मंगलवार, 29 जून 2021

स्टाफ ट्रेनिंग कॉलेज की ट्रेड मिल

 

 

"स्टाफ ट्रेनिंग कॉलेज की ट्रेड मिल"





कुछ गतिविधियों का शौक किसी व्यक्ति को बचपन से ही लग जाता है और इस के लिये कोई देश, काल या पात्र अर्थात समय, स्थान या व्यक्ति इसके लिये प्रेरणा का हेतु बनता है। बचपन मे अपने बड़े भाई साहब शरद सहगल की प्रेरणा से उनके साथ लक्ष्मी व्यामशाला, झाँसी  जाना शुरू किया था। कालांतर मे स्व॰ श्री सीता राम गुप्ता जी के सानिध्य मे कॉलेज स्तर पर मलखम सीखा। झाँसी मे स्वास्थ और व्यायाम का जो सिलसिला बचपन मे शुरू हुआ था पठन पाठन के पश्चात सेवारत होने के साथ लखनऊ, ग्वालियर, रायपुर, भोपाल, दिल्ली नोएडा होते हुए आज भी निरंतर जारी है।

सन् 2001 मे ग्वालियर पदस्थपना मे इसी व्यायाम की प्रवृत्ति के बशीभूत एक पैदल/दौड़ने वाली बालबेयरिंग युक्त रोलर पर फिसलने वाली मानवीकृत ट्रेड मिल खरीदी। चूंकि बिजली  मोटर से युक्त ट्रेड मिल महंगी थी तथा दाम मे दुगने से अधिक का अंतर था। इस तरह की मानवीकृत रोलर पर फिसलने वाली ट्रेड मिल का अनुभव मै वर्षों पूर्व 1987-88 मे  बैंक के स्टाफ ट्रेनिंग कॉलेज मे देख चुका था जो कि बहुत अच्छा नहीं था। 2-3 दिन उपयोग के पश्चात हमे लगा कि इस पुरानी तकनीकि की ट्रेड मिल उपयोग मे सरल और मित्रवत न होने के कारण ये यूं ही अनुपयोगी पड़ी रहेगी और  इसका पैसा यूं ही बेकार जाया होगा। यध्यपि उन दिनों वेतन इतना ज्यादा नहीं था कि बीस-बाईस हजार की राशि के बड़े व्यय को अचानक झेल सके। लेकिन मरता क्या न करता आठ-नौ हजार की मानवीकृत ट्रेड मिल के अपव्यय से बचने के लिये मजबूरी मे विधुत  मोटर की ट्रेड मिल लेनी पड़ी। लेकिन उस समय उक्त बड़े व्यय का निर्णय सही रहा क्योंकि उस विधुत मोटर युक्त ट्रेड मिल का भरपूर उपयोग अब तक लगातार परिवार द्वारा  होता आ रहा है।

ठीक ठाक तो याद नहीं लेकिन स्टाफ प्रशिक्षण कॉलेज न्यू फ़्रेंड्स कॉलोनी के बाद  नोएडा मे शुरू हो चुका था और मै पहली बार इस महाविध्यालय मे शायद 1987-88 मे प्रशिक्षण हेतु आया था। परिसर के अंदर तो सब ठीक था लेकिन कॉलेज परिसर के बाहर सुनसान बियाबान जगल सा प्रतीत होता था। शाम के झुरमुटे से लोगो का आना जाना बंद हो जाता था। गार्डस  की  सख्त हिदायत थी कि शाम के बाद परिसर के बाहर न निकले। असामाजिक तत्व लूटपाट के इरादे से हिंसा या राहजनी कर सकते है। भोजन आदि के पश्चात रात्रि मे परिसर के अंदर ही घूमना घामना हो जाता था। प्रशिक्षण महाविध्यालय यूं तो ठीक था पर कमरे की बनावट कुछ अजीब थी। एकल व्यक्ति के लिये बने कमरे तो ठीक थे पर शौचालय एवं स्नानालय को दो कमरों के बीच सांझा करना पड़ता था। टॉइलेट मे दोनों ही कमरों के  दरवाजे खुलते थे। जब एक व्यक्ति टॉइलेट का इस्तेमाल करता तो दूसरे दरबाजे को भी अंदर से लॉक करना पड़ता था। जब कभी कोई  व्यक्ति टॉइलेट के उपयोग के बाद दूसरे दरबाजे को अनलॉक करना भूल जाये तो पहला व्यक्ति शौचलाय के उपयोग से वंचित रह जाता। ऐसी समस्या प्रायः होती। कालांतर मे जब समस्या बड़ी तो फिर हॉस्टल के कमरों के वास्तु मे बदलाव कर छोटे छोटे एकल कमरों के बीच की दीवार  को तोड़ कमरों को  दो व्यक्तियों के सांझा उपयोग हेतु परिवर्तित किया गया। इस पुनर्निर्माण मे निश्चित ही लाखों रुपए  का अपव्यय हुआ होगा। जिससे टॉइलेट की समस्या का निराकरण हो गया।   

