जागेश्वर (अल्मोड़ा)
3 अक्टूबर
2019 को मुंसियारी शिविर से बापसी मे यूं तो सभी परिजनों के साथ बापस हरिद्वार
जाना था, पर रास्ते मे अल्मोड़ा घूमने का लोभ संवरण न कर सका। यहाँ पर तय
कार्यक्रमनुसार हमारे बड़े भाई श्री शरद सहगल सपत्नीक बरेली से अल्मोड़ा पहुँच चुके
थे हम भी बापसी मे शाम को मुंसियारी से
सभी परिजनों का साथ छोड़ कर अल्मोड़ा उतर गये। उत्तराखंड का एक महत्वपूर्ण केंद्र
पर्यटन की द्रष्टि से अति महत्वपूर्ण है जहाँ हम पहले कभी नहीं आ पाये थे। रात्रि
मे विश्राम कर अगले दिन सुबह हम लोग अल्मोड़ा से लगभग 35 किमी दूर जागेश्वर मंदिर
श्रंखला देखने निकले। इन दिनों यहाँ पर पंचायत चुनाव की गहमा गहमी चारों तरफ नज़र आ
रही थी। जगह जगह चुनावी पोस्टर लगे हुए थे। प्रत्याशी और उनके समर्थक जलूस, जलसों मे जीपों पर अपने कुमायूंनि परिवेश मे प्रचार करते नज़र आ रहे थे जो
पर्यटन के अलावा हमे अल्मोड़ा की सांस्कृति और रीतिरिवाज,
भाषा से परिचय करा रहा था। अर्तोला से एक रास्ता धारचूल (चीनी बार्डर) के लिये जाता
था जो वहाँ से 184 किमी था एवं एक रास्ता जागेश्वर मंदिर श्रंखला को जाता था जो
4-5 किमी था अतः हम लोग अर्तोला मे एक चाय की दुकान जय भोले भोजनालय पर चाय और
यहाँ का प्रचलित नाश्ता बंद के साथ मटर-छोले लिये। हमारे भाई साहब ने प्रचलित नाश्ते मे थोड़ा बदलाव कर मटर मे प्याज, धनिया और नीबू हरी मिर्च का समावेश किया जो उन्हे बड़ा प्रिय लगता है इस
तरह अल्मोड़ा के नाश्ते का थोड़ा ट्विस्ट हम
सबको प्रिय लगा। चाय बनने तक हम लोगो ने चुनावी चर्चा भी की। चाय स्टॉल बाला भाजपा
समर्थक था।
चाय-नाश्ते
के बाद हम लोगो ने जागेश्वर के लिये प्रस्थान किया। रास्ता एकदम से नीचे की ओर
घाटी मे था। रास्ते के दोनों ओर चीड़ और देवदार के ऊंचे ऊंचे पेड़ आसमान की ऊंचाई को
छू रहे थे। मौसम भी खुश गवार था। हल्की
हल्की ठंड थी पर धूप भी खिली थी। 15-20 मिनिट की ड्राइव पर एक छोटी सी जल धारा
जिसे "जटा गंगा" कहा जाता है के तट पर सुंदर
हरे-भरे वृक्षों से परिपूर्ण पहाड़ों की
पृष्टभूमि मे बसे विशाल प्रांगण मे लगभग 125 छोटे-बड़े मंदिरों की श्रंखला स्थित है जिसे जागेश्वर
मंदिर श्रंखला कहा जाता हैं। बहुत छोटी आवादी एक छोटा गाँव पर कुछ आवास जो एक शतक
पूर्व बने प्रतीत हो रहे थे अपने वैभव की कहानी सुना रहे थे किन्तु समय के थपेड़ों
ने उन्हे बूढ़ा बना दिया था। जटा गंगा मंदिर के पार पंचायत द्वारा एक विशाल मैदान
मे मेला, भंडारा, वाहन पार्किंग आदि के
लिये निर्माण कार्य चल रहा था।
मंदिर
श्रंखला 7वी-8वी शती से लेकर 14वी शती के बने हुए थे। मुख्य
मंदिर जो महामृतुंजय मंदिर के नाम से जाना जाता है सबसे बड़ा और ऊंचा मंदिर था, मंदिर मे विशाल सुंदर शिवलिंग के दर्शन हुए। इस मंदिर के सामने केदारेश्वर मंदिर जो इस श्रंखला का दूसरा
मंदिर है जिसमे भगवान केदारनाथ के दर्शन होते है। उक्त दोनों मंदिर अपनी स्थापत्य
कला के वेजोढ़ उदाहरण है। इस आध्यात्मिक एवं पौराणिक काल की नगरी का कुमायूं मण्डल मे
अपना एक अलग स्थान हैं जिसके कारण इसे राष्ट्रिय संरक्षित स्मारक घोषित किया गया
हैं। प्रांगण मे अन्य अनेक छोटे छोटे मंदिर द्रष्टिगोचर होते है जो सारे मिल कर इस
प्रांगण की दिव्यता एवं अध्यात्मिकता को
चार चाँद लगाते हैं। प्रांगण मे कार्यरत
