बुधवार, 9 अक्टूबर 2019

गायत्री तीर्थ-मुंसियारी (प्रथम भाग)


गायत्री तीर्थ-मुंसियारी (प्रथम भाग)












पिछले वर्ष अगस्त 2018 मे शांतिकुंज हरिद्वार  मे 9 दिवसीय संजीवनी सत्र मे जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। उस सत्र से एक असीम ऊर्जा एवं आनंद का अनुभव हुआ था। वहाँ पर पिथौरागढ़ स्थित गायत्री चेतना केंद्र मुंसियारी के बारे मे सुना था तब से मुंसियारी जाने की लालसा मन मे थी। इस वर्ष जैसे ही पता चला कि मुंसियारी मे 5 दिवसीय विशिष्ट साधना शिविर के आयोजन की श्रंखला शुरू होने जा रही है तो तत्काल ही उक्त शिविर मे शामिल होने का प्रयास किया। इस शिविर के मुख्य समन्वयक श्री विष्णु मित्तल जी द्वारा 12 अगस्त 2019 को मेल पर हमे सूचना मिली कि मुझे और मेरी पत्नी रीता सहगल को दिनांक 25 सितम्बर से 03 अक्टूबर के सत्र मे शामिल होने की सहमति मिल गई। तभी से मुंसियारी जाने की तैयारियों मे जुट गया। श्री मित्तल जी द्वारा ई-मेल पर आवश्यक निर्देश हर साधक को मुंसियारी जाने के लिये दिये गये। मुंसियारी जिला पिथौरागढ़ (उत्तराखंड) समुद्र ताल से 7300 फुट उपर होने के कारण गरम कपड़ो, पीने के पानी के लिये थर्मस बॉटल, एवं आवश्यक दवाई आदि जो लेते है साथ लाने के निर्देश दिये। एक अन्य आवश्यक निर्देश जो शारीरिक क्षमता बढ़ाने का था वह यह कि दिन भर मे 400 सीढी चढ़ने/उतरने का था इसकी पूर्ति के लिये हमने जहां एक ओर पैदल चलने का दायरा बढ़ाया वही हमारी श्रीमती जी ने हमारी सोसाइटी मे स्थित 13वी मंजिल के घर मे 4-5 मंजिल बगैर लिफ्ट की सहायता से नित्य पैदल चढ़ना अपनी दिनचर्या का हिस्सा पिछले एक डेढ़ महीने से बना लिया था। इस शिविर मे हमारे अनुज भाई श्री राजेश कंचन झाँसी से शामिल होने साथ मे आ रहे थे।  सभी ने तुरंत ही अगस्त मे हरिद्वार तक का ट्रेन रिज़र्वेशन करा लिया और यात्रा तिथि का इंतज़ार करने लगे। नियत तिथि को सभी आवश्यक निर्देशों का पालन कर हम दोनों दिनांक 25 सितम्बर 2019 को प्रातः 6 बजे के आसपास शांतिकुंज हरिद्वार पहुँच गये। झाँसी से हमारे भाई श्री राजेश कंचन अपने विभागीय ज़िम्मेदारी के कारण एनवक्त पर शिविर मे शामिल न हो सके। नोएडा के मुक़ाबले हरिद्वार का मौसम सुबह और शाम का तो ठीक था पर दोपहर नोएडा की तरह ही गरम थी। मुंसियारी जाने बाले साधक धीरे धीरे शांति कुंज पहुँचने लगे। हम लोग श्रंगऋषि परिसर पहुंचे जहां सभी साधकों के ठहरने की व्यवस्था थी। हमे जिस कमरे मे रुकने के निर्देश थे उस कमरे मे नागपुर और भोपाल से पधारे परिजन श्री विलास देशमुख एवं श्री शरद देशमुख भी अपने परिवार के साथ कमरे को सांझा कर रहे थे। आपसी अभिवादन के साथ ही हम छः परिजन आपस मे जल्दी ही घुलमिल गये। हम सभी का ये आपसी सदभाव शिविर के अंत तक कायम रहा। दिनांक 25 सितम्बर 2019 को पित्रपक्ष की  एकादशी थी हमारे स्वर्गीय पिताजी का श्राद्ध दिन था, अतः हम पति-पत्नी ने देवभूमि हरिद्वार मे उनका श्राद्ध तर्पण किया जो गायत्री परिवार के परिजनों ने बड़ी विधि विधान एवं मंत्रोचारण के साथ विधिवत सम्पन्न कराया। इस डेढ़-दो घंटे के  कार्यक्रम मे देश के दूरदराज़ से आये लगभग 1000-1100 लोगो ने अपने-अपने पूर्वजों का श्रद्धा पूर्वक एक साथ श्राद्ध तर्पण किया। सभी परिजनों को तर्पण संस्कार मे लगने  बाली सामाग्री निशुल्क प्रदान की गई बगैर किसी दान दक्षिणा की वाध्यता के साथ।  ऐसी सेवा एवं भारतीय संस्कारों को संपादित कराने की  परंपरा परम पूज्य गुरुदेव पंडित  श्री श्रीराम शर्मा, आचार्य की प्रेरणा से प्रेरित, मात्र शांति कुंज हरिद्वार मे ही देखी जा सकती हैं। पूरे पित्रपक्ष के दौरान श्राद्ध और तर्पण का संस्कार दिन मे तीन-चार पारियों मे लगातार सम्पन्न कराया गया, जो एक अनुकरणीय एवं सराहनीय कार्य है। हिन्दू धर्म के समस्त संस्कार शांति कुंज हरिद्वार मे विधिवत नित्य संपादित कराये जाते है बगैर किसी जाति, वर्ग  या प्रांतीय भेदभाव के। दोपहर  शिविर के सभी साधक शाम तक शांतिकुंज पधार चुके थे, जिन्हे शाम को कैंटीन के उपर हाल मे एकत्रित कर शिविर के मुख्य समन्वयक श्री विष्णु मित्तल जी से मिल कर अगले दिन की यात्रा के लिये आवशयक निर्देश एवं परामर्श लेना था। श्री चम्पक भाई साहब के साथ श्री विष्णु मित्तल जी से सभी 27 परिजनों की औपचारिक मुलाक़ात और आपसी परिचय के बाद मुंसियारी तक बस यात्रा एवं मुंसियारी मे चार दिन और पाँच रातों तक रुकने एवं बापसी तक के कार्यक्रमों पर विस्तार से बताया गया। मुंसियारी के दैनिक कार्यकलापों की विस्तृत समय सारणी सभी परिजनों को वितरित की गई। रात्रि भोजन के पश्चात  सभी परिजनों के चेहरों पर प्रातः सुबह यात्रा प्रारम्भ होने का उत्साह, उल्लास और उमंग स्पष्ट देखी जा सकती थी।