परिसर काफी बड़े क्षेत्र मे हरियाली से परिपूर्ण था। हरे घास के मैदान के चारों ओर बनी पक्की सड़क के दोनों ओर बड़े बड़े पेड़ परिसर की खूबसूरती मे चार चाँद लगते थे। योगा की क्लाससेस भी शायद लगती थी। प्रशिक्षण कक्ष आधुनिक तकनीकी से सुसज्जित पूर्णतः वातानुकूलित थे। भोजन कक्ष भी आधुनिक सुख सुविधाओं से परिपूर्ण था। मनोरंजन कक्ष मे टेबल टेनिस, शतरंज और कैरम की भी व्यवस्था थी जो उत्तम गुणवत्ता लिये बने थे।  एक तरफ एकांत मे जेनरेटर रूम की व्यवस्था भी की गई थी। उसके बगल मे ही प्रशिक्षणार्थियों के स्वास्थ की चिंता का समाधान भी बैंक ने "जिम" (व्यायामशाला) के माध्यम से कर रक्खी थी ताकि व्यवयमशाला के उपयोग से स्टाफ अपने बैंक की सेवा के साथ अपने स्वास्थ पर भी ध्यान दे सके। इस जिम को हम अन्य सुविधाओं की तरह आधुनिक कदापि नहीं कह सकते थे।

जिम मे कुछ डंबल, वेट लिफ्टिंग सेट, साइकलिंग मशीन, पुशअप बेंच थी। सबसे अजीब ट्रेड मिल थी। उक्त ट्रेड मिल मोटर से नहीं अपितु अनेकों बाल बेयरिंग यक्त रोलर के माध्यम से फिसल कर चलने वाली थी। जिम के उपकरण कॉलेज की अन्य सुविधाओं के विपरीत पुराने ढर्रे के थे। जिम की हालात देख कर ऐसा लगता था मानों प्रबंधन को स्टाफ के स्वास्थ के प्रति कोई रुचि नहीं, जिम को रखना शायद रिजर्व बैंक या अन्य विभागीय नीतियों के अनुरूप उनकी वैधानिक मजबूरी रही होगी। हर वर्ष शाखाओं की तरह ट्रेनिंग कॉलेज का भी निरीक्षण होता होगा पता नहीं क्यों, निरीक्षकों ने साल दर साल के निरीक्षण मे जिम की स्थिति पर कोई टिप्पड़ी नहीं की या टिप्पड़ी को लगातार नज़रअंदाज़ किया जाता रहा??

ट्रेनिंग के आखिरी सत्र मे ट्रेनिंग प्रोग्राम समन्वयक के साथ  प्रधानाचार्य या प्रबंधन के उच्च अधिकारी से साक्षात्कार होता। जिसमे प्रशिक्षण कार्यक्रम के औचित्य, आवश्यकता और बैंक की कार्य प्रणाली पर प्रशिक्षण के महत्व पर चर्चा के साथ महाविध्यालय मे उपलब्ध सुविधाओं पर प्रशिक्षुओं का विचार, प्रतिपुष्टी (फीडबैक) भी लिया जाता था। खानपान, रहन सहन, ट्रेनिंग का मैट्रियल पर भी लोगो की राय ली जाती थी। ठेकेदार को कम पैसे की प्रतिपूर्ति के कारण खान पान पर पहले ही कोई टिप्पड़ी न करने के लिये आग्रह किया जाता था।  मुझे याद है मैंने जिम मे उपयोग मे चलन के बाहर पुराने उपकरण, आदि पर राय दे उन्हे आधुनिक मशीनों मे बदलने का अनुरोध किया था जैसे उन दिनों नजदीक ही बने  "नॉर्थन स्टेट ट्रैनिग कॉलेज मे उपलब्ध कराई गई थी। तत्कालीन अधिकारियों ने जिम को उन्नतशील बनाने का आश्वासन दिया था। उसके बाद अनेकों बार जब जब प्रशिक्षण पर आना हुआ हर बार मैंने जिम के हालात, उसकी प्रचलन के बाहर पुरानी मशीनों और दरिद्र रख रखाब  बारे मे अपना दुःख प्रकट किया तब तब हर बार मुझे अगली बार जिम मे बदलाब करने का आश्वासन मिला। 

