"स्व॰ राहत इंदौरी एवं काँच के घर"
राहत
इंदौरी का अभी हाल ही मे दो दिन पूर्व कोरोना पोसिटिव रहते दिल का दौरा पड़ने से निधन
हो गया। इसमे कोई शंका नहीं कि राहत इंदौरी ने शेरों शायरी की दुनियाँ मे अपना एक
अहम स्थान बनाया था। मुझे अच्छी तरह ध्यान है कि मैंने ग्वालियर,
भोपाल, रायपुर आदि शहरों मे मे अनेकों स्वागत, बिदाई या यूनियन के कार्यक्रमों मे "राहत इंदौरी" सहित कई नामचीन कवियों और शायरों की कविताओं और शायरी को उद्धरत कर उन कार्यक्रमों
का सफल संचालन किया था। कार्यक्रमों मे समय और परिस्थिति के अनुसार कविता और शेरों-शायरी
के वाचन से कार्यक्रम या सभा मे उपस्थित भागीदारों मे एक नई ऊर्जा और उत्साह का
संचार हो जाता है अन्यथा ऐसे कार्यक्रमों मे नेताओं के उबाऊ और थकाऊ भाषणों से
श्रोता उकता कर लघुशंका के बहाने धीरे धीरे सभा स्थल से गायब होना शुरू हो जाते है।
हम आप सभी ने सभा के दौरान सभा स्थल के बाहर इस स्थिति को अवश्य देखा और महसूस
किया होगा।
लेकिन
सभी नेताओं के भाषण, कवियों की कवितायें,
शायरों की शायरी एवं संत महात्माओं के प्रवचन मे इस तरह के उबाऊ या थकाऊ परिस्थितियां
नहीं बनती। लोग अच्छे वक्ताओं,
प्रवचोनों, कवियों और शायरों को ने
केवल ध्यान पूर्वक सुनते है बल्कि अपने
स्थान से हिलते भी नहीं। अखिल भारतीय स्तर पर
बैंक की मीटिंग मे कॉम॰ आलोक खरे और कॉम॰ नागराजन को अनेकों बार हमने सुना
है। हाल ही तक क्रांतकारी संत तरुण सागर जी महाराज की ओजस्वी वाणी मे प्रवचन सुनने
के लिए लाखों लोग एक पैर पर खड़े होकर भी सुनने को ललायित रहते थे। राजनैतिक दलों
मे विना किसी शंका के सर्वोत्क्रष्ट
वक्ताओं के रूप मे स्व॰ अटल विहारी
बाजपेयी का स्थान सर्वोपरि रहा था। शायरों मे ऐसा ही स्थान राहत इंदौरी को भी
प्राप्त था।
लेकिन
पिछले दो-तीन दिन से स्व॰ राहत इंदौरी की मृत्यु से उपजी उनकी यादों मे लोगो के दो
विपरीत ध्रुवों रूपी धुर विरोधी विचारों
को पढ़ कर हैरानी हुई। सोशल मीडिया मे जहां एक ओर उनके चाहने बालों ने उनकी शान मे
अनेकों अलंकरणों का उपयोग कर उनकी प्रशंसा की जो स्वाभाविक ही थी पर उनके आलोचकों
ने जिस तरह से उनकी निंदा की मेरे लिये आश्चर्य चकित करने बाला था। किसी ने पूर्वाग्रह से ग्रसित,
किसी ने उनके रूपरंग पर भद्दी टिपपड़ी कर चिंमगादड़ को उद्धरत किया। किसी ने अधम और छुद्र तक कहा। सामाजिक माध्यम के विभिन्न
मंचों पर इस निंदा और आलोचना की गहराई मे
जब जानने के प्रयास के तहत
"गूगल" पर सर्च किया तो "घुटनों
मे दर्द कैसा है" नाम की शायरी की "यू ट्यूब" पर एक क्लिप दिखायी दी। उक्त क्लिप मे मंच पर लगे
बैनर पर "भारत रत्न स्व॰ राजीव गांधी की याद मे" अखिल भारतीय मुशायरा का
बोर्ड लगा दिखा। उक्त बैनर पर दिनांक 18
अक्टूबर 2003 (शनिवार) का दिनांक लिखा है। दिनांक के दिन और बार को भी हमने गूगल
पर सुनिश्चित किया कि कहीं ये फेक विडियो
तो नहीं? पर ये सही था किन्तु शहर का नाम उस पर क्लियर न दिखाई देने के कारण
ये सुनिश्चित करना कठिन थी कि राहत इंदौरी किस शहर के मुशायरे मे शामिल दिखायी दे