26 सितम्बर को हम प्रातः 4.00 बजे जाग गये ताकि शांति कुंज के प्रातः कालीन हवन मे शामिल हो सके। शांति कुंज मे हवन  यज्ञ मे शामिल होने पर हमेशा राम लीला मे देखे या पढे प्राचीन ऋषियों के आश्रम की याद हो आती है। आधुनिक युग मे राम राज्य के समय की ऋषि-मुनियों की आश्रम व्यवस्था से साक्षात्कार शांतिकुंज हरिद्वार मे आज भी जीवंत देखा जा सकता हैं। यज्ञ जैसे पवित्र कार्य मे आहुती समर्पित कर हम लोग प॰पू॰ गुरुदेव द्वारा सन् 1926 मे प्रज्वलित अखंड दीप के दर्शन करने गये जहां पर गुरदेव ने सघन लेखन कार्य किया और गायत्री परिवार को सतत नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। तत्पश्चात हम सभी परिजन श्रद्धेय डॉ॰ प्रणव पाण्ड्या एवं सम्मानीय दीदी से मुंसियारी यात्रा का आशीर्वाद ग्रहण करने पहुंचे। जहां हम अन्य सैकड़ो परिजनों के साथ उपस्थित थे। हम सभी मुंसियारी जाने बाले परिजनों ने श्रद्धेय डॉ॰ प्रणव पाण्ड्या एवं सम्मानीय दीदी से यात्रा के लिये  आशीर्वाद लिया, श्रद्धेय डॉ॰ प्रणव पाण्ड्या एवं सम्मानीय दीदी ने जाने बाले सभी परिजनों का कुशलक्षेम पूंछा और यात्रा के लिये अपनी शुभ कमनायें प्रेषित की।  स्वल्पाहार के पश्चात मुंसियारी जाने बाले सारे परिजन श्रंगऋषि परिसर मे एकत्रित होकर बस के पास एकत्रित हुए एवं बस के सामने श्री विष्णु मित्तल जी के साथ एक यादगार ग्रुप फोटो ली। इस अवसर पर श्री विष्णु जी मित्तल द्वारा बस के सारथी गुरमीत को विधिवत गायत्री अंग वस्त्र प्रदान कर सम्मानित किया और सभी परिजनों को सफल यात्रा की शुभकामनाए प्रेषित की। सभी परिजन अपना-अपना समान बस मे चढ़ा कर लगभग 10.30 बजे गायत्री मंत्र का उद्घोष करते हुए बस से यात्रा आरंभ की।  

मुंसियारी के लिए विशिष्ट सधना शिविर के साधकों की बस गंगा नदी के किनारे हर की पौढ़ी को पीछे छोड़ती हुई  अपनी मंजिल की ओर बढी जा रही थी। लगभग 220-30 किमी का लक्षय तय कर पहले दिन काशीपुर पंतनगर होते हुए गायत्री शक्ति पीठ हल्द्वानी पहुँचना था। हम अपने तय समय अनुसार अपनी मंजिल की ओर बढ़ रहे थे। दोपहर मे हम सभी काशीपुर मे अपने परिजन श्री आर॰ के॰ सिंह चौहान का आथित्य ग्रहण करने हेतु उनके निवास पर पहुँच गये। श्री चौहान जी द्वारा सभी परिजनों को प्रज्ञा पेय के साथ स्वपल्पाहार से स्वागत किया गया। श्रीमती चौहान द्वारा सभी बहिनों का स्वागत किया गया। सभी परिजन अल्पविराम मे फ्रेश होकर लघु शंका आदि से निवृत होकर आगे चलने का कार्यक्रम के लिए बढ़े। बस चालक ने जैसे ही गाड़ी स्टार्ट करने की कोशिश की तो पता चला बस मे कुछ व्यवधान है। बस की खराबी कुछ गंभीर थी जिसको ठीक करने मे 3-4 घंटे का विलंब हो गया। इस दौरान श्री चौहान जी एवं उनके सुपुत्र लगातार हम सभी परिजनों के साथ लगातार बने रह कर बस को ठीक कराने का प्रयास करते रहे, तब कहीं  रात 7.30-8.00 बजे हम लोग हल्द्वानी के लिए प्रस्थान कर सके। हल्द्वानी की  शक्ति पीठ पर हमारे परिजन श्री बसंत पांडे जी एवं हरिद्वार से श्री विष्णु मित्तल जी  लगातार हम सभी का कुशल क्षेम पूंछते रहे।  इस तरह हम सभी परिजन रात 10 बजे के लगभग हल्द्वानी पहुंचे जहां पर सभी कार्यकर्ता जाग कर हम लोगो का इंतज़ार कर रहे थे। हल्द्वानी 2.00-2.30 घंटे देर से पहुँचने के बाबजूद श्री बसंत पांडे जी द्वारा आदर सहित हम सभी को तैयार होकर भोजन करने का अनुरोध किया। सभी परिजन अपना हाथ मुंह धोकर भोजन उपरांत शयन के लिए अपने अपने कमरों मे प्रस्थान कर गये ताकि सुबह जल्दी नहा धोकर मुंसियारी के लिये प्रस्थान कर सके।

सुबह सुबह 3.30 बजे से  सभी परिजन जल्दी-जल्दी नहा धोकर तैयार होकर बस मे सवार होने के लिये बस के पास पुनः एकत्रित हो गये एवं लगभग 5.00 बजे 290 किमी की यात्रा को पूर्ण करने हेतु  मुंसियारी के लिये यात्रा शुरू की। उस समय तक सूर्योदय नहीं हुआ था ज्यादा ट्रैफिक न होने के कारण हल्द्वानी शहर को पार कर काठगोदाम को पीछे छोड़ते हुए भीमताल, भुवाली से होकर सुबह 6 बजे कैंची मंदिर, नीम करौली बाबा के धाम पर हम लोगो ने पहला पढ़ाव चाय नाश्ते के लिये डाला। कुछ परिजन चाय का ऑर्डर देकर मंदिर के दर्शन करने चले गये। इसी बीच चाय तैयार हो चुकी थी, चाय, ब्रेड-बटर, बिस्कुट आदि का हल्का-फुल्का नाश्ता कर पुनः सभी परिजन मुंसियारी के लिये आगे बड़े। अब तक सुबह का मौसम कुछ मन भावन होने लगा था। अल्मोड़ा होकर कुमायूँ क्षेत्र के आराध्य न्याय देवता भगवान गोलु के मंदिर, चितई होते हुए थल पहुंचे जहां पर एक बार फिर सभी लोगो ने चाय पानी के लिये विराम लिया। इसी बीच धौलचीनी स्थित हरिओम होटल पर भोजन करने बाले परिजनों की संख्या प्रेषित करनी थी। श्री विलास देशमुख जी द्वारा लगातार विष्णु जी, मुंसियारी मे श्री श्याम जी अग्रवाल, होटल बाले एवं हल्द्वानी मे श्री बसंत जी  से संपर्क कर संतुलन बनाये रख इस कार्य को बखूबी अंजाम दिया। धौलाचीनी से भोजन कर हम बमुश्किल आधा किमी ही निकले थे कि श्री विलास देशमुख को याद आया कि उनका दवाइयों का बैग होटल मे छूट गया है, चूंकि होटल बाले का नंबर पहले से ही था और पहाड़ की यात्रा मे बस को बापस मोड़ना संभव न था, होटल बाले ने सहयोग करते हुए बैग को बस मे पहुंचाया।   

