"ग्राहक
सेवा"
मै उन दिनों कलेक्ट्रेट शाखा
रायपुर मे
प्रबन्धक के पद पर था। कलेक्ट्रेट परिसर के अंदर ही शाखा थी। कलेक्ट्रेट कार्यालय
के शत प्रतिशत कर्मचारियों को मै शक्ल और नाम/उपनाम से जनता था तब अधिकारी वर्ग का
जानना तो स्वाभाविक ही था जिनसे हमे हमेशा बैंक का व्यवसायिक सहयोग मिलता रहा था।
एक दिन शाखा मे सुबह सुबह अतरिक्त जिलाधीश
महोदय श्री अशोक अग्रवाल जी का फोन आया और
अपने एक सब स्टाफ की सहायता करने का अनुरोध किया। अभिवादन की औपचारिकता के बाद जब
एडीएम महोदय ने उनके एक अधीनस्थ स्टाफ की बीमारी की हालात के बारे मे बताया जो उनके
कार्यालय मे पदस्थ था और सेवानिव्रत्ति के कगार पर था। काफी अस्वस्थ होने के कारण चलने फिरने की
स्थिति मे भी न था। अस्वस्थता के चलते चिकित्सकीय व्यय आदि के कारण बैंक खाते से
पैसे निकालने की समस्या थी और इसी संदर्भ मे हमारे सहयोग की अपेक्षा अतिरिक्त जिलाधीश
महोदय को हमसे थी। हमने उन्हे इस समस्या मे आवश्यक सहयोग का आश्वासन दे निश्चिंत
रहने को कहा। मैंने एडीएम महोदय से उनके सब स्टाफ के किसी भी परिजन को उस अस्वस्थ
स्टाफ की खाते की पास बुक के साथ बैंक मे भेजने का अनुरोध किया। कुछ ही मिनटों मे
उक्त सब स्टाफ का बेटा अपने पिता की पास बुक लेकर हमारी शाखा मे पहुँच गया। मैंने
उसकी पास बुक के खाता नंबर की आद्धतन
जानकारी प्राप्त की आवश्यक धनराशि की निकासी और उनके घर के बारे मे जानकारी मांगी।
कर्मचारी के पुत्र ने खाते की न्यूनतम धनराशि छोड़ समस्त राशि निकालने का निवेदन
किया जो शायद छः हजार के आस पास थी उसने ये
जानकारी कि उनके पिता की तबीयत बहुत ज्यादा खराब है त्वरित कार्यवाही
का अनुरोध किया। उन्होने बताया कि कलेक्ट्रेट परिसर के पास ही उनका आवास है। मैंने तुरंत ही आवश्यक नगदी
एवं निकासी फॉर्म ले वाहक के साथ स्कूटर
से उस अस्वस्थ खाताधारक के घर पहुंचा। वहाँ की स्थिति बड़ी ही चिंतनीय थी।
कलेक्ट्रेट कर्मचारी बिलकुल ही गंभीर हालत मे विस्तर पर पड़ा था। परिवार के सदस्य
एवं अन्य रिश्तेदार आसपास दुःखी हो चिंतित हालत मे खड़े थे। उस खाता धारक को
अभिवादन का सम्बोधन किया जिसका प्रत्यातुर उसने कुछ चेतन और अर्धचेतन अवस्था मे रहते दिया। मैंने परिवार के
सदस्यों की उपस्थिती मे ही निकासी धनराशि को खाते से निकालने के बारे मे कान के
पास जा कर ऊंची आवाज मे कहा जिसे उसने सर हिला सहमति व्यक्त की। खाताधारक कर्मचारी
निकासी फॉर्म पर हस्ताक्षर की स्थिति मे न था जिसकी जानकारी एडीएम महोदय ने हमे
पहले ही बता दी थी अतः मै बैंक से ही इंक पैड लेकर चला था। मैंने कर्मचारी के बाएँ
हाथ का अंगूठा निशानी निकासी फॉर्म के आगे पीछे प्राप्त की गवाह के रूप मे उनके
पुत्र के हस्ताक्षर प्राप्त किये और वांछित धनराशि सभी परिवार के सदस्यों के समक्ष
पुत्र को प्रदान कर दी।
एडीएम पद पर रहते एक अधीनस्त सब-स्टाफ के
