एसटीडी-पीसीओ
हमारे एक वरिष्ठ
साथी एवं मित्र जिनके साथ मुझे दो बार
ग्वालियर मे कार्य करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। अच्छे मित्र आकर्षक व्यक्तित्व, व्यवहार कुशल, शानदार ज्योतिष एवं
जन्मकुंडली विशेषज्ञ। खुर्दबीन से खोज के बाबजूद
भी हमे उनमे कमी के नाम पर सिर्फ पान
मसाले का शौक के अलावा कोई और लत उन्हे छू भी नहीं गई थी। पर कभी कभी किसी आदमी के
उपर ऐसा आरोप लग जाता है जिस पर दूर दूर तक कोई सहज विश्वास नहीं कर सकता बिल्कुल
बैसे ही जैसे किसी हिन्दू पर गौ हत्या का आरोप?? एक घटना हमे रह रह कर याद आती है जब हमारे उक्त
मित्र पर बैंक के पास मे स्थित एसटीडी-पीसीओ, संचालक ने एक दुर्घटना मे
उसके पीसीओ का काँच टूट जाने के कारण जो
आरोप लगाया सुनकर हम लोग सकते मे आ गये, विश्वास तो दूर आरोप को सुन कर हंस-हंस कर लोट-पोट
हो गए। जिस व्यक्ति ने सादा जीवन उच्च
विचार के संदेश से इतर जीवन मे कभी कोई कार्य नहीं किया। जिसने पूरा जीवन भर शुद्ध
शाकाहार से हट कर कभी कोई ऐव या लत नहीं पाली, उस पर शराब.....तौबा- तौबा लिखते हुए भी घिन और
अफसोस हो रहा था। पर सारे स्टाफ की हंसी चाह कर भी नहीं रुक रही थी।
दरअसल हुआ ये था, शाखा नया बाजार ग्वालियर मे अर्धवार्षिक लेखा बंदी
का समय था। 1989-90 की बात थी। हम हमारे उंक्त मित्र और अन्य मित्रों विजय गुप्ता, यशवीर, रामानुज, हरज्ञान सिंह सिसोदिया, व्यास जी, बलबीर, अजय गुप्ता, राजेंद्र जी आदि सहित 30-32 स्टाफ के साथ था। श्री आर के
वोहरा जी शाखा प्रमुख थे और शायद खिच्ची साहब हाल इंचार्ज और अन्य काफी स्टाफ
सदस्यों के नाम इस समय याद नहीं आ रहे हैं शाखा मे थे। नया बाजार शाखा उस समय बैंक
के टॉप 10 शाखाओं मे समाहित हुआ करती थी। जेसी मिल, ग्वालियर रेयॉन, सिमको जैसी
देश की जानी मानी कंपनियों के व्यावसायिक लेन-देन नया बाज़ार शाखा मे होता
था। पहले जैसा कि शाखाओं मे रिवाज था अर्ध
वार्षिक और वार्षिक लेखा बंदी पर शाखाओं मे बढ़िया डिनर पार्टी का आयोजन हुआ करता था।
यध्यपि शाखा मे मदिरापान निषेध था पर विदेशी मदिरा के शौकीन इसका स्वाद चखने के
लिये शाखा के आसपास के स्टाफ के निवास मे इसका रसास्वादन का इंतजाम हरी बाबू
शिवहरे और ग्वालियर डिस्टिलर जैसे गणमान्य लोगो के सौजन्य से कर ही लेते थे। डिनर
का कार्यक्रम बहुत ही हास-परिहास के माहौल मे चल रहा था। इस डिनर पार्टी मे सिमको
कंपनी के एक उच्च अधिकारी श्री गुप्ता जी भी विशेष आमंत्रित मे थे। शाखा ने
निर्देशित लक्ष्यों को प्राप्त कर लिया था जिसका उत्साह शाखा प्रमुख श्री बोहरा
सहित शाखा के सभी स्टाफ सदस्यों के चेहरे पर झलक रही खुशी से स्पष्ट देखा जा सकता था। मोबाइल उन दिनों नहीं आया था। लैंड लाइन टेलीफोन का विस्तार देश मे चरम पर था।
जगह जगह आम पब्लिक के लिये एसटीडी-पीसीओ उन दिनो काफी पाये जाते थे। चूंकि रात 10