धौलाछीनी से कुछ आगे प्रथम ग्रुप जो दूसरी बस से मुंसियारी से बापस हो रहा था हम लोगो को मिला। दोनों बसों के परिजनों ने बस से उतर कर एक दूसरे का अभिवादन किया, मुंसियारी से आने बाले परिजनों ने अपने-अपने अनुभव हम लोगो के साथ सांझा किया और आगे की यात्रा के लिये हौसला अफजाई की। इस 15-20 मिनिट की मेल-मुलाकात ने हम लोगो के उत्साह को और बढ़ाया। इस मिलाप को श्री विष्णु जी द्वारा भारत मिलाप के नाम से संबोधित किया जो सामयिक ही था।  यहाँ पर बस के सारथीयों ने  आपस मे अदला-बदली की क्योंकि हमारे बस ड्राईवर पहली बार पहाड़ों पर जा रहे थे। अब गुरमीत की जगह इकबाल सिंह हमारे बस चालक के रूप मे हमारे रथ के सारथी थे। सभी ने इकबाल सिंह जी का स्वागत कर आगे की यात्रा शुरू की। थोड़ी दूर कुछ आगे बिरथी फॉल दूर से ही पहाड़ की चोटी से नीचे गिरता नज़र आ रहा था जिसे बापसी मे हम लोगो ने तसल्ली पूर्वक देखा। न केवल देखा बल्कि फॉल के बगल मे जगत सिंह के होटल मे गरमा-गरम चाय पी, चाय के साथ मुंसियारी के कार्यकर्ताओं द्वारा प्रदत्त स्वादिष्ट पोहे का नाश्ता किया। अद्भुत, अद्व्तिय द्रश्य था, निहायत खूबसूरत मन को मोहने बाला। पहाड़ की चोटियों के बीच से काफी ऊंचाई से पानी  की बड़ी भारी जलधारा सैकड़ों फुट उपर से नीचे गिर रही थी। बड़ा मनोहारी प्रकृतिक नज़ारा था। जलधारा बड़े वेग से नीचे आकार बड़ी बड़ी चट्टानों से टकरा कर अपनी शक्ति का अहसास करा रही थी। चट्टानों से टकरा कर पानी चाँदी की तरह चट्टानों के बीच छिटक कर ऐसे बह रहा था मानो सफ़ेद दूध की धारा वह रही हो। हम सभी उस द्रश्य को काफी देर तक निहारते रहे। वही पर एक फिल्म के द्रश्यांकन की तैयारी चल रही थी। फिल्म का नाम अभी तय नहीं था। फिल्म के छायांकन के लिए काफी स्टाफ वहाँ पर मौजूद था इसलिए काफी गहमा गहमी थी। चाय होटल मालिक अपने होटल को भी फिल्माने का अनुरोध कर फिल्म का हिस्सा बनने की चाह मे उनके स्टाफ की सेवा मे तत्पर दीख पड़ता था। 20-25 मिनिट तक हम सभी एकटक विरथी फॉल को निहारते रहे।  श्याम जी भाई साहब द्वारा  भेजे पोहे का वितरण करने के लिए होटल बाले से लिया चमचा हम लोगो के साथ गलती से  बस मे आगया,  कोडरमा से आये नौजवान परिजन विनोद शर्मा से हमने उस चम्मच को भाग कर उस होटल बाले को बापस करने का निवेदन किया ताकि वह हम लोगो के बारे मे कोई गलत धारणा न बनाये।