प्रति इतना लगाव निश्चित ही प्रशंसनीय था।
उस कर्मचारी की खाते से सामयिक नगदी निकासी से उसके परिवार को कितना सहायता मिली होगी नहीं
कह सकता पर दुर्भाग्य से उसी दिन शाम के उस खाताधारक का देहांत हो गया।
एक अन्य घटना ग्वालियर प्रवास के दौरान की है।
सन् 2000 मे रायपुर से स्थानांतरित हो
ग्वालियर आने के कारण मै जिला अदालत ग्वालियर मे भी रायपुर की तरह एम॰ए॰सी॰टी (मोटरयान दुर्घटना दावा अभिकरण) खातों
का व्यवसाय पाने हेतु प्रयासरत था। इसी
बीच एक घटना जिसमे जिला न्यायालय के एक अर्दली को कुछ आसमाजिक तत्वों और एक
हिस्ट्रीशीटर बदमाश द्वारा लूटपाट की मंशा से घायल कर दिया था। उक्त अदालत का
स्टाफ घायल अवस्था मे जयारोग्य हॉस्पिटल ग्वालियर मे स्वास्थ लाभ के लिये भर्ती था
पर चिंताजनक जैसे हालत की स्थिति न थी।
उक्त चतुर्थ श्रेणी के स्टाफ की आर्थिक हालात भी बहुत अच्छे न थे और उपर से अनचाहे
आकस्मिक चिकित्सकीय खर्चों ने उसकी हालत को
और भी खराब कर दिया था। तभी जिला न्यायालय के एक माननीय अतरिक्त जिला न्यायाधीश ने
उक्त कर्मचारी के प्रति सहानुभूति रखने के आशय से कैसे उसकी सहायता करने के बारे
मे जानना चाहा? यध्यपि न्यायालय परिसर मे
पूर्व से ही यूनियन बैंक की शाखा थी। उन
दिनों हमारे बैंक ने सरकारी
कर्मचारियों के वेतन के दस गुना तक साथी कर्मचारी
की व्यक्तिगत गारंटी के अंतर्गत व्यक्तिगत ऋण योजना चला रखी थी। जब मैंने उन
माननीय को उस योजना की विस्तृत जानकारी दी तो वे उस चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की गारंटी देने हेतु सहर्ष
तैयार हो गये।
फिर क्या था मैंने कर्मचारी ऋण योजना के
अंतेर्गत ऋण प्रस्ताव बनाया। पर एक समस्या और थी उक्त कर्मचारी हॉस्पिटल मे भर्ती
था! मैंने ऋण दस्तावेजों पर कर्मचारी के हस्ताक्षर स्वयं अस्पताल मे जा कर कराये
और हॉस्पिटल के मेडिकल ऑफिसर से काउंटर साइन करा कर्मचारी के हस्ताक्षर का सत्यापन
कराया। इस तरह अतरिक्त जिला न्यायाधीश महोदय की व्यक्तिगत गारंटी के पेपर एवं कर्मचारी
के भी आवश्यक पेपर, आवेदन आदि लिये जिसे माननीय
न्यायाधीश ने सहजता से उपलब्ध करवा दिये। मैंने भी उक्त ऋण स्वीकृत कर कर्मचारी के खाते
मे वितरित कर दिया। उक्त एक ऋण के कारण हमे एक नया ग्राहक समूह जिला न्यायालय के रूप
मे प्राप्त हुआ।
दोनों ही घटनाये छोटी थी लेकिन ऐसी अन्य
छोटी छोटी सेवाओं ने कलेक्ट्रेट परिसर,
रायपुर स्थित बैंक की शाखा को एक मजबूत नीव प्रदान की और जो आज छत्तीसगढ़ की बड़ी
शाखाओं मे से एक गिनी जाती है और ग्वालियर शाखा मे भी जिला न्यायालय का भी बड़ा
बैंकिंग व्यवसाय हासिल करने मे हम सक्षम रहे। इन दोनों ही घटनाओं मे शाखा के
स्टाफ का उसी तत्परता से अमूल्य सकारात्मक सहयोग भी एक अहम लेकिन मुख्य कारक था जिनके
बिना उक्त अविस्मरणीय ग्राहक सेवा देना संभव न थी।
विजय सहगल


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