बजे के बाद टेलीफोन के शुल्क आधे हो जाते थे तब लोग प्रायः रात 10 बजे के बाद
पीसीओ के माध्यम से अपने रिशतेदारों और परिजनों से बात करते थे। उस दिन भी रात 10
बज चुके थे डिनर पार्टी लगभग समाप्ती की
ओर थी, डिनर
के आखिरी दौर मे मिष्ठान के वितरण और ग्रहण करना शेष था। लेकिन टेलीफोन के शुल्क
मे छूट का समय होने के कारण कुछ स्टाफ शाखा के बाहर स्थित पीसीओ मे फोन करने चले
गये। रात के समय सिवाय पीसीओ के अन्य जगह ज्यादा चहल पहल नहीं थी। अचानक ज़ोर से धमाके
की आवाज सुनाई दी। ये आवाज शाखा के अंदर
बैठे स्टाफ के सदस्यों ने भी सुनी। स्वाभिक थे सभी लोग शाखा के बाहर दौड़े। जो स्टाफ
शाखा के बाहर खड़े थे वह उस जगह पर भागे जहाँ धमाके की आवाज आई थी। पता चला एसटीडी-पीसीओ
संचालक की दुकान मे प्रवेश द्वार से लगा फुल साइज़ काँच किसी व्यक्ति के टकराने से
टूट गया है। वास्तव मे काँच पीसीओ संचालक
के ऑफिस के प्रवेश द्वार के बगल मे फुल साइज़ का फिक्स (स्थिर) काँच टूटा था। सभी
किसी अनहोनी न होने की चिंता कर रहे थे।
कहीं किसी को चोट आदि तो नहीं लगी, कोई घायल तो नहीं हुआ
इसके लिये सभी व्याकुल थे। तभी पता चला काँच टूटने से हमारे उक्त स्टाफ मित्र महोदय
को चोट लगी हैं। कुछ स्टाफ सदस्य उनको बोहरा साहब की कार से लेकर शाखा के नज़दीक स्थित जय आरोग्य
अस्पताल ले गये। बाकी सभी सदस्य इतने बड़े काँच के टूटने से घायल उक्त मित्र की चोट के बारे मे चर्चा कर उसकी गहराई और
नाजुकता के बारे मे चिंतित थे। कहीं कोई
गंभीर चोट आदि न लगी हो!! डिनर मे शामिल लोग कुछ दुःखी और गमगीन होकर उक्त मित्र के आने का इंतजार कर रहे थे। थोड़ी देर बाद वह जेए
हॉस्पिटल से बापस आ गये। ईश्वर को धन्यवाद था चोट गंभीर नहीं थी। साधारण चोट काँच
के टुकड़े नाक पर गिरने के कारण लगी थी, चिंता की कोई बात नहीं थी। ये तो अच्छा रहा काँच सिर के ऊपर नहीं गिरा अन्यथा मामला गंभीर
हो सकता था। ये देख सुनकर सभी स्टाफ सदस्यों ने चैन के साथ मिठाई का रसास्वादन
किया। हम लोगो ने जब उक्त मित्र से यूं ही
मज़ाक मे पूंछा आपसे इतना बड़ा काँच टूटा
कैसे और ये बहादुराना काम आपने किया कैसे? बातचीत मे उन्होने बताया कि फुल साइज़ काँच जो लगभग 10X8 फुट का होगा द्रष्टि भ्रम
के कारण लगा कि इस मे कोई काँच नहीं है यह खाली
खुली रास्ता है। क्योंकि काँच पर कुछ क्रॉस का निशान या प्रवेश निषेध या
कुछ फूल पत्ती आदि लिखा या बना नहीं था। कुछ लिखा या बना होता या कुछ अवरोध रखा
होता तो रात मे दृष्टि भ्रम न होता और न ही ये दुर्घटना होती। उनकी इस
बहादुराना काम देख कर किसी शायर की ये लाइनें हमे याद आ गई:-
"डर
मुझे भी लगा फासला देख कर, पर मै बढ़ता गया
रास्ता देख कर।
खुद
व खुद टकराती...... गई,
मेरी मंजिल मेरा हौसला देख कर"॥
दूसरे दिन जब सभी शाखा मे आये तो सभी रात को हुई
