शुक्रवार, 25 जून 2021

हल्दीघाटी

 

"हल्दीघाटी"

 










28 फरवरी 2021 मेरी ज़िंदगी का एक अहम दिन था। इस दिन हल्दी घाटी की चिरप्रतीक्षित यात्रा का सौभाग्य जो मिलने जा रहा था। बचपन मे  कक्षा छटी या सातवी  की किताब मे राणा प्रताप के घोड़े पर  श्री श्याम नारायण पांडेय द्वारा रचित वो अविस्मरणीय पंक्तियाँ आज भी कंठस्थ है। जिसमे हल्दी घाटी के युद्ध मे चेतक की भूमिका को सराहा गया था:-  

रण बीच चौकड़ी भर भर कर,
चेतक बन गया निराला था।
राणा प्रताप के घोड़े से,
पड़ गाया हवा का पाला था॥
वो तनिक हवा से बाग हिली,
लेकर सवार उड़ जाता था।
राणा की पुतली फिरी नहीं,
तब तक चेतक मुड़ जाता था॥.............

वास्तव मे बचपन मे पढ़ी इन पंक्तियों मे महाराणा प्रताप की वीरता और बलिदान तथा इस कालजयी युद्ध मे चेतक घोड़े की हल्दीघाटी  के युद्ध मे महत्वपूर्ण भूमिका ने मन को उद्वेलित कर दिया था। हल्दीघाटी  की यात्रा मेरे लिये कोई साधारण पर्यटन यात्रा नहीं थी अपितु हल्दीघाटी  मेरे लिये किसी तीर्थ यात्रा से कम न थी। भारत और भारतीय स्वाभिमान के विजय का संदेश देता हल्दीघाटी का युद्ध महारणा प्रताप के महान पराक्रम, बल और पौरुष के साथ ही भारतीय सांस्कृति और सभ्यता और स्वाभिमान  को पुनर्स्थापित करने करने की बीर गाथा थी। 18 जून 1576 को कुछ घंटे चले इस युद्ध मे महारणा प्रताप के बहादुर 3000 घुड़सवारों और कुछ सैकड़ा भील जनजाति के बीर योद्धाओं ने मुगल शासक अकबर की दस हजार सैनिकों  की सेना को उसके अहंकार और दंभ को चकनाचूर कर नाकों चने चबवा दिये थे। हल्दी घाटी का युद्ध एक मायने मे भारत के गौरव और आत्मसम्मान के लिये इसलिये और भी  महत्वपूर्ण है कि महारणा प्रताप के शौर्य, पराक्रम के इस युद्ध की घटना से प्रेरित होकर ही छत्रपति शिवाजी महाराज ने मुगलों के विरुद्ध अपना युद्ध  कौशल और पराक्रम का प्रदर्शन किया।  मेरे कोमल बाल मन पर उंकरी उन पंक्तियों की पूर्णाहुति दिनांक  28 फरवरी 2021 को पूर्ण हुई जब इस दिन हमने अपने परिवार सहित इस तीर्थ स्थल के दर्शन किये और इस धरा की माटी को अपने मस्तक पर धारण किया।   

एक सकरी सी पहाड़ी घाटी जिसके दोनों ओर हल्दी जैसी पीली माटी के पहाड़ से घिरी पीली रज के तिलक और चन्दन से महाराणा प्रताप के बीर योद्धाओं और भील जनजाति के पराक्रमी सैनिकों ने एक नया इतिहास रच इस स्थान को  देश के गौरवपूर्ण  एवं महत्वपूर्ण स्थानों मे सुमार कर दिया। इस पवित्र घाटी के पास ही महाराणा प्रताप के चेतक घोड़े की समाधि भी बनी है। हल्दीघाटी के युद्ध मे चेतक का एक पैर बुरी तरह घायल होने के बावजूद भी चेतक घोड़े ने 26 फुट के नाले के पार छलांग लगा महराणा  प्रताप को रणभूमि से सुरक्षित निकाल अपने प्राणों की आहुति दी थी। एक घोड़े की अपने स्वामी के प्रति  भक्ति की ऐसी मिशाल देखने को नहीं मिलती।

हल्दिघाटी के पास ही महारणा प्रताप म्यूजियम भी दर्शनीय है। इस म्यूजियम का दृश्य और श्रव्य का विशेष कार्यक्रम देखने लायक है। इस म्यूजियम मे आदमक़द प्रतिमाओं के माध्यम से घटनाओं का चित्रण किया गया है और पृष्ठभूमि से आती आवाज के माध्यम से घटना का संक्षिप्त पर जीवंत रूप दिया गया है मानों प्रतिमाएँ आपस मे बातचीत कर रही हों। भारतीय सांस्कृति और सभ्यता मे महिलाओं के सम्मान का एक दृश्य जिसमे  दिखाया गया कि महारणा प्रताप के सैनिकों द्वारा युद्ध मे अकबर के सेनापति अब्दुल रहीम खान ए खाना सहित  उनके पूरे परिवार को गिरफ्तार कर जब उनके समक्ष पेश किया गया तो महारणा प्रताप ने महिलाओं को इस तरह गिरफ्तारी पर अपनी नाराजी प्रकट की और उन्हे ससम्मान रिहा कर उनके शिविर मे बापस भिजवाया। कदाचित मुगल शासकों के झूठ, फरेब, धोखे के बहाने प्रतिपक्षी राजाओं को कैद करने की घटनाओं का समुचित मूल्यांकन इतिहासकारों ने इस घटना को सामने  रख किया होता।

किलेनुमा प्रतिरूप के अंदर म्यूजियम के प्रवेश करते ही चेतक घोड़े की आकर्षक  प्रतिमा देखते ही बनती है। महारणा प्रताप की सेना और भील जाति के सैनिक की आदम कद ताँबे सी चमकती प्रतिमाए एवं  छत्रपति शिवाजी सहित अन्य सैनिकों की प्रतिमाएँ दर्शनीय है।  राजस्थान की जन जातियों का सजीव चित्रण और ग्रामीण परिवेश की राजस्थान मे प्रचलित  बैल गाड़ीयों  की झाकियाँ, गौ पालन, बढ़ई और लोहार का कार्य करने वाली राजस्थानी जन जातियों की प्रतिकृति एक आदर्श गाँव का चित्रण करती नज़र आती है। हल्के फुल्के स्वल्पाहार, भोजन के साथ ही राजस्थानी वस्त्र उत्पाद, शिल्प, हैंडिक्राफ्ट के विक्रय की व्यवस्था भी म्यूजियम मे की गई थी।

इस तरह भारत के इतिहास मे एक अहम महत्वपूर्ण  स्थान रखने वाली "हल्दीघाटी" के दर्शन और  तीर्थाटन से प्राप्त पुण्य को शिरोधार्य रख हमने  अपने अगले गंतव्य के लिये प्रस्थान किया।    

विजय सहगल     


1 टिप्पणी:

Unknown ने कहा…

बहुत हीं ऐतिहासिक विरासत स्थल