सोमवार, 10 अगस्त 2020

कोरोना-कथा"(व्यंग)-"भाग-2


"कोरोना-कथा"(व्यंग)-"भाग-2"





कुछ देर सुस्ता कर वह फिर बोला चलो तुम्हें एक बुंदेलखंडी कहानी सुनाता हूँ। एक 80 साल की बूढ़ी को एक स्कूटर बाले ने टक्कर मार दी। बूढ़ी बेहोश होकर सड़क पर गिर पड़ी। लोगो कि भीड़ इकट्ठी हो गई। कुछ ने कहा मुंह पर पानी के छींटे मारो, कुछ बोले हवा करो, कुछ ने मिर्गी का दौरा समझ जूता सुंघाने का सुझाव दिया। वहीं पास खड़े एक छोटे से बालक ने अपनी भाषा मे कहा "कुछ न करो बुढ़िया खौ आधा किलो जलेबी खुआ दो, बुढ़िया झट से ठीक हो जे"। लेकिन लोगो ने उस नन्हें बालक को डपट दिया। फिर दस पंद्रह मिनिट बाद  कुछ लोग  हवा झलने लगे तो कुछ मुंह पर पानी के छींटे मारने लगे। तभी बालक फिर अपनी नन्ही तोतली बोली मे बोला "हम बताए, हम बताए, जाय  बूढ़ी खों  आधा किलो जलेबी खुआ दो बूढ़ी झट ठीक हो जे"। पर लोग पढे लिखे थे, कोई मीडिया पत्रकार, कोई राजनीति का प्रखांड पप्पू, और कई वुद्धिजीवी लोगो ने फिर उसे डांट डपट दिया। कुछ देर मे बुढ़िया को होश आ गया।  सभी अपनी पीठ ठोक तारीफ करने लगे। कोई कहता "हम ना कहे थे पानी छिड़को" यदि पहले ही पानी डालते तो बुढ़िया कब की ठीक हो जाती।  एक ने कहा मै न कहता था, हवा करो मेरी सुनते तो बुढ़िया आधा घंटे पहले ही ठीक हो जाती। एक बोला मिर्गी के दौरों मे जूता सुंघाना अचूक दवा है मेरी सुनते तो बुढ़िया बीस मिनिट मे ही ठीक हो जाती। सभी की बाते सुन बुढ़िया ज़ोर से गुस्से  मे बोली "चुप डीलमरे!, नाश जाए तुमाए!! अपनी अपनी लगाए घंटाभर से, "छींटा मारो", "हवा करो", "जूता सुंघाओ"..... जो नैक सो मोड़ा बार बार तुमौरन से कै रओ "आधा किलो जलेबी खुआ दो", "आधा किलो जलेवी खुआ दो", "बाकी काऊ ने न सुनी, "अरे तुमाई ठठरी बंधे", "नाश जाए तुमाए" अगर  आधा किलो जलेवी खुवा देते तो कबऊ की उठ के झट्टई दौड़ के घरें न पौंच जाती अबनो??


कोरोना बोला:- ठीक तुम लोगो की भी यही स्थिति है। जब डॉक्टर, पेरा मेडिकल स्टाफ, वैज्ञानिक और सुरक्षा बलों के लोग चिल्ला चिल्ला कर बार बार आगाह करते रहे कि घर पर ही रहो, यदि निकलना जरूरी हो तो मास्क पहन के निकलो, दो गज की दूरी का ध्यान रखो और बार बार अपने हाथ साबुन से धो, तब किसी ने न सुनी। बातों को हंसी मे उढ़ा  देने बालो यदि मात्र 14 दिन जी हाँ मात्र 14 दिन घर पर रह कर डॉक्टर, चिकित्सकों वैज्ञानिकों  की  उक्त तीन बातों का अक्षरश:  पालन किया होता तो मेरी क्या औकात थी देश तो क्या दुनियाँ से कभी का गायब हो गया होता? अब सरकार और व्यवस्था को कोसते हो? कोरोना क्रोध से बोला।