घटना की ही चर्चा कर रहे थे और ईश्वर को अनहोनी टालने के लिये धन्यवाद दे रहे थे।
उन दिनो "शिंकारा" के टीवी विज्ञापन की चर्चा कर कुछ स्टाफ मज़ाक मज़ाक मे
उक्त मित्र को "शिंकारा बॉय" कह बुला रहे थे, जिसमे टीवी पर दिखाया
जाता था कि कैसे एक ऑफिस का अधिकारी काम
के बोझ से दबा है और एक चम्मच शिंकारा पीते ही ताकत का अहसास कर फ़ाइल लेकर काँच तोड़ते हुए ऑफिस से निकलता दिखाई
देता हैं। उसकी पंच लाइन होती थी:-
"ये बेचारा, काम के बोझ का मारा, इसे चाहिये हमदर्द का टॉनिक शिंकारा।"
टिंग-ठोंग। उक्त विज्ञापन पिछले रात हुई घटना पर सटीक बैठता थी।
काँच टूटने की रात मे घटी घटना से सभी स्टाफ इसलिये खुश थे कि चलो रात को आया संकट
किसी तरह टल गया। पर काँच टूटने से हुई गंभीर
चोट का संकट तो टल गया पर एक नया संकट दूसरे दिन आ गया जिसकी कल्पना हम स्टाफ ने नहीं की थी। हुआ
यूं कि दूसरे दिन एसटीडी-पीसीओ संचालक आया और अपने टूटे काँच का हर्जाना मांगने लगा। हम लोगो ने
पीसीओ बाले से कहा एक तो आपने पूरे प्लेन काँच मे कुछ पेंट आदि से "प्रवेश
निषेध" या कुछ शब्द आदि लिखना चाहिए था या कुछ अवरोध गमले आदि रखना चाहिए था, ताकि दृष्टि भ्रम से होने बाली दुर्घटना से बचा जा सके। तुम काँच का हर्जाना मांग रहे हो और हमारे मित्र को जो चोट लगी और कष्ट हुआ उसका हर्जाना कौन
देगा। अब पीसीओ बाले और बैंक के स्टाफ मे कुछ वाद-विवाद होने लगा। पीसीओ बाला बोला
यदि हमे हर्जाना नहीं दोगे तो हम पुलिस मे शिकायत दर्ज कराएंगे कि "हमारे
उंक्त मित्र ने शराब के नशे मे पीसीओ मे
आकार हमारा शो-केश का काँच तोड़ दिया"? बात पुलिस से डरने की नहीं थी, पर आरोप "शराब के
नशे मे काँच तोड़ने" से हम लोग भी
चौंके और उसको डांट कर बोले क्या बोल रहा हैं। जिस व्यक्ति ने कभी शराब को छुआ
नहीं उन पर शराब पी कर नशे का आरोप लगा रहा हैं?? लेकिन पीसीओ बाला अपनी बात पर अड़ा रहकर हर्जाना
मांगता रहा अन्यथा शराब पी कर काँच तोड़ने के आरोप से पीछे हटने को तैयार नहीं हो
रहा था। काफी बहस-मुस्सहिबा के बात आधा-आधा हर्जाना भुगतने की बात पर सहमति बनी।
इस तरह उस समय 400-500 रूपये का हर्जाना देना
पड़ा। हम सभी स्टाफ काफी दिनों तक यही बात करते रहे कि उक्त मित्र को चोट भी लगी हर्जाना भी भुगता वो कोई बड़ी बात
नहीं थी पर इन सबसे उपर अफ़सोस इस बात का
था कि उनके उपर ऐसा आरोप लगा जिस पर हम सभी स्टाफ को भी दूर दूर तक कभी विश्वास
नहीं हो सकता। जिस आदमी ने कभी शराब को
हाथ भी नहीं लगाया उस पर आरोप यह लगा कि "शराब के नशे मे शो-रूम का काँच तोड़ दिया"।
हमारे उक्त मित्र के उपर इस "इल्ज़ाम" पर जिगर मुरदाबादी का एक
शेर याद आ रहा है जिसमे हमारे मित्र मानों "शराब" से शिकवा कर रहे हों:-
यूँ
ज़िंदगी गुज़ार रहा हूँ तिरे बगैर।
जैसे
कोई गुनाह किए जा रहा हूँ मैं॥
विजय
सहगल




कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें