"मैनेजर की व्यथा"
मैनेजर का बीबी से हो गया झगड़ा।
छोटा नहीं तगड़ा॥
बोली,
हम औरतों की भी 'अजब'
कहानी है।
शादी के बाद,
एक अपरचित घर मे,
सारी उमर बितानी है॥
पूरी ज़िंदगी पापड़ बेलना है।
"सास-ससुर" के नखरे झेलना है॥
"जेठ" जी के ताने।
सौ हुक्म माने॥
एक मे भी चूके।
तो मर गये भूंखे॥
रास्ते है संकरे।
"देवरों" के नखरे॥
"ननदें" घोड़ी पर सवार।
जैसे,
सिर पर लटकी तलवार॥
इन सबसे बचे हम।
तो "बच्चों" ने लिया दम॥
गुजरी उम्र सारी।
हाय "अबला" वेचारी॥
सुनते सुनते मैनेजर को भी आ गया जोश।
तानों के उससे,
वह भी खो बैठा होश॥
बोला,
तेरी और मेरी कहानी नेक है।
सिक्के है दो,
पर पहलू एक है॥
मैनेजर है "बहू" की तरह,
शाखा के जैसा है घर।
"आर॰एम॰® है "ससुर" की तरह,
जिससे लगता है डर॥
जो रिश्ता "गरीब" और "सेठ" का
है।
गरीब हूँ मै "ए॰आर॰एम॰© "जेठ" सा
है॥
जो शाखा मे मैनेजर के गले के फंदे है।
"कैशियर" और "बाबू" के रूप मे "देवर"
और "ननदें" है॥
और जो उम्र मे छोटे,
पर मन के सच्चे है।
"सब-स्टाफ" मेरे बच्चे है॥
"स्पेशल एसिस्टेंट",
जो नाविक के तीर है।
देखन मे छोटे लगे पर घाव करें गंभीर है॥
ज़िंदगी के रास्ते,
कहीं टेढ़े कहीं प्लेन है।
मिल गये रिश्तेदार ठीक,
तो हीरो,
वरना,
ब्लेन है.....वरना ब्लेन है॥
(®आर॰एम॰-रीजनल मैनेजर,
© ए॰आर॰एम॰ -एस्सिटेंट रीजनल मैनेजर)
विजय सहगल


1 टिप्पणी:
बहुत खूब सर।
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