शनिवार, 13 जून 2020

तालाब-मछ्ली और आदमी


"मछ्ली-तालाब और आदमी"



दिल्ली एवं राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र मे  ऊँची-ऊँची, कई-कई मंज़िला इमारतों को देख लगता था कि इन बहुमंजिला इमारतों मे प्रबुद्ध वर्ग के  भले और कुलीन परिवारों के लोग रहते होंगे जो समाज के उच्च वर्ग के संभ्रांत समाज से संबद्ध रखते होंगे। ये पढे-लिखे बुद्धिजीवी वर्ग के लोग एक दूसरे के सुख सुविधाओं और सामाजिक नैतिकताओं का पालन समाज के औसत वर्ग के दर्जे के नागरिकों से कहीं अधिक ज़िम्मेदारी एवं सहृदयता  से करते होंगे। राजधानी मे रहने का मेरा ये पहला अनुभव था।  इससे पहले तक मेरा  जीवन देश के कुछ मध्यम वर्गीय शहरों तक ही सीमित रहा था। पिछले 3-4 वर्ष से मुझे  दिल्ली एनसीआर की  बहुमंजलि हाउसिंग सोसाइटी मे रहने का सौभाग्य मिला।

सोसाइटी का रखरखाव, सफाई व्यवस्था, सुरक्षा व्यवस्था, पार्क, स्विमिंग पूल ठीक ठाक हो सामान्य दर्जे का ही था। अधिकतर वासिंदे मिलनसार और व्यवहारिक थे, सोसाइटी मे बनी रहवासी समिति के लोग जागरूक और क्रियाशील थे और जहां बड़े बड़े राष्ट्रीय और सामाजिक त्योहार उत्साह पूर्वक मनाये जाने के कारण हर उम्र और वर्ग के बच्चे, महिलाये युवा और पुरुष प्रत्येक कार्यक्रमों मे बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते देखना सुखद लगता।

अधिकतर रहवासी अनुशासन मानने बाले और शांति प्रिय लोग थे। पर  इस सबके बाबजूद एक चुभने बाली अप्रिय घटना मैंने इन दिनों लॉक डाउन खुलने पर देखी जिसे देख कर दुःख और वेदना हर उस रोज या यूं कहे प्रत्येक दिन देखने को मिली  जब प्रातः भ्रमण के लिये सोसाइटी के ग्राउंड फ्लोर के एक सिरे (प्रेवेश द्वार) से दूसरे छोर (निकासी गेट) तक जाने के दौरान जब सोसाइटी के एक ब्लॉक का कोई अजनबी  रहवासी धूम्र पान का शौक रखता पर सिगरेट के बचे ठूंठ (बचे हुए अनुपयोगी हिस्सा) को अपनी मंजिल के नीचे से गुजरने बाले रास्ते पर फेंक देता। 21 मंज़िला उस इमारत के अज्ञात फ्लोर के उस अज्ञात   रहवासी के सिगरेट पीने के इस  शौक से  भला किसी को क्या आपत्ति हो सकती थी?, पर उन बचे ठूंठ को एकत्रित कर घर के कचरे दान मे न फेंक बीच रास्ते पर फेंकना अप्रिय लगता।  कोई व्यक्ति धूम्रपान का शौक तो करे पर उससे उत्पन्न होने बाली या फैलने बाली गंदगी से सोसाइटी के  दूसरों रहवासियों के लिये समस्या बने तो उसके इस कृत पर प्रश्न उठना और  निंदा या आलोचना होना स्वाभाविक ही था।

