"अ-मित्र"
1988 की बात थी। पहली बार घर से दूर परिवार
के साथ सागर, मध्यप्रदेश स्थानांतरण पर आया था। कुछ दिन एकल प्रवास कर घर आदि देखे
क्योंकि परिवार सहित आना था। छोटे छोटे पहाड़ों के बीच सुंदर शहर। बुंदेलखंडी भाषा,
रहन सहन मौसम की द्रष्टि से भी अच्छा था। एक दिन बस से सामान सहित सागर मे पढ़ाव
डाल लिया। ट्रक बगैरा का कोई झमेला नहीं था क्योंकि ग्रहस्थी अभी शुरू ही की थी
ज्यादा सामान आदि का तामझाम न था। झाँसी
घर से सारा सामान बस मे लोड कर पहुँच गये सागर। बसस्टैंड से भी सामान चार पहिया
ठेले पर एक बार मे ही घर पहुँच गया। सिर्फ
आवश्यक जरूरी सामान ही साथ था। उन दिनों बैसे भी टीवी,
फ्रिज, वॉशिंग मशीन का चलन न था और न ही आर्थिक
स्थिति इस की अनुमति देती थी। गैस सेवा का चलन शुरू तो हो चुका था पर बेईमानी और
भ्रष्टाचार की चरम सीमा के चलते हमारी पहुँच से दूर थी। केरोसिन स्टोव ही सहारा था
वह भी बत्ती बाला। शाम को पहुंचे तो उस दिन तो खाने की जुगाड़ घर से ही कर के चले
थे जो अगले दिन सुबह तक भी चला। मै तो अगले दिन ड्यूटि करने हेतु बैंक निकल
गया। पूरे दिन श्रीमती जी ने घर को
व्यवस्थित कर रहने योग्य बना दिया। शाम के भोजन की व्यवस्था भी करनी थी।
जब दोस्त अच्छे मिल जाये तो बड़ी से बड़ी दुःख
तकलीफ दूर हो जाती छोटी मोटी दिक्कते तो चुटकी बजाते ही हल हो जाती है। ऐसा ही
हुआ। मैंने ऑफिस पहुँच कर अपने संगी साथियों से खाने बनाने की समस्या पर चर्चा की
तो हमारे एक मित्र ने बड़े ही अपने पन से कहा सर मै और तो ज्यादा कुछ नहीं कर सकता
पर उनके घर पर पड़े अतरिक्त गैस सिलेंडर
देने की सहमति का प्रस्ताव उन्होने किया। अंधे को क्या चाहिये दो आंखे,
मैंने उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा कर उन्हे
हृदय से आभार किया और ईश्वर से प्रार्थना की कि अब गैस से जुड़ी चूल्हे और
रेग्युलेटर की समस्या भी हल करा दे। शाखा के कुछ अन्य मित्रों ने बताया कि गैस का
चूल्हा और रेग्युलेटर पाइप आदि पास मे ही मस्जिद बाज़ार मे मिल जाएंगे। रेग्युलेटर उन दिनों बड़ी समस्या थी। हमे अंदेशा
था कि ये सिर्फ सरकारी गैस एजेंसी ही रेग्युलेटर उपलब्ध कराती है। पर हमे बताया
गया उसी मस्जिद के पास एक दुकान मे ये उपलब्ध हो सकता है। इस तरह गैस चूल्हा सस्ते
मंदे मे पाइप के साथ ले लिया। रेग्युलेटर मिला तो पर बहुत महंगा
था शायद 400/- रुपए मे मिला था रेग्युलेटर उन दिनों। बड़ा महंगा लगा था दुकानदार भी
बैंक का ही कस्टमर था पर अन्य शहरों की
तरह यहाँ बैंक का स्टाफ होने का कोई लिहाज आदि न था। मैंने गैस बाले से सारे सामान
पर जब कुछ डिस्काउंट दे कीमत कम करने का कहा तो छूटते ही बोला "घोड़ा घास से
दोस्ती करे तो खायेगा क्या"। ऐसे मुँहफट्ट जबाब की उम्मीद न थी,
मैंने मांगी गई कीमत अदा कर सारा सामान समेट
शाखा मे आ गया। बाद मे घोड़े और घास की
कहावत/कहानी का हमे पता चला। दरअसल घोड़े
का मालिक घास के मालिक को जंगल से घोड़े पर बैठा कर घास मंडी मे छोड़ता था और इस तरह
घास का मालिक घोड़े को सौजन्यता के नाते घास खिलाता था उसका मानना था कि इस तरह के
पारस्परिक लाभ दोनों के ही हित मे है। इस तरह सम्बन्धों का लिहाज वे एक दूसरे के
प्रति करते थे। मैनेजर और दूकानदारों के आपसी सम्बन्धों का कुछ इस तरह का ही लाभ दूसरे
शहरों मे बैंक के कर्मचारियों को वस्तुओं की कीमत आदि मे मिल जाता था। पर हमे पता चला यहाँ शाखा मे घोड़ा मालिक और घास
मालिक अपनी अपनी सेवाओं का क्रय-विक्रय नगदी के रूप मे कर लेते-देते है। अतः कहावत
के अनुसार सागर शहर शाखा मे घोड़ा और घास
मे दोस्ती नहीं थी!!
