"मेरे पापा" (पितृ-दिवस पर विशेष)"
यू तो हर शख्स की ज़िंदगी मे उसके पिता उसके आदर्श पुरुष होते
है, ऐसा हमारी ज़िंदगी मे भी था। हमे
याद है हम जब सभी भाई बहिन जब छोटे थे हमारे पापा की पोस्टिंग उस समय राजा की मंडी
आगरा मे थी। वो वीकेंड मे घर आते थे, बचपन मे सप्ताह के अन्य
दिनों मे यध्यपि संयुक्त परिवार मे बड़े घर के बावजूद न जाने क्यों रात मे सोते समय
अदृश्य डर लगता पर सप्ताहांत पापा के आने पर निर्भय नींद आती थी। यध्यपि मेरी बहुत
ज्यादा बात उनसे नहीं होती थी फिर भी मन
मे सुरक्षा का अहसास और एक
अजीब उत्साह एवं खुशी बनी रहती थी कि पापा घर मे है। यह अहसास उनके जीवनपर्यंत
तक जब कभी नौकरी के दौरान अपने पैतृक घर झाँसी या ग्वालियर मे रहने के दौरान
उनके अंतिम दिनों मे जब वो हमारे साथ ग्वालियर मे थे हम महसूस करते रहे। उनका देहांत चलते-फिरते
अचानक ग्वालियर मे हुआ। उनके निधन के बाद
एक घटना उनके बारे मे हमे हमारे पारवारिक सदस्य श्री सूरन चाचा से ज्ञात हुई जो आज भी पूरे शहर के
परिवारों के बीच सूचनाओं का आदान प्रदान करते है और समाज के हर परिवार और व्यक्तियों
के वारे मे गहरी जानकारी रखते है। उनके द्वारा बताई। उस घटना ने हमारा सिर अपने पापा के प्रति गर्व और
सम्मान से और भी ऊंचा हो गया जो शायद और
अन्य लोगो से उन्हे अलग करती है। श्री सूरन चाचा, श्रीमती
रामकली चाची हमारे समाज के अभिन्न अंग है एवं विशेषता: हमारे परिवार मे हमारे माता
पिता की तरह ही सम्मानीय है जिनके बिना हमारे
घर या समाज मे कोई भी सुख/दुख: आदि का कार्य नहीं होता। जिनसे मिल कर
हमे आज भी हमेशा अपनी माँ/पिता से मिलने की सी खुशी मिलती है। सूरन चाचा ने
जो की शुद्धि संस्कार के पश्चात बैठक मे हमारे घर आए
जैसे कि समाज मे परंपरा है।
उन्होने हमारे पापा की
शादी का
एक प्रसंग बताया कि जब तुम्हारे पापा की शादी (सन्-1953) हुई तो शादी की एक रश्म
"कुँवर कलेऊ" होती है। उसमे वर एवं उसके परिवार के सदस्य
को मंडप मे बधू पक्ष के घर भोजन कराया जाता है। उक्त कार्यक्रम मे परिवार के सदस्यों के अलावा उनके
अभिन्न मित्र स्व॰ श्री गनेशी लाल जी भी थे। श्री गनेशी चाचा जीवन
पर्यान्त हमारे परिवार के अभिन्न सदस्य रहे एवं जिनकी उपस्थिती हमारे परिवार के हर
सुख/दुःख मे अपरिहार्य थी। उस जमाने मे रूढ़िवादिता और जातिवाद काफी प्रचलित था। हमारे ननिहाल पक्ष के लोगो को उनके मित्र जो कि
समाज के कमजोर वर्ग अर्थात अनुसूचित जाति से थे का "कुँवर कलेऊ" कार्यक्रम मे
सबके साथ भोजन करना पसंद नहीं आया और उन लोगों ने उनकी मंडप मे उपस्थिती पर एतराज़
किया। लेकिन हमारे पापा ने अपने मित्र के बिना कुँवर
कलेऊ मे भोजन करने से इंकार कर दिया। हार कर हमारे मामा एवं ननिहाल के परिवार को उनके मित्र को साथ मे बैठा कर
उक्त कार्यक्रम को पूरा किया। उस समय मे प्रचलित दक़ियानूसी सोच के विरुद्ध हमारे पापा
की सोच ने तत्कालीन समाज मे जो भी क्रिया या प्रतिक्रिया दी हो पर उनके उक्त साहसिक
कदम के बारे मे जान कर हमारा सिर गर्व से ऊंचा
हो गया।
प्रगतिशील सोच और आर्थिक
विकास के वर्तमान युग की नौजवान पीढ़ी ने इस सामाजिक भेदभाव को काफी हद तक कम कर दिया है।
तत्कालीन समय मे देश काल और पात्र के बीच उनकी प्रगतिशील सोच को हम नमन करते है!!
उनके द्वारा प्रतिपादित संस्कार हमारे
परिवार की आज भी थाती हैं। पितृ दिवस पर हम आज उन्हे अपनी विनम्र श्रद्धांजलि
अर्पित करते हुए उनको याद करते है। पापा हम सभी आपको प्यार करते है !! सादर नमन्!!
विजय सहगल

1 टिप्पणी:
बहुत सही आपके पापा को समाज के ऐसे दकियानुसी जाति प्रथा का विरोध के लिए हार्दिक अभिननंद
आपको भी बहुत बहुत बधाई कि आपने उनकी ऐसीबातों को सबके सामने लाये 🙏👋👌
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