मंगलवार, 22 अक्टूबर 2019

दीवाली का एक दिया


दीवाली का एक दिया





एक दिया  इस दीवाली का, उस  बलिवेदी पर  भी जलाओ।
देश की खातिर खेत रहे उस, वीर सा जीवन निज अपनाओ॥  

सीमाओं की रक्षा  करने,  नींद चैन को  भगा-गवा कर।
देश की खातिर अपनी रातें, रिपु-दमन मे लगा-जगा कर॥
हम सब की खुशियों अटूट कर, अपने सुख को लगा दिया।
आन पड़ा  जब देश पे संकट, जीवन  अपना  गवा दिया॥
सीमा के उस सतत प्रहरी को सजल श्रद्धा  सुमन चढाओं।  
एक दिया इस  दीवाली का उस बलिवेदी पर भी जलाओ॥

हमने सीखा ऋषि-मुनियों से, गुरु गोविंद मे चुनना क्या?
गुरु ज्ञान के उपजे गुण से, वेद-उपनिषद मे सुनना क्या? 
ऋषि आश्रम की शिक्षा हमको मानवता का बोध कराती।
सत्या, अहिंसा, करुणा-प्रेम और गीता का संदेश सुनाती॥
उस गुरु सत्ता का सुमरिन कर पथ से  कांटे दूर हटाओ।
एक दिया इस दीवाली का उस बलिवेदी पर भी  जलाओ॥

उस श्रमिक को याद करो, जिसके श्रम से मिला है आश्रय। 
खुद रहा खुले आसमां नीचे, रही संतति भी सदा निराश्रय॥  
निर्माण वास्तु का उस श्रम से जो उत्पीढन के बिना बना॥  
उजड़े-महल, किले-वीराने, सुख  शांति-निकेतन है  अपना।
वास्तु देव को नमन करो, शुभ-लाभ के पग अंदर लाओ।
एक दिया इस दीवाली का उस बलिवेदी पर भी  जलाओ॥

अन्न के दाता का भी श्रेय है, जीवन रुधिर बनाने का।  
खेत से  अपने उपजा जीवन, मानव श्रेष्ठ जगाने का॥ 
नहीं सराहों उन्हे जिन्होने, अनीति पूर्वक कमाया धन हैं।
नीति शास्त्र की शिक्षा कहती जैसा अन्न-बैसा ही मन हैं॥
अन्न देव का ग्रहण प्रसाद कर वसुधैव की अलख जगाओ।
एक दिया इस दीवाली का उस बलिवेदी पर भी  जलाओ॥

विजय सहगल

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