स्वस्थ कर्मचारी-स्वस्थ बैंक की विचारधारा के विपरीत उच्च प्रबंधन के किसी भी अधिकारी ने इस ओर ध्यान तो दूर शायद ही जिम को देखने की जहमत उठाई हो? मुझे स्वस्थ स्टाफ का एक किस्सा याद आ रहा जिसे आपसे सांझा करूंगा, कृपया हल्के मे लें!! एक बार एक शाखा के मैनेजर का बार्षिक चिकित्सा बिल प्रादेशिक कार्यालय मे स्वीकृति हेतु आया जो उन दिनों दो हजार रुपए था। पर्सनल डिपार्टमेंट के अधिकारी ने उक्त बिल को अपनी अनुशंसा के साथ स्वीकृति हेतु प्रादेशिक प्रबन्धक को प्रस्तुत किया। बिल को देख प्रादेशिक प्रबन्धक भड़क उठे और पर्सनल विभाग के प्रमुख को बुलवा भेजा और पूंछा तुमने चिकित्सा बिल को अच्छी तरह देखा? स्टाफ डिपार्टमेंट के अधिकारी ने कहा, "जी अच्छी तरह जांच कर  बिल देखा, बिल मे  रसीद है, डॉक्टर का पर्चा एवं चिकित्सकीय जांच रिपोर्ट भी है जो डॉक्टर द्वारा प्रमाणित  बिल के साथ सलग्न है। प्रादेशिक प्रबन्धक फिर भड़के, "बोले क्या खाक देखा? ये लो देखो रिपोर्ट मे ब्लड शुगर?-नॉर्मल, ब्लड प्रैशर?-नॉर्मल, हीमो ग्लोबिन?-नॉर्मल, कोल्लेस्ट्रोल?-नॉर्मल, ईसीजी? नॉर्मल, अरे जिस व्यक्ति की सारी रिपोर्ट "नॉर्मल" बो क्या खाक बैंक की परवाह करेगा??  झुंझला कर बोले, "ऐसा व्यक्ति मैनेजर पद पर रहने लायक ही नहीं, जिसकी सारी मेडिकल रिपोर्ट "नॉर्मल" हो!! ऐसे  व्यक्ति को तुरंत ब्रांच मैनेजर के पद से हटा कर सेकंड मैन बना कर भेजो!! या  स्टेशनरी गोडाउन भेजो!! विभाग का अधिकारी प्रादेशिक प्रबन्धक की बात सुन आश्चर्य से हक्का-बक्का था!!  

इसे सौभाग्य कहें या दुर्भाग्य सेवानिवृत्ति का आखिरी महीना और आखिरी दिन भी मैंने स्टाफ ट्रेनिंग कॉलेज मे स्थित शाखा के निरीक्षण मे बिताया।  मैंने अपनी सेवा के 38-39 वर्ष पर दृष्टिपात किया और मनन किया कि  बैंक का आकार एवं व्यवसाय पहले के मुक़ाबले अनेकों गुणा बढ़ गया, स्टाफ बढ्ने के साथ प्रोन्नतियाँ हुई। बैंक शाखाओं के आकार मे भी अनेकों गुना वृद्धि हुई। शाखाओं की संख्या, मे भी भारी बदलाब हुए पर जो नहीं बदला सो नहीं बदला वह था स्टाफ ट्रेनिंग कॉलेज का "जिम" अर्थात "व्यायामशाला" और उसमे स्थित "ट्रेड मिल"!!।  निश्चित ही बैंक की लाभप्रदत्ता मे इस दौरान इतनी तो वृद्धि हुई ही होगी कि जिम के नए उपकरण एवं   विधुतिकृत ट्रेड मिल आ जाती।

विजय सहगल  

1 टिप्पणी:

N K Dhawan ने कहा…

बैंक के ट्रेनिंग सेंटर पर आपका लेख बहुत वास्तविक है । आपके इस वाक़िये कि जिस व्यक्ति का सब जाँच नार्मल वह शाखा प्रबंधक होने लायक़ नहीं । मैं सीतापुर का शाखा प्रबंधक था, हमारे प्रादेशिक प्रबंधक हम से बजट डिस्कस कर रहे थे और नाराज़ होकर डाट रहे थे जैसे-२ वह डाँटते जाते मेरे चेहरे की मुस्कान हंसी में तब्दील होती जाती । अब प्रादेशिक प्रबंधक का ग़ुस्सा बेक़ाबू हो गया बोले मैं क्या जोकर दिखता हूँ जो तुम्हें हंसी आरही है । मैंने कहा नहीं सर आपकी पर्सनालिटी इतनी डैशिंग व चेहरा इतना आकर्षक है कि इतने ग़ुस्से पर भी आपके चेहरे के भाव में हमारे प्रति प्रेम ही झलक रहा था यही मुझे वास्तविक ख़ुशी दे रहा था।
प्रादेशिक प्रबंधक का ग़ुस्सा उडंछू हो गया और उन्होंने फिर मुझसे सामान्य लहजे में और मेरे फ़ेवर की बात की।