कुछ महिला मजदूरों ने अपनी फोटो लेने का भी आग्रह किया जिसे हम इंकार न कर सके।
मंदिर
के दर्शन के पश्चात मंदिर प्रांगण के
बाहर-सामने छोटी छोटी मंदिर से संबन्धित वस्तुओं की दुकाने
और खाने-चाय आदि की दुकाने थी। तभी मैंने कुछ लोगो को देखा जो अपने साथ
संगीत वाध्य यंत्र लेकर जा रहे थे और शायद कुमायूं के संगीतज्ञ ग्रुप था। मैंने यूं
ही उनका परिचय जानने की ईक्षा प्रकट की। उन सरल हृदय व्यक्तियों ने बताया वे
स्थानीय संगीत वाध्य यंत्रों विशेषज्ञ है और एक शादी के बारात मे अपना संगीत मंडली के साथ हल्द्वानी जा रहे हैं।
उनमे से एक जो श्री भगवान चन्द पांडे जी
थे और उनके हाथ मे कुमायूंनि संगीत वाध्य "तुरही" था को हमने कुछ सेकेंड के
लिये तुरही बजाने का आग्रह किया जिसको उन्होने सहज स्वीकार कर लिया और हमारे ब्लॉग
के लिये विशेष रूप से बजाया भी जिसका शानदार विडियो हम संलग्न कर रहे हैं।
श्री
भगवान चाँद पांडे जी की "तुरही" का संगीत सुनकर मै भी अब कुमायूंनि माहौल
के रंग मे पूरी तरह रच-वस कर कुमायूंनि हो
गया था। तभी एक जीप के साथ 40-50 लोग जागेश्वर पंचायत के चुनावी जलूस के साथ
प्रचार करते नज़र आए। वे सभी एक प्रत्याशी श्रीमती हेमा गेढ़ा, चुनाव चिन्ह "केतली" (मोदी बाली) के समर्थक थे। कुमायूंनि संगीत
के बाद अब हमने उत्तराखंड की राजनीति मे भी अपना दखल दिया और श्रीमती हेमा गेढ़ा के
समर्थन मे चुनाव प्रचार किया, हमारे चुनाव प्रचार को जगेशवर
की जनता ने अपना प्यार भर प्रतिसाद दिया। हमने जागेश्वर की जनता से उन्हे विजयी
बनाने का अनुरोध किया जिसका विडियो भी इस ब्लॉग मे संलग्न कर रहा हूँ। अब तक तो
नतीजे आ चुके होंगे पता नहीं श्रीमती हेमा गेढ़ा जीती या नहीं? अगर जीत जाती है तो हमे वादा अनुसार उनसे एक पार्टी लेने दुबारा जागेश्वर
जाना होगा और इस तरह उत्तराखंड की राजनीति मे हमारा भी थोड़ा बहुत दखल की शुरुआत होगी और
अगर श्रीमती हेमा गेढ़ा नहीं जीती?? तो क्या लिखना आप खुद समझदार हैं??
राजनीति
के बाद जागेश्वर पुरातत्व संग्रहालय देखने गया। कर्मचारियों ने मुझे देखते ही मेरा
कुछ विशेष सम्मान के साथ संग्रहालय मे
स्वागत किया। तभी याद आया मेरे चुनाव प्रचार को वे सभी भी संग्रहालय से खड़े होकर
सुन व देख रहे थे। संग्रहालय मे मंदिरों से प्राप्त भगवान की मूर्तियों को एकत्रित
कर संजो कर रखा गया है ताकि मूर्ति तस्करों से इन्हे बचा कर रखा जा सके। बहुत
दुर्लभ एवं दर्शनीय मूर्तियों के दर्शन कर अपने आपको अभिभूत और धन्य माना। पूर्व
मे इन पुरातत्व रूप से बेशकीमति मूर्तियों को चोरी के प्रयास देशद्रोहियों द्वारा
किये जा चुके थे इसलिए इन पुरातत्व रूप से बहुमूल्य मूर्तियों को सुरक्षित
सीसीटीवी की निगरानी मे रखा गया है। मैंने कर्मचारियों के सद्व्यवहार और संग्रहालय
के रखरखाव, साफ सफाई की प्रशंसा आगंतुक रजिस्टर मे दर्ज़ की।
बापसी
मे डंडेश्वर मंदिर के दर्शन किये जो जागेश्वर मंदिर की ही तरह उसी वास्तु कला के
आधार पार बनाये गये है जो जागेश्वर से लगभग 2 किमी दूर उसी जटा गंगा नदी के किनारे
सुंदर रमणीय प्रकृतिक हरे-भरे व्रक्षों से आच्छादित पर्वत श्रंखलाओं के बीच स्थित
है। इस तरह अल्मोड़ा के प्रसिद्ध जागेश्वर मंदिर के दर्शन कर हम सभी लोगो ने अपने आपको
कृतार्थ समझा एवं बापस अल्मोड़ा के लिये
प्रस्थान किया।
विजय
सहगल










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