रहे है। वस्तुतः उक्त विडियो के संदर्भ के कारण ही सोशल मीडिया के मंच पर राहत
इंदौरी की इतनी लानत-मलानत की गई थी। उक्त
विडियो मे उन्होने नाम न लेने की कह अपने शेर की कीमत करोड़ो रुपए का बता परोक्ष रूप से देश के पूर्व
प्रधान मंत्री को "दो कौड़ी" का आदमी कह उनका मखौल उड़ाया जिस दौरान उनके
घुटने का प्रत्यारोपण ऑपरेशन हुआ था। उक्त विडियो मे वे उनके घुटनों के दर्द का
मखौल उड़ा कह रहे है कि "काम घुटनों
से जब लिया ही नहीं, फिर ये घुटनों मे दर्द
कैसा है"। बेशक बोलने की आज़ादी और अभिव्यक्ति के अधिकार के अंतर्गत वे घुटनों
के दर्द तक ही सीमित रहते तो भी शायद राजनैतिक नेताओं के उपर चुटकी मान इस बात को नज़रअंदाज़
किया जा सकता था। लेकिन परोक्ष रूप से उनको
"दो कौड़ी" का कहना हद दर्जे की बद्जुवानी और एक पूर्व
प्रधानमंत्री के प्रति बेअदबी की पराकाष्ठा थी,
वह भी बाजपेयी जैसे सरल और शालीन व्यक्तित्व को। इस तरह के व्यवहार की अखिल भारतीय स्तर के शायर से कदापि अपेक्षा या
उम्मीद नहीं की जा सकती। कोई गली मोहल्ले छाप का शायर,
मुशायरे की सस्ती लोकप्रियता पाने के लिये इस तरह की अधम हरकत को करता तो भी समझा जा सकता था लेकिन राहत इंदौरी जैसे
शायर के मुंह से इस तरह की बदमिजाजी सुन
बड़ा आश्चर्य मिश्रित दुःख हुआ। वे इस सस्ते शेर को न भी कहते तो उनकी लोकप्रियता
या प्रसिद्धि मे रत्ती मात्र भी कमी न आती। लेकिन इसके विपरीत इस क्षणिक वाहवाही
के कारण इस शेर ने उनकी ख्याति मे एक धब्बा लगा उनके लाखों आलोचक पैदा कर दिये। लोकप्रियता के इतने ऊंचे मुकाम पर पहुँच कोई आदमी चंद शब्दों के माध्यम
से इतनी बड़ी गुस्ताख़ी भी कर सकता है ये उसका सटीक लेकिन घोर क्रूरतम उदाहरण हो सकता है।
हम
सभी बचपन से इस कहावत को सुनते आये है "कि मुंह से निकली बोली और बंदूक से
निकली गोली कभी बापस नहीं आती"। कवि बिहारी ने भी अपनी कविता-:
सतसैया
के दोहरे, ज्यों नावक के तीर।
देखन
मे छोटे लगै, घाव करें गंभीर॥ मे शब्दों को तीरों से ज्यादा गंभीर घाव देने
बाला बताया है।
जब
"राहत इंदौरी" जैसे प्रसिद्ध शायर भावनाओं मे बह अभिव्यक्ति की आज़ादी के
पक्षधर हो "तीरों" से भी तीखे शब्दों से किसी को आहत कर उसका मखौल उड़ा बेइज्जत कर सकते है तो उन साधारण जन मानस को इस
अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता से कैसे वंचित किया जा सकता है जो स्व॰ राहत इंदौरी के
रंग रूप की तुलना को लंगूरी, चिमगादड़,
और पूर्वाग्रही जैसे अलकरणों से उनकी
निंदा, आलोचना और विरोध कर तिरस्कार कर रहे हों?
ये एक विचारणीय प्रश्न है।
उक्त
घटना या परिस्थितियाँ वर्तमान नायकों के
लिये इस बात की गंभीर चेतावनी भी है जो प्रसिद्धि के मुहाने पर खड़े है,
फिर वे नेतृत्वकारी व्यक्ति चाहे राजनीति मे हों या साहित्य,
संगीत, आर्थिक क्षेत्र सहित अन्य किसी भी क्षेत्र
की विध्या मे पारंगत हों, उन्हे हमेशा इस
बात को स्मरण रखना होगा कि "काँच के घरों मे रहने बाले लोग दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंका करते"
।
विजय सहगल


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