"अमीर बच्चों की पॉकेट मनी"
श्रीमान संपादक, 24.08.2020
नवभारत टाइम्स
नई दिल्ली।
महोदय,
आपके समाचार पत्र दिनांक 23 अगस्त 2020
मे मनी मंत्र के तहत श्री लोकेश के॰ भारती के टिप्स,
ट्रिक्स, आइडियास पढे। बच्चो को
मनी मैनेजमेंट समझाने हेतु उन्होने मुकेश-नीता अंबानी द्वारा अपने बच्चों को स्कूल
पॉकेट मनी के रूप मे पाँच रूपये प्रति दिन देने के उदाहरण के रूप मे दर्शा समझाने
का प्रयास किया।
इस संबंध मे मुझे गीतकार श्री साहिर लुधियानवी के गीत की ये लाइने याद आ
रही है जो उन्होने किसी शायर द्वारा लिखे गीत :-
"इक शहँशाह ने बनवा के हंसी ताज महल......... की तर्ज़ के विपरीत इन
लाइन मे लिखा है:-
"इक शहंशाह ने दौलत का सहारा ले कर,
हम ग़रीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मज़ाक,"
आपके मनी मंत्र मे उदाहरण देकर श्री अंबानी जी के परिवार के बच्चों
को स्कूल पॉकेट मनी के आइडिया से कुछ ऐसी ही अनुभूति हम जैसे निम्न और मध्यम
वर्गीय परिवारों द्वारा अपने बच्चों को दी जा रही पॉकेट मनी को देते हुए भावना से
ग्रसित करती है।
इस विषय मे काफी चिंतन मनन के बाद मै ये समझने मे
असफल रहा कि इस उदाहरण से लेखक महोदय
किसको बरगलाने का प्रयास कर रहे है?
इस संबंध मे उन करोड़ो मध्यम वर्गीय माता-पिता को जो इसे पढ़कर शायद अपने बच्चों को एक रूपये भी पॉकेट मनी के
रूप मे न दे सकने के दुःख और पश्चाताप की आग मे अपनी विवशता और लाचारी पर आँसू वहाये?
या उन संघर्षशील बच्चों पर जो अपनी दैनिक जरूरतों भर कि आवश्यकताओं को पूरा करने मे ही अपने जीवन की
सार्थकता मान अपनी संघर्ष यात्रा जारी रखे हुए है?
या देश के उस सर्वोच्च धनी मानी परिवार एवं उनके
बच्चों को जिनकी प्रशंसा या महिमामंडन
"पाँच रूपये के स्कूल के पॉकेट मनी" रूपी उदाहरण दे एक सामान्य
एवं मध्यम वर्गीय भारतीय परिवार बनने के छद्म प्रयास को?
निम्न और मध्यम वर्गीय परिवार, बच्चों को कठिन संघर्ष,
श्रमसाध्य आचरण एवं निर्धनता से मिली सफलता के श्रेय को ढंका और छुपा कर रखते
है। इस तरह के उदाहरण से अलग उक्त परिवार की महिमा मंडन की लेखक या पत्र की
व्यावसायिक बाध्यता को समझा जा सकता है,
पर इसके लिये अन्य अनेकों दूसरे विकल्प मौजूद है जैसे- सम्मान समारोह या
पुरुस्कारों रूपी अलकरणों से अलंकृत कर इन आभिजात श्रेष्ठियों के मन मे सम्मान की ललक और लालसा को पूर्ण किया जा
सकता था। पर यहाँ उदाहरण मे उनके उक्त
"पाँच रूपये की स्कूल पॉकेट मनी" के "दर्शनशास्त्र" का
यह तत्वज्ञान हम सामान्य जनों की समझ के
परे है।
लेखक महोदय
शायद अपनी ऊंची एवं प्रगतिशील सोच को आम भारतीय की सोच का उदाहरण मान उनके
सपनों को ऊंचा दिखा उन्हे अंबानी जी के बच्चों के समकक्ष रखने का प्रयास कर रहे हों। इसके विपरीत हम जैसे गिरे,
अधोपतित और निम्न सोच के व्यक्ति इन संघर्ष शील युवाओं और बच्चों
को ऊंचे सपने की उड़ान के विरुद्ध उन्हे अपनी वास्तविक स्थिति मे रह जमीन से जुड़े रहने के लिए चेता
रहा है!! साहब, पॉकेट मनी के रूप मे
देश के प्रथम धनी परिवारों मे शुमार अंबानी परिवार के पाँच रूपये का उदाहरण देकर इन
मध्यम और निम्न वर्गीय युवाओं ने जो थोड़ी बहुत सफलता अपने संघर्ष से हांसिल की है उनके
जीवन अस्तित्व रूपी संघर्ष को इतने हल्के
मे जाया न करे।
वेशक इस परिवार ने अपने औध्योगिक साम्राज्य से देश
के आर्थिक विकास मे एक अहम भूमिका अदा की हो?
इनके द्वारा परोपकार और दान-पुण्य के कार्यों के तहत बड़े बड़े स्कूल और अस्पताल से
हम सभी अच्छी तरह से वाकिफ है। मुंबई स्थित धीरुभाई अंबानी इंटरनेशनल
स्कूल शिक्षा के क्षेत्र मे एवं मुंबई मे ही स्थित
कोकिलाबेन धीरुभाई अंबानी हॉस्पिटल एवं शोध संस्थान चिकित्सा क्षेत्र मे एक
अहम भूमिका निभा रहा है जिसके योगदान को दुनियाँ और देश मे बड़ी सरहना प्राप्त है। क्या इन मध्यम और निम्न वर्ग के बच्चे जो अपने
परिवार से पॉकेट मनी के रूप मे पाँच रूपये या उससे कम पॉकेट मनी पाते है,
क्या उन शिक्षा एवं चिकित्सा संस्थानों मे
शिक्षा या चिकित्सा पाने की सोच भी सकते है?
पता नहीं लेखक महोदय इन तथ्यों एवं वास्तविकताओं से अवगत है या नहीं?
इन संस्थानों का देश के आर्थिक विकास मे योगदान को मेरे सहित कोई
नहीं नकार सकता पर ये मेरा द्रढ़ मत है देश की 99% आबादी उनके इन शिक्षा और
चिकित्सा संस्थाओं द्वारा की जा रही सेवाओं से निचित ही वंचित होंगी। इस पर भी इस
परिवार के बच्चों की पॉकेट मनी वेशक पाँच
रूपये से दस रूपये न बढ़ाने की इन के
अभिभावक की मजबूरी लेखक महोदय के समझ आयी
हो या न आयी हो पर मेरी तो समझ से परे है?
कृपया निम्न और मध्यम वर्गीय इन बच्चों को जमीन से जुड़ा रहने दे उनको इतने हंसीन
सपने न दिखाये कि सपने से जागने पर ये सीधे आसमान से नीचे आ जमीन पर गिरें और किसी भी काम के न रहे!!
क्योंकि आपके मनी मंत्र के इस पाँच रूपये के पॉकेट खर्च
बाले सूत्र के निहतार्थ फलीभूत होकर अंबानी परिवार के बच्चों की तरह आम जनों के
बच्चों की सफलता बन चरितार्थ करेंगे,
इसमे शंका है?
विजय सहगल



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