"फकीर"
1993
मे मैंने पोरसा
शाखा की शुरुआत जिला मुरैना मध्यप्रदेश मे की थी। पहली बार मैनेजर बना था कुछ
अतिउत्साह उसी तरह था जैसे "नया नया मुल्ला प्याज ज्यादा खाता है"।
आर्थिक रूप से सम्पन्न पर सामाजिक रूप से और साक्षारता की द्रष्टि से पिछड़ा था
पोरसा। नगदी फसल सरसों की बहुलता से उत्पादन करने बाला ये तहसील स्तर का स्थान
सरसों के तेल उत्पादन मे अपना एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
बैंक
के विकास और व्यवसाय को बढ़ाने मे मैंने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। मुख्य बाज़ारों मे
संपर्क के बाद सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं मे संपर्क भी किया। वमुश्किल एक सवा किलोमीटर की परधि मे पोरसा को समेटा जा
सकता था। घनी आबादी बाला ये क्षेत्र सभी उपभोगता वस्तुओं के खपत और सेवन मे भी ये
क्षेत्र अव्वल है। घी तेल, शक्कर एवं अन्य
खाध्य पदार्थ की खपत सहित निर्माण,
परिधान, जूते चप्पल के साथ साथ
जमीन संबंधी मामलों मे आपसी लड़ाई झगड़े,
मारपीट और कभी कभी हत्याओं जैसी घटनायें
यहाँ आम बात है क्योंकि बेशकीमती कृषि भूमि सरसों के उत्पादन हेतु बहुत ही अनुकूल है।
गरम स्वभाव का एक मुख्य कारण चंबल के पानी की तासीर और हर परिवार के किसी न किसी
सदस्य का सेना मे होना तथा अधिकतर घरों मे विभिन्न तरह की लाईसेंसी बंदूके आम होना
एक मुख्य बजह है। डाकू पुतली बाई, डाकू मान सिंह,
डाकू माधो सिंह, मोहर सिंह एवं डाकू पान
सिंह तोमर जैसे अन्य अनेक दस्यू सरगना भी इसी क्षेत्र से हुए है। इन सभी नकारत्मक छवि के
बाबजूद बाहरी आगंतुकों के लिये ये स्थान मानों स्वर्ग है बस आपको यहाँ के
रहवासियों की आंतरिक राजनीति मे बगैर पक्षपात के अनासक्त भाव रखना आवश्यक है। यहाँ
के लोग अपनी मेहमानबाजी आगंतुकों को ऊंचतम दर्ज़े का सम्मान और प्रत्येक चीजों मे चीनी की प्रचुर मात्रा पेश कर करते है फिर चाहे वो
चाय, दूध,
तसमई (खीर) या शरबत हो या अन्य कोई मिष्ठान पदार्थ।
एक दिन बैंक व्यवसाय के विस्तार योजना अंतर्गत शाखा के पीछे स्थित आवासीय क्षेत्र "नई बस्ती" मे संपर्क का कार्यक्रम बनाया। घरों मे मिलने बाले लोगो को बैंक मे खाता खोलने और बचत जमा करने को प्रेरित किया। कुछ परिवारों की आर्थिक माली हालत कमजोर दिखी उनको रोजगार या अन्य हुनर के लिए ऋण की योजना से अवगत कराया। बातचीत मे एक नौजवान लड़का जो लकड़ी का छोटा सा व्यवसाय कर चारपाई के पाये बनाने का कार्य करता था। जब मैंने उसे एक पाया बनाकर दिखाने को कहा तो उसने तुरंत ही एक ढाई-तीन फीट लंबे चौकोर लकड़ी के टुकड़े को मशीन के दो सिरों के बीच फंसा कर मोटर चालू कर दी। मशीन के साथ ही उक्त लकड़ी का टुकड़ा भी तेजी से घूमने लगा। उस लड़के ने "खराद" बाले तेज ब्लेड से लकड़ी के टुकड़े को एक सिरे से छीलना शुरू किया और कुछ ही मिनटों मे लकड़ी को जगह जगह गोल आकार देकर ऊपरी सिरे को चौकोर ही रख सुंदर पाये की शक्ल दे दी। आगे उसने बातचीत मे एक मल्टी-पर्पज मशीन खरीदने के लिए ऋण लेने की ईक्षा प्रकट की जिसकी लागत लगभग एक लाख थी मैंने तुरंत ही उस ऋण स्वीक्रत करने की सहमति देकर अन्य औपचरिकताए पूरी करने को कहा।
रास्ते मे जाते समय एक वयोवृद्ध महिला ने लगभग प्यार से डांटते हुए "सुन लला" कह केरोसिन स्टोव मे पिन से सफाई कर जलाने का आग्रह किया। जिसे मैंने स्वीकार कर स्टोव को पिन से साफ कर ठीक किया और जब नजदीक गुजरने बाले राहगीर ने उस दादी माँ को बताया ये बैंक मैनेजर है तो सुन कर उक्त महिला अपने वृद्धावस्था मे दिखाई न देने का वास्ता देकर अपने किये पर अफसोस प्रकट कर क्षमा मांगने लगी। मैंने कहा माँ जिस अधिकार से तुमने आग्रह किया उसे तो किसी भी कीमत पर मै मना न करता। हम दोनों एक दूसरे के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित कर आगे बढे।
