रविवार, 27 अक्टूबर 2019

दीवाली उजियारी



"दीवाली उजियारी"






दीयों की रोशनी के रहते, फिर क्यों है ये स्याह अँधेरा?
हर घर दीवाली उजियारी, पर क्यों बंचित इसमे घर मेरा?

हे कृष्ण आओ इस दीपावली, सुदामा तुम्हारा बुलायेगा ज्यों?
गारीबों के दाता तुम्हें सब पुकारें, पर मित्र तुमको पुकारेगा क्यों?
दीनहीन  के  आँसू पोंछो, दीनन का  कल्याण करो।
दीन दरिद्र निहारे तुमको, निर्धन का तुम ध्यान धरो॥
बदला जीवन सुदाम का ऐसे, रात के बाद सुबह का सवेरा॥  
हर घर दीवाली उजियारी, पर क्यों बंचित इसमे घर मेरा॥

राम हमारे भी  आराधन, परम  मर्यादा  पुरुषोत्तम।
ध्यावे-आराधे यश गावे, ऋषि मुनि गण द्विजोत्तम॥
बिता वरष चउदा घर आये, आनंदित हर घर हरि जन।  
वनवास हमारा पड़ा अधूरा, भोगे कुटुंब  सहित नन्दन॥       
अबकी उबारो पार लगाओ, जिन दुःख दरिद्रों  ने घेरा।
हर घर दीवाली उजियारी, पर क्यों बंचित इसमे घर मेरा॥

ज्ञान के देवी वीणा वादिनी, धवल वस्त्रधारी हंस वाहिनी।
स्वर की देवी, वेदों की ज्ञानी, मेधा-प्रज्ञा, बुद्धि, प्रदायनी॥       
अज्ञानता पर हो ज्ञान की जय, हे शारदे माँ  सद्ज्ञान देना।
हम है निरक्षर, हे! बुद्धिदात्री, सद्ज्ञान का हमको वरदान देना॥
ज्ञानाक्षरों  को  मुझे तू पढ़ा कर, मेरे घर तूँ  बना ले डेरा।    
हर घर दीवाली उजियारी, पर क्यों बंचित इसमे  घर मेरा॥

विजय सहगल

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