अब तक मुंसियारी जाने के रास्ते मे  अंधेरा घिरना शुरू हो चुका था। बस चालक भाई इकबाल सिंह भी जल्दी से जल्दी मुंसियारी पहुँचना चाह रहे थे। बीच-बीच मे बरसात के कारण रास्ता कुछ खराब था पर इकबाल सिंह एक अच्छे और अनुभवी सारथी थे जो हम लोगो के बस रूपी रथ को निष्कंटक चला रहे थे। एक जगह बिल्ली ने हमारी बस के रास्ते को काटा तभी हमारे टोली नायक श्री विनोद सिंह जी ने बस मे सभी परिजनों से गायत्री मंत्र जप करने को कहा ताकि रास्ते मे कोई अनहोनी न हो, पर तभी आगे एक जगह विपरीत दिशा से आ रही एक जीप के  चालक ने रास्ता न होने के बाबजूद अपनी गाड़ी जबर्दस्ती रास्ते मे घुसा दी जिसके कारण कुछ अप्रिय स्थिति होने को थी। तभी दोनों चालकों ने  समझदारी दिखा दोनों वाहनों को पीछे किया और अप्रिय स्थिति को टाला। सभी परिजनों के बीच बिल्ली के रास्ता काटने के प्रसंग की काना फूसी होने लगी यध्यपि गुरुदेव देव सदा ही ऐसे अंधविश्वासों के वीरुध रहे।       
             
मुंसियारी के पहाड़ शुरू हो चुके थे और अंधेरा भी घिर गया था, रिमझिम बरसात भी शुरू हो चुकी थी। रास्तों पर कहीं कहीं गाय बैलों के झुंड सड़क पर पसर कर रास्ते को अवरुद्ध कर रहे थे किन्तु सभी परिजन गुरदेव का स्मरण और गायत्री मंत्र जाप कर सभी  बाधाओं और कठिनाइयों को पार करते हुए 8.30 बजे के आसपास चेतना केंद्र मुंसियारी पहुँच गये, जहां पर श्री श्याम जी भाई साहब के नेतृत्व मे सभी समयदानी परिजन हम लोगो का इंतजार कर रहे थे। ठंड भी पढ़ रही थी। उन सभी बंधुओं ने गरम-गरम प्रज्ञा पेय से हम सभी आगंतुकों का स्वागत किया। गायत्री मंदिर मे माँ गायत्री प॰पू॰ गुरदेव और वंदनीय माता के दर्शन किये।  मंदिर कक्ष मे ही आपसी परिचय के बाद श्री श्याम जी अग्रवाल द्वारा हम सभी साधकों को आवश्यक निर्देश दिये और  केंद्र मे करने योग्य कार्यों और कुछ सावधानियाँ को ध्यान मे रखने का निवेदन किया ताकि शिविर का कार्यक्रम अच्छी तरह और तय लक्ष्यों के साथ सम्पन्न हो सके।  सभी परुजनों को उनके कमरों मे जाकर हाथ मूंह धोकर जल्दी-जल्दी तैयार होकर भोजन ग्रहण करने के लिये आमंत्रित किया। सभी परिजनों ने भोजन ग्रहण किया और अपने अपने मोबाइल से अपने प्रियजनों को  कुशलता पूर्वक मुंसियारी पहुँचने की सूचना दी, क्योंकि हम सभी साधकों को मालूम था कि कल प्रातः 4.30 से हमारे मोबाइल, व्हाट्सप, मैसेज और स्वजनों से बातचीत चार दिनों के लिये बंद होने बाली हैं तथा 4 दिवसीय मौन साधना शुरू होने बाली है। 27 सितम्बर की रात वहाँ मौसम साफ हो गया जिससे मुंसियारी की पंचाचूली पर्वत श्रंखला साफ दिखाई दे रही थी। हिमालय पर्वत की इस श्रंखला के दर्शन कर हम अभिभूत हो गये सभी ने उक्त हिमालय पर्वत माला को प्रणाम कर गिरिराज के प्रति अपना सम्मान प्रकट किया। अब तक रात हो चुकी थी एवं सभी यात्री साधक यात्रा से थक भी गये थे अतः 10.30 तक सभी अपने अपने कमरों मे विश्राम करने चले गये ताकि अगले दिन की दिनचर्या के लिये तरो-ताज़ा होकर विशिष्ट-साधना के लिये तैयार हो सके। (क्रमशः......)               

विजय सहगल   

1 टिप्पणी:

Unknown ने कहा…

Namaste, अछा हुआ अपणे लिंक दुबारा शेअर की. विस्तृत व समर्पक वर्णन छूट गया था. धन्यवाद. मुझे याद है कि परमपूज्य गुरुजी के मात्र स्मरण से सभी बाधाये हट गई. और संपूर्ण यात्रा व शिविर गुरुजी की सुक्ष्म चेतना के साथ पूर्ण हो गया