"कोरोना-कथा"(व्यंग)-"भाग-1"
कल सोसाइटी मे प्रातः भ्रमण मे कोरोना
कोविड-19 मिल गया। कुछ कदम साथ ही चला होगा मैंने तुरंत ही दुत्कार कर टोका
"दो गज दूर हो के चल"। बड़ी ही हिकारत की द्रष्टि से देखा
उसने। ऐसे घूर कर क्या देखता है?
मैंने कहा- "जागरूक हूँ",
"तेरी यहाँ दाल न गलने बाली",
"मास्क लगा कर चलता हूँ"। अपने बड़बोलेपन से कोरोना बोला- "जागरूक,
हा-हा-हा" तो फिर देश मे सभी जगह इस जागरूकता का अभाव क्यों?
मक्कारी भरी मुस्कराहट चेहरे पर ला,
बोला- "फिर देश मे बीस लाख से ज्यादा लोग मेरे कैसे हो लिये"?
मैंने कहा वे कोई और होंगे और हाँ अब तू यही रह मेरा घर आ गया। बोला- "हमे घर
न ले चलोगे"? मैंने कहा घर........,
ये मूंग और मसूर की दाल......... । मलेरिया,
हैजा या चिकिंगुनियन होता तो भी ले जाता पर तुझे हर्गिज नहीं ले जाऊंगा?
बोला- क्यों? मैंने कहा -: "चीनी
सामान का बहिष्कार करने की जो ठानी है"। "चाइनीस समान पर बैन लगा दिया
है हमने"। "किसी भी वस्तु यहाँ तक कि चीनी बीमारी का भी प्रवेश निषेध"!
"खबरदार घर की तरफ देखने की कोशिश भी न करना"।
पार्क मे सारी रात कहीं पड़ा रहा। आज सुबह
फिर मुलाक़ात हुई। बोला- "गुड मॉर्निंग"। मैंने कहा "काहे की गुड
मॉर्निंग वे"। बैसे भी हमारे व्हाट्सप ग्रुप के एडमिन इस "गुड मॉर्निंग"
से दुःखी रहते है। "कहाँ रहा सारी रात"?
मैंने यूं ही पूंछ लिया। कोरोना बोला- "कोशिश
करता रहा किसी के घर जाने की पर कोई लेने ही नहीं
आया"। "लगता है तुम्हारी सोसाइटी के लोग कुछ ज्यादा ही स्मार्ट है"। मैंने कहा- "तुम जैसे करम जले को
कौन घर ले जायेगा अपने"। कुटिलता से कोरोना बोला- "ले क्यों नहीं जायेगा"?
देश के महानायक भी बड़ी बड़ी बात करते थे,
कहते थे- "कोरोना खुद नहीं आता जब तक कि आप खुद उसे घर लेने नहीं जाओगे"!!....."लटक
लिया न उनके साथ"!! धरे रह गये सारे उपदेश?
कोरोना बड़ी निर्लज्जता से बोला "अरे तुम नहीं जानते,
मै बो शैतान हूँ? कि- "ऐसा कोई सगा
नहीं जिसको हमने ठगा नहीं"। बात तो सही थी लेकिन मुझे जँची नहीं। मैंने
प्रतिवाद किया। धोखा! सिर्फ धोखे से महानायक को फंसाया तुमने?
अरे अब तो तुम्हारी बदमाशियां भी बहुत बढ़ गयी। अरे अब तो तुम बहू बेटियों से भी
इश्क करने पर उतर आये। कुछ माह पूर्व तुमने लखनऊ की उस हीरोइन गायिका....अरे क्या
नाम उसका..... खैर छोड़ो, से मुंह लड़ाया था
तुमने, हमने सोचा चलो कोई बात नहीं तीसरे पेज की
हीरोइन है लेकिन अब तुम्हारी ये हिमाकत की तुम पूर्व विश्व सुंदरी से मुंह लड़ा
इश्क फरमा रहे? अरे उसकी नादान बच्ची
को भी तुमने पॉज़िटिव कर दिया? शर्म नहीं आयी?
उसके ससुर को तो तुम पहले ही अपने इश्क की गिरफ्त मे ले चुके थे।
"अरे ये इश्क का सारा चक्कर भी उन्ही
महानायक की देंन है, उनसे ही मैंने ये सीखा"!,
कोरोना बोला।
मैंने कहा- "वो कैसे"?
तो कोरोना बोला- "मेरे पिताजी सी
जिंपिंग ने अपनी जवानी मे महानायक की फिल्म कुली देखी थी"। "फिल्म "कुली" मे महानायक ने जैसी
एक्टिंग की थी क्या धान्सू एक्टिंग की थी,
"बाबा रे बाबा",
"मेरे पिताजी बतलाते थे, बे चौंक गये थे "कुली"
फिल्म देख कर। क्या शानदार अभिनय किया था!,
महानायक ने।"
मैंने अपना सीना चौड़ा कर सवाल किया,
"सारी दुनियाँ उनका लोहा मानती है"!!
"ऐसे ही नहीं कहा था मैंने महानायक
के अभिनय को"?
कोरोना बोला- पिताजी जिस दिन चीन के नये
राष्ट्रपति बनने बाले थे उसके एक दिन पहले कुली फिल्म देख कर "इतने इम्प्रेस
हुए", "इतने इम्प्रेस
हुए", "इतने इम्प्रेस
हुए"।
मैंने झुँझला कर कहा- "आगे भी बोलेगा या यही
"इम्प्रेस" पर ही सुई अटक गई"?
कोरोना बोला-राष्ट्रपति बनने के एक दिन
पूर्व जब उन्होने फिल्म देखी, फिर क्या उन्होने
एक कठिन निर्णय ले लिया? मैंने पूंछा
क्या कठिन निर्णय ले लिया किसी नये देश की जमीन हड़पने का सोचा होगा?
कोरोना बोला-अरे नहीं न, मेरे पिताजी सी
जिंफिंग ने कहा कि "साला चीनी राष्ट्रपति" बनने से तो अच्छा है "कुली"
बन जाऊ? क्या गज़ब एक्टिंग थी
महानायक की। उन्हे लगा था क्या ठाँठ की ज़िंदगी है "कुली" की। छाँट छाँट
के सुंदर-सुंदर महिला यात्रियों का सामान ढोते हुए नाचते गाते सामान को स्टेशन के
बाहर तक ही नहीं बल्कि उसके घर तक और उसके बेड रूम तक सामान रख के आओ। क्या मजे
है! वो सुंदरी "भाड़े के पैसे भले दे
न दे" लेकिन कितना जीवंत अभिनय था
महानायक का कि हीरोइन ने खुश होकर अपना दिल कुली को दे इश्क लड़ाना शुरू कर दिया।
और तो और उस अभिनेत्री के माँ-बाप भी इस
रिश्ते से खुश थे। ऐसा लगता था कुली के आगे सारी दुनियाँ बेकार! तब पहली बार उन्हे
लगा था कुली की लाइफ के सामने चीन के राष्ट्रपति की क्या बिसात?
अगर कुली बन गये तो मानो जीवन सफल हो गया?
"कोरोना" बोला- पिताजी बताते थे कि "उन दिनों चीन के बहुत से
नौजवानों ने आपके महानायक की फिल्म
"कुली" देख कर अपनी डॉक्टर,
इंजीनियर और बैंक की नौकरी छोड़ रेल्वे स्टेशन
पर कुली का धंधा शुरू कर दिया था"। धन्य
है तुम्हारे महानायक और धन्य है आप!! कोरोना ने कहा।
मै समझ नहीं पाया "साला कोरोना मेरा मज़ाक
उड़ा रहा है या महानायक के अभिनय की तारीफ कर रहा है??
कमीना ऐसे ही झूठा मज़ाक कर उल्लू तो नहीं बना रहा?
मैंने कहा:- ठीक है, ठीक है।
लेकिन कोरोना यहीं नहीं रुका -: "बोला,
जब महानायक "कुली" बन कर सुंदर सुंदर लड़कियों का
सामान उठा कर स्टेशन के बाहर तक तो छोड़ो उसके घर तक "छेड़ते" हुए "छोड़ता"
था। तब तुमने कोई आबाज नहीं उठाई? और अब वही सब मै
सुंदर सुंदर स्त्रियॉं से इश्क लड़ा रहा तो तुम्हें बड़ी आपत्ति हो रही है?
बहू बेटियों की बड़ी चिंता हो रही??
मुझ से बोलते न बना फिर भी मैने कहा- मै,
मै......., मेरा कहने के
मतलब......,
बोला- "खामोश"!,
मेरी पूरी बात सुनो। "क्या तुमने कभी फिल्म मे देखा कि महानायक किसी बूढ़ी लाचार
औरत के सामान को सिर पर रख उसके घर तक
छोड़ने गया हो? क्या तुमने उनकी या
अन्य छैल छबीले बड़ी बड़ी मांस पेशियों बाले नायक या महा नायक को फिल्म मे देखा कि
किसी बीमार या गरीब यात्री का सामन ले उनके घर तो छोड़ो प्लातेफ़ोर्म के बाहर तक
छोड़ने गये हों? क्या तुमने देखा,
महानायक ने लाखों पलायन कर रहे प्रवासी मजदूरों और उनके छोटे छोटे मासूम बच्चों के
सिर पर रखे बोझे को हल्का कर किसी एक मजदूर का भी सामान ट्रेन से बाहर निकाल
प्लेटफोर्म पर भी रखने की झूठ-मूट एक्टिंग की हो?
