"अपहरण"
अनेकों बार हम लोग भी वही गलती दोहराते है
जो दूसरे करते है। बुद्धिमानी इसी मे है कि आप दूसरों की गलती से सीख ले अपने स्तर
पर उस त्रुटि को जल्द से जल्द आवश्यक सुधार और संशोधन कर ले। ऐसा ही कुछ सबक हमने
अपनी डबरा (मध्य प्रदेश) पद स्थापना के दौरान लिया। दरअसल हम लोग ग्वालियर से डबरा
आवागमन किया करते थे। आवागमन प्रायः बस से होता लेकिन ट्रेन का मासिक पास (एमएसटी)
भी साथ आकस्मिक आवश्यकता हेतु रखते थे।
जल्दी बापसी और यात्रा मे बचने वाले समय को देख कई बार हम लोग बस को छोड़ प्राइवेट कार जो सवारियों
को आवाज देकर बुलाते थे से भी कभी कभी ग्वालियर की यात्रा कर लेते थे। ये
प्राइवेट जीप या कार शेयरिंग के आधार पर उतना ही किराया लेती जो बसे लिया करती थी,
लेकिन प्राइवेट कार, बस से यात्रा मे लगने
वाले समय से आधे समय मे बगैर रुके हमे 35-40
मिनिट मे हमारे गंतव्य ग्वालियर मे छोड़
देती थी। समय की बचत के एक इसी आकर्षण के कारण जब तब कभी मौका मिलता तो उसके उपयोग
से हम कभी न चूकते।
प्राइवेट कार से ग्वालियर जाने के इस आकर्षण
मे छुपे खतरे से बेपरवाह हम लोग तब तक यात्रा करते रहे जब तक आवागमन मे हमारे एक
बैंक के साथी के साथ घटे हादसे की खबर हम
लोगो को न मिलती। प्राइवेट कार से बस के मुक़ाबले मे आधे समय और उसी किराये मे गंतव्य तक पहुंचाने के लुभावने प्रस्ताव से
सभी दैनिक यात्री प्रभावित थे। ऐसे ही एक दिन स्टेट बैंक के हमारे एक साथी को शाम
के समय कुछ देर होने के कारण बापसी मे प्राइवेट कार का ड्राईवर ग्वालियर जाने की
आवाज लगाता मिल गया। जल्दी पहुँचने की चाह मे हमारे उन साथी ने बस की जगह प्राइवेट
कार से जाने का निर्णय ले लिया। यूं भी शाम के समय बसों की आवाजाही कुछ कम हो जाती
थी। प्रायः प्राइवेट कार का उपयोग करने के कारण किसी आशंका-कुशंका की गुंजाइश नहीं थी न ही किसी खतरे की अंदेशा था। दरअसल हम
लोग दस्यू प्रभावित इस क्षेत्र की कानून व्यवस्था को जानते हुए भी सुरक्षा के
नियमों की अवेहलना कर रहे थे। उस दिन भी ऐसा ही हुआ। किसी अपराधी गिरोह ने
पूर्वनियोजित तरीके से बैंक के उस अधिकारी को अपनी प्राइवेट कार मे बैठा लिया। साथ
मे बैठी जिन सवारियों को हमारे साथी सहयात्री समझ रहे थे वास्तव वे सभी उस गेंग या
गिरोह के सदस्य थे।
दुर्भाग्यपूर्ण उस रात ने हमारे साथी के
जीवन को संकट मे डाल दिया। रास्ते मे उनका बलपूर्वक अपहरण हो गया था। देर रात तक
घर न पहुँचने के कारण उनके परिवार ने बैंक
के अन्य स्टाफ से पूंछ तांछ करने एवं सकारात्मक उत्तर न मिलने पर पुलिस प्रशासन को
सूचना और सहायता ली गयी। अगले दिन समाचार
पत्रों मे उनके अपहरण की सूचना और फिरौती की मांग की दिल दहल वाली खबर से हम लोग हतप्रभ
थे। 6-8 दिन पुलिस की कड़ी कार्यवाही और
बड़ी जद्दो जेहद के बाद उनको मुक्त किया
गया। इन 10-12 दिनों मे बैंक के उक्त अपहरित साथी का जीवन संकट मे रहा। जरा सोचिये
परिवार के सदस्यों की क्या हालत रही होगी,
कितने मानसिक संकटों से उन्हे गुजरना पड़ा होगा। फिरौती की रकम के बारे मे समाचार
पत्रों मे कोई स्पष्ट सूचना नहीं आयी। लेकिन कानाफूसी और अपुष्ट खबरों से पता चला
कि एक बड़ी धन राशि फिरौती के रूप मे अपहरणकर्ताओं को दी गयी। बैंक ने भी शायद ही
इस संकट की घड़ी मे अधिकारी की कुछ आर्थिक मदद की हो ज्ञात नहीं?
अपहरण की उस घटना के बाद हम लोगो ने जीवन मे अपरचित प्राइवेट कारों
से किसी भी कीमत पर यात्रा न करने का
निश्चय किया। प्राइवेट कारों मे पिछली यात्राओं मे जीवन को संकट मे डालने का स्मरण आज भी
दिल मे डर और दहशत का संचार कर जाता है तो उस अपहृत साथी के दिल पर कैसी
गुजरी होगी? इसकी कल्पना भी नहीं की
जा सकती। एक अन्य अपहरण की घटना आगे किसी ब्लॉग मे पुनः।
विजय सहगल


2 टिप्पणियां:
आज भी ऐसी घटनाएं होती रहती है लेकिन लोग जानते हुए भी खतरा मोल लेते और उन्हें उसका खामियाजा भी समय असमय भुगतना पड़ता है
मुझे भी अच्छी तरह याद है। हम, यूनियन के कुछ लोग थाने में जाकर धरने में बैठे हुए थे। आश्वासन मिला भी था परंतु फिरौती की पैसा मिलने के बाद ही उस सज्जन को छोड़ा गया था!
शंकर भट्टाचार्य, ग्वालियर
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