इसी तरह देश पर कोरोना रूपी महामारी एवं देश की उत्तरी सीमा पर चीन की कुत्सित, धोखे बाजी, आक्रामक कारी, कायरता पूर्ण,  विस्तारवादी प्रयासों को संकट के ऐसे आढ़े वक्त पर पानी पी-पी कर सरकार को  कोसने  बाले देश की सबसे पुराने राजनैतिक दल के युवराज लगातार बगैर कोई सकारात्मक सुझाव व सहयोग के अपनी राजनैतिक लाभ के लिये नित्य ऊलजलूल सवाल, अनर्गल और मिथ्या आरोप लगा कोरोना महामारी और दुश्मनों के हाथ का खिलौना बने रहे। सात दशकों तक देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को हरण कर एक परिवार की सत्ता को अपना एकाधिकार मानने बाले तथाकथित युवा ह्रदय सम्राट लोकतान्त्रिक रूप से चुनी सरकार पर छिद्रान्वेषण का आरोप लगा उस कहावत को चरितार्थ करते रहे कि "सूप शिकायत करे तो फिर भी ठीक, छलनी जिसमे छत्तीस छेद है सुई से  कहती है, "सुई री सुई", तेरे पेट मे छेद है"।

कोरोना हमारे देश के मीडिया के बारे मे भी अच्छी ख़ासी जानकारी रखता था। बोला- मेरे द्वारा निर्मित महामारी इकदम नयी थी। चिकित्सकों द्वारा अपने अनुभव और ज्ञान के आधार पर हमारे बारे मे अनुमान, रीति नीति बना दिशा निर्देशों के बारे मे घोषणा करते  रहे।  तब आपके एक छद्म पत्रकार श्री रवीश कुमार लॉक डाउन, दो गज दूरी, मास्क का मखौल उढ़ाते रहे। ए॰सी॰  कमरों मे कोट पहन कम्मेंट्री कर एम्स के चिकित्सकों द्वारा प्रतिपादित कोरोना ग्राफ जो उन्होने दुनियाँ मे कोरोना महामारी के अपने अनुभव के आधार पर बनाया था कि शायद कोरोना मई-जून तक समाप्त हो, पर इस कुत्सित पत्रकार ने उनका अपने कार्यक्रम मे खूब मखौल उड़ाया था। अपने आपको ऐसा प्रस्तुत कर रहा था मानों जैसे  "वीर अभिमन्यु" द्वारा व्यूह भेदन की  कला की तरह इस पत्रकार ने भो  भी कोरोना भेदन का ज्ञान अपनी माँ के गर्भ से सीखा हो? पत्रकार का मुख्य कार्य है निष्पक्ष तरीके से समाज, सरकार, व्यवस्था और नौकरशाही को बगैर किसी पक्षपात के आईना दिखाये। पत्रकारिता का अंतरराष्ट्रीय " रेमन मैग्सेसे" पुरस्कार प्राप्त पत्रकार की तो और भी ज़िम्मेदारी थी कि बगैर अपने पूर्वाग्रहों से ग्रसित हो सरकार की उपलब्धियों और असफलताओं को अनासक्त भाव से मीडिया मे प्रस्तुत करे। पर पिछले एक दशक से सरकार और नौकर शाही का विरोध करते करते वे देश विरोध  पर उतर एक पक्षीय समाचार दर्शन कराते रहे।  अतः  मीडिया के संगठन से एक साधारण नागरिक की हैसियत से हम मांग करते है कि इस पत्रकार के चाल चलन चरित्र और नियत की जांच करे?  देश की सेना और सुरक्षा बलों पर आरोप लगा उन्हे हतोत्साहित करने बाला ये पत्रकार कंही देश विरोधी ताकतों के हाथ का खिलौना तो नहीं बन गया? क्यों ने ऐसे समाचार मीडिया चैनल और पत्रकार पर प्रैस की आज़ादी की आढ मे, हमे उसकी बदनीयति  और छद्म पत्रकारिता पर शंका कर सवाल करना चाहिये? देश विरोधी ताकतों और विदेशी हाथों की  ऐसी कठपुतली बने पत्रकार एवं  देश विरोधी अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्रकारियों द्वारा फेंके गये टुकड़ों से प्राप्त छद्म अंतरराष्ट्रीय पुरुस्कार  भी गंभीर सवालों के घेरे मे है?? उक्त तथाकथित पत्रकार की पत्रकारित पर संदेह करने के पर्याप्त कारणों की भी विस्तृत जांच होना चाहिये?, क्या ऐसे रीढ़विहीन पत्रकार न केवल विकाऊ पत्रकार है बल्कि पत्रकारिता और देश के नाम पर कलंक नहीं? 

अब तक हमारा भ्रमण भी समाप्त हो चुका था हम दोनों अपनी अपनी राह पकड़ बगैर एक दूसरे का मुँह देखे "कोरोना" तो किसी नये ग्राहक की तलाश मे सोसाइटी के निकासी गेट से "बाहर" निकल गया और मै "अंदर" अपने घर के दरबाजे के।    

विजय सहगल       

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