सिगरेट के बचे ठूंठ और कुरूप कैंसर की तस्वीर बाली डिब्बी को देख उस नामहीन कुसंस्कारित व्यक्ति की  इस कढ़वी सच्चाई से जब सामना हुआ तब  मेरे दिल मे चली आ रही बहुमंजलि इमारतों मे रह रहे लोगो की धारणा को टूटते विखरते देख दिल को बड़ी ठेस पहुंची और इस कहावत को चरितार्थ होते देख और सुन बड़ा दुःख हुआ कि "कैसे एक मछ्ली सारे तालाब को गंदा करती है"।
ये घटना सामान्य दिनों मे उस स्थान पर ध्यान न देने के कारण  उतनी चुभने बाली न थी क्योंकि तब नोएडा अथॉरिटी के गार्डन मे घूमने जाने के कारण उस स्थान से दिन मे बमुश्किल एक या दो बार ही निकालना होता था। लेकिन लॉक डाऊन के खुलने के  कारण अपने स्वअनुशासन एवं सोसाइटी के अंदर ही भ्रमण का संकल्प लेने के कारण उस गंदगी से हर चक्कर मे सामना होना और देखना बड़ा कष्ट और दर्द देने बाला लगता। ब्लॉक की बहुमंजिला इमारत की किस फ्लोर से उक्त अमानवीय, उच्छृंखल रहवासी अपनी  हठधर्मिता और नकारात्म कुसंस्कारों से पोषित धूम्रपान की गंदगी क्यों नीचे फेंकता है? नहीं मालूम पर उस व्यक्ति का घिनोना चेहरा ग्राउंड फ्लोर के उस रास्ते मे पड़े सिगरेट के  ठूंठ और खाली सिगरेट की डिब्बी के रूप मे मार्ग के दोनों ओर काफी दूर तक दिखाई देते, जिनकी संख्या 20-30 से अधिक रहती होगी और जो हवा के कारण दोनों दिशाओं मे 10-15 मीटर तक उड़ कर विखरे हुए दिखाई देते! काश इस "महा मानव" के माता-पिता या बड़े भाई बहिनों  ने बचपन मे इसकी गंदी या बुरी आदतों के लिये डांट लगाई होती या कान खींचे होते तो कदाचित ऐसी  उद्दंडता या हट्धर्मिता वो इस सभ्य समाज मे न करता। कैसे कोई  एक व्यक्ति सोसाइटी के लगभग 500 आवासों मे रह रहे ढाई तीन हज़ार रहवासियों के जीवन को नरकीय स्थिति  मे डाल वातावरण को अप्रिय और दूषित बना सकता??

ऐसा नहीं था कि सोसाइटी के सफाई कर्मचारी अपने कार्य मे कोई कोताही वर्त रहे थे पर सिर्फ उस एक अज्ञात रहवासी द्वारा पूरे क्षेत्र मे गंदगी फैलाने के कारण उक्त छोटे छोटे सिगरेट के टुकड़े झाड़ू लगाने के बाबजूद झड़ने से रह जाते और यही टुकड़े 2-3 दिन मे संचयी गणना के कारण कभी कभी 40-50 की संख्या मे दिखाई देते, उपर से सिगरेट की खाली डिब्बी जिस पर बड़ी ही विभत्स कैंसर  की तस्वीर छपी रहती है स्थान के वातावरण को बड़ा रौद्र और भयावह नज़ारा प्रस्तुत करती।

एक कहावत के अनुसार क्या इस तरह के नागरिक "झड़े मे कूड़ा" (अर्थात साफ सुथरे स्थान मे पड़े कचरा) के समान नहीं है? क्या दूसरों के लिये संकट और दुःख पैदा करने बाले ऐसे कुसंस्कारित नागरिक  सोसाइटी ही नहीं देश और दुनियाँ  के लिये अनउत्पादक  बोझ के समान नहीं हैं? इन अधम शक्तियों के विरुद्ध सोसाइटी के हजारों  व्यक्ति भी बौने दीख पड़ते है? क्या इन सहस्त्र  बुद्धजीवियों को संगठित होकर इस मूढ़ व्यक्ति के हठधर्मिता पूर्ण  व्यवहार को बदलने के लिए अगाह नहीं करना चाहिये?, और अगर चेतावनी के बावजूद न माने तो वैधानिक कार्यवाही कर समाज के लिये संकट बने ऐसे व्यक्ति  के विरुद्ध  नागरिकों के अधिकारों के हनन के लिये आवश्यक कार्यवाही पर विचार नहीं करना चाहिये?

वर्तमान मे अपने देश की ये सबसे बड़ी विडम्बना ही नहीं बल्कि कढ़वी सच्चाई है जब चंद असामाजिक तत्वों के सामने अधिसंख्य शांति प्रिय सुबोध नागरिक मौन रह बौने नज़र आते है? आइये इस विषय मे चिंतन मनन कर अपने लिये समुचित मार्ग चुने!!   
           
विजय सहगल

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