शाखा
मे सुपरवाइजर के पद पर था,
तंगी तो थी पर सोच कर खुश था चलो शाम के
खाने की जुगाड़ स्टोव पर सर खपाने से बेहतर था कि गैस पर खाना बनेगा और एकाध महीने मे नये गैस सिलेंडर की जुगाड़ कर लेंगे अन्यथा रोज रोज मिट्टी के तेल की कौन जुगाड़ करे?
राशन कार्ड तो था नहीं जब देखो राशन बाले के मिट्टी के तेल के लिये निहोरे करों,
आधा लीटर भी दे तो दुनियाँ भर के अहसान जतलाएगा?
अब शाम तक ऑफिस मे तीनों सामान चूल्हा,
गैस पाइप और रेग्युलेटर की जुगाड़ हो चुकी थी। मै पहली बार परिवार सहित घर से
बाहर निकला था,
इतनी आसानी से खाना बनाने के इंतजाम हो जाने की उम्मीद न थी। अपने संगी साथियों और
दोस्तों के सहयोग पर नाज़ होना स्वाभाविक था। बिशेष तौर पर हम अपने उन मित्र के
द्वारा अतरिक्त सिलेंडर उपलब्ध कराने के बड़े आभारी थे।
शाखा से प्रस्थान के कुछ समय पूर्व जब हमने
अपने उन मित्र से अनुरोध कर अतरिक्त सिलेंडर घर से लाने का अनुरोध किया जो वहीं
शाखा से कुछ कदम की दूरी पर रहते थे। उनका चेहरा देख हमे कुछ परेशानी दिखाई दी।
सौयजन्यता वश हमने उनकी तबीयत आदि के बारे मे पूंछा तो उन्होने बड़े अनमने और बुझे
चेहरा लिये कहा तबियत तो बिल्कुल ठीक है पर "सहगल साहब,
असल मे मै श्रीमती जी के कामों मे हस्तक्षेप नहीं करता!! मैंने चौंक कर आश्चर्य
भाव से पूंछा "मै समझा नहीं आप क्या कह रहे है?
तब उन्होने फिर गोल मोल जबाब देते हुए कहा "सर असल मे श्रीमती जी के किचिन,
घर ग्रहस्थी के मामले मे मै दखल नहीं
देता"। मैंने कहा पर सिलेंडर तो दे दो ताकि हमारा आज खाने आदि का कार्यक्रम
सुचारु रूप से चले। लेकिन तब उन्होने बड़े भारी मन से कहा कि श्रीमती जी ने सिलेंडर
देने से मना कर दिया। अब मेरे काटो तो खून नहीं। मै तो सुन कर चौंक गया। मैंने कहा
भाई तुमने सुबह तो हमे अतरिक्त सिलेंडर का वादा किया था और इस तंगी की हालात मे
तुम्हारे सिलेंडर के आश्वासन पर हमने तो हजार ग्यारह सौ रुपए खर्च कर दिये। पर वे
टस से मस न हुए। मैंने कहा भी कि फिलहाल कुछ दिन काम चला दो मै शीघ्र ही तुम्हारा
सिलेंडर दो चार दिन मे बापस कर दूँगा?
