मंगलवार, 8 जून 2021

लैपटॉप

 

"लैपटॉप"



अनेकों बार शासन, सत्ता या पद से प्राप्त शक्तियों के मद मे व्यक्ति अपनी बुद्धि, विवेक और कौशल से अनाधिकृत कार्य को (ही) "यह अधिकृत" है ऐसा मान लेता है। वह साधारण सोच अधिकारी ये मान कर चलते है कि उनके द्वारा निर्णित कार्य ही अधिकृत, सत्य और नियमानुसार है, इसके विपरीत वास्तव मे ऐसे कार्य अनधिकृत, अकारण और अनैतिक होते है।  ऐसे ही व्यक्तियों के वारे मे श्रीमद्भगवत गीता के अध्याय 18, श्लोक संख्या 32 मे व्याख्या की गई है :-

 

अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसाऽऽवृता।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी।।18.32।।

अर्थात तमो गुण से घिरी हुई बुद्धि, अधर्म को (भी) "यह धर्म है" ऐसा मान लेती है तथा इसी तरह संपूर्ण पदार्थों को भी विपरीत मान लेती है, वह बुद्धि तामसी है।      

सेवाकाल के दौरान एक कार्यालय मे एक घटना का उल्लेख करना चाहूँगा। इस कार्यालय मे स्टाफ सदस्यों को कार्यालय के कार्य हेतु लैपटॉप दिये गये थे जिनके उपयोग वे बैंक के कार्य हेतु अपनी ड्यूटि के दौरान करते थे। पाँच या  छः पुराने लैपटॉप पड़े हुए थे, जो थे तो ठीक ठाक पर नवीन तकनीकी के अन्य नये लैपटॉप आने के कारण पुराने लैपटॉप  चलन से बाहर हो गये थे और उपयोग के बिना कार्यालय मे पड़े हुए थे। विभाग प्रमुख ने कार्यालय मे  पड़े उक्त  पुराने लेपटोपों को बट्टे खाते मे डालने  (राइट ऑफ) की सिफ़ारिश उच्च प्रबंधन से की। उन्होने सिफ़ारिश मे ये लिखा कि ये लैपटॉप तकनीकी की द्रष्टि से पुराने और प्रयोग के लिये  अनुपयुक्त है। कम्प्युटर इंजिनियर ने इन पुराने लैपटॉप की कीमत (ठीक से याद नहीं) शायद 1200/- या 1300/- रूपये प्रति लैपटॉप आँकी थी। विभाग प्रमुख ने अपनी  सिफ़ारिश मे ये भी लिखा कि तकनीकि विशेषज्ञ द्वारा निर्धारित कीमत पर विभाग के स्टाफ सदस्य उन लैपटॉप को क्रय करने के इक्षुक है। अतः उक्त प्राचीन लैपटॉप को निर्धारित कीमत पर इक्षुक स्टाफ सदस्यों को क्रय कर देने हेतु सहमति प्रदान करे। आवश्यक औपचारिकताओं के बाद उच्च प्रबंधन से लैपटॉप को स्टाफ सदस्यों के बीच बिक्रय की अनुमति हमारे कार्यालय को प्राप्त हो गई। इस आशय का पत्र पढ़ मेरे सहित अन्य स्टाफ भी पुराना लैपटॉप लेने को आतुर हो गये क्योंकि उन दिनों लैपटॉप की भारी कीमत हुआ करती थी।

सभी स्टाफ सदस्य  इंतजार करने लगे कि इस प्रक्रिया मे आवश्यक धनराशि जमा कर कैसे शामिल हों? इसी बीच विभाग प्रमुख द्वारा उक्त  पाँच-छः लेपटोपों की कुल रकम परिसर मे स्थित शाखा के  समुचित मद मे जमा करा दी गई। तब भी हम स्टाफ सदस्य यही सोचते रहे और  इंतज़ार करते रहे कि शायद लैपटॉप क्रय करने के इक्षुक स्टाफ से अलग अलग धनराशि एकत्र कर लैपटॉप के  वितरण पर चर्चा पश्चात एकाध लेपटोप कार्यालय प्रमुख रख शेष  लेपटोप  स्टाफ के सदस्यों को दे दिये  जायेंगे। मै भी एक "लेपटोप" क्रय करने का इक्क्षुक था।  पर इंतज़ार के धैर्य की सीमा शाम के समाप्त हो गई जब बगैर किसी चर्चा के  अधीनस्थ  स्टाफ द्वारा उक्त सारे पुराने लैपटॉप को साहब की कार मे रखवा दिये  गये और हम सभी स्टाफ परिस्थितिजन्य कारणों और कार्यालय की गंदी राजनीति के चलते विभाग प्रमुख के मदांध व्यवहार के फलस्वरूप मुँह टापते रह गये। उस दिन मेरे सहित सारा स्टाफ  स्व॰ कवि  नीरज की उन पंक्तियों को याद कर मन मसोस कर रह गये कि :-

  "और हम खड़े खड़े बहार देखते रहे।"                                          "कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे।" 

विजय सहगल   

   

2 टिप्‍पणियां:

P.c.saxena ने कहा…

ऐसे मदमस्त अधिकारी और चापलूस कर्मचारियों के नाम पद नाम सहित अवश्य लिखिए जिससे लोगों को उनकी औकात पता चल सके

Unknown ने कहा…

कभी कभी लगता है मेरे साथ ऐसा होता है लेकिन ये आपके साथ कुछ ज्यादा ही जाता है आपने आगे नहीं बताया उन laptop का क्या हुआ रिकॉर्ड में नंबर तो होते है शायद मिल जाये फिर से कहीं चल रहे हों हा हा। हा ।।