नहीं है। कुछ वर्ष पूर्व जुलाई
2014 मे चंडीगढ़ मे पंजाब नेशनल बैंक के एक
मुख्य प्रबन्धक द्वारा अपने प्रबंधन वर्ग के अधिकारियों द्वारा प्रबन्धक मीटिंग मे सार्वजनिक रूप से अपमानित, प्रताड़ित और तिरस्कार पूर्ण व्यवहार के कारण ट्रेन के सामने कूद
आत्महत्या की घटना व्हाट्सप पर खूब प्रवहित और प्रचारित हुई थी। एक अन्य घटना मे
ओबीसी के कानपुर शाखा के मुख्य प्रबन्धक द्वारा सितम्बर 2013 मे फांसी लगा आत्महत्या का मामला भी काफी
सुर्खियों मे रहा था जिसके लिये मृतक ने प्रादेशिक स्तर के अधिकारी और अन्य स्टाफ
को आरोपित और उत्तरदाई ठहराया था। इस तरह
की अन्य अनेकों घटनायेँ विभिन्न विभागों
और क्षेत्रों मे घटी लेकिन कदाचित ही किसी
घटना मे आत्मघात के लिये प्रेरित और बाध्य करने बाले किसी अधिकारी और नौकरशाह को
कभी कोई सजा मिली हो। सुशांत जैसे युवा द्वारा उठाये गये आत्मघाती कदम मे भी तमाम
न्यायिक मांग के बाबजूद फिल्मी कॉकस या
अंडर वर्ल्ड का कोई सदस्य या सरगना पकड़ा या दोषी पाया जायेगा इस मे संदेह है??
बैसे बैंकों मे "नेपोटिस्म"
तो नहीं है पर कुछ उच्च अधिकारियों का अपने अधीनस्थों के विरुद्ध वाणी और उत्पीढन रूपी
"टेररिस्म" अवश्य है। ऐसे ही मुझे भी हमारे कई अन्य साथियों को एक
अधिकारी के व्यवहारिक क्रूरता और अन्याय का कोप भाजन होना पड़ा था। इस तरह के
अधिकारी ये मान कर चलते है कि वे ही अपने कार्य और व्यवहार के दम पर संस्थान चला
रहे है बाकी सभी स्टाफ अपने काम मे कोताही
वर्तेते है। ठीक बैसे ही जैसे कहावतों मे
उस "कुक्कुर के भ्रम को बताना जो
बैलगाड़ी के नीचे चल रहा है और उसे ये गुमान है कि बैलगाड़ी का सारा बोझा उसके उपर
है और बो ही बैलगाड़ी को खींच रहा है"।
कई बार राजस्व मे छूट या
माफी के लिये शाखा प्रबन्धक प्रादेशिक और आगे प्रधान कार्यालय को सिफ़ारिश करते, पर जिसका
निराकरण प्रादेशिक या प्रधान कार्यालय स्तर पर महीनों और कभी कभी सालों पेंडिंग पड़ा रहता है। बगैर इन समस्या का
निराकरण किये राजस्व की बसूली का दबाब उचित न था, उपर से
तुर्रा कि वसूली न करने की दशा मे राजस्व की वसूली प्रबन्धक के व्यक्तिगत खाते से
करने की धमकी उस कहावत को चरितार्थ करती कि "मारे और रोने भी न दे"। इस कार्य व्यवहार का आतंक पूरे क्षेत्र की शाखाओं
मे सर चढ़ कर बोलता था।
पूर्वाग्रह
के कारण कार्यालय के न्यूनतम शिष्टाचार मे अभिवादन का प्रत्युत्तर न देना,
किसी घंटे दो घंटे के कार्य को देने के बाद हर पाँच-दस मिनिट मे उसके बारे मे
पूंछना और सिर पर सवार रहना, अपने प्रबन्धकों से अपने
निजी सचिव की तरह टेलीफ़ोन ऑपरेटर का कार्य लेना,
क्लास टीचर की तरह सभी के सामने दुर्व्यवहार करना,
वरिष्ठ को सीट से उठा कर कनिष्ठ को उसकी कुर्सी पर बैठा प्रताड़ित करना उनके पोषित संस्कारों मे समाहित था। दूसरे पक्ष को
पूरा सुने बिना ही अपनी बात
"नहीं....नहीं.... से शुरू कर अपना मन्तव्य थोप देना उनके स्वभाव का हिस्सा
था। चिकित्सा शास्त्र, इतिहास,
भूगोल, आयुष शास्त्र,
विज्ञान सहित दुनियाँ का कोई ज्ञान उनसे अछूता न था जिसमे वे परास्नातक न हों! कई
मुख्य प्रबन्धकों को उनके पद और उम्र का लिहाज किये बिना उनके साथ अपमानित और नफ़रतपूर्ण
व्यवहार के कारण वे हीनता की भावना महसूस करते। कोई उच्च पदस्थ अधिकारी अपने अतिवादी
और तिरिस्कृत व्यवहार से अपने अधिनास्थों
का उत्पीढन, शोषण या जुल्म की इस हद
तक कैसे जा सकता है? उसके इस अमानवीय
व्यवहार की पीढ़ा से परास्त होकर चार मुख्य प्रबन्धकों ने अपने पद से स्वैच्छिक
सेवानिवृत्ति ले ली। दूसरों को कर्तव्यों का बोध करा नसीहत देना और स्वयं अपने पूर्व कार्यकलापों के
मद मे अकंठ सराबोर डूबे रहने बाले अधिकारी
का मै भी अगले क्रम मे पाँचवाँ मुहरा हो सकता था पर अपने मित्रों के उच्च संपर्कों
के चलते कुछ दिन इंतजार के परामर्श के कारण उस निष्ठुर का शिकार होने से बच गया।
ऐसे अधिकारियों के कार्यकाल मे इनके व्यवहार से
सताये गये पीढ़ित, शोषित अधिकारियों की संख्या शोध का विषय हो सकती है। संख्या
की द्रष्टि से अति सूक्ष्म इस तरह के प्रबंधन वर्ग के लोगो ने बैंक के मानव संसाधन
रूपी बैंक की पूंजी का बड़ा अहित किया है। क्या
ऐसे कर्मी श्रेष्ठता के भाव से पोषित,
मानसिक रुग्णता से ग्रसित नहीं प्रतीत होते?
दुर्व्यवहारपूर्ण रवैये की पीढ़ा से ग्रसित इन अधिकारियों की असमय स्वैच्छिक
सेवानिवृत्ति लेना कदाचित आत्मघात तो नहीं पर पर वैचारिक आत्मघात से कम भी
न था।
अतः
युवा सुशांत सिंह सहित चंडीगढ़ के मुख्य प्रबन्धक स्व॰ अजय एवं कानपुर के मुख्य
प्रबन्धक स्व॰ सुनील सहित अन्य व्यक्तियों का आत्मघाती कृत पीढ़ा और क्लेश देने बाला
है,
जिनके कारणों पर गहन चिंतन मनन की
आवश्यकता है। समाज के ऐसे होनहार नागरिकों
को अत्महत्या के लिए प्रेरित करने बाले इस तरह के अतिवादी और आततायी इस बात को
ध्यान पूर्वक सुन ले कि वैधानिक संस्थाओं मे व्यवस्थाओं से प्राप्त आपकी सर्वशक्ति
सम्पन्नता, वैभवता और बलिष्ठता सिर्फ और सिर्फ उनके पद पर बने रहने तक ही है अन्यथा उन्हे एक
अदना कर्मचारी भी शायद ही एक गिलास पानी के लिये कभी पूंछे।
विजय सहगल


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