पर उस बंदे पर कुछ असर न हुआ। अब मुझे भी क्रोध आ रहा था पर सब व्यर्थ! आखिरी
प्रयास के तहत उनके स्वाभिमान जाग्रत कर अपने दिये वचन का स्मरण करा कहा दोस्त
तुम्हारे भरोसे पर मैंने गैस चूल्हा,
पाइप, रेग्युलेटर खरीदा कुछ तो लिहाज करो अपने
जुबान का, पर उनके विना शर्म
चेहरे पर अपनी झूठी बातों का लेश मात्र भी असर न था। मै मन ही मन उस घड़ी को कोसता
पर सभी व्यर्थ। उसके चेहरे पर पश्चाताप और खेद का तिल भर भी असर न था। मुझे सपने
मे भी उम्मीद न थी कि ऐसी परिस्थितियों से दो चार होना पड़ेगा। पर अब तो
परिस्थितियों से जूझने के अलावा कोई चारा न था। शाखा के अन्य स्टाफ भी उस कर्मचारी
के इस व्यवहार से हतप्रभ और दुःखी थे। शाम के सात बजने को थे हमारे अधीनस्थ स्टाफ
मुकेश और हीरा लाल ने दौड़ भाग कर चाय बाले के स्टोव से मिट्टी का तेल निकलवा एक
बोतल मे तेल लाकर दिया तो कुछ चैन की सांस आयी।
दुःख और परेशानी की उस घड़ी मे उन दोनों साथियों का सहयोग मै आज भी नहीं
भूला। शाम को उस आधा लीटर तेल से जब खाना बना तो कहते है न कि मेहनत का फल मीठा
होता है अतः उस दिन के खाने का स्वाद भी अविस्मरणीय था।
सिलेंडर बाले वे हमारे मित्र आगे भी बैंक
सेवा के दौरान एक दो कार्यकाल मे शाखाओं मे मिले। सेवानिवृत्ति के बाद भी हम दोनों एक ही शहर मे बसे। वे आज भी हमारे
मित्र है पर मित्रता के भाव से आज भी कोसो दूर!!
विजय सहगल



6 टिप्पणियां:
सहगल साहब, मैं समझता हूं कि मित्र तो सिर्फ एक ही होता है! बाकी सब साथी होते हैं।
मित्र के पास हक जताया जाता है पर साथी या साथीयों से नहीं! इसलिए हम दुखी होते हैं!
दुखी मन को मैं हमेशा कहता हूं - ये वक्त भी गुजर जायेगा! By shankar bhattacharya on whatsap
ALOK AGRWAL JI ON WHATSAP
Vijay sahgal ji aapki kalam par pakad hai.sabdo ko achchay se bandte sir pirote hai.
HKD JOSEPH ON WHATSAPP
बहुत खूब विजय भाई। नपे तुले शब्दों में उन दिनों का सुख दुःख गिना दिया। आपकी कहानी के मुख्य पात्र... यानी चूल्हा और गैस सिलेंडर ने हम सबको भी बहुत रुलाया था 😃
मित्रता तो ठीक है पर उनसे सिलेंडर नहीं मांगना।
SH KULBIR JI ON WHATSAPP
सहगल जी आपने अपने जीवन काल की इस संवेदनशील विपदा को आज याद किया। कभी कभी हम अतीत में डुबकियां लगा ही लेते हैं। सभी के जीवन मे ऐसी ही कुछ घटनाएं हो जाती हैं जो भुलाये नहीं भूलतीं। आपने जिस तरह से वर्णन व चित्रण किया है वह आपकी लेखन क्षमता का प्रमाण है...👌🏻👌🏻👌🏻
SH. SHANKAR BHATTACHARYA JI ON WHATSAPP
सहगल साहब, मैं समझता हूं कि मित्र तो सिर्फ एक ही होता है! बाकी सब साथी होते हैं।
मित्र के पास हक जताया जाता है पर साथी या साथीयों से नहीं! इसलिए हम दुखी होते हैं!
दुखी मन को मैं हमेशा कहता हूं - ये वक्त भी गुजर जायेगा!
एक टिप्पणी भेजें