तुम्हारे महानायक की क्या यही परिभाषा है कि हीरोइन के लिये जी हाँ सिर्फ हीरोइन
के लिए उसके आगे पीछे ऊदविलाव की तरह पूंछ उठाये घूम-घूम कर नाचे-गाये?
एक अकेला महानायक चालीस पचास गुंडों बदमाशों को "ढिशिंग-ढिशिंग" कर मार
भगाये और वही महानायक हम जैसे पिद्दी "कोरोना" से मात खा जाये,
तो बताओ महानायक मै? या महानायक वो?
बात मे दम थी। मै चुप रहा।
कोरोना अब तो अपने सुरूर मे धाराप्रवाह बोले
चले जा रहा था। मै कोई प्रत्युत्तर देने की स्थिति मे भी न था।
बो फिर बोला- आप ध्यान से सुनों! तुम भारतीय
लोगो की सबसे बड़ी कमी है कि "रियल महानायक" और "रील महानायक"
के बीच का अंतर तुम्हें आज भी नहीं मालूम?
अरे सच्चे महानायक वो डॉक्टर,
पेरमेडिकल स्टाफ है जिन्होने अपनी जान पर खेल महामारी से प्रभावित लोगो का इलाज़
किया और अनेकों मेडिकल महानायकों ने इलाज
करते करते खुद महामारी से ग्रसित हो अपनी जान गँवा बैठे और तुमलोग........,
तुमलोग कितने अधम निर्लज्ज, और नीच रहे कि
इन्ही फरिश्तों के उपर पत्थरों और डंडों से हमला किया!! शर्म से डूब मरने बाली ऐसी
हरकते की कि सेवा कर रही महिला मेडिकल
स्टाफ के सामने अश्लीलता की हदे पार कर
दी। क्या तुम्हारी यही -सांस्कृति है और ये ही संस्कार तुम्हारे मत,
संप्रदाय और सोच ने तुम्हें सिखाये?
क्या घर पर भी अपने परिवार की महिलाओं के साथ ऐसी ही बदसलूकी करते हो?
पशु से भी गिरी हरकते है तुम्हारी और दम भरते हो कि हम आदमी है?
लानत है तुम्हारी आदमीयत पर!! अरे सच्चे महानायक वे है जो सीमा पर देश की रक्षा के
लिये अपना जीवन आहूत करते है। पर्दे पर खलनायक का अभिनय करने बाला वो सोनू सूद
तुम्हारे सिनेमाई पर्दे के अनेकों छद्म
नायकों से भी कहीं बहुत बड़ा महानायक है। अपने सीमित साधनों के बाबजूद जिसने गरीब,
भूंखे लाखों प्रवासी मजदूरों को खाना खिलाया और बसों से उनके घर तक पहुंचाया!!
महानायक वे नहीं जो सिर्फ पर्दे पर ढिसुंग ढिसुंग करते रहे?
या वो राजकुमारी जिन्होने प्रवासी मजदूरों के लिये तथाकथित हजार बसों का इंतजाम किया और नंबर दिये स्कूटर,
ऑटो और टैक्सीयों के? राजनैतिक
दोगलापन सरकारों ने भी कम नहीं दिखाया। काश बेचारे प्रवासी मजदूरों को सिर्फ खाने
और रहने की व्यवस्था ईमानदारी से की होती तो उन लाखों प्रवासी मजदूरों को भरी
दोपहरी मासूम बच्चों के साथ सैकड़ो-हजारों किलोमीटर पैदल चलने के लिए मजबूर न होना
पड़ता और तुर्रा ये बीमारों के ईलाज मे भेद-भाव करने की स्वार्थ परक नीति अपना कर
जनसेवक होने का ढोंग करते रहे? हा!! शोक कुछ
बेचारे प्रवासी तो पलायन की
इस आपाधापी मे अकाल मृत्यु को प्राप्त हो गये!! जब तक देश के लोग
चिकित्सकों, सुरक्षा बल और सेना के
जवानों को महानायक न मान 100-150 रूपये
मे सिनेमा हाल या पीवीआर की स्क्रीन पर
तीन घंटे बंदर-बंदरियों की तरह नाच
दिखाने बाले तथाकथित "नचनियों" को महानायक मानेंगे तो इस महामारी से
तुम्हारी दुर्दशा होने से कोई नहीं रोक सकता?
कुछ देर सुस्ता कर वह फिर बोला चलो तुम्हें एक बुंदेलखंडी कहानी सुनाता हूँ। एक 80 साल की बूढ़ी को स्कूटर बाले ने टक्कर मार दी.........
(क्रमश:) :
विजय सहगल


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