"जीवन हारा....."
दिवस गये बीते महीने,
वर्षों ने गाया गीत नया॥
जीवन हारा विधि जीत गया॥
राजतिलक की थी तैयारी।
हर्षित प्रजा अवधपुर सारी॥
कोप भवन वर,
दो सुध आये।
कनक धाम हा! शोक बढ़ाये॥
दिवा स्वपन ऐक क्षण टूटा।
सच हारा,
जीता हठ झूठा॥
मिट गई
हाथों की रेखायें।
भूपति भरत,
राम वन जायें॥
मनन मंथरा पुनीत भया।
जीवन हारा विधि जीत गया॥
मस्तक रेखा पथ बतलाता।
भाग्य विधाता
इठलाता॥
लिखे थे महले दुमहले जिनके।
भटके वन-वन सपने तिनके॥
कहाँ मुदित मंगल थे सपने।
हुए कुटिल कंटक पथ अपने॥
कब सावन बीता,
शीत नया।
जीवन हारा विधि जीत गया॥
मखमल के नरम बिछौने थे।
सेवक हर क्षण हर कौने थे॥
कानों मे कुण्डल की शोभा।
जनक नंदनी ने मन मोहा॥
वो राजमहल महारानी थी।
पर नियति को कहाँ सुहानी थी॥
घर एक वचन से रीत गया।
जीवन हारा विधि जीत गया॥
उस राज्य के वो युवराजे थे।
श्री राम,
अनुज दुलारे थे॥
दोनों "वर" से वो बंधे न थे।
सब के साधे वो सधे न थे॥
राम सिया संग सहचर थे।
अनुज राम दृढ़ अनुचर थे॥
बन भ्रात प्रेम का गीत नया।
जीवन हारा विधि जीत गया॥
उर्मिल राजभवन रहती।
स्वामी विरह,
वियोग सहती॥
महलों मे था जिसका आवास।
वह श्राप बिना भोगी वनवास॥
वह पति प्रेम की दासी थी।
पर पानी मे मीन प्यासी थी।
उसका तप महलों भीत गया।
जीवन हारा विधि जीत गया॥
अग्रज राम बने,
वनवासी।
अधिपति भरत अयोध्या शासी॥
राज्याभिषेक,
राज सिंहासन।
रामचरण पद,
"नीति" शासन॥
पलक पांवड़े थी
मातायेँ।
नैन गिरे अविरल धारायेँ॥
मंत्र कैकई फलीत भया।
जीवन हारा विधि जीत गया॥
विजय सहगल


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