एक अन्य घर मे गृह स्वामी से मिला जब मैंने उन्हे अपना परिचय बैंक प्रबन्धक के रूप मे दे हमारे बैंक मे खाता खोलने का आग्रह किया तो उन्होने बड़े गरम जोशी से हाथ मिलाकर अपनी सहमति प्रकट कर घर मे आमंत्रित किया। सौजन्यता वश जल ग्रहण करने को उनके आग्रह को मै न ठुकरा सका। उन्होने बड़े सम्मान के साथ घर मे चाय बनवाई और एक काले अजीब चमकदार झोले से एक बड़ा पर साफ सफ़ेद कप के साथ विस्कुट का एक छोटा पैकेट निकाल कर मेहमानवाजी का आदर्श उदाहरण प्रस्तुत किया जिसे मैंने बड़ी सहजता से स्वीकार किया। इस पूरे घटना क्रम को देख ऐसा प्रतीत हुआ मानों उन सज्जन की आर्थिक स्थिति बहुत ज्यादा अच्छी न हो पर उनके उत्साह वर्धक भाव और प्रेरणादाई शब्दों ने हमे उनका आथित्य स्वीकारने के लिए बाध्य कर दिया।
बात आई-गई हो गई हम भी अपने बैंकिंग कार्यों की व्यस्तता के चलते उक्त घटना के साथ अन्य घटनाओं के विस्मृत कर अपने दैनंदनी कार्यों मे व्यस्त हो गये।
एक दिन मै अपनी शाखा के नीचे (शाखा प्रथम तल पर है) सड़क पर खड़ा था मैंने देखा एक फकीर भेष धारी व्यक्ति लंबे बाल, हारा कुर्ता उसके उपर काली जैकिट, काले पीले, सफ़ेद लाल कंचे नुमा बड़े बड़े मोती की माला गले मे डाले सिर पर काला पट्टा बांधे था। हाथों की दसों उँगलियों मे करीब 10-12 भिन्न-भिन्न रंगों और आकार की अंगूठियाँ पहने था। जिस हाथ मे लोहे और स्टील के अनेकों कड़े पहने उसी हाथ मे एक छोटा डांडा लिए तथा दूसरे हाथ मे गोल भिक्षा पात्र के साथ कुछ मोरपंख लिए बैंक की बायीं ओर आठ दस दुकानों पूर्व से दाता के नाम से रुपए दो रुपए मांगते चला आ रहा है। कुछ को दान के बदले मोर पंख सिर पर हौले से मारता और उपर बाले से दुआ कबूल करने की अरदास करता तथा छोटे डंडे से हाथों मे पहने कड़ों मे इस तरह मारता कि एक संगीतमय स्वरलहरी वातावरण मे गूंजने लगती। हमसे दो-तीन दुकान पूर्व चाय बाले एक दुकानदार ने उसे एक छोटा बिस्कुट का पैकेट दिया और चाय को देने के विचार से फकीर को कहते ही उस फकीर ने झोले से सफ़ेद कप निकाल उसके काउंटर पर रख दिया जिसमे चाय बाले ने चाय उढेल कर भर दी। कुछ देर चाय पीने के बाद वह पुनः हमारी ओर बढ़ा। उसे देख हमे लगा जैसे इस व्यक्ति को हमने कहीं देखा है। मन मे जिज्ञासा हो उठी कहाँ देखा होगा और नजदीक आने पर मेरी कौतुहूल नज़रे उसके उस विशेष जादुई काले झोले पर पड़ी जिसमे चमक दार चाँदी जैसे सलमा सितार लगे हुए थे। मै इस फकीर नुमा व्यक्ति की इसी उधेड़ बुन मे खोया था कि अचानक ही उसने हमारे पास आकार उसी संगीतमय डंडे से हाथ मे पहने कड़ों मे चोट की आवाज से झलंकृत ध्वनि निकाल, "फकीर को कुछ मिलेगा, "जनाब" की गुजारिश की। तभी दिमाक पर ज़ोर लगाने पर कुछ दिन पूर्व नई बस्ती मे संपर्क अभियान के तहत गये उस व्यक्ति की याद हो आई जिसने हमारी मेहमान बाजी के चलते इसी जादुई झोले से बिस्कुट का छोटा पैकेट और सफ़ेद कप निकाल हमे चाय बिस्कुट खिलाये थे। फकीर द्वारा पुनः दान देने और डंडे से उत्पन्न संगीतमय ध्वनि से मानों मै सोते से उठा और फकीर से हाथ जोड़ "माफ करो बाबा" कह आगे वढ्ने का इशारा कर बिदा ली।
फकीर तो आगे बढ़ गया और पीछे छोड़ गया बो यादें जिसमे मन ही मन मै सोचता रहा कि इस मांगने बाले फकीर भिखारी और बैंक मैनेजर के व्यवसाय मे कितनी समानता है कि उस दिन मै मांगने (बैंक व्यवसाय) इस के घर गया था और उसी मांगने के व्यवसाय के तहत आज ये फकीर हमारे घर (बैंक मे) मांगने आया है। मैने हँस कर ईश्वर को याद किया कि तेरी लीला अपरमपार है। मन ही मन अपने को संबोधित कर कहा "वाह! मैनेजर साहब, भिखारी से भी भीख मांगनी पड़ेगी", ऐसी कल्पना भी की थी कभी?? अपने आप पर हलके फुल्के हास्य का संदर्भ लेते हुए मैंने, ठहाका! मारकर खुले आसमान को संबोधित कर कहा, "हे संत कबीर दास जी आपके इस कथन को एक मैनेजर के नाते झुठलाने के लिये मै आपसे क्षमा प्रार्थी हूँ कि":-
"मांगन मरन समान है,
मत कोई माँगे भीख"।
"मांगन ते मरना भला,
ये सतगुरु की सीख"॥
क्योंकि उस फकीर और मैनेजर के नाते मै, हम दोनों की वृत्ति ही मांगना है और विन मांगे दोनों का ही निर्वाहन बहुत ही दुरूह है अतः आपके इस दोहे को मिथ्या सिद्ध करने का दुस्साहस कर रहा हूँ? हे संत मुझे माफ करना!!!